सोमवार, 4 जुलाई 2011

एक थी तरु - 24. & 25.


24.
'अरे ,भाभी तुम यहाँ छिपी खड़ी हो , मैं सब जगह ढूँढ आई,' कहती हुई रश्मि पास आ गई, 'अकेली खड़ी-खड़ी ,क्या कर रही हो ?'
 'बाहर चबूतरे पर बडा मज़ेदार डिस्कशन हो रहा था . तीन-चार लोग थे ,बाद में मास्टरजी और उनका लड़का भी आ गये थे .'
 'चबूतरा पालिटिक्स हमरे यहाँ की खासूसियत है . हर मसला चाहे कहीं का, कैसा भी हो ,पहले चबूतरे पर ही डिस्कस होता है .'
 'हमारे यहाँ भी .हम जब छोटे थे रश्मि ,1947 से पहले की बात है,तब गान्धी जी का आन्दोलन ज़ोरों पर था. हमारे चबूतरे पर भी ऐसी ही गर्मागर्म डिस्कशन्स हुआ करते थे .आज सुन कर मज़ा आ गया .तब लोगों में जोश था .निष्ठा थी,कुछ उद्देश्य था .. हाँ ,.....मास्टर जी के लड़के का नाम क्या है ?'
 'बबुआ का ?अरुण चन्द्रा .मास्टर साहब ने अपने नाम के आगे से जाति तभी निकाल फेंकी थी .स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़ कर कॉलेज छोड़ दिया था.इनके भाई,चाचा वगैरा बड़ी अच्छी- अच्छी जगहों पर हैं.यह बिचारे रह गए .अब ल़ड़के को इस सब मे पड़ने से मना करते हैं . कहते हैं पढ़ो- लिखो ज़िन्दगी बना लो .....तुमसे कहना तो मैं भूल ही गई भाभी,माँजी तुम्हें कबसे बुला रही हैं .सामान की लिस्ट बनाई जा रही है आज शाम तक सारा ताम-झाम धर्मशाला में पहुँच जाना है .'
 तरु को मालूम है धर्मशाला सिर्फ तीन दिन के लिये मिली है .वैसे काफी बड़ी और खुली हुई है ,कमरे भी काफ़ी हैं .रश्मि की बिदा के बाद ही खाली कर देनी होगी .छोड़ते ही अगली पार्टी आ जायेगी .इन दिनों बहुत शादियाँ हैं,
 घर में मेहमान काफ़ी आ गये हैं .हलचल बढ़ गई है.
आनेवाले अपनी-अपनी निगाह से तरल को तोल रहे हैं .अलग -अलग झुण्ड बना कर लोग छोटे-मोटे कामो में लगे  हैं ,साथ में बातें भी चल रही हैं .
लड़कियों में उत्सुकता है ,असित भैया ने लव- मैरिज की है -ऐसा क्या है भाभी में ?
 'ऐसी सुन्दर तो नहीं है !'
'देखने में साधारण होते हुये भी अच्छी लगती है .'
'व्यवहार खूब अच्छा है .'
'खूब बातें करती हैं .'
'काम भी तो डट कर कर रही हैं .'
 लड़कों का कहना कुछ और है -,'सिर्फ गोरा रंग ही सबकुछ नहीं .काली  तो बिलकुल नहीं ,कुछ गिरता रंग ,पर बोल-चाल, व्यवहार कितना अच्छा है .बार-बार मिलने-बोलने का मन करता है .'
'ढंग भी खूब है ,ऐसा कि घर बाहर हर जगह निभ जायें .प्रभाव पड़ता है कि मिले हैं किसी से .'
 ' हाँ ,कुछ है जो अपनी तरफ खींचता है .'
 'मन का साथी मिल जाय तो क्या बात है !'
 तरल चुनौती सी खड़ी है सबके सामने .कुछ-कुछ रिमार्क कानों में पड रहे हैं .
 'लड़का इतना हैण्डसम . बीबीऔर बढ़ कर मिल सकती थी?'
 'चलो, जो है सो ठीक है.असित भाई कौन गोरे हैं उनसे तो साफ़ ही है रंग.'
तरल को खुद लग रहा है शादी के बाद उसका रंग काफ़ी खुल गया है .
' मिला-जुला  तो कुछ भी नहीं .'.'किसी बड़ी-बूढ़ी का रिमार्क था ,'भई कुछ जमा नहीं ,पता नहीं काहे पर रीझ गया !'
 'पागल हुई हो लव मेरिज में कुछ मिलता है ?बस लड़की मिलती है .'
 तरु को याद है असित ने कहा था ,'तुम मुझे अच्छी लगती हो .तुम्हारे बिना मै कैसे रहूँगा ?'
 वह सोच लेती है और किसी को अच्छी लगूँ, न लगूँ क्या फ़र्क पड़ता है !

 पास के कमरे से आवा़ज़ें आ रही है ,'अब लाला काहे को पहचानेंगे !अब तो सब भूल गये .जब इन्टर व्यू देने आये थे हमारे पास ,तो इनसे कहते थे -दादा हमे टाई बाँधना सिखा दो .इन्हीं ने सिखाया था ढंग-सहूर .पर अब काहे को याद होगा !'
 बाहर आँगन से तरल सुन रही है .खूब ठसकेवाली जिठानी हैं ,फुफुआ सास की बहू.पढी-लिखी नहीं तो क्या हुआ ,पैसा तो है .सबको कुछ न कुछ सुनाते रहने का अधिकार है उन्हें !
 'रहने दो भाभी ,' किसी ने टोका , 'बाहर आँगन मे तरु भाभी हैं.'
 'हैं तो हम क्या करें ,' उन्होने इठलाकर कहा ,'तब भाभी- भाभी करते मुँह नहीं थकता था असित लाला का .मैं कोई झूठ बात कह रही हूँ क्या ?अब कोई नहीं पूछता कहाँ दादा ,कहाँ भाभी .'
 रश्मि ने तरल के पास आकर बताया था ,'इनकी ऐसी ही आदत है,हरेक से कुछ न कुछ शिकवा है इन्हें.चाहती हैं सब इनके गुन गाते इनके चारों तरफ घूमते रहें .'
 तरु का उत्साह फीका पड गया .
असित ने बताया था - जाता था तो कभी खाली हाथ नहीं जाता था ,घी ,खोया .आम .अमरूद भर-भर कर पहुँचाता रहता था .तब लाला-लाला करते पीछे घूमती थीं .अब दादा का प्रमोशन हो गया है न,रुतबा बढ गया ,ऊपर की आमदनी के ज़रिये बन गये .तब तो कहीं जाना होता था तो  मुझे लिख देती थीं .टिकट के पैसे भी मैं कभी नहीं लेता था .पहुँचा आता था सो अलग .नौकरी लगने पर सबसे पहले उन्हीं को उनकी पसन्द की साड़ी खरिदवाई थी .और मैं करता था तब - इनके मान का भूखा था न !

'पर उस सब को उनने अपना अधिकार समझ लिया .अब पोस्टिंग दूर हो गई तो नहीं जा पाता ,तब से बड़ी शिकायतें हैं. वे चाहती हैं और सबको छोड़ उन्हीं के हिसाब से चलूँ ,सौतेला- सौतेला याद दिलाती रहती थीं . पर अब मेरा भी तो कुछ  फ़़र्ज़ है .
असित को याद है- आते- जाते कुछ न कुछ लेकर ही उनके घर रुकता था ,बस एक बार एक हफ़्ते रहा था ,जब पिता का दूसरा ब्याह हुआ था .पर कहती फिरती हैं सौतेली माँ के मारे हफ़्तों हमारे पास पड़े रहते थे.

 तरु का मन ऊबने लगा है-पहले की विपन्नता और असहायता की याद दिला-दिला कर लोग अपनी कृपा से तरु को अवगत कराना चाहते हैं .
'ऊँह .क्या करना है मुझे.इन सबसे ! चार दिन बाद सब अपने-अपने घर होंगे .बस रश्मि की शादी अच्छी तरह निपट जाये, ' यही मना रही है तरल .
 'भाभी ,तुम्हें पता है ,ये लोग सगापन दिखा-दिखा कर ,फुसला-फुसला कर तुम्हारे बारे में टोहती रहती हैं .थोड़ी सी बुराई कर दूँ तो मगन हो जायेंगी .'
 'तो कर दो न .उनके मन की भी हो जाये .'
 'अरे, फिर एक की दस इधर -उधर लगायेंगी ,और बढ़ा-चढ़ा कर तुम्हारे कान भरेंगी .'

 रात को तरु ने असित से कहा था ,'सुनते हो ,मैंने तुम्हें बहका  लिया है .'
 'कहने दो उन्हें ,'उसे अपने में समेटते हुये कहा असित ने,'मुझे तुम्हारे सिवा और कोई नहीं चाहिये था .'

 इस स्पर्श के साथ एक और स्नेह भरा स्पर्श तरु के मन को छू जाता है ,जिसका आकर्षण कभी कम नहीं होगा , अपने मन में ही दोहराता है-'अब मुझे कुछ नहीं करना ' .यही तो असित ने कहा था ',तुम बहुत कर चुकीं ,अब मुझ पर छोड़ दो अब तुम्हें कुछ नहीं करना है .'
 हाँ, असित तुमसे मुझे दुखों ने जोड़ा है ,सुख के स्वप्नो ने नहीं .यह लेई इतनी कच्ची नहीं  कि जरा से ताप से खुल जाये .
एक आश्वस्ति जो अंत तक सम्हाले रहेगी !
निश्चिन्त पलकें मुँद जाती हैं .
***
25
मकान मालिक शुक्ला जी के घर से ज़ोर-ज़ोर से आवाजें आ रही हैं .
 'आज तो हड्डियाँ तोड़ के  रहूँगा ...ले हरामी ....'
 'हाय, हाय रे अब नहीं करेंगे. बाबूजी ...अब कभी नहीं ...'
 'नहीं समझेगा कभी तू .आज तुझे ठिकाने लगा कर रहूँगा .'और मार-पीट के साथ-साथ हाय-हाय की आवाजें .
 'हाय अम्माँ ,हाय बाबू ,हाय हाय रे मर गया ...'

 तरु और रश्मि बरामदे में निकल आई हैं .
 'कैसी बुरी तरह मार रहे हैं !'
 'वह है ही चार-सौ-बीस. भाभी ,यही है इनका तीसरे नंबर का लडका दन्नू !जब आते हैं दो-चार बार भूत उतार जाते हैं .पर वह भी एक ही बेशरम है .उधर वो गये इधर ये फिर चालू .

 चीख़-पुकार और मारने की आवाज़ें बराबर आ रही हैं .
 'ऐसे मारने से तो बच्चे और बिगड़ जाते हैं .'
 'बच्चा?बच्चा नहीं,अठारह -उन्नीस साल का साँड  है.उसकी शुरू से यही आदतें है .'
 रश्मि उसके किस्से सुनाने लगी -
छोटी बहिन गर्ल-गाइड्स में थी ,उसकी यूनिफार्म का नेवीब्लू दुपट्टा आया  .शाम को उसने तह लगा कर हैंगर पर टाँग दिया .सुबह पी.टी के लिया जल्दी पहुँचना था .वह तैयार होकर दुपट्टा उठाने आई तो देखा दुपट्टा हई नहीं .
 'काहे अम्माँ ,तुमने धर दौ का? हियाँ अरगनी पे टाँगो हतो '
 'हम काहे धरिहैं ?हुअँनई परौ हुइयै .'
 इधर उधर चारों तरफ ढूँढा.दुपट्टा कहीं नहीं .
 अरगनी की लहदी टटोली,गन्दे कपडों की गठरी ,सन्दूक,छान मारा ,गुसलखाने में भी नहीं .दुपट्टा कहीं हो तो मिले !
 'हमेसा देर हुइ जात हैगी .आज टाइम से तैयार हुइ गईं तो दुपट्टा सुसरो गायब .'
 वह हल्ला मचा रही थी .
अम्माँ भी ढूँढने में जुट गईं .
 दन्नू से बड़े मन्नू ताव खाते हुये बिस्तर से उठे ,'सम्हाल के धरो नाहीं जात है किसऊ से .जइये कहाँ? हियनई हुइयै .'
 उनने बिस्तरों को भी  उलट-पलट डाला .
दन्नू पड़े सोते रहे . किसी ने जगाया भी नहीं .
बहिन ने रोना शुरू कर दिया
 'नेक सो दुपट्टा है .कहूँ दबिगौ हुइयै ',मन्नू ने सांत्वना दी .
 गठरी फिर उल्टी गई,अरगनी की लहँदी बिखेरी गई ,बाहरवाला सन्दूक खखोला गया .दुपट्टा नहीं मिला .
 हार कर मन्नू नया लेने चले .
 मोहल्ले की दुकान पर नेवीब्लू दुपट्टा माँगते ही दुकानदार ने झट एक तह लगाया हुआ प्रेस किया दुपट्टा पकड़ा दिया ,' जहै तो लियो बाबूजी ,कल दन्नू बेच गये हते .'
 कह कर दुकानदार ने खीसें निपोर दीं .
 आश्चर्य से मुँह खुला रह गया मन्नू का ,'दन्नू बेच गये हते !'
 'हाँ!आय के कहन लगे-नओ दुपट्टा है ,एकौ बार ओढ़ो नाहीं गौ .अब जा कलर की जरूरत नाहीं है .'
 'साला चोट्टा ,औने-पौने दामन पे बेच गओ बहिनी को दुपट्टा .'दुकानदार से कुछ कहने से क्या फ़ायदा ,लाकर पटक दिया बहन के सामने .
 'हियाँ कहाँ मिलिहै दुपट्टा ?सामई को दन्नू बेच आये हते .'
 'दन्नू बेच आये हते ! 'माँ ने कपाल पीट लिया .फिर सोच कर बोलीं ,'पर बे तो साम ई से घर नाहीं हते .रात दस बजे आये और खाय के सोय गये .'
 दुपट्टा बेच के सनीमा देखन गओ हुइयै ,सुसरा. चोर कहूँ को ,नालायक .है कहाँ ?दन्नू ,अबे दन्नू ...'
दन्नू की ढूँढ पडी अभी-अभी तो सो रहे थे .जैसे ही सुना भाई दुपट्टा खरीदने जा रहे हैं चुपके से सरक लिये .
 'आउन देओ सुसरे को ..जइयै कहाँ ..'गुस्से में मन्नू चिल्ला रहे थे.
 'बहिनी को दुपट्टा भी नाहीं छोड़ो .कैसो हरामी पैदा भओ है .खून पियन के लै जनमो है राक्सस...'माँ बड़बड़ाती रहीं .
 रश्मि और तरु बातें करती चबूतरे पर निकल आई हैं .
 किताबें लादे पड़ोस की उमा ने आकर अपना दरवाजा भड़भड़ाया -उमा का घर आगे सामने की तरफ़ है .दरवाज़ा खुलते ही उमा उत्तेजित-सी अपनी माँ से कह उठी .'अम्माँ ,वह जो गुण्डा बस में लड़कियों को परेशान करता  था , जिसे पुलिस पकड़ ले गई थी ...'
 रश्मि और तरु चबूतरे के उस ओर के कोने पर पहुँच गईं .
 'उमा, किसे पकड़ ले गई पुलिस?'
 'एक गुण्डा था ,खूब छेड़ा करता था बस में लडकियों को,गंदी-गंदी बातें बकता था ,एक दिन एक लड़की की चुन्नी खींच ली . अगले दिन वह अपने भाई को बुला लाई ,तो गुण्डे  ने उसके छुरा भोंक दिया .तब पुलिस पकड़ ले गई थी .'
 'अच्छा !'
 'आज फिर वह बस स्टैंड पर खड़ा था .सबको धमका रहा था कि एक-एक को देख लेगा .'
 उमा के पिता बाहर निकल आये थे .
 'छोड़ दिया होगा कुछ ले लिवा कर .या किसी नेता का पालतू रहा होगा उसी ने छुड़वा लिया होगा .उमा, तुम किसी के बीच में मत पड़ना .अब तुम रिक्शे में जाया करो .'
 'पर बाऊजी ,वो लोग जो बस से जाती हैं वे कहती हैं- हम रोज रोज तीन- तीन रुपये रिक्शे के लिये कहाँ से देंगे ?"
 'उँह ,तुम्हें उनसे क्या करना ?तुम अपनी देखो .'
 उमा चेहरा तमतमा रहा था .

24.
कभी -कभी जाने क्या होता है, खास तौर से जब ट्रेन में  अकेला होता है ,अतीत के पृष्ठ एक-एक कर खुलने लगते हैं . तरल के साथ और भी ,उसे लगता है वह उसे समझ रही है ,उसका दुख अपने मन में अनुभव कर रही है. कोई तो है जो हिस्सा बँटा रहा है उन अनुभवों में और असित सुनाये जाता है विगत की कथा.अपने भीतर से निकाल कर सब-कुछ व्यक्त कर देना चाहता है .
उसने कहा था ,'माँ जब दूसरी होती है तरल जी ,तब बाप और तीसरा हो जाता है .
और भी कि जब पिता का विवाह हुआ वह नादान था .
बुआ बताती हैं कि इन माँ के ग्रह कुछ ऐसे थे कि कहीं शादी नहीं होती थी ,इनके पैर पट हैं न !'
'पट क्या ?' तरु ने पूछा था ,' मतलब - तलवा बिलकुल सपाट.भीगा पैर ज़मीन पर पड़े तो पूरा का पूरा छप जाए .हम लोगों के एड़ी-पंजे के बीच जगह रहती है न.
बुआ कहती थीं ऐसा पाँव पटरा बैठा देता है .'
'आप मानते हैं यह सब ?'
'मेरे मानने से क्या होता ?लोग तो मानते हैं ,बुआ कहती हैं इसी मारे पिता की नौकरी चली गई .,बड़ी उमर में शादी ,घर में पैसे की कमी ,ऊपर से पहली के तीन-तीन बच्चे सम्हालने को , बहुत खीझती थीं हम पर ....वो तो ये कहो कि श्यामा जिज्जी की शादी ठीक-ठाक हो गई .सौतेली माँ देख कर दया आ गई थी उन लोगों को ,फिर जिज्जी काम करने में भी चटक थीं .और हमारे बाबू जी ,जो इनने कह दिया वही ठीक .'
उतरती उमर की शादी में यही होता है -तरु ने सोचा रही थी,पर कुछ कहा नहीं .
'आप भी क्या सोच रही होंगी अपने माँ-बाप के लिये कैसे कहे जा रहा है ..'
तरु क्या कहे, पर वह सिर हिला रही है .
'मिठाई का दोना लिये बिना वे उनके कमरे में घुसते नहीं और वे हमेशा अस्वस्थ .कभी कुछ तो कभी कुछ .हम सब थे न सेवा करनेवाले .'
वह समझ नहीं पाती क्या बोले !
अच्छा है जो असित उससे कुछ सुनने की अपेक्षा नहीं करता .और असित ! तरु का चेहरा देख कर ही उसका समाधान हो जाता है .
**
उस दिन की बात ,जब बिगड़े मूड में दोनों की  झड़प हो गई थी ,बाद में बताई  थी असित ने  .
 रश्मि सौतेली बहिन है ,वैसे उसके व्यवहार में परायापन नहीं है. बहुत छोटी राहुल-राजुल के बीच की.असित पर अपना अधिकार अधिक समझती है .
उसे लेना था नया सलवार-सूट . माँजी से कहा. उनने साफ़ जवाब दे दिया ,अभी पिछले महीने तुम्हारा कार्डिगन आ चुका है .कहती हैं - ज्यादा ऊँचे दिमाग़ मत रखो .वैसे ही खर्चे के लिए हाय-हाय मचाये रहती हैं ,रश्मि की शादी की दुहाई दे-दे कर .
उनसे कहना बेकार है .असित दा से कहे रश्मि सोचती है,पर इतना पैसा फ़ालतू उनके पास होगा भी ? अपने लिए तो बहुत कम ही रखते हैं. हर महीने पहले ही माँजी को पकड़ा देते हैं .असित दा तो सावन में ,भैया-दूज पर और वैसे भी रश्मि के लिए काफ़ी कुछ कर देते हैं -उनसे कहने की हिम्मत नहीं पड़ रही.
'इधर दो दिन से दादा घर पर ही हैं,चलो आज कहूँगी .'
अम्माँजी कहती हैं अपना पेट जाया होता  तो काहे इतनी चिन्ता होती.
ससुराल से जब कभी श्यामा आ जाती है तो उस पर होनेवाला खर्च भी उन्हें भार लगता है ,पर न बुलायें तो भी मुश्किल ,सब कहेंगे सौतेली माँ है, काहे को पूछेगी ?सबसे अधिक भय असित से लगता है ,घर में इतना रुपया देता है, श्यामा को न पूछने पर क्या सोचेगा ?
कहीं सब अपने हाथ में ले लिया तो न पैसा मिलेगा न अपना नाम होगा .
पिता कंपाउंडर थे तो बँधी-बँधाई आमदनी थी पर वहाँ से सस्पेंड चल रहे हैं  .

अबकी बार श्यामा के आने पर असित की शादी की चर्चा हुई तो माँजी ने उससे भी कहा-असित को समझाओ.उनका का विचार है असित की शादी में जो मिलेगा उससे रश्मि के लिए सहारा हो जाएगा .बीस-पचीस हज़ार तो आसानी से मिल जायेगा कुछ सामान भी  इधर का उधर चला सकती हैं.
इनकी हो जाए तब तो कहीं रश्मि की बात चलाएँ .अच्छी-अच्छी लड़कियाँ आ रही हैं घर भी खाते-पीते ,पर वह सुने तब न !
फिर श्यामा ने समझाया ,'सोचो ज़रा ,हमेशा थोड़े ही न अच्छे रिश्ते आते रहेंगे. आगे का भी समझो. सत्ताईस पार कर गए  और आगे कौन लड़की देगा फिर ?'
पर वह तैयार नहीं होता .
श्यामा की मौसिया-सास की बेटी है - सुन्दर , इन्टर पास है .देंगे भी दिल खोल के .कई चक्कर लगा चुके हैं . वे लोग श्यामा से भी संपर्क बनाए हैं .असित के सामने बात हो जाए तो अच्छा .आज  आने को कह गए हैं .

रश्मि के मन में खलबली हो रही है .उसने पूछा,'दादा ,आज तो घर पर ही रहोगे ?'
'क्यों ?काम है कुछ?'
'आज वो लोग आ रहे हैं ,देखने और बात करने के लिए ....'
उसने जानबूझ कर पूछा 'तेरी शादी की बात पक्की करने ?'
रश्मि ठुनकती हुई बोली,' हमारे क्यों ,तुम्हारे लिए आ रहे हैं पहले भी चार चक्कर लगा चुके हैं ,...फ़ोटो देखोगे दादा,वहीदा रहमान जैसी ...'
वह फ़ोटो लेने दौड़ी ,फिर तारीफ़ों के पुल बाँध दिये उसने ,'इतना सामान ले-ले कर आते हैं ..मिठाई भी फल भी .दो ही लड़कियाँ हैं .लड़का एक भी नहीं.
बाबू ने कहा है लड़के के सामने आकर बात कर लो .आज पिक्चर भी ले जायंगे तुम्हें  . दादा,हमें भी ले चलोगे ?
हाँ , अपने सवालों की लिस्ट तैयार रखना ,वह पिक्चरहाल में मिलेगी.'
पिता कामता प्रसाद ने सस्पेंड हेने के बाद अपना दवाखाना खोल लिया ..बड़ी लड़की के डूब कर मर जाने के बाद से घर की किसी बात में दखल नहीं देते .
पहली पत्नी मरी थी तीन बच्चे छोड़ कर,असित बहुत छोटा था.दूसरी पत्नी राहुल की माँ बड़ी दबंग थी ,सौतेली लड़की के डूब मरने के बाद से धीमी पड़ गई है .
कामता प्रसाद की प्रेक्टिस ठीक-ठाक चल जाती है ..खर्च लायक कमा लेते हैं
अब नज़र कमज़ोर हो गई है ,शरीर दुर्बल ,पर चलाए जा रहे हैं .
राहुल इन्टर करके डिप्लोमा कर रहा है ,बीच में दो बार फ़ेल भी हो चुका है ..रश्मि अठारहवें में पहुँच रही है .प्राइवेट फ़ार्म भरा है इंटर का .छोटा राजुल हाई स्कूल कर रहा है .
बे-मन से फ़ोटो हाथ में पकड़ लिया असित ने ,सरसरी नज़र डालता बोला पर मुझे तो तीसरे पहर की ट्रेन पकड़नी है .प्रोग्राम पहले से तय है .'
'फिर तो बड़ी मुश्किल हो गई ,'रश्मि के मुँह से निकला,'दादा ,माँजी को मत बताना कि हमने तुमसे इस बारे में कुछ कहा .नहीं तो समझेंगी इसीलिये चले गए.'
'नहीं ,मैं क्यों कहूँगा ,मैं तो पहले ही जा रहा था.'
'और दादा ..'रश्मि की हिम्मत नहीं पड़ रही है .'
'झटपट कह डाल,वही सहेलीवाली बात होगी .'
कुछ दिन पहले रश्मि ने बताया था ,हमारी सहेली साधना है न ,वही जो घर पर आती रहती है ,तुम्हारे बारे में खूब खोद-खोद कर पूछती रहती है ..कहती है तेरे दादा कितने हैंडसम हैं और कितनी अच्छी तरह बात करते हैं .'
'फिर तूने क्या कहा ?'
'हम क्यों पीछे रहते ,हमने कहा हाँ, वो तो हैं ही और कितने स्मार्ट भी.'
'क्या फिर कुछ कह रही थी तेरी सहेली ?'
'नहीं , उसकी बात नहीं. माँजी तो कुछ समझती ही नहीं ,'
'तुझे कुछ चाहिये ?'
'दादा , हमें एक सलवार सूट चाहिये ,'वह मचलती-सी बोली ,'माँजी तो एकदम मना कर देती हैं .हमारे पास बीस रुपये हैं पर उतने में तो कपड़ा भी नहीं आएगा..'
असित उठा ,जेब में से पचास का एक नोट निकालते हुए असित ने कहा,' अब तो ठीक..?'
'बस इतना काफ़ी है .'रश्मि ले कर नाचती हुई चली गई .
लड़कीवालों के आने के बाद तो फँस जाऊँगा.असित ने सोचा ,वे घुमा-फिरा कर यही सब पूछेंगे कैसी चाहिये ,क्या चाहिये और भी जाने क्या-क्या .'
हुँहँ , कैसी-कैसी बातें पूछते हैं ? असित को झल्लाहट होने लगती है.जब विवाह में रुचि नहीं तो कैसी चाहिये का क्या मतलब !
घर के लोग जो चाहते हैं असित का मन वह करने की बिसकुल गवाही नहीं देता .उस पर किये गये एहसानों का ब्योरा पहले ही वहाँ पहुँच चुका होगा ,फिर सहज रूप से संबंध बनाना संभव नहीं होगा .इस लड़की के बाप तो पहले ही कह गए हैं जिनने इन बच्चों को पाला-पोसा ,लड़की का ब्याह किया लड़के को लायक बनाया ,वह माँ सौतेली कैसे वह तो पूजने लायक है .
विवाह से मतलब है  - सब की स्वीकृति से जीवन भर साथ रहने को वचन-बद्ध स्त्री-पुरुष का एक जोड़ा ,जो झींकेगा ,लड़ेगा ,एक-दूसरे पर दोषारोपण करेगा और बच्चे पैदा करते हुये इस संबंध को ज़िन्दगी भर घसीटता जाएगा .
क्या करना है ऐसे थोपे हुए रिश्ते का ,जहाँ पहले से भूमिका तैयार कर दी गई हो ,जहाँ सिर्फ़ शिकायतें हों ,अपनी बात मुँह पर लाने पर प्रतिबंध हो ,एक बँधी-बँधाई लीक पर चलते जाने को विवश !
कितने नीचे स्तर पर उतर आते हैं लोग और सबके सामने ढ़ोंग रचते हैं .नहीं ऐसा संबंध मुझे स्वीकार नहीं है, जहाँ खुली साँस लेने का मौका भी न मिले .
और फिर असित घर पर रुका नहीं, बैग उठाया और 'जाने का प्रोग्राम तो तय था कह कर घर से निकल गया.
**
25 .
क्या-क्या देखा है इसका पूरा ब्योरा तो शायद कभी न दे सके ,पर विवाह के नाम से घर छोड़ कर भागता लेता था असित .
मन में ग्लानि उत्पन्न होती है .जैसे हमलोग पले-बढ़े ऐसे ही कुछ और लोग पलें ,सिर झुका कर मुँह छिपा कर .वैसा ही एक घर और बसे उसे गवारा नहीं .इससे तो अच्छा है घर ही न बने .एक मैं ही बिनब्याहा रह गया तो क्या बिगड़ जायेगा किसी का ! उसे लगता है जिन्दगी का यह अध्याय बंद रहे तो ही अच्छा. जो पृष्ठ पलटे जा चुके हैं वे आगे कभी न खुलें वही ठीक है .
उसे उन दिनों की याद आती है जब उन लोगों से संबंध रखना लोगों को अपनी हेठी लगता था ,एक वह भी समय था जब उसे अपना कहते हुए लोग कतराते थे .,दूर-दूर रखने की कोशिश करते थे और हमें ज़रा भी महत्व देने में जिनकी शान घटती थी ,आज वही लोग आस-पास घूम रहे हैं ,हमसें जुड़ कर बड़ा संतोष मिल रहा हो जैसे उन्हें !
बड़ा अजीब लगता है असित को .एक दिन वे भी थे और एक ये भी हैं.
परायेपन का पाठ उन लोगों ने पढ़ाया था जिनके अपनेपन के प्रति मन में कभी संदेह नहीं जागा था ,और जिन्हें पराया समझा था उनसे इतना कुछ मिलेगा ,कभी सोचा भी न था .कभी-कभी ऐसी अजीब मनस्थिति हो जाती है कि वह स्वयं नहीं समझ पाता कि काहे से खुश होगा ,काहे से खिन्न .
बचपन से बहुत रिज़र्व रहने की आदत रही है .अपने सुख-दुख कहता भी तो किससे?माँ सौतेली ,जिसे आज तक अपना नहीं समझ पाया ,और पिता इतनी दूर पड़ गए थे कि उनसे मन का कोई लगाव शेष नहीं रहा .श्रद्धा-सम्मान कुछ नहीं हैं मन में उनके लिये. बस देह का संबंध है वह निभाये जा रा हूँ.  जब से होश सम्हाला यही देखा है .कई बार रिश्तेदारियों मे जा-जा कर दिन काटने पड़े .वे अनुभव भी निराले थे .उस छोटी-सी उम्र में कैसी-कैसी स्थितियाँ झेल गया .उसके बाद विमाता ने बुलवा लिया ,रिश्तेदार पीठ-पीठे बहुत कुछ कहते थे उसका असर पड़ा होगा .
इस घर में आकर छोटे-छोटे बाई-बहिनों की सम्हाल ,हर समय कहीं न कहीं की दौड़ और  झिड़कियाँ .पिता के सामने जाते हुए भी डर लगता था ,पता नहीं इन माँ ने क्या लगाया हो औ वे बिगड़ने लगें मारा-पी़टी करने लगें ,मुँह छिपाये-छिपाये फिरता था असित .
**
सुधा जिज्जी के मरने के बाद बड़ा डर लगता था .बड़े भयानक दिन थे -रातों में चीख़-चीख़ कर जाग जाता था . फिर कुछ दिनों को उसे बुआ के घर छोड़ दिया गया .तब पिता किसी अस्पताल में कंपाउंडर थे .
एक बार बड़ा हल्ला मचा था -पिता पर अस्पताल की दवायें बेचने का आरोप था और बहुत सी शिकायतें . फिर उनके तबादले के आर्डर्स आ गए थे .
एक दिन मुँह लटकाये घर में आय़े और माँ की भारी-भारी पायलें ले कर बाज़ार चले गये
असित से बड़ी श्यामा ने धीरे से उसके कान में कहा था ,'देखो ,ये पायलें अपनी अम्माँ की हैं .'
'अपनी अम्माँ 'उसके कानों से टकराया
उसे उनकी बिलकुल याद नहीं .
पुराने संदूक में एक फ़ोटो है - फ़्रेम में लगी हुई .पिता,पिता नहीं लगते ,एक चढती उम्र का युवक है जिसके चेहरे में पिता का चेहरा झलक मारता है .,एक झेंपी-झेंपी-सी युवती उनके साथ खड़ी है .रद्दी के सामान में डाली हुई फ़ोटो श्यामा ने निकाल ली थी.
वह कभी-कभी किसी साड़ी या जेवर को देख कर कहती थी ,'ये अपनी अम्माँ का है .'
लेकिन असित को ये चीज़ें भी पराई लगती हैं
हाँ, माँ के फ़ोटो को वह बड़े ध्यान से देखता है  -यही हैं मेरी माँ !
माँ के चेहरे की कोई हल्की-सी झलक उसे तरल के चेहरे में मिली ,लेकिन यह बात बहुत बाद में उसके दिमाग़ में आई थी.
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फिर सामान बाँध कर सब लोग नई जगह चल दिये थे  -खानाबदोषों की तरह .सबसे छोटा राजुल अभी पैदा नहीं हुआ था .
ज़रूरी सामान साथ ले लिया गया ,बाकी पलँग ,मेजें ,कलसे, परातें आदि एक कोठरी में बंद कर ताला लगा दिया गया.सारी  अपनी अम्माँ की जोड़ी गृहस्थी - श्यामा कहती थी.
बाद में ठीक से इंतज़ाम कर लेने पर पिता ले जायेंगे ,अभी से ले जा कर लादे-लादे घूमने से क्या फ़ायदा !
छूटे हुये सामान में असित की एक पीतल की जालीदार संदूकची भी रह गई ,जिसमें उसकी कुछ अमानतें सँजोई हुई थीं -बंदनवार की निकली हुई नलियाँ ,उसका भाग्यशाली सिक्का,जिसे जेब में रख कर उसे खेल में जीतने का विश्वास रहता था,फानूस से निकला एक कटावदार शीशा ,जिससे सारी दुनिया सतरंगी दिखाई देती थी ,जिसे वह किसी को नहीं दिखाता था .घर में और स्कूल में भी उसे जेब में छिपा कर रखता था और मौका पाते ही एक आँख बंद कर ,खुली आँखके आगे शीशा घुमाता उन इन्द्र -धनुषी दृष्यों के आनन्द में लीन हो जाता था.उस समय न विमाता की दुत्कार,न पिता की मार न छोटे भाई-बहनों के कारण मिला दुर्व्यवहार,कुछ भी उस तक नहीं पहुँच पाता .कई बार उसी के पीछे साथियों से मारा-पीटी भी हुई थी.
 उसने कुछ नहीं कहा था अपनी उस छूटी हुई संदूकची के लिये लेकिन  उसने सालों प्रतीक्षा की थी कि कब छूटा हुआ सामान आये, और उसे उसका खजाना मिले .लेकिन वह सब उसे फिर कभी नहीं मिला.
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महरी ने रश्मिको संवाद दिया,'इधर लौंडियन की सुनवाई हुइ रही है .चतरू की हुलहिन के लौंडिया भई.'
'लगता है भगवान के यहाँ से अलग-अलग खेप छोड़े़ जाते है -एक बार लड़कियों का अगली बार लड़कों का ..फिलहाल लड़कियों का चल रहा है.'
'कुभाखा न बोलो बिटिया.ओहिके दुइ बिटियाँ पहिलेई से हैं अबकी बेर लरिका हुइ जाए देव.'
'हमारे कहने से क्या हो जायगा .हो सकता है तब तक भगवान लड़कोंवाली खेप छोड़ दें.'

अपनी नन्हीं नातिन को टाँगों पर औंधाये महरी तेल-मालिश कर रही है.सामने का आँचल उतार कर एक तरफ़ डाल रखा है .
इतने में मकान-मालकिन सुकुलाइन आती दिखाई दीं.शुक्ला जी बाहर रहते हैं
दो-एक साल में ये भी रिटायर होकर यहीं आ जायेंगे .दो लड़के ब्याह गए हैं छोटा दन्नू यहीं रह रहा है .पढ़ने में मन नहीं लगता आवारागर्दी करता है.उससे छोटी लड़की हाईस्कूल में पढ़ती है .
'माँजी,ओ,माँजी'. रश्मि ने आवाज़ लगाई -श्यामा और असित से सुन-सुन कर वह भी माँजी कहने लगी है.
भीतर से कोई जवाब नहीं आया.
धूप में चारपाई पर बैठी रश्मि थोड़ा खिसकते हुए बोली ,'आइये चाची ,ज़रा धूप में बैठ लीजिये .'
साड़ी के घूम हाथ में समेटे वे उचक कर बैठ गईँ .,'अरे बिटिया,कहाँ टैम बइठन के लै .नेक अपनी अम्माँ को टेर लेओ.'
रश्मि चल्लाई ,'अरे माँजी कहाँ हो ?शुक्लाइन चाची बुला रही हैं .'
'अरे तो बैठाल लेओ ,आ तो रही हैं ..'
आते ही शुक्लाइल बोलीं ,'किराओ दियो का ?'
'किराओ तो दन्नू लै गए हते .'
शुक्लाइन का मुँह खुला का खुला रह गया .
,'दन्नू लै गए हते ?उन्हें काहे दै दौ ?'
'काहे? बे माँगन आए .हमने कही महतारी ने मँगाओ हुइये , दै दौ .रसमी देखो जाय के .दूध धरो है अँगीठी पे ,उफन न जाय.''.'
 'परसों ते घर से गायब हैं दन्नू . हमें का पता का बात है.सोच लौ गौ हुइये कहूँ ,सुसरो .अब जानी, हियाँ से किराया लै गए अउर सकल नाईं दिखाई .तुम दन्नू को न दौ करो.'

रश्मि की माँ भरी बैठी थीं - न कभी पुताई कराएँ ,न मरम्मत .बाप ने मकान बनवा के खड़ा कर दिया ,बेटे निश्चिंत बैठे खा रहे हैं ये भी नहीं कि साल में दो-एक महीने का किराया ही मकान में लगा दें ऊपर से हमेशा किराया बढ़ाने को तैयार .
तभी तो औलाद एक से एक निकल रही है.कोई चुपचाप सनीमा देखेगा .कोई होटल में खाये उड़ायेगा .और ये दन्नू तो हमेशा पिटते रहते हैं पर फिर जैसे के तैसे .
'हम का जाने ,तुम जानो बे जाने ,उनने रसीद दई हमने दै दौ !'
'रसीद तो उनके बाप आउत हैं तो बनाय के रख जात हैंगे .इन नालायकन का कोऊ आसरा नाहीं .खून पियन के लै हैंगे .'
दन्नू की हमेशा कोई न कोई करतूत सुनने में आ जाती है .,बाप आते हैं उनसे शिकायतें होती हैं ,वे मारते-मारते खूनाखून कर देते हैं .माँ रोती-धोती हैं ,कभी दन्नू घर से भाग जाते हैं .जब लगता है मामला शान्त हो गया होगा लौट आते हैं ,और कुछ दिनों में फिर वही हाल .
शुक्लाइन चाची उठने को हुईं ,रश्मि की माँ ने रोक कर बैठा लिया .रश्मि की शादी की बातें होने लगीं .
26.
असित के गैर जात में ब्याह करने की बात अब ठंडी पड़ने लगी है . अब तो उन्हें रश्मि की चिन्ता है .निपट जाए अच्छी तरह से -फिर तो उन्हें असित से कोई आशा नहीं रहेगी .उन्हें लगता है अभी तो मियाँ-बीवी दोनों कमाते हैं ,ज़िम्मेदारी कोई नहीं ,कोई हमेशा  थोड़े ही करते रहेंगे .
खटका तो उन्हें पहले ही था कि असित करेगा अपने मन की ही .सौतेली लड़की की शादी में भर-भर कर देने के लिए वे हैं औरऔर असित की बार कुछ आस लगा सकें इसके लिए वे कोई नहीं !
पहले बड़ी दुखी हुईं थीं फिर श्यामा ने आकर मध्यस्थता की ,उन्हें समझाया ,'अरे माँजी ,तुम नहीं करोगी तो वे कोर्ट में जा कर कर लेंगे
हमेंई कौन अच्छा लग रहा है .पर अच्छाई इसी में है कि तुम्हीं करवा दो शादी .
तब उनने भी सोचा कौन बिगाड़ करे ,रश्मि की नैया तो उसी की मदद से पार लगनी है .दो-चार साल में राहुल भी लग जाएगा तब तक इसी का आसरा है .
'काहे बहू को का हाल है 'शुक्लाइन ने पूछा.
''हाल का हुइये -आप अच्छे तो जग अच्छों ,.अभै तो पुछती हैं ,रसमी से भी पटत हैगी .'
'सोतो है .ननद को बाजार लै जाय के करीदारी करवाय रही हैं .रसमी तो बहुतै खुस है.'
तरल ननद को हर बार कुछ न कुछ, शादी के लिए, खरिदवा जाती है,उसकी पसंद का पूरा ख़याल रख रही है .
वह भी भाभी के साथ उत्साह से खरीदारी कर रही है .
जेवर ,कपड़ा बर्तन,असित-तरल कर रहे हैं ,नाज-पानी ,घी-शक्कर वगैरा रश्मि की अम्माँ के जिम्मे .
लड़कों के बारे में बात होने लगी -दो जगह से हाँ हो रही है . अभी फ़ाइनल नहीं हुआ  है .असित को बैंकवाला ज्यादा ठीक लगता है .कॉलेज में पढ़ाता है वह इतना अच्छा नहीं.बात कुछ लेन-देन पर अटकी है .
शुक्लाइन को उठने का उपक्रम करते देख उन्होंने रश्मि को आवाज़ लगाई -चाची के लै पान लगाय लाओ .
रश्मि पान लगा रही है कान बाहर लगे हैं -अपनी शादी की बात पर .
'राजुल आ कर खड़ा हो गया है ,'ये कैसे लगा रही हो .ठीक से लगाओ .'
'तू चुप रह, हमें आता है .'
'ये कैसा उलटा-सीधा लपेटा है , ठीक करो .'
'चुप नहीं रहेगा .बकबक किये जा रहा है ,तू हमें मत सिखा .'
'अच्छा समझ गए ,तुम्हारी शादी की बात हो रही है वही सुन रही हो .'
'झूठ बोलता है .ले, ले जा पान .'
'तभी न बार-बार चुप कर रही हो और भगा रही हो .'
रश्मि रुआँसी हो आई .
'झूठा नाम लगा रहा है हम कहाँ सुन रहे हैं ?'
पान लेने दरवाज़े तक आ पहुँची माँजी बोल उठीं ,'अच्छा वह सुन रही है तो तुम्हारा का  जाय रहा है ,जाय के अपना काम करो .'
वे पान ले कर चली गईं.
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(क्रमशः)





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4 टिप्‍पणियां:

  1. शकुन्तला बहादुर5 जुलाई 2011 को 3:35 pm

    कथा का प्रवाह विविध क्षेत्रों में प्रवाहित हो रहा है। केवल पारिवारिक
    संबंधों को ही नहीं,सामाजिक, नैतिक और मानवीय समस्याओं को भी समेटते हुए भी कथा के विकास और उसकी रोचकता में कोई अवरोध नहीं आने पाया है।व्यापक फलक पर विविधता के साथ ही
    लोकभाषा ने भी खूब रंग जमाया है, जो सराहनीय है।

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  2. अभी ठीक से नहीं पढ़ पाया हूँ.फुरसत में आकर पढ़ने का आनंद लूँगा.

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  3. जो कुछ कहना चाहती थी प्रतिभा जी...सबकुछ शकुंतला जी ने सुगठित और सुंदर शब्दों में पहले ही कह दिया है..सहमत हूँ उनसे पूरी तरह.....

    बस एक चीज़....पिछली बार विपिन के आने से प्रवाह रुका रुका सा लगा था....इस बार ऐसा नहीं था..।
    विपिन के जीवन में आने waale मोड़ तरु और असित के जीवन को किस तरह से और कितना प्रभावित करेंगे...यही देखने की उत्सुकता है....

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  4. शकुन्तला जी से शब्दशः सहमत, लोक भाषा भी वाकई बहुत सुरुचिपूर्ण है।
    अगले अंक के लिए उत्सुकता से प्रतीक्षारत।

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