रविवार, 12 अगस्त 2012

कृष्ण-सखी - 55.& 56.


55 .
*
विषम जीवन के दुर्दांत क्षणों में जो निरंतर अवलंब दिये था वह आधार चला गया . अधीर हो-हो कर बार-बार  रो पड़ती है पांचाली .
बिखरे केश ,वस्त्र मलीन - धरती पर बैठी है .सारे भान भूल गई है . अनायास आँसू बहने लगते हैं ,पोंछने की सुध नहीं .अंतर की वेदना बार-बार मुखर हो उठती है .
'ओ मीत, कहाँ हो तुम ?'
अंतर्मन से  रह-रह कर पुकार उठती है.
कृष्ण बिना इस संसार में कैसे जिया जायेगा ?
कैसे समझेगा कोई - कृष्ण, तुम कौन थे मेरे ?
कोई नहीं - सब-कुछ !
संसार के सारे काम चल रहे हैं पर भीतर एक शून्य समा गया है . कुछ अनुभव नहीं हो रहा . एक रिक्ति -सबसे विरक्ति.
वेदना अंतस्तल में जम गई है .
कोई अपना नहीं रहा था जब, बिलकुल अकेली पड़ गई थी ,बस, एक ने साथ दिया था .
हर विषम क्षण में ,उसे ही बार-बार पुकारता है आकुल मन !
पर वह कहाँ है ?
स्मृतियाँ बार-बार उमड़ती हैं .विगत कथा के बिखरे अंश समेट लाती
 विचलित कर जाती हैं .
 पतियों का मुख हत-तेज हो गया है .पार्थ घोर ग्लानि से ग्रस्त !नहीं बचा सके उन कुलनारियों को, वन्य जातियों द्वारा हर ली गईं वे .कुछ नहीं कर पाये, नितान्त असमर्थ !
सामर्थ्य तुम्हारी थी ,निमित्त मात्र थे शेष सब.
  नर ,नारायण से विच्छिन्न हो गया . नारायण छोड़ कर चला जाये तो नर अकेला क्या करे -एकाकी ,आहत, विवश !
मीत ,तुम इस जीवन में न होते तो .....बस, आगे नहीं सोचा जाता.
अब क्या करना है?सौंप दो सब,जिसका जो हो ले ले .हमारा कुछ नहीं, न राज न भोग .
पांचाली का मन पुकारता है , कहाँ हो तुम ?  कहीं तो होगे पर अब मैं नहीं हूँ मीत ,क्योंकि तुम यहाँ नहीं हो .तुम्हारे जाते ही सब समाप्त हो गया मान -अपमान ,सुख-दुख ,यश-अपयश।.मने सम्पत्ति -विपत्ति में समभाव से जीना सिखाया .अब जब तुम नहीं हो मैं व्यर्थ -सी रह गई हूँ .मेरी बात आती है तो सारी मर्यादायें ,सारे औचित्य बदल जाते हैं और तटस्थ दर्शक बन कर देखता रहता है सारा संसार.
तुम्हारे बिन क्या करती मैं ?
लाख प्रयत्न करती हूं ,नहीं भूल पाती ,उस असह्य क्षण को जो भयावह स्वप्न बन कर मुझ पर  घिर आता है .लगने लगता है, भरी सभा में कोई निर्वस्त्र कर रहा है मुझे . तुम्हें टेरती हूँ .उद्भ्रान्त सी हो हो.
 नहीं उबर पा रही .इन सब संबंधों से मेरा विश्वास उठ गया है  ,
जिस दिन आकाश से एकदम गहरी खाई में जा पड़ी थी ,कहीं सहारा नहीं था .पूरे प्राण-प्रण से  पुकारा था तुम्हें  और तभी समझ गई थी कि तुम्हारे सिवा ,और कोई  मेरा नहीं .
भयानक अकेलापन  घेर लेता है बार-बार ..
तुम्हारे बिना उस विभीषिका से मुक्त नहीं हो पाती मैं !
मन में बोलता है कोई-,' तुमने  सारा भार मुझे सौंप दिया था .अब क्यों खोल रही हो पुरानी गठरी ?'
अनायास अश्रु प्रवाहित होने लगते हैं .
- व्यथा का ज्वार उमड़ता चला आता है . संयम के सारे बाँध टूट जाते हैं.
*
जिसने सदा धैर्य दिया,साहस बँधाये रखा वह द्रौपदी बिखर  रही है .
सब निबटा गये तुम ,अब कुछ नहीं बचा  करने को - तो फिर मैं क्यों हूँ ?
 पाँच पति , पर किसी  को धीरज देने का साहस नहीं हो रहा .जस के तस विमूढ़ से सब.
सबसे बहुत कुछ पूछना है.पर किसी के पास कोई उत्तर नहीं .हाँ, मेरे पतियों ,अब मैं मुक्ति चाहती हूँ. जीवन जीने की इच्छा नहीं रही मुझमें .नहीं होना चाहती पट्टमहिषी.
रह-रहकर स्वर खो जाते हैं हिचकियों में -
 आज मैं सब भूल गई हूँ सारी मर्यादायें सारे औचित्य !
'कभी-कभी पुरुष मात्र से वितृष्णा होने लगती है मुझे, अपने उद्देश्य की पूर्ति का माध्यम बना लिया स्त्री को .कामना-पूर्ति का हेतु मात्र !
पर पुरुष ही तुम भी थे -  पुरुषोत्तम सही. '
विमूढ़ युधिष्ठिर सुन रहे हैं चुपचाप !
उन्हें लगता है वेग उतरेगा ,तो शान्त हो जायेगी .
ठगे से भीम , व्यथित अर्जुन ,जड़ हो गये  नकुल-सहदेव .
सब जैसे एक दूसरे को न झेल पा रहे हों ,परस्पर दृष्टि बचाये . कोई नहीं  जो आगे बढ़े कुछ कह सके .ज्वार का वेग कौन थामे !
*
 लगातार पुकार उठ रही है - कहाँ हो ?  तुम बिन इस संसार में कैसे जिया जायेगा ?
लगा कृष्ण ने हाथ पकड़ लिया है - 'गंभीरता से मत लो सखी !खेल समझ कर खेलो .आरोपित वस्तुओं को ऊपर -ऊपर से ही बीतने दो. '
'सब ओर तुम्हें हेर रही हूँ .कहाँ हो तुम ?'
विषाद-मग्नता बार-बार जड़ कर देती है
 उसने कहा था , 'जब भी पुकारोगी मैं होऊँगा तुम्हारे पास .'
यह भी कहा था उस महारास में  हर गोपी के साथ मैं ही तो रहा था......
कहाँ है वह ?हाँ ,शब्द हैं उसके -
'शंका मत करो ,मैं हूँ सतत तुम्हारे साथ,
 मैं सदा था, हूँ और रहूँगा .और तुम भी पांचाली  ,
अपने संस्कारों के अनुकूल मनोवृत्तियाँ धारे जन्म-जन्मान्तरों  तक मिलते रहेंगे हम !'
कितने रूप ,कितने नाम ,सहस्र-सहस्र दृष्यों में विद्यमान !
 हाँ ,कहा था तुमने , 'अनगिनत रूप धारे. यहाँ-वहाँ हर जगह व्याप्त .दिग्-दिगंत तक ,आत्म से परमात्म तक .वही चेत सब में झंकारता ,योजता, जैसे माला में डोरी !'
शीश नत कर लिया द्रौपदी ने .
लगा मन के आगे डोल गया वह अपरूप.
माधव ,तुम  नहीं गये ,बस ओझल हो गये हो दृष्टि से .'
लगा कह रहा है -'मैं तो ग्वाला हूँ सदा चराता हूँ तुम्हारी गायें  .'
 वही टेढ़ी मुस्कान .
 पर आज  खीझने  के स्थान पर मन रीझा जा  रहा है .
*
हाँ ,तुम हो .आभासित होते हो ,मेरे अंतर में .
अपनी ही अलापे जाओगी ,या कुछ मेरी भी सुनोगी  ,
 'हे ग्वाल, मेरी गौ बार-बार हरक कर भागती है .मन  भटकता है यत्र-तत्र-सर्वत्र,.समा लो अपने झुंड में !'
'हँकार लाता हूँ जब भटक जाती हैं ,पर दुहना तो तुम्हें ही है न - इन्द्रियों का आनन्द ! कभी सरस कभी फीका !'
'ग्वाला हूँ न पांचाली ये चतुर्दिक् गोचर जो हैं .देख लो इन चरती हुई गायों को...चाहता हूँ खींच लूँ अपने पास .'
हँस रहा है ,नटखट.
 तुम भी तो मुकुन्द .सबसे भिन्न सबसे निराले !'
  'भिन्न न रहूँ तो ग्वाल कैसे बनूँ ?'
लगा वह हँस रहा है मुँह टेढ़ा किये ,'क्यों, मैं मिला नहीं क्या तुम्हें ?'
शान्त हो चला है मन !
 *
समय बीत रहा है .कितने दिन -कितनी रातें .
अपने आप में डूबी , यंत्रवत् सारे  दायित्व निभाती है .
मन में मौन संवाद चलता है .
'परिताप  कहाँ झेला तुमने ?सारी सुलगन तो मेरे हिस्से आई .'
'तुम्हें क्या पता ?'
एक उसाँस उठी हो जैसे !
'जानती हूँ पर कह लेती हूँ ,एक तुम्हीं से तो .'
'द्रौपदी , देह का स्वभाव  है ताप !..औरों के दुख देखो. अपने से कम कर के मत आँको ..
और  देह.यही तो बनती है  सारे पापों की मूल .'
' भीतर दहकती है तो आँच आती है .तपाती है .फिर विचारती हूँ , जल  छींटती हूँ ज्यों ..,कुछ शान्ति पड़ती है उस समय .पर मेरे बस में नहीं ,आवेगों का उफान फिर-फिर  उमड़ता है.'
  ' सुविचारों का छिड़काव शान्त करता रहे .और पांचाली , देह है तो
ताप उमड़ेगा ,यही संसार का क्रम है ,कौन बचा है इस सुलगन से !
..माटी की रचना सखी,कभी मंद कभी तीव्र आंच नहीं खायेगी तो पकेगी कैसे ? मीता , इससे निस्तार नहीं .देह के साथ विदेह को निभाना यही तो जीने की कला है .'
*
उसने आगे  कहा था -
'पांचाली ,मेरा-तुम्हारा भौतिक संबंध कब रहा ? केवल शब्द , विश्वास और पारस्परिक  समझ.तभी तो पक्के साझीदार हो सके. '
तुम क्या अंतर्मन में जागते हो ,कृष्ण ?
कोई उत्तर नहीं .
कर्तव्य पूरे करने को निभाती रहे देह अपना धर्म , यही तो था उस  कथन का मर्म !
सामने होता तो चिढ़ाता ,'जुगाली कर रही हो ?'
 सोच कर अनायास मुस्करा दी .
कोई देखे तो क्या कहे !साम्राज्ञी पगला गई हैं
अपने आप हँसे जा रही हैं .
'साम्राज्ञी,देवी वृषाली पधारी हैं .'
परिचारिका कह रही थी .
'हाँ हाँ ,भूल गई थी मैं ,विशेष कक्ष में सम्मानपूर्वक आसन दो .कहो ,मैं बस उपस्थित हो रही हूँ .'
उठ पड़ी वह .
कर्ण की स्मृति उदित हुई -कितनी संश्लिष्ट .कितने-कितने दृष्य एक-दूसरे में गुँथे .
वृषाली .  मेरे बाँटे भी आये थे तुम्हारे पति. पर यह भी उनका दुर्भाग्य रहा , सखा ने उनके लिये कहा था,'जितना निर्मल अंतःकरण उतनी दमक से दीपित .कवच-कुंडलहीन हो कर भी वही ओज-तेज .'
तुम अनजान नहीं हो.पति की कोई बात तुम जैसी पत्नी से अजानी नहीं रहती ,कितनी सहनशील कितनी संयमी हो तुम !
वह चली गई वृषाली से भेंट करने .
*
56.
 काल का चक्र अविराम घूमता रहा. महा-समर के बाद दो पीढ़ियाँ धरती पर आ चुकीं  .
  बहुत-कुछ बीत गया .हर विपद् में सहारा देनेवाला अभिन्न मित्र खोकर नर एकाकी रह गया.प्रिय सखा अब कभी नहीं मिलेगा जान कर भी पांचाली दिन बिताती रही .
कृष्ण का प्रस्थान एक रिक्तता सिरज गया ,किसी के आने की उत्सुक प्रतीक्षा नहीं रहती .सब कुछ  निश्चित ढंग से चलता है .शत्रुओं के साथ मित्रों-संबंधियों का भी विनाश हो गया .वह आवागमन ,वैसे आयोजन और वह उल्लास अब कहाँ ? बराबरी के संबंध कहाँ रहे ?
  एक उदासीनता सर्वत्र समा गई हो जैसे .
 अपार जलराशि दहाड़ रही है जहाँ द्वारकापुरी थी .
अब उस पर कहाँ-कहाँ के विदेशी पोत दिखाई देने लगे हैं  .
सब ओर क्षरण के लक्षण .कैसा युग कि आस्थायें और विश्वास बिखरे जा रहे हैं .
 फिर एक दिन द्रौपदी ने कहा ,'सम्राट् युधिष्ठिर ,सुनो !'
सब सचेत ,आज पांचाली ,बड़े पांडव को नाम से बुला रही है .
कुछ चौंके से बोले ,'कहो, साम्राज्ञी.'
 गंभीरता छाई है ,वातावरण की शान्ति बोझिल -सी ,' मुझे लगता है ,हमें जो करना था कर चुके .समय बदल गया. अब बागडोर नये हाथों में दे कर मुक्त हों .'
' मैं भी यही कहना चाह रहा था ,
सब के मनों में इस  सब से उपराम होने की इच्छा जागने लगी है .
परस्पर विचार कर शासन-दंड परीक्षित को सौंपने को प्रस्तुत हैं युधिष्ठिर .
*
कृष्ण द्वैपायन के सम्मुख चर्चा हुई.
उन का मत है पहले युवराज को प्रजा के सामने लाओ , सारी वस्तु-स्थिति से अवगत होने दो .विगत के परिप्रेक्ष्य में वर्तमान को समझेगा तभी भविष्य के लिये उचित निर्णय ले पाएगा.
तब से अधिकतर वार्तालापों में परीक्षित की उपस्थिति रहने लगी  .
विचार-विमर्ष में पांचाली के साथ , सुभद्रा और उत्तरा को सम्मिलित करने का आग्रह रहता है .उत्तरा राजमाता होगी ,दायित्व निर्वाह हेतु समुचित मानसिकता बने, प्रारंभ में कोई अवलंब चाहिये उसे ,सुभद्रा से अधिक और कौन उसके समीप होगा.
मित्र की भगिनी के नाते सुभद्रा ,पांचाली को और प्रिय हो उठी है .वैसे भी पट्टमहिषी के कर्तव्य निर्वाह में बहुत औपचारिकतायें व्यस्त रखती हैं .सुभद्रा के निस्पृह सहयोग से बहुत सुविधा हो जाती है.
इतनी शीघ्र युग-परिवर्तन हो जायेगा किसने सोचा था.
शंकाओं का युग ,अनास्था का युग !
उन घटनाओं को नई पीढ़ी अपने  ढंग से देख रही है - उल्लेख करती है जैसे कोई इतिहास  .
जन-चर्चाओं की गूँज राजमहल तक चली आती है .
अपनी सुनी-सुनाई के आधार पर वे कहते हैं -'पार्थ सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर नहीं थे .'
 पार्थ ने होंठ काट लिये ,युधिष्ठिर ने शीष झुका लिया .
पांचाली ,कुछ सोचती चुप रह गई .
सर्वश्रेष्ठ धनुर्धऱ ?
वसुषेण .हाँ वही ,सबसे तिरस्कृत हो कर भी श्रेष्ठतम .
एकलव्य किसी सहायता के बिना ,अपनी साधना के बल पर  सर्वश्रेष्ठ !

पर इनकी योग्यताओं का यहाँ कोई मूल्य नहीं था !
धनी-निर्धन का भेद तब भी था -एक ओर सारे विलास दूसरी ओर संतानों को दूध के अभाव में आटे का  घोल  पिला कर आश्वस्त करनेवाले गुणी - जन तब भी थे.पर तब आश्रय देने वाले समर्थ थे .अब तो वह भी नहीं .

वेश बदल कर  पांडव-बंधु लोगों के बीच टोह लेने पहुँच जाते हैं .राज-परिवार के विषय में वार्तालाप करना जनता का स्वभाव है - जो कुछ हुआ नये लोगों में उसे जानने का कौतूहल  है.
लोक-मानस उतना सहज-संतोषी नहीं रह गया .
*
युवराज परीक्षित की भिज्ञता बढ़ रही है.समय के साथ आनेवाले परिवर्तनों को समझ रहे हैं .
 सीमित बुद्धि जब गहन को व्याख्यायित करने पर उतर आती है तो विवेक पर आवरण पड़ जाता है .परिणाम एक से अनेक मत-मतांतरों की उपज .सबकी अपनी ढपली अपना राग , और सामान्य-जन भरमा कर,उसे ही परम साध्य समझने लगता है.
भक्ति का उद्देश्य उन्नयन से हट कर मन-रंजन हो गया .
 किंवदंतियो में व्याप्त कृष्ण का पुरुषोत्तमत्व आच्छादित हो गया .भावना  वासना की राह चल पड़ी .प्रेम की दिव्यता, ऐहिकता और दैहिकता में रँग गई .
 निस्पृह-कर्म का संदेश भूल गये सब, लीला-कलाओं से  विलास की गंध आने लगी.
राधा और गोपियों के साथ के कृष्ण के संबंध को अपनी कुंठित वासनाओं की अभिव्यक्ति बना कर कहाँ-कहाँ घसीट रहे हैं लोग!
वासुदेव का उदात्त,अनासक्त चरित्र ,लोक मन में विलासी नायक का रूप लेने लगा .पुरुषोत्तम के उस दिव्य चरित्र पर कैसे-कैसे आरोपण होने लगे !
 जन-रुचि आखिर कहाँ तक पतित होती चली जाएगी ?
*
साम्राज्ञी को कुछ सूझा परिषद् के सामने पूछ बैठीं-'भागवत कथा का पुरुषों के लिये कोई उपयोग नहीं ?'
युधिष्ठिर चौंक गये ,'नहीं सबके लिये हितकारी है .'
व्यास देव मुस्कराये ,'शुभे ,आपका कथन उचित है. श्रीकृष्ण के जीवन में जो नीतिज्ञता ,दृढ़ता,जो तत्व-ज्ञान था ,सर्वमंगल की कामना थी और अनासक्ति ,' व्यास जी ने कहा,'जिसमें धर्म-युद्ध से विमुखों को भी सम्मुख कर देने की सामर्थ्य हो ,उसके क्रिया-कलाप और उसकी वाणी सारे समाज के लिये प्रासंगिक है - पुरुषों को कर्मशीलता की ओर प्रेरित करनेवाली  ,'
'तो यह आयोजन सब के लिये क्यों नहीं ?" .
विस्मित हो गये व्यास देव.
' चकित हूँ साम्राज्ञी,जिस अंतःप्रेरणा से ये शब्द आपके मुख से निस्सृत हुये .उसी में भावी कल्याण का समाधान निहित है .'
' भागवत का पारायण  सार्वजनिक रूप से हो सम्राट् , राज-परिवार और प्रजा दोनों के संबंधों का नया अध्याय प्रारंभ हो .'
युधिष्ठिर की उदारता जाग उठी,' तो फिर प्रजा  हमारी आगत  अतिथि हो,प्रसाद पाकर जाये !'
भावी मंगल और अनिष्ट की छायाओं के निवारण हेतु ,सप्तदिवसीय भागवत-कथा का आयोजन .प्रजा-जन सादर आमंत्रित हों .
क्रियान्वयन का निर्णय  सर्व-सम्मति से हो गया .
सुभद्रा धीरे से बोली 'जीजी,कितना प्रसाद ?'
वैसा ही हँसी भरा उत्तर मिला ,'अक्षय पात्र है न !'
*

(क्रमशः)

11 टिप्‍पणियां:

  1. परीक्षित को शासन की बागडोर संभालवाने की सुंदर कथा ....

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार १४/८/१२ को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी आपका स्वागत है|

    उत्तर देंहटाएं
  3. अद्भुत रस है आपके लेखन में , मंत्रमुग्ध हो पढ़ते ही जाए और पौराणिक इतिहास से परिचित भी हो जाएँ !

    उत्तर देंहटाएं
  4. गतिमान-
    अनुसरण कर रहा हूँ-

    अश्वश्थामा के सिर पर, इक ख़ूनी घाव बहा करता है |
    निरपराध बच्चों की हत्या, यह संताप सहा करता है |
    मामा श्री के कर कमलों से जीवन दान मिला था तुमको-
    ब्रह्मास्त्र का शेष चिन्ह है , जिससे व्यक्ति सदा मरता है ||

    उत्तर देंहटाएं
  5. शकुन्तला बहादुर14 अगस्त 2012 को 9:22 pm

    इस शृँखला में भी कई सुभाषित सदृश दार्शनिक उक्तियाँ हैं। जैसे-"माटी की रचना कभी मंद कभी तीव्र आँच नहीं खाएगी तो पकेगी कैसे?","देह के साथ विदेह को निभाना यही जीने की कला है।" तथा" सीमित बुद्धि जब गहन को व्याख्यायित करने पर उतर आती है,तो विवेक पर आवरण पड़ जाता है।"आदि अनेक सशक्त वाक्य हैं।
    पांचाली का करुण विलाप हृदयविदारक है।परीक्षित के राज्याभिषेक का प्रस्ताव भी पांचाली की विरक्ति और चरित्र की उदात्तता को ही उजागर करता है।युद्ध के परिणाम स्वरूप हुई सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधःपतन की स्थिति का चित्रण प्रभावी है।जीवनदर्शन
    की अद्भुत प्रस्तुति श्लाघनीय है।प्रतिभाजी की लेखनी को नमन!!

    उत्तर देंहटाएं
  6. अभिभूत हूँ!
    शकुन्तला जी के शब्द को दोहराने भर की ही योग्यता पाता हूँ स्वयं में।
    आपकी लेखनी को नमन!

    उत्तर देंहटाएं
  7. मन को बांध लेने वाली कथा।

    उत्तर देंहटाएं
  8. अद्भुत! निशब्द करती प्रस्तुति....आभार

    उत्तर देंहटाएं
  9. apni ankho ke aage sab kuchh gatit hua jab itihas banNe lage to khud ko hi ye dekh hairani hoti hai ki waqt kaise kaise karwat leta hai.

    pareekshit ka vritant padh kar gyan vriddhi hui. aabhar.

    उत्तर देंहटाएं
  10. श्रीकृष्ण और पांचाली के संवाद पुन: उसी पीड़ा को जगा देते हैं..जो कृष्ण के जाने पर अनुभव की थी।पांचाली की रिक्तता देख भान होता है..शायद हम सदा ही परमात्मा इतने रिक्त रहते हैं..यद्यपि पांचाली के अंत:करण में उठते अदृश्य सूक्ष्म विचारों में प्रेरणा बनकर उभरता श्रीकृष्ण का स्वर और उसके अधरों की मुस्कान मन को सहलाने के साथ साथ विश्वास भी दिलाते है ..कृष्ण के सदा आत्मा के समीप होने का।
    माटी की देह और ताप वाली बात मुझे भी बहुत भायी।आगे और सोचती रही..जितना तपेगी उतना ही देह की माटी से मुक्त सकेगी आत्मा...ताप जितना अधिक होगा उतनी ही अधिक सांसारिकता भस्म होगी..आसक्ति ही नहीं रहेगी तो अपना लक्ष्य पा ही लेगी जीवात्मा।
    श्रीकृष्ण के जाने के बाद जो शुष्कता आई होगी पांचाली और पांडवों के जीवन में..उसकी अनुभूति कर पाती हूँ।
    ''वृषाली '' ये नाम सुनकर नेत्र मूँद लिए दो क्षण को..मन एक बार 'मृत्युंजय' होकर आना चाह रहा था।युद्ध शिविर में कर्ण और वृषाली के मध्य का संवाद याद करकर ही आगे पढ़ना पुन: प्रारम्भ किया।पांचाली का चरित्र कितना अधिक निखरकर मेरे सामने आया है ..और उसे समझकर जानकार मन आदर से भर उठता है।
    उत्तरा के प्रसंग से याद आया...कुछ दिन हुए एक प्रवचन सुनते हुए एक स्वामी जी ने (क्षमा प्रार्थी..नाम स्मरण न रहा..वो चित्रकूट के हैं..और दृष्टिहीन हैं..)उत्तरा के गर्भस्थ शिशु पर साधे गए बाण का बहुत सुन्दर वर्णन किया।एक एक दृश्य जीवंत हुआ।मन ही मन आपके प्रति कृतज्ञता अनुभव की....पहले से आपने मस्तिष्क को ये खाका खींच के न दिया होता तो वो चित्र इसमें कभी सही न बैठता।आपके लेखन से मेरे लिए एक उपदेश अधिक ग्राह्य और सरलता से आत्मसात करने योग्य हो गया।

    उत्तर देंहटाएं