बुधवार, 16 मई 2012

कृष्ण-सखी - 39 & 40 .



39
*
उस दिन जो सुन पाया बार-बार  क्यों  उद्विग्न करता है!
अंतर से कोई बोल उठता है -अब पांचाली के कहने पर चेते हो ,सत्यवती ने भी कुछ कहा था .तब संरक्षक बने चुप बैठे रहे ?
 हाँ ,तब मस्तिष्क का प्रवाह दूसरा था -स्त्रियों की बातें !जैसा रखा जायेगा रहेंगी. नीति क्या उनके कहे चलेगी ?
 एकदम झटका-सा लगा .गंगा-माँ ,अपनी शर्तों पर आईं थीं ,छोड़ कर चली गईँ .पूर्वज पुरूरवा को भी,सुना है,उर्वशी ने इसीलिये त्यागा.
पहले सोचा होता ,कुल-शील की धज्जियाँ ,इतना सर्वनाश और ये विकृतियाँ -  बचा जा सकता था.
यह पांचाली है !वह विमाता थी - सत्यवती .
फिर ध्यान आया .प्रतिज्ञा की मैंने ,पर क्यों ?  विमाता के कारण ही तो .
परिवार में उनका प्रवेश न हुआ होता तो ..
बुद्धि सतर्क हुई -
वे स्वयं नहीं आईँ .मैंने ही रथ भेज कर बुलाया था ,उन्हें  ले कर उनके पिता साथ आये .
शर्तें उनके पिता ने रखी..
अपनी युवा पुत्री एक वृद्ध को ब्याहने के पहले पिता उसका हित सोचता है --स्वाभाविक है .वे भी कहाँ गलत रहे.
और विमाता ?
मन ने प्रश्न किया - सत्यवती संतुष्ट रहीं क्या ?
उन्हीं ने कहा था-
  'मुझे संसार का क्या अनुभव था, पिता का कहना था तुम दुनियादारी नहीं जानतीं .और मैंने मान लिया ,पिता हैं मेरे हित  के लिये कर रहे हैं .राजमाता बनूँगी -कितनी शक्ति कितना वैभव. कहीं न कहीं तो मन का समाधान करना था . वृद्ध से विवाह करना मुझे क्यों रुचता पर पुत्री की बात का महत्व ही क्या? दायित्व पिता का होता है ,मैं क्या कहती ?'
 युवा  कन्या,धीवर की ही सही  बूढ़े के साथ विवाह कर राजमहल में आयेगी.यहाँ के लोग कैसा व्यवहार करेंगे .बड़े घरों की बड़ी बातें ,सब छिपा रह जाता है. फिर यह तो राजमहल ,जहाँ पति का युवा पुत्र ,राज- पद का अधिकारी .और वृद्ध का क्या ठिकाना ?अकेली स्त्री पता नहीं कल को क्या हो? सब अनिश्चित ही तो था .वचन उनके पिता के कहने पर उठाये थे .
उन्होंने कहा था-
'....तुम्हारे पिता मेरे पिता से कम वय के तो नहीं होंगे ! देवव्रत,तुम बीच में साधते गये सब !
दोनों ने मिल कर सब तय कर लिया और यहाँ की मर्यादायें ,वर्जनायें इन सारे बंधनों में जकड़ दिया  .
'जन-जाति की कन्या मैं ,बात को सीधे शब्दों में कह देती हूँ .पुरुष में पकी उम्र में भी ,वात्सल्य नहीं जागता ,लालसा ही जागती है ?
ओह, भीष्म ,किससे कहूँ  पहले वह पराशर ,ऋषि कहाते हैं जो .नदी पार करा रही थी वहीं संयम खो बैठे .मैं तो धीवर पुत्री ठहरी..  कितना
मुक्त जीवन था .क्या मोल इन स्वर्ण -हीरे-मोतियों का .रात-दिन का मनस्ताप और चिन्तायें हैं मेरे लिये  तो .'
 पूछा था उन्होंने -
' तुम्हें क्या सूझा, मेरे पिता की शर्तें मानते गये? तुम्हीं हो इस सब के उत्तरदायी !'
कोई उत्तर नहीं था भीष्म के पास !
'वहाँ निश्चिंत जीवन बिता रही थी ..प्रसन्न थी चाहे नदी पर नाव खेऊँ या वन में विहार करूँ .मैंने तो बता भी दिया था एक पुत्र है मेरा .पर तुम्हारे पिता ..अब मैं क्या कहूँ .
ऊपर से ये दो राजकन्यायें ,मुझ से भी अधिक दारुण स्थिति में जीने को विवश .'
सदा एक दूरी बनाये रखी थी विमाता से .भीष्म को असहज लगने लगता था ,जितना कम हो सके उतना ही सामना हो .
सोचते-सोचते जब थक जाते हैं श्लथ तंद्रिल -से ,शृंखला टूट जाती है कहीं के तार कहीं से जुड़ जाते हैं.
 कितनी बातें कोई तुक की कोई बेतुकी .माँ क्यों चली गईँ? प्रसन्न और तुष्ट होतीं तो क्यों जातीं !पर यहाँ नारी का अस्तित्व ही क्या ? वे नहीं रह पाई होंगी ,चली गईं .कुछ कारण रहा होगा .ये सब राज-परिवार के रहस्य हैं मुझे भी किसी ने नहीं बताया ,कोई क्या जाने !मैं भी पूछ नहीं सका ,जानना चाहता भी नहीं. वैसे ही कौन कम उलझनें हैं !
आज फिर वह अध्याय खोल बैठे.
' क्यों  रूप-यौवन दिया ईश्वर ने? पुरुष स्वयं को बस में रख नहीं पाता और दंडित होना पड़ता है हमें !'
चिन्तन चल रहा है -
सब पुरुष एक से नहीं होते ,
विराट् को जब उन पाँचो के  पांडव होने का पता चला था तो उन्होंने उत्तरा से अर्जुन से विवाह का प्रस्ताव रखा था .अर्जुन ने उत्तरा को पुत्रीवत् कह कर अभिमन्यु के लिये स्वीकार किया .यह है मर्यादा !
और महाराज प्रतीप ने भी गंगा के आग्रह पर भी मर्यादा के ही कारण स्वयं न स्वीकार कर पुत्र के हेतु स्वीकारा .
 पर पिता ?
उद्वेग से होंठ काट लिया भीष्म ने .
 विमाता का प्रश्न था-
'  इन संतानों का क्या होगा .कोई देगा इन्हें अपनी पुत्री ?'
और वे काशिराज की कन्यायें हर लाये -समाधान हो गया समस्या का.पर उससे भी बड़ी समस्या आ खड़ी हुई .
विभ्रम में पड़ जाते है ,विचार भटक जाते हैं .
 क्रम आगे चला .तुम्हारे वंश को आगे बढ़ाने उनका पुत्र आया . तब भी तुम्हारा व्रत आड़े आ गया ..'.
 और अधिक उद्विग्न हो उठे  पितामह .
कुछ नहीं कर सका ..उन्हें लगता है, समर्थ थे तब अनीति नहीं रोक सके तो अब! अब तो... .
कितनों के साथ अन्याय किया ,अपना कर्तव्य कह कर . क्या-क्या घूमने लगता है जैसे सारा अतीत सामने चक्कर काट रहा हो . .
शून्य कर देना चाहते हैं मन को .शान्त -एकदम शान्त .विश्राम मिल सके इस मनस्ताप से .
सिर चकराने लगता है .आँखें मूँद लेते हैं- एकदम श्लथ..
 इन शरों की चुभन में तन को चैन नहीं .विगत स्मृतियों के दंश से मन को चैन नहीं .
40.
*
हे ईश्वर ,कब होगा सूर्य उत्तरायण !
अब सहा नहीं जाता .विश्रान्त मन विस्मृति में डूब जाना चाहता है .माँ की थपकियों की याद आती है .
हवा तिरपाल से छेड़खानी करने लगी है .माथे पर चुहचुहा आई पसीने की बूँदें -शीतल प्रलेप सा लगाने लगते हैं हवा के झोंके .हाथ-पाँव हिलाने की इच्छा नहीं होती शरों के पृष्ठभाग भी रुक्ष कठोरता से भरे .
सब आते हैं .पर किसी से कुछ कहने-सुनने की इच्छा नहीं होती  . भीतर ही भीतर मौन संवाद चलते हैं -अविराम.
भूल जाते हैं क्या विचार चल रहा था .
मन कहाँ शान्त बैठता है. फिर चिन्तन चल पड़ा - कितना अंतर है इन पांडवों और कौरवों में !
दोनों मातायें श्रेष्ठ कुलों की कुमारियाँ ,पर संतानों में कितना अंतर !
एक निरीह-सी ,उदासीन ! जो आ पड़ा ,स्वीकार करती जा रही है .आँखों पर पट्टी बाँध लेनेवाली .कभी पति और संतान का मुख न देखनेवाली - पतिव्रता ?
और तब सबने  बहुत प्रशंसा की थी .
एक-दूसरे के मन को समझ पाया होगा ?
उसाँस भर कर रह गये भीष्म !
दुर्योधन ! उसकी बात छोड़ो ,जिसने कभी माँ की स्नेहभरी दृष्टि न पाई वह नारी का क्या सम्मान करेगा ?एक के बाद एक  लगभग सारे भाइयों की यही कथा रही .
चाहा था दुर्योधन से सुभद्रा का विवाह होता.हमें यदुकुल का, विशेष रूप से कृष्ण का समर्थन मिलता .बलराम भी तैयार थे . पर नहीं हो सका ..
स्मृतियाँ फिर अतल में डुबाने लगीं
क्या विचार कर  रहे थे सब गडमड हो गया .
हाँ ,कुन्ती की भूमिका ...
 तेजस्विनी ,समर्थ .बढ़ा हुआ मनोबल ,स्वयं वरा था उसने अपनी रुचि से प्रतिष्ठित कुल का कुमार देख कर .कुन्ती ने स्वयं पांडु के कंठ में वरमाला डाली थी.
पांडु की असमर्थता पर वह सचेत रही . काम्य-पुरुष से अंश ग्रहण किया , संतृप्ति के सुख से विह्वल-क्षणों में,नारीत्व की चरम उपलब्धि मातृत्व का भान . स्वस्थ-समर्थ संतान ,
कुन्ती समर्थ और गांधारी विवश -  दोनों में कैसी तुलना ?
कारण केवल मैं -सिहर उठे पितामह !
तभी कुन्ती संस्कार दे सकी ,स्नेह- दृष्टि से सींच सकी ,संतानों में संतुलित  व्यक्तित्व का विकास कर सकी .
 श्रेष्ठ का वरण कर, स्वस्थ आगत जीवन की नींव पड़े -आनन्दमय जीवन-चेतना के  क्रोड़ से नवांकुर फूटें इसीलिये स्वयंवर की प्रथा रखी गई होगी !
एकदम विचार आया ,जिसे हरा जाता है उसे कैसा लगता होगा  ?
 अंतर पड़ जाता है .हरण करनेवाला स्वयं विवाह को तत्पर हो तो कन्या को लगता होगा ,इसके हृदय में मेरे प्रति  इतना चाव है कि सबसे जूझने को प्रस्तुत हो गया  ,प्राणों की बाज़ी लगा कर पाना चाहता है .
अन्यथा लगेगा . मुझमें रुचि नहीं थी लूट में समर्थ थे सो हर लाये ,.,अहंकार के वशीभूत ,किसी को भी सौंप देंगे -कितना उपेक्षित अनुभव करती होगी .
कहाँ से कहाँ भटकने लगते हैं विचार .हाँ ,दोनों का अंतर- कुंती की सामर्थ्य गांधारी की विवशता .केवल वही क्यों कितनी और भी तो.
एक की महानता के अभियान में कितनों को स्वाभाविक जीवन से वंचित होना पड़ा .
कैसी महानता जो सिर्फ अपने को प्रमाणित करने के लिये औरों का अस्तित्व रौंद डाले .  .
अंबा-अंबिका- अंबालिका ?
फिर वही कथा आगे बढ़ चली .वैसे ही अध्यायों की रचना होने लगी .
पश्चाताप से भर उठे . आँखें मूँदे ,अवसन्न से .
लग रहा है बाहर-भीतर  जम-से  गये हैं .लेटने की स्थिति बदल ली .
माँ गंगा का स्मरण हो आया ..वे चली गईँ .
माँ सत्यवती की अपनी शर्तें .
और दोनों के बीच देवव्रत-कितना लाचार !
ऊंह ,कैसे -कैसे विचार आ रहे हैं .उनके विषय में सोचना मेरा काम नहीं .
तो कुन्ती के विषय में ,द्रौपदी के विषय में !
वे अपने ढंग से रहीं .
उन पर बस नहीं चला .इन सब पर चल गया, ये बेबस हो रह गईं  .
तो कैसा होनी चाहिये स्त्री को वैसी या ऐसी ?
तब तो ऐसी चाहिये थी जिसे अपने अनुसार चला लें ,पर अब लग रहा है ,वैसी ही ठीक थी ,समर्थ माता ही संतान को उपयुक्त ढंग से ढाल सकती है .
ओह ,जिस पर कोई बस नहीं उस विषय में सोचे जा रहे हैं .
अपने ऊपर वश ही नहीं . अनजाने ही कितने विचार चले आते हैं ,
करें भी क्या .रात-दिन बस यही करना शेष रह गया है .
नहीं ,अब नहीं  बस बहुत हो गया .कुछ क्षण यों ही-  दिमाग में कुछ नहीं आने देंगे .
अचानक विचार कौंधा -और पुरुष कैसे होने चाहियें?
मेरे जैसे ?
ना ,ना. नहीं . बिलकुल नहीं .क्या किया मैंने ?सब चौपट !
हाँ, विमाता ने कहा था ,'यह  नारी की ही  विवशता है कि समवयस्क को पुत्र माने .पितृ-तुल्य को पति ..पुरुष को खुली छूट !पुत्री की वय की कन्या को विवाह लाये .'
इस प्रकार कभी सोचा नही था.
 पिता शान्तनु ?नहीं ,पद तथा वय की गरिमा - गांभीर्य नहीं निभा सके  .पहले माँ की शर्तें ,फिर सत्यवती-माँ के लिये ....कामना- तृप्ति हेतु औरों से संचालित रहे !
अपना उचित-अनुचित स्वयं निर्धारित न कर सके .
आगे  ,धृतराष्ट्र और उनके सौ पुत्रों की बात !आज लग रहा है जो हुआ प्रारंभ से ठीक नहीं था..
और पांडु काका?हाँ ठीक, पर उनकी अपनी विवशतायें .वंश में जो ग्रहण लगा था उन्हें भी छाये रहा .
कुछ क्षण सोचते रह गये -ग्रहण ?
 मेरे ही कारण !हाय रे दुर्भाग्य !
अनचाही पत्नी से दूर रहने के  सैकड़ों उपाय हैं पुरुष  के पास ,पर विवश हो कर अनचाहे पुरुष से जीवन भर दाम्पत्य निभाना  -ओह,कैसे बिताया होगा जीवन !
गहरी सांस छोड़ी पितामह ने .
कुन्ती ने ठीक ही किया .
मस्तिष्क थक गया .शिथिल हो पड़े रहे .विचित्र विचार आते-जाते रहे .
बचपन में माँ गंगा के साथ की स्मृतियाँ जाग उठीं -बस धुँधली यादें .जैसे तंद्रा में हों .
लगा पहुँच गये अपने गंतव्य पर .अशान्ति मौन  हो गई .
निद्रा ने घेर लिया . .
**
जीवन का लेखा-जोखा पूरा होने जा रहा है .इस जनम के कर्म इसी में भोग लूँ तो यह पीड़ा सार्थक हो !
कर्ण आया था ,कब ,किस दिन ? दिनों की गिनती भी भूल जाते हैं .
उसके शब्द याद आते हैं
'नहीं तात कवच-कुंडलों से बढ़ कर मेरे लिये मेरा व्रत है .
किस बात पर कहा था उसने ?
अभेद्य कवच-कुंडलों की बात पर ?नहीं, कोई गुमान नहीं था उसे .
विनीत है वह !
आकर चुपचाप चरणों की ओर खड़ा हो गया था  .
स्नेह से समीप बुलाया ,वर्तालाप होने लगा.
अब वह सेनापति है.आशीर्वाद लेने आया है .
 'आपको कभी प्रसन्न नहीं कर पाया मैं,मेरा दुर्भाग्य !..'
'नहीं . मैं रुष्ट नहीं तुमसे ,असंतुष्ट भी नहीं .परिस्थितियां ऐसी बनती चली गईँ .तुम दुर्योधन के हित ..'
 पूरी बात याद नहीं कर पाते ,मन  कहाँ-कहाँ भटक जाता है !
'और क्या करता .तात,. अकारण सब ओर से तिरस्कार और वंचनायें मिलीं किसी ने कभी सीधे मुँह बात नहीं की तब , उसी ने बढ़ कर साधा .सब कुछ उसी का दिया - राज्य,मित्रता ,और एक पहचान .वह जो  आज मैं हूँ .'
'तुम कौन हो नहीं जानते ?'.
'अब चाहता भी नहीं , जान कर क्या होगा .जानना तो औरों को चाहिये था ..'
  'मैंने किसलिये युद्ध से रोका ?नहीं ,मुझे तुमसे अरुचि नहीं थी ..इसका कारण था .जो मैं जानता हूँ तुम भी जान लो ...'
कहते-कहते वे कुछ रुके ,कर्ण के मुख की ओर देखते बोले ,
 '..एक ही माता की संतानों को मरने-काटने के लिये आमने-सामने खड़ा कर दूँ  वह मैं नहीं कर  सका .मैं जानता था तुम कुन्ती-पुत्र हो .हाँ वसुषेण ,कुन्ती तुम्हारी भी माता है .'
एकदम विस्मयाभिभूत,'मेरी माता ? वे .?'
 अवाक् कर्ण .
सिर झुकाये अंतर्मंथन में लीन !अचानक मुख तमतमा उठा,
'क्या होता, क्या बना दिया ..' .
पितामह ने हाथ उठा कर सांत्वना देनी चाही ,बोले ,'जो बीत गया सो गया .आगे की सुध लो .युठिष्ठिर तुम्हें माथे चढ़ाकर पूरा अधिकार देंगे .सारे भाई तुम्हारे अनुकूल रहेंगे .जीवन में जो अप्राप्य रहा ,सब तुम्हारे चरणों में होगा .'
स्थिर दृष्टि ,पितामह की ओर देखा उसने .
'अप्राप्य रहा था सब कुछ.उस किशोर वय में बहुत दुखी होता था .अशान्त चित्त दिन-रात चुभते वही वाक्य .हर स्थान पर केवल इस कारण दुत्कार दिया गया. इधर से उधर भागता था .कहीं कोई सहारा मिल जाय, जीवन सँवार लूँ .सब जगह दुरदुरा दिया गया ..मेरी योग्यता का कोई मोल नहीं .आचार्य परशुराम से मिथ्यावाचन  कर शिष्यत्व पाया ,पर सत्य कहाँ छिप सका .अर्जित विद्या निष्फल हो गई .राधेय रहा जीवन भर ,कौन्तेय कभी नहीं .पितामह,उनका बस चलता तो जन्मती ही नहीं .अब पांडव नहीं बनना चाहता .सूत-पुत्र रहा -पग-पग पर प्रताड़ित वंचित .
जिनके लिये मैं कभी था ही नहीं,मेरे हर सच को झुठला दिया गया हो जहाँ ,उनका साथ नहीं दे पाऊँगा .'
जैसे स्वगत कथन कर रहा हो ,'माता ?जिसने जन्मते ही म़त्यु के मुख में धकेल दिया ?अनचाहा था मैं ,अब जब सब बीत गया ,तो जिसने मान दिया ,जिसने जीवन दिया, नेह से पाला उसे कैसे नकार जाऊँ ?'
वहीं धरती पर बैठ कर उसने शर-शैया के किनारे सिर धर  दिया था .पितामह ने ,धरती की ओर मुख किये कोर से टिके  उस शीष पर हाथ रख ,कर्ण को आश्वस्त करने का उपक्रम किया .
   जैसे युग-युग की पीड़ा बाँध तोड़ कर बह निकली हो .आज पहली बार किसी परम मान्य का वात्सल्य उसे सींच रहा था.
'अब सब व्यर्थ लगता है ,तात .मित्र बनाया जिसने ,मान-सम्मान दिया उसे अधर में  नहीं छोड़ सकता .उसका विश्वास नहीं तोड़ूँगा .जिन का ऋण चढ़ा है मुझ पर, अब  चुकाने की बार ,धोखा दे जाऊँ ?
नहीं पितामह ,वसुषेण अभागा है तो क्या ,ऐसा स्वार्थी नीच और कृतघ्न  नहीं है  !  बहुत सम्मान करता हूं आपका आज आपका स्नेह अनुभव कर हृदय विह्वल हो उठा है ..पर यह नहीं कर सकूँगा पूज्य, मुझे क्षमा करें.'
पितामह चुप उसका मुख,देख रहे हैं.
'मरण पर मेरा वश नहीं ,पर जीना अपनी  मान्यताओं पर चाहता हूँ. '
 .शैया से टिके कर्ण के मस्तक पर ,पितामह बड़ी देर हाथ रक्खे रहे थे .
सजल थे दोनों के नेत्र .
रणभूमि के वीभत्स वातावरण में करुणा की क्षीण धारा बह निकली थी .
*
(क्रमशः)



8 टिप्‍पणियां:

  1. पुराणी कथा का नया रूप ।
    अनोखी प्रस्तुति ।
    विना मूल कथा को छेड़े ।
    आभार ।।

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  2. शकुन्तला बहादुर16 मई 2012 को 10:39 pm

    भीष्म के मानस-मंथन ने अतीत की कितनी घटनाओं को उद्घाटित कर दिया है,जो पुनः सजीव सी हो उठी हैं।भीष्म का सारा जीवन ही अन्याय और अनीति का आगार प्रतीत होता है।उनके मनस्ताप का चित्रण अत्यन्त मनोवैज्ञानिक और स्वाभाविक है।चरित्रों के अन्तर्द्वन्द्व का चित्रण करने में प्रतिभा जी सिद्धहस्त हैं।कथा का प्रवाह ,रोचकता एवं मूलकथा का निर्वाह सराहनीय है।

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  3. भीष्म का आत्मविश्लेषण ....रोचक और प्रवाहपूर्ण ...

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  4. महाभारत के पात्र पुनः सजीव से हो उठे है ,चित्रण करने में आप परांगत हैं।प्रवाह और रोचकता सराहनीय है।

    MY RECENT POSTकाव्यान्जलि ...: बेटी,,,,,
    MY RECENT POSTफुहार....: बदनसीबी,.....

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  5. इतिहास के झरोखे से इतिहासिक पात्रों को नए संदर्श में देखती हुई विश्लेषण परक पोस्ट .

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  6. bheeshm ka antardwand bahut hi prabhavi roop se ukera hai. unki pratigya se tasveer ka dusra rukh kya roop le gaya ham soch bhi nahi sakte the jo in prasango aur antardwand se pata chala. ab sochti hun ki main bhi bheeshm par ek kavita likh hi dalu :-).

    aap please mujhe apni nayi post ka link bhej diya karen... kayi bar vyast hone k karan main late ho jati hun aur kayi bar, bar bar apke blog ka chakkar lagane par bhi nayi post nahi hoti to nirasha hoti hai.

    aage bhi intzar rahega.

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  7. ओह! ओह कर्ण!
    कैसा दृश्य रहा होगा, कैसी मनस्ताप जब दो महापराक्रमी पर अभागे पुरुष साथ रोये होंगे।
    आपने सब जीवंत कर दिया शब्दों से।

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  8. पता ही नहीं चला पढ़ते पढ़ते कब इस शब्द चित्र पर नेत्रों से अश्रु छलक आये।सारे पात्र घुल रहे हैं..नियति का रंग उभर के आ रहा है।कितना प्रभावी लेखन है ..अपने आप को पूर्णत: विस्मृत कर स्वयं को भीष्म और कर्ण के निकट पा रही हूँ।हृदय जैसे दो भागों में विभक्त सा हो चला है...एक का स्पंदन दूजे को सांत्वना देता सा प्रतीत हो रहा है। जिसे हम चेतना देने वाला तत्व कहते हैं..या कह लीजिये 'आत्मा'....काश हम जान सकते कि कैसे आत्मा अपने अनुरूप देह चुनती है? ऐसा होता तो भीष्म 'भीष्म' न होते..कर्ण 'कर्ण' नहीं होता..ख़ैर,जीवन के रंगमंच पर अपना पात्र निभाना ही है सबको।दूसरों की भूमिकाओं पर भी दृष्टि रखनी है।मानस तरंगे हाथों में प्रश्न भींचे विचलित होकर 'भगवदगीता' की ओर भागीं जा रहीं हैं।

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