शनिवार, 24 मार्च 2012

कृष्ण-सखी - 29 .& 30.


**29.
नहीं टल सका युद्ध !
पाँच ग्राम भी देने को तैयार नहीं हुये वे .'युद्ध अवश्यंभावी है ' -आभास था. पर अब स्थिति सामने है. हो गई तैयारियाँ
युद्ध चल रहा है .एक और अविराम युद्ध सबके मनो में .भय? नहीं ,केवल भय नहीं .एक अशान्ति ,अनिश्चितता ,द्विधा और ऐसा कुछ जो स्थिर नहीं रहने देता ,चैन नहीं लेने देता पल भर भी.
अपनों को इस अनिश्चितता की लपटों में झोंक देने का दुख !कौन रहेगा कौन हट जायेगा यह भी ज्ञात नहीं कितना कुछ खो जायेगा ,.ये सारे चेहरे ,सारे नाम ,सारे व्यवहार पता नहीं कितने होंगे कितने नहीं होंगे कहीं नहीं होंगे .क्या होगी उपलब्धि ?क्या मिलेगा राज्य से ?और क्या शेष रहेगा जिस पर नये ठाठ ठनेंगे ?
कौरवों के सेनानायक -भीष्म पितामह .पूरी आक्रात्मकता से विपक्ष के विरुद्ध डटे हैं  गये ,भयानक संहार शुरू हो गया .दोनो पक्ष हताहत हो रहे हैं ,कभी-कोई कम तो कभी अधिक हर दिन एक नया आघात !
बलिष्ठ भुजाओं में वेग भी कम नहीं .पर रण खिंचा चला जा रहा है . अंतर्मन और बहिर्मन के द्विधात्मक प्रत्ययों के बीच तन की स्थिति विषमता कोई नहीं समझ पाता  .लक्ष्य तक पहुँच कर भी प्राप्ति बाधित रह जाती है . दिन बीतते जा रहे हैं  निर्णायक क्षण पता नहीं कब आयेगा !
हर मन में आशंका .पता नहीं कब क्या घट जाये .बस ,एक दूसरे का सहारा !
सब देखे-जाने लोग .एक दूसरे से संबंधित .पक्ष का कोई हत हो या विपक्ष का ,अंतर उद्वेलित हो उठता है .
हर दिन एक नया आरंभ हर संध्या किसी नये विनाश की , निकट संबंधियों के घात की कथा सुनाती निकल जाती है .
*
उस शाम अचानक कृष्ण आये .आते ही बोले ,'सखी मेरे साथ चलों.'
युधिष्ठिर एकदम पूछ बैठे ,'इस बेला ?कोई विशेष कार्य ?'
'बड़े भैया ,यह युद्ध क्षेत्र है, हर बात बताई नहीं जाती ..'
' नहीं, बताना आवश्यक नहीं ,तुम हो न ! शंका काहे की .मैंने तो केवल कौतूहल वश.....'
पूरी बात नहीं सुनी ,कृष्णा की ओर मुड़ कर बोले ,'बहुत शीघ्रता से . बस अपने को वस्त्र से आवृत्त कर लो और चलो .'
याज्ञसेनी ने झटपट पेटिका से स्वर्ण-खचित आच्छादन निकाला और ओढ़ती हुई द्वार के समीप रखे पद-त्राण की ओर चली .
कृष्ण कुछ कहने को हुये पर तब तक वह पहन चुकी थी .
'अच्छा बड़े भैया ,अभी आते है अधिक से अधिक दो घड़ी .'
वे बाहर निकल गये .
पांचाली चुपचाप साथ चली आ रही है .
निकलते-निकलते कृष्ण ने कहा,'आगे युद्ध-क्षेत्र है.मुख पर भी आवरण डाल लो.कोई पहचान ले तो ,अच्छा नहीं लगेगा .और लौटने तक ऐसे ही रहना .'
अवगुंठन डाल लिया पांचाली ने ,'बात क्या है ,यह तो बताओ ..'
'चलती जाओ, सब बता दूँगा ,'
युद्ध-क्षेत्र के किनारे से होते हुये वे  जिस शिविर में पहुँचे.पर्याप्त स्थान समेटे सज्जा-सुविधाओँ से युक्त किसी राज-पुरुष का शिविर लग रहा था. .
द्रौपदी उत्सुक हो उठी ,'किसका शिविर है , हम यहाँ क्यों आये हैं ?'
'आशीर्वाद हेतु पितामह के समीप जा रही हो,पदत्राण बाहर ही ,इधर ,' कृष्ण ने द्वार-पट की ओर इंगित किया .
शिविर के किनारे आड़ में एक ओर उतार दिये पाँचाली ने, फिर बोली,'उधर क्यों खड़े हो ,चलो न !'
' नहीं, मैं यहीं बाहर प्रतीक्षा कर रहा हूँ .तुम जाओ अंदर .द्वारपाल को सँदेशा दो ... .और सुनो , उसे अपना नाम मत बताना .'
आश्चर्य से देख रही है पांचाली .
'राज- महिषियों के नाम और पहचान परिचारकों को नहीं बताई जाती .राज-कुल की मर्यादा है.'
*
शिविर में दिन भर के युद्धोपरांत की विश्रान्ति छायी थी
पितामह काष्ठ-चौकी पर विचारों में मग्न ध्यानलीन-से बैठे थे .
दुर्योधन उनसे कितना असंतुष्ट है वे समझ रहे थे.मन में ऊहापोह चल रहा था -
जब से युद्ध प्रारंभ हुआ है उसे लगता है मैं मन से उसका साथ नहीं दे रहा .वह समझता है मैं चाहता तो यह असंभव था कि उन पाँचों में से कोई हत नहीं होता और. मैं जानबूझ कर उन पाँचो को बचा रहा हूँ .उसे लगता है उन्हें मारने का हर अवसर जानबूझ कर गँवा देता हूँ .
उधऱ दुर्योधन क्षुब्ध .भीष्म पितामह को सेनापति बना कर भी इतने दिन हो गये उसका उद्देश्य पूरा होने के आसार नहीं.उनके प्रहार से पांडवों का बाल भी बाँका नहीं हुआ  और भीम और घटोत्कच ने उसके सत्रह भाइयों का संहार कर दिया.पितामह आखिर चाहते क्या हैं ?
उसे लग रहा था वे हमारे सेनापति बन कर भी उनका पक्ष ले रहे हैं .उनके तर्कों ,कारणों, आश्वासनों का कोई प्रभाव उस पर नहीं होता.
उसके मनोभाव समझ रहे हैं भीष्म !
दुर्योधन उद्धत है अधीरता उसके स्वभाव में है.वाणी पर संयम नहीं रखता ,ऐसी बात कहता है जो दूसरे को चुभ जाये.
उन्होंने पूछ ही लिया .'तुम मुझ पर शंका कर रहे हो , पुत्र ?'
'शंका ?मैं समझ नहीं पा रहा हूँ पितामह .हमने आप पर विश्वास किया है .आप इतने असमर्थ नहीं कि इन सात दिनों में उनका कुछ न बिगाड़ सकें .आप चाहें तो एक दिन में वारे-न्यारे हो जायँ .तात,मैं क्या कहूँ आप हमारे सेनापति हैं लेकिन ..'
'लेकिन ?..ऐसा आक्षेप मत करो .मैंने सदा तुम्हारा साथ दिया है, युवराज ,मेरी कुछ विवशतायें हैं .पर मैं उन्हें बचा नहीं रहा हूँ .तुम्हें कैसे विश्वास दिलाऊँ ..?
कुछ रुके भीष्म,'
स्थिति बड़ी विषम ,युद्ध का गणित दुरूह होता जा रहा था .
बस पहले ही दिन ,अभी तक एक ही दिन ऐसा हुआ कि  विपक्ष के चुने हुये योद्धा विराट् के कुमार उत्तर और श्वेत खेत रहे थे.
पर बाद में पांडवों की ओर से घटोत्कच साक्षात् काल बन कर प्रतिपक्षी सेना पर टूटा था .भीम तो थे ही .भैरव रूप धरे उतर पड़े संग्राम- भूमि में .कौरवों की सेना में हाहा-कार मचा था .कोई गिनती नहीं कितने योद्धा हत हुये.नित्य-प्रति संध्यायें जब जीवित और मृतों की गणना करती हैं तो कौरव पक्ष ही हानि में रहता है ..आाठवें दिन तक धृतराष्ट्र के सत्रह पुत्र मारे जाते हैं .
' जो हो रहा है वह सामने हो रहा है .कहने से कुछ नहीं होता तात,यदि कुछ कर सकते हों तो कर दिखाइये. जब हमारे लोग ही नहीं रहेंगे तो कुछ हुआ भी तो क्या लाभ..?''
परोक्ष आरोपों का क्या उत्तर दें  भीष्म ?कैसे विश्वास दिलायें दुर्योधन को !
'अच्छा कल देखना मेरा शर-संधान .तुम्हारा संदेह एक चुनौती है मेरे लिये .कल का दिन और फिर तो उनमें से एक भी नहीं बचेगा .पाँच शर आज ही उनके नाम से अलग रख रख देता हूँ .लो,तुम्हारे सामने ही,'
पितामह उठे .चलकर गये जहाँ तूणीर टँगा था .
कुछ देर देख कर छाँटते रहे .पाँच तीक्ष्ण बाण अलग कर लिये .
'ये देखो , ये हैं पाँच ! एक एक के नाम का अलग -अलग.
कल अर्ध-रात्रि में अभिमंत्रित करना रहेगा ,बस. और फिर तुम देख लेना .देखना कौन बचता है इन रुद्र-शरों से . इन से वे बच नहीं सकेंगे . उनका अंत निश्चित है '
मन ही मन की प्रसन्न हो उठा था पर मुद्रा गंभीर ही रखी,बोला ,' देखिये .आ रहा है कल का दिन और उसका अगला दिन भी .'
'अपनी पत्नी को भेज देना ,मेरे समीप,अमोघ आशीष के लिये !'
*
30
हर्ष से फूला नहीं समा रहा दुर्योधन .
अब नहीं बच सकते पांडव . जीत निश्चित है .बस दो दिन और .
पितामह ने कहा था ,'अपनी पत्नी को मेरे पास भेज देना .उसे अमोघ आशीर्वाद दूँगा .'
ऊंह ,अब क्या दो दिन हैं  बस !
शिविर में अपनी मंडली को आमंत्रित कर विजय का उत्सव मनाने लगा .
सारी रात मदिरा के चषक ,एक से एक बढ़ कर पाँडवों की हँसी उड़ाते वाक्य और रह-रह कर गूँजते ठहाके.
नशे में धुत उसके अव्यवस्थित शब्द ,' कल ही - जा कर ..कह दूँगा भानुमती से ..चली जाये ..अकेली पितामह के पास ..अखंड सौभाग्य का आशीष लेने ....'
जिसके जो मुँह आये बोल रहा था .हँसी के फव्वारे छूट रहे थे
शकुनि ने कहा था ,'अरे भांजे,कुछ बाद के लिये भी छोड़ दो ,मुँह दुख गया हँसते-हँसते .'
कर्ण कुछ सोच-मग्न, ' मित्र , थोड़ा संयम बरत लो .समय से पहले किसी को सूचना न हो कभी-कभी बात बनते-बनते ..'
बीच में टोकता दुर्योधन बोला ,' अब कोई क्या कर लेगा .पितामह के बचन हैं .उनके नाम के पाँच तीर ..'
और वह फिर ठठा कर हँसने लगा .
दुश्शासन ने समझाया 'समझ लो वे पाँचो मृत शरीर पितामह के कक्ष में पड़े हैं .अब वहाँ बचा ही क्या '
सारी रात धूम मची रही .
युद्ध-क्षेत्र के उस शिविर से उस रात वाद्य-यंत्रों और घुँघरुओं के स्वर छन-छन कर बाहर आते रहे . मदिरा में मत्त आधे-अधूरे वाक्यांश शिविर के बाहर तक सुने गये.
सम्मिलित हास्य की फुहारें , विश्रान्त सैनिकों की निद्रा-लीन स्तब्धता को आन्दोलित करती रहीं
 ऐसी बातें कहीं छिपती हैं भला !
*
सेवक ने आकर निवेदन किया - कोई कुल-नारी आई है आपे मिलना चाहती है .
'कौन ?इस असमय? इस क्षेत्र में ?'
'अवगुंठिता हैं ,राजपरिवार की प्रतीत होती हैं ?
पितामह ने संकेत किया आने दो .
कौन हो सकती है?
सुभूषिता नारी ने प्रवेश किया
वे समझ नहीं पाये .
विचार में पड़ गये कौन होगी ? वस्त्राभरणों से सौभाग्यवती प्रतीत होती है .
याद आ गया .ओह ,कितना भूलने लगा हूँ मैं .कल ही तो दुर्योधन से कहा था ,'अपनी पत्नी को मेरे पास भेज देना .
हाँ भानुमती . .वही होगी !
बहुत व्यथित थे .सेनापति बना कर भी दुर्योधन उनका विश्वास नहीं करता .
अवश्य,आशीष लेने भानुमती आई होगी .कहा था मैंने आज का मेरा आशीर्वाद अमोघ होगा.  अपनी पत्नी को अखंड सौभाग्य ग्रहण करने के लिये मेरे पास भेज देना .
इस अंधकार की बेला ,वही आई होगी .कैसा भुलक्कड़ हो गया हूँ मैं .पर अब याद आ गया था उन्हें.
अवगुंठिता नारी पितामह के चरणों की ओर बढ़ी. .
. अनायास उनके मुख से निस्सृत हुआ ',कुल-वधू तुम्हारा मनोरथ सफल हो!'
नारी शीष नत किये है ..पितामह सँभल कर बैठ गये .अंतर सदय हो आया .
वह समीप आई ,झुककर उनके चरण-स्पर्श किये .
वाणी में स्नेह छलक उठा ,'अखंड सौभाग्यवती हो .''अखंड सौभाग्यवती भव !'
नारी ने धीमे से शीष उठाया उस की वाणी फूटी -
'आश्वस्त हुई पितामह !
'' कैसी विडंबना है एक .ओर पतियों के संहार का व्रत दूसरी ओर पत्नी को अखंड सौभाग्य का आशीष . क्या सच मानू क्या नहीं ?'
वे चौंक गये 'अरे, पांचाली तुम ? '
'हाँ ,तात कैसी-कैसी असंभावित स्थितियाँ जुड़ी हैं मेरे साथ ! किसका विश्वास करूँ ,आप परिवार के सर्वाधिक वयोवृद्ध !आपके आशीष को वरदान मानती हूँ ...पर मन में कैसी- शंकायें... मेरे अपने ही जब..' कहते-कहते कंठावरोध हो आया .
किंकर्व्यविमूढ़ से पितामह . क्या बोलें !
'.न जाने क्यों इस परिवार के लिये मैं पराई ही रही .मेरे मान्यजन भी, जब जब मुझे सहारे की आवश्यकता हुई, मुँह फेर गये . ,मेरा साथ किसी ने न दिया .पूज्यवर, आप भी तटस्थ हो गये ,.मैं कुल-वधू हो कर भी....कितनी गई-बीती ...'
आगे सुन नहीं सके हो उठे पितामह ,' ..बस, अब कुछ मत कहो आगे '.
कुछ क्षणों में प्रतिस्थ हो बोले ,'पुत्री,अवगुंठन हटा दो,अब कोई आवश्यकता नहीं उसकी .'
आत्मलीन से हो गये थे ',प्रभु की इच्छा पूरी हो ! '
'जो हुआ ,आपको उसकी अपेक्षा नहीं थी, तात ?क्या मैं ...'
'मैं क्या कहूँ ..जो होना था , हो कर रहा .भ्रम में मैं ही था .मुक्त केश- राशि वस्त्राच्छादित भी पूरा आभास दे रही थी .नीलकमल की सुगंध कक्ष में व्याप्त हुई तब भी मैं बूझ न पाया .नियति अपना खेल ,खेल कर रही .याज्ञसेनी ,तुम्हारा व्यक्तित्व भला पट में छिप सकता है !तुम्हें पहचाना नहीं कैसी आत्मविस्मृति छा गई थी मुझ पर !.'
.' आप पूज्य हैं मेरे, कुछ अनुचित हो गया हो तो परिष्कार कर लीजिये ,मैं अब तक कृपा-पात्री न हो सकी आगे भी ...'
भीष्म के मन में जाने- कौन-कौन सी स्मृतियाँ जाग उठीं , .'बस,बस करो पुत्री ,तुम्हारे साथ जो हुआ ,मैं दुखी हूँ ,लज्जित भी . कितना धिक्कारता हूँ अब भी अपने आप को .'
'बस आपका नेह भरा आशीर्वाद चाहती हूँ तात,और कुछ भी नहीं ,'
जानता हूँ पांचाली ,अपने लिये कभी कुछ नहीं माँग सकतीं तुम .'
द्रौपदी चुप है ,पितामह कुछ सोचते-से.
'तुम विलक्षण हो पांचाली .इतना संयम ,सहनशीलता और कर्तव्य-बोध ,तुम्हारी महती ...'
उद्वेलित-सी वह बरज उठी,' तात ,महत् और महान् ,ये शब्द मेरे लिये नहीं...'
'मिथ्या-भाषण नहीं सच कह रहा हूँ पुत्री,जो कुछ तुम्हारे साथ हुआ उस स्थिति को
निभाना सामान्य नारी के वश की बात नहीं... .'
कुछ नहीं कहना , सुन रही है चुपचाप.
' तुम्हें जो आशीर्वाद दिया है सच्चे मन से  .पर एक बात तो बताओ ,तुम इस अबेला यहाँ कैसे चली आईँ ,किसने प्रेरित किया तुम्हें यहँ आने को ?'
' क्या फिर कुछ अनुचित हो गया तात ?मुझे बड़ा दुख है कि मेरे पति अपने शील-सौजन्य के कारण सदा मात खाते आये.आप कुल के सबसे मान्य ,आपसे सहनुभुति की आशा ले कर आई थी.'
'पुत्री ,निश्शंक हो कर जाओ .दैव का विधान ! तुम्हें मिला यह आशीष मिथ्या नहीं हो सकता .अब तुम निचिंत हो कर जाओ.रात्रि हो रही है अपने निवास पर जाओ शुभे .'
पांचाली ने दोनों कर जोड़ ,शीश नत कर प्रणाम किया और घूम कर कक्ष से बाहर निकल गई.
कुछ अव्यवस्थित से पितामह रुक न सके,पीछे से बोले 'पुत्री,कोई आया है तुम्हारे साथ ?'
'हाँ ,अकेली नहीं आई हूँ .आप चिन्तित न हों .' कहती हुई वह बढ़ गई.'
*
शिविर के द्वार पर खड़े थे कृष्ण ,काँधे तले पीतांबर में कुछ लपेट कर सँभाले .
पांचाली को आया देख झटपट उसके निकट बढ़ आये, पीतांबर से पदत्राण निकाल उसे देते हुये बोले ' लो पांचाली ,ये सँभाले खड़ा हूँ ,कोई इन्हें पहचान ले तो तुरंत अनुमान कर लेगा कि तुम ...'
पीछे-पीछे शिविर के द्वार तक आ पहुँचे थे पितामह .
'अच्छा तो तुम हो इसके पीछे ?बस , यही जानने को आतुर था कि पांचाली को यहाँ आने को किसने प्रेरित किया !'
'वह साहस नहीं कर पा रही थी आपके सम्मुख आने का ..मैंने ही कहा ,तात के स्नेह में किसी के लिये भेद नहीं है,जा कर देख लो . '
विह्वल से कृष्ण को निहारते रहे थे वे.
'जिसके उपानह पीतांबर में सम्भाले खड़े हो जनार्दन,उसका कोई अनिष्ट नितान्त असंभव है ,'
'जाओ पांचाली, जाओ याज्ञसेनी ! निर्भय हो कर जाओ .और वासुदेव,तुम जिसके साथ उसका कोई क्या बिगाड़ सकता है .तुमसे क्या कहूँ मैं ? बस ,नतमस्तक हूँ .'
*
(क्रमशः)


8 टिप्‍पणियां:

  1. जिसके उपानह पीताम्बर मे सम्हाले खड़े हों जनार्दन उसका कोई अनिष्ट नितांत असंभव है !!!

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  2. शकुन्तला बहादुर25 मार्च 2012 को 10:38 pm

    दृश्यों की नाटकीयता,तदनुरूप शब्द-संयोजन एवं चुटीले वाद-संवादों के द्वारा प्रसंग के सभी अंश नेत्रों के समक्ष विविध चित्रावलियाँ प्रस्तुत
    कर देते हैं- मन उनमें चित्रकाव्य सा रम सा जाता है।
    अत्यन्त सरस और अद्भुत प्रस्तुति!! इस आनन्द के लिये आभार!

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  3. इस श्रृंखला पर कोई टीप्पणी नहीं कर सकता। पढ़कर भाव विभोर हूं।

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  4. आप ऐसा लिखती हैं की लगता ही कि सारे दृश्य आँखों के सामने चल रहे हों ...बहुत सुंदर प्रस्तुति

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  5. यह तो काव्य है!!
    सचमुच, विभोर होना इसे ही कहते हैं जैसा अभी लग रहा है।
    शकुन्तला जी से अक्षरशः सहमत।
    अत्यंत आभारी हूँ।

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  6. भीष्म पितामह की मन:स्थिति पर एक दो पुस्तक पढ़ीं थीं..आज इस अंश को पढ़ने के बाद पांचाली से अधिक मन भीष्म और दुर्योधन के लिए विचलित हो रहा है..मन की उथल पुथल को यही कह कर शांत कर रही हूँ कि अंतत: नियति ही सर्वोपरि है...फिल्म आनंद का 'रंगमंच की कठपुतलियाँ' वाला संवाद मन में गूँज रहा है।पता नहीं कहाँ पढ़ा था या शायद 'श्रीमदभगवतगीता यथारूप' में ही...कि जब श्रीकृष्ण को किसी उद्देश्य की पूर्ति करनी होती है तो उनकी शक्ति माया उनके अनुरूप परिस्थितियाँ निर्मित कर देती है।यहाँ देख रही हूँ स्वयं कृष्ण भी प्रत्यक्ष रूप से नियति चक्र में साधारण व्यक्ति की भाँति अपना पात्र निभा रहे हैं।
    कितना प्रयत्न करते हैं हम ..कितना ध्यान रखते हैं...कि पूजा अर्चना में कोई अशुद्धि न आने पाए ...ऐसे ईश्वर स्वयं ओट में छिपे हुए और पदत्राण पीताम्बर में छिपाए हुए कैसे लगते होंगे ? मैं तो उनके मुख पर भावों की कल्पना ही नहीं कर पा रही हूँ।कितना भाव विभोर कर रहा है अंतिम दृश्य..कितना सौभाग्य पांचाली का...और इस दृश्य को देखने वाले पितामह का।
    आपने एक बार कहा था कि पांचाली लिखकर आप अधिक संतुष्ट होतीं हैं...आज तीव्रता से ये अनुभव कर रही हूँ।
    (आज जब अपनी चप्पलें मंदिर के बाहर रखने को होउंगी...तब यह दृश्य, आपके शब्द और मेरी कल्पना नेत्रों को, दृष्टि को छा लेंगे।क्या पता अन्दर विराजे हुए लड्डूगोपाल भी खिलखिला पड़ें कि ,'' ये तो पांचाली पढ़कर आ रही है''।..:):).... )

    अत्यंत आभार विशेषकर इस अंतिम दृश्य के लिए!! :)

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