रविवार, 8 जुलाई 2012

कृष्ण-सखी . - 49 & 50.



49.
अनेक आधे-अधूरे जोड़कर एक सर्वांग संपूर्ण की रचना होगी ,सोचना भी असंभव !
सब-कुछ टूटा-फूटा  हो जहाँ , हर ओर अवसाद ,और खंडित संबंधों के दंश ,कुछ भी तो समूचा नहीं बचा .समर के बाद सारे भ्रंश समेट कर एक नया प्रारंभ करना कितना दुरूह कार्य  !
 पर जीवन कब रुका है ? सिंहासन रिक्त कैसे रहता .युधिष्ठिर सम्राट बने,पांचाली पट्टमहिषी !
धृतराष्ट्र और गांधारी से इस देश नहीं रहा गया .वे सप्तस्रोत तीर्थ चले गये .
कुन्ती भी रुक न सकीं .जीवन में बहुत कुछ देख लिया. अपने अंतर की गहन वेदना  में किसी को भागीदार न बना सकीं ,अंत में सत्य उद्घाटित करना पड़ा.केवल निराशा  और आरोप झेले .जिन पुत्रों के लिये जीवन लगा दिया उनका असंतोष और संपूर्ण नारी जाति के लिये  युधिष्ठिर के शाप की कारण बनीं .
सब कुछ करती रहीं, पर मन का एक कोना कर्ण के लिये रिक्त रहा,एक फाँस जो कभी निकल नहीं सकी ,आजीवन करकती रही .अब चित्त उचाट हो गया .यहाँ नहीं रहा जाता -और वे भी उनके साथ प्रस्थान कर गईं .
द्रौपदी , कहीं नहीं जा सकती .महारानी है ,मन का वनवास यहीं पूरा करेगी. पिता -भाई और पुत्र सब गये. कितने अँधड़ आये ,झकझोरते निकल गये . बैठकर विचार करती है -जीवन में जो रिक्तियाँ समा गई हैं कैसे पुरेंगी !
आवेग उठता है- सब गडमड हो जाता है .
*
सुविधा से बैठकर बात करने का कितने दिनों बाद  आज अवसर मिल पाया .
मन में घुमड़ती बात पूछ बैठी पांचाली ,' योगेश , तुम्हें इतना क्रोधित कभी नहीं देखा था,इतना भयंकर शाप .. .'
'उस पातकी अश्वत्थामा  की बात कर रही हो ?'
'तो सुन लो उसके अपराध -
' पिता का बदला लेने के लिये वह नारायणास्त्र का प्रयोग कर चुका था .उसके बाद  इन बालकों की हत्या. आगे ,अजन्मे शिशु पर आघात -एक और जघन्य पाप !
पांचाली,और आगे  सुनो ,अर्जुन से भयभीत हो  इसने ब्रह्मास्त्र का संधान किया.अक्षम्य अपराध !जान-समझ कर ऐसे अस्त्र का संधान कि भू-तल पर असह्य ताप, तत्वों में भीषण प्रदूषण,  ,युगों तक कुत्सित- अपंग होता जीवन !सोचो तनिक,  कितना लंबा भविष्य अँधेरा कर डाला ! ...और  प्रतिकार स्वयं को नहीं मालूम! '
उफनती साँस का वेग रोकने रुके नारायण , '  उसका यह घात कहाँ तक गया है इसका साक्षी बने वह, इसी अवस्था में ,चिरकाल जीवित रह कर !घोर प्रतिहिंसा ने उसे जिस तल पर पहुँचा दिया है ,इसके बिना उसका निस्तार नहीं !'
सिहर उठी वह .
' याज्ञसेनी , कुरुक्षेत्र की यह धरती कभी भूल पायेगी उस दाह को ?
मौन छा गया  -पाँचाली हतप्रभ-सी  .
 वे उसकी की मुद्रा देखते कह रहे थे, '  और  उस दिन तुम्हारी दृष्टि में ऐसा कुछ देखा कि हृदय  उद्वेलित हो उठा . '
  वह देख रही है अति गंभीर .
'सच कहना याज्ञसेनी,उस दारुण व्यथा के बीच तुम्हारे मन में मेरे लिये कुछ आया था ?'
सिर झुकाये सोच रही है द्रौपदी , उत्तर खोजती दृष्टि जमी है उस के मुख पर .
'मिथ्या-वाचन नहीं करूँगी .क्षण भर को लगा था तुम ,तुम्हारे होते यह कैसे हो गया ?मेरे बच्चे !काश ,तुम बचा लेते. माँ के मन की दुर्बलता समझोगे तुम ,भीतर घुटती पुकार कहीं तो निकलती .दुर्बलता थी मेरी ही.. .नहीं ,तुम्हें दोष नहीं दे सकती .. किससे शिकायत करूँ ?किस पर अधिकार दिखाऊँ .
पागल मन बहकता है तो तुम्हीं याद आते हो .आवेग फूट निकलता है. तुम्हें जानती हूँ . दुख के उन विवेकहीन क्षणों को गंभीरता से मत लो .'
वे चुप देख रहे हैं वह करुणा-कातर मुख .
भाव-हीन मुद्रा ,यंत्र-वत् शब्द मुख से निकल रहे हैं ,' अधिक नीतिवान अपना स्वार्थ  सिद्ध करता है तो कोई जान नहीं पाता चोट किस पर गई ,चुप्पा रह सबकी सहानुभूति का पात्र बना रह कर .और जो सबके सामने खुल कर कर डाले दोषी -अपराधी तो वही हुआ न !
'.. .कहने मात्र से कोई धर्मराज नहीं हो जाता  वासुदेव ,मनुष्य की  पहचान विषम स्थितियों में होती है .जो अनीतियाँ हो रही हैं उनका परिणाम कहाँ तक जा सकता है ,यह भी विचारा होता ..मैं किससे कहूँ ?..नहीं कह सकती ..मैं इन पाँचों में भेद के बीज नहीं बो सकती ....
 मन का सच किसी के सामने नहीं खोल सकती  बस, एक तुम्हारे सिवा ....!'
सुन लिया कृष्ण ने ,समझ गये मन का उमड़ता आवेग .किसी से न कह सकी जो ,मुझसे कह डाला .
 सोच रहे थे कैसे समाधान करूँ .मन की इस विचलित अवस्था में किन-किन बीहड़ों में भटकी जा रही है .कोई नहीं जो आश्वस्ति के बोल ,बोल दे .
 वे मुखर हुये,जैसे कहीं बहुत गहरे से आवाज़ आ रही हो ,
 मेरे सामने तुम्हारे पाँच और सुभद्रा का इकलौता मार दिये गये .प्रयत्न था मेरा दोनों का सुहाग सुरक्षित रहे ..नहीं तो पितामह को कोई नहीं रोक सकता था,उनकी तूणीर में रखे पाँच ,अभिमंत्रित बाण ,इन पांचो के नाम के गवाह हैं .पर पितामह के हाथ बंध गये तुम्हें आशीर्वाद दे कर .
उस दिन छल से  तुम्हें दूसरे के लिये रखा अखंड सौभाग्य ,आशीष में दिला लाया . ऐसा न करता तो तुम्हारे पाँचो पतियों की मृत्यु अवश्यंभावी थी .वरदान पलट गया .मूल्य तो चुकाना पड़ेगा !वे नहीं उनके पुत्र गये .एक को जाना ही था.
पतियों के जाने से तुम दुर्भागिनी होतीं .दुर्योधन का शासन होता ,आँखों के सामने पुत्रों को अपमानित देखना कितना कष्टकर होता है .कुन्ती बुआ को देख कर समझा मैंने ....
और सोचो  पांचाली ,सब-कुछ किसी को कहाँ मिला है !'
रुक कर लंबी सांस भरी यादव ने .
'फिर भी अपराध मेरा समझती हो तो क्षमा ...'
व्याकुल हो हाथ से बरजती बीच में बोल उठी  ,'मत कहो ,मत माँगो क्षमा .
एक तुम्हीं तो हो .मेरा हित समझते हो .,अपमानजनक जीवन से मृत्यु अच्छी .उनके लिये क्या बचता ?कुछ नहीं . तुमने मुझसे पूछा भी होता तो भावनाओं के वश में विचार नहीं कर पाती .बस यही कहती उन दोनों की जगह मुझे ..'
 सोचते रहे कृष्ण .
वह फिर बोली - 'तुम मुझे क्षमा कर दो ,मेरी दुर्बलता पर . '
'बस-बस हमारी मित्रता में यह क्षमा कहाँ से घुस आई कृष्णे ,विषम परिस्थितियों में हो जाता है ऐसा.उस रात भी उसका लक्ष्य तुम्हारे पाँचो पति थे ,पर संयोग या विधि का विधान कि उसी रात पिताओं की जगह पुत्र वहाँ जा सोये .'
'हाँ ,इधर भीम ,पार्थ आदि देर रात तक मंत्रणा करते रहे  .अपने
मामा के साथ बातें करते वे पाँचों उधर सोने चले गये  .  किसी को क्या पता था ..'
एक उसाँस  बस !
*
'दुख भटका देता है पांचाली ,डुबो देता है ,सारा विवेक बह जाता है .'
'बस तुम मेरे साथ रहना ,जो होगा वह शिरोधार्य !'
एक करुण हास्य कृष्ण के मुखमंडल पर छा गया .
'इस महायज्ञ में तुम्हें भी अपनी आहुति डालनी थी..अपना पूरा बचा कर नहीं रख  सकती थीं .'
'तुम्हारे लिये कभी कुछ अन्यथा सोच भी नहीं सकती. कभी भी नहीं मीत ,इतना भरोसा रखना .''
शान्ति छा गई माधव के मुख पर .

 ' एक खटक थी मन में जाती रही .अब शान्ति से जा सकूँगा .तुम पट्ट-महिषी हो  अपना दायित्व समझती हो ,जानता हूँ .'
'पट्टमहिषी!' पांचाली ने दोहराया ,'यह कुछ नहीं चाहिये मुझे ,बस शान्तिपूर्ण जीवन .'
'मेरे -तुम्हारे चाहने से क्या !किसके जन्म का निमित्त क्या है ,किसे पता ?..पर जो होना था हो चुका .अब बस ..'
''एक तुम हो साथ ..बस आश्वस्त हूँ .'
'किसका आसरा ? सदा के लिये कुछ नहीं होता.'
वही करुणा-भीगा  हास्य कृष्ण के मुख पर ,' अभी तुम्हें रहना है कृष्णे,सब निभाया तुमने ,अब काहे का सोच !'
क्या कहना चाहते हैं जनार्दन ?
 '..अधर में नहीं छोड़ूंगा तुम्हें .सब सुलटा कर जाऊँगा .'
 'जाओगे ?कहाँ ?'
' निश्चिंत हूँ. अब मैं न होऊँ तो भी तुम सँभाल ले जाओगी .'
एकदम चौंकी पांचाली ,'कहाँ जा रहे हो तुम ?'
'...और कहाँ जाऊँगा ! अभी तो द्वारका .. ..वहाँ  की समस्यायें ,यादव वंश की समस्याये '
'वहाँ भी कुछ ..?'
'शान्ति कहाँ है ?उन का अनुशासनहीन जीवन ,अमर्यादित व्यवहार ....कुछ तो करना होगा मुझे .'
नहीं कहा कृष्ण ने कि शप्त हैं यादव वंश .
नहीं कहा कि माँ गांधारी ने कैसा शाप दिया है .
अवसान-काल समीप आ रहा है -आभास भी नहीं दिया प्रिय सखी को .
एक और दुखिनी गांधारी ,उसे सुख से जीने का अवसर कहाँ  मिला अंधे को ब्याह कर उसने स्वयं अपनी दृष्टि गँवा दी .कृष्ण को शाप दे दिया पर फिर बहुत  पछताई थी गांधारी.
कुछ चैन पड़ा था क्या?
कहाँ, मन की व्याकुलता और बढ़ गई ?
आह , यह क्या कर डाला  ?पागल हो गई थी  !आँखों पर पट्टी बाँधकर क्या पाया मैंने ?जिन पुत्रों के मुख तक नहीं देखे,जिनके क्रिया-कलाप कभी मेरे आनंद का विषय नहीं बने  उनके लिये रो रही हूँ ।और दोष कृष्ण को दे रही हूं ?'
उत्तर में क्या कहा था?
हँस कर कृष्ण ने कहा था ,'चलो माँ, तुम्हें संतोष मिलता है तो मैं यह शाप शिरोधार्य करता हूँ . हर बार जीता-मरता तो मैं ही रहा हूँ ।कुलनाश को नियति का संकेत मान कर स्वीकार करता हूँ .मुझे भी जाना ही है , कहाँ तक रहूँगा यहाँ !'
क्यों कहें वह बात इस संतप्तमना नारी से ,जान कर झेलना और  कठिन हो जायेगा .
प्रत्यक्ष कहा उन्होंने ,' जो होना था हो चुका .अब तो उतार का क्रम है .
तुम दुर्बल नहीं हो कृष्णे,अब जब सब बीत चुका है .शेष जीवन  बिताना रह गया है .'
संध्या का धुँधलका गहराने लगा था.राजमहल की परिचारिकायें दीप प्रज्ज्वलित करने उपस्थित हो गईँ .
उस दिन का संवाद वहीं थम गया .
*
50.
 कर्मयोग जिसे वे जीवन में उतारते रहे ,रणक्षेत्र में मुखर हो उठेगा कौन जानता था !
उस महाध्वंस के बीच वह अमृत-वाणी समस्त मानवता की एक धरोहर बनी रह जाएगी , यह कोई सोच भी नहीं सकता था.
पितामह के विचार चल रहे हैं .
 संकट के समय पौरुष न हो  .अपने सुख अपनी कामना पूर्ति हेतु नहीं ,धर्म की रक्षा हेतु .शक्ति का प्रतिफलन, न्याय और सत् के रक्षण हेतु ,
दुर्बलता से दुष्टता उत्पन्न होती है .इससे आगे और कहने सुनने को बचा ही क्या ?
 हे मुकुन्द, तुम दृष्टा हो
  सत्य तुम ने उद्घाटित किया !
देह त्यागने हेतु सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं भीष्म !
सब आते हैं ,समाचार मिलते हैं .सब जान-सुन कर फिर आत्म-चिन्तन में डूब जाते हैं पितामह.
जनार्दन सौ वर्ष की वय प्राप्त कर चुके  .वृद्धावस्था झलकने लगी  ,जीवन में कभी विश्राम करने को नहीं मिला था.महाभारत -युद्ध के बाद ,आवश्यक कार्य संपन्न करवा दिये .पितामह के अवसान के समय उनकी दृष्टि के सामने बने रहें उनकी इस इच्छा से अवगत थे  .
शर-शैया पर निरंतर उन्हें प्रबोधते रहे .
भीष्म की शंका पर उन्होंने  ही कहा था ,' तात ,बात केवल सावधानी की है .आपने प्रण किया था तब  विचित्रवीर्य और चित्रांगद के राज्य संरक्षण की बात थी . बाद में स्थितियाँ बदल चुकीं थीं ,स्थितियाँ बदलने के साथ अपनी नीति ,शपथ,संकल्प ,आदि का पुनरावलोकन करना ही उचित होता है .विभ्रम से अशान्ति ही पल्ले पड़ती है .'
 तभी तो. अशान्ति ही पल्ले पड़ी मेरे.
कितने-कितने विचार उठते हैं मन में ,सब कुछ सामने घटता रहा.जीवन भर न समझ सके ,आज परिणाम देख रहे  हैं ,कामना में बाधा पड़ने पर मन में कितने विकार उत्पन्न होते हैं -यही तो सारी कहानी है
*
मेरा वचन सत्यवती-माँ के पुत्रों के संरक्षण के लिये था. फिर तो धर्म की धज्जियाँ उड़ती रहीं और मैं प्रतिज्ञा की ओट लिये रहा .इच्छा-मृत्यु का वरदान है मुझे सब जानते थे .कह देता अनीति सहने से मृत्यु भली, तो कौन दुस्साहस करता ?
कृष्ण ने कहा था,'जो भवितव्य था, हो कर रहा .'
कुसमय आने पर मनुष्य की बुद्धि वैसी ही हो जाती है .
 अम्बा की याद आई उसके शब्द -  'मनमाने हरण हेतु परम समर्थ, ग्रहण हेतु नितान्त असमर्थ - श्रेष्ठ पौरुष के लक्षण यही न !'
गहरा निश्वास .
चाहते हैं कुछ न सोचें ,पर पता नहीं चलता ,जाने कहाँ-कहाँ की भूली-बिसरी  स्मृतियाँ घेर लेती हैं .विचार परंपरा सक्रिय हो जाती है .
जानता था  पांडु बचपन से ही दुर्बल है -  स्नायु तंत्र इतना दुर्बल कि  किंचित उत्तेजना भी सहन नहीं कर सके , और उसके दो-दो विवाह !
बौद्धिक पकड़ सिद्धान्त है ,और कर्म में परिणति व्यवहार .यही जीवन की विद्या है -ब्रह्मविद्या की एक शाखा यह भी -जिससे  अर्जुन का विषाद-ग्रस्त अंतर प्रकाशित हो उठा .
 पितामह के अंतः-चक्षु खुल रहे हैं .
तुम लीला मय थे या कर्मशील ?
हाँ, तुम लीला भाव से कर्म करते चले गये .
परम चिति का लीला-विलास ! जिसके विभिन्न अध्याय इस विराट्  पटल पर एक के बाद एक लिखे जा रहे हैं, इस -मानव चेतना के आयाम ,सारे रस ,समस्त रूप ,समूचे रंग समाहित होकर जैसे एक महाकाव्य की रचना हो रही हो !
व्यक्ति सब भूल जाता है उचित-अनुचित का भान नहीं रहता .मोह बुद्धि जाग्रत हो जाती है विवेक हरा जाता है .यही सब तो हुआ.
किसका जीवन कैसा बीता वही जान सकता है ,या सब के साक्षी नारायण !
पुरुषोत्तम,तुम्हारी बात मेरी समझ में आ गई .
धन्य हो तुम !
*

9 टिप्‍पणियां:

  1. शकुन्तला बहादुर8 जुलाई 2012 को 3:32 pm

    अश्वत्थामा के भयंकर शाप का स्पष्टीकरण और पांचाली के मन की शंका का समाधान कृष्ण के युक्तिसंगत एवं गंभीर ज्ञानपरक उत्तर द्वारा करवाने में प्रतिभा जी की सूझबूझ और बुद्धिकौशल प्रशंसनीय हैं। उनसे पांचाली ही नहीं पाठक भी आश्वस्त हो जाता है।भीष्म को याद आए अम्बा के वचन अत्यन्त सशक्त कटाक्ष हैं। कुछ वाक्य तो उद्धरण जैसे हैं-"बौद्धिक पकड़ सिद्धान्त है और कर्म में परिणति व्यवहार।यही जीवन की विद्या है।"शृँखला की अंतिम कुछ पंक्तियों में
    गीता के द्वितीय अध्याय के कुछ श्लोकों का ज्ञान छलक उठा है-
    "क्रोधात् भवति...स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशो,बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।" कुल मिलाकर संपूर्ण प्रकरण सार्थक,सशक्त और प्रभावी है,जो मन
    पर छा जाता है।

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  2. बहुत बहुत बधाई इस प्रस्तुति पर ||

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  3. माया-मोह की पट्टी जब आंखों पर पड़ी रहती है तो उचिर-अनुचित का भान नहीं रहता और लोग असंगत न्याय के उद्यत हो जाते हैं।
    यह अंक भी लाजवाब रहा।

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  4. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार १०/७/१२ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी आप सादर आमंत्रित हैं |

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  5. आज शर शैया पर पड़े भीष्म भी अपनी प्रतिज्ञा के विषय में सोच रहे हैं ... कृष्ण सभी प्रश्नों का समाधान करते से प्रतीत होते हैं .... बहुत कुछ जाना आपकी इस शृंखला से ।

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  6. bahut se sawalon ke jawaab is shrinkhla ko padhte padhte milte ja rahe hain. aur apne tark karne wale dimag ko jawab mil jaye to kaisa sukoon milta hai, pratibha ji aap samajh sakti hain....aur ye sirf aap hi k prayason se sambhav ho pa raha hai.

    aabhar.

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  7. एकदम सही बात। जिसका जीवन है,वही जान सकता है कि उसका समय कैसा बीता। बहुधा,जो बाहर दिखता है,वह भीतर नहीं होता। यही जड़ है-संशय का,आघात का।

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  8. चित्र बनते आते हैं, मन यात्रा पर हो आता है।

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  9. जब मनुष्य मृत्यु शय्या पर हो और प्रत्येक आती जाती श्वास उसे देह के अंत की ओर ले जा रही हो..तो सूक्ष्म से सूक्ष्म आत्मग्लानि भी दृष्टि, अधरों और मन के कोने कोने से आत्मा में मुखर हो उठती है। पितामह भीष्म की दशा देख पुन: मेरा ये विश्वास प्रबल होता है। साथ ही हृदय कामना करता है ..जीवन और समय रहते ही मनुष्य अपने निर्णय सुधार सके..सबके हित के लिए सोच सके।
    श्रीकृष्ण तटस्थ भाव से अपने कर्म करते रहे..संसार में गहराई से रहते हुए भी वे सबसे अलग रहे।पांचाली और कृष्ण के करुण संवादों से मन मीरा की ओर अनायास ही मुड़ गया..जहाँ मीरा कृष्ण की तरह एकदम तटस्थ हैं संसार से भावनाओं से और अपने कर्त्तव्य भी निभातीं हैं।
    गुरुपुत्र अश्वत्थामा के सन्दर्भ में तो मेरे प्रश्न का उत्तर मुझे मिल गया।( किन्तु तनिक सी आस पास दृष्टि दौड़ाई तो सैंकड़ों अश्वत्थामा देश-विदेश में मिल गए।अस्तित्व के धनुष पर चढ़ाई गयी चरित्र की प्रत्यंचा से कितने ही अश्वत्थामा जाने किस किस अस्त्र का संधान करके अजन्मे शिशुओं,नारियों, मानवता और प्रकृति को हानि पहुँचाते हैं और इन सबकी क्षतिपूर्ति तो स्वप्न में भी नहीं की जा सकती है।क्षमा कीजियेगा महाभारत के दृश्य से निकाल कर आपके शब्दों को हमारे आपके युग में ले आती हूँ...:( .क्या करूँ..प्रतीत होता है आज प्रत्येक मनुष्य के भीतर एक महाभारत चल रही है..प्रकृति द्रौपदी की तरह मानव रुपी दुर्योधन के अत्याचारों से त्रस्त है...न चाहते हुए भी मन भटक ही जाता है)
    (एक और प्रश्न उठ रहा है मन में प्रतिभा जी द्रौपदी के लिए..पांचाली के अंत पर पूछूँगी आपसे.. )

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