रविवार, 5 जून 2011

एक थी तरु - 20, & 21.


20

तरु ने असित के कंधे पर सिर टिका दिया .

"बहुत दिनो से कहीं नहीं गये हम लोग ,कहीं चलो न ."

"कहां चलोगी ?शन्नो जिज्जी के घर?"

"नहीं "

"फिर ,राहुल के पास रह आओ कुछ दिन ?"

"नहीं."

"गौतम दादा के पास ,या संजू के घर ?"

"नहीं,कहीं नहीं ."

"फिर ?"

"जाने को कोई जगह नहीं है .यहीं रहूँगी ."

असित के कंधे पर आँसू टपकने लगे हैं ..हाथ बढाकर वे थपथपाते हैं .

"क्या हो गया ,तरु?"

"कुछ नहीं ."

वह रोए जा रही है .

"आखिर बात क्या है ? बताओ न .मैंनें कुछ कह दिया क्या ?"

"नहीं."

फिर वह बोलने लगी ,"असित मेरे माँ-बाप भाई बहिन कोई नहीं है .शुरू से मुझे लगता रहा मेरे कोई नहीं है.मैं बिल्कुल अकेली थी.मुझे कहीं नहीं जाना है ."

"अरे ,तो मत जाओ .मैं तो वैसे भी नहीं चाहता कि तुम मुझे छोड़ कर कहीं जाओ .चलो, पिक्चर देखने चलते हैं ."

"तुम नहीं होते तो मेरा क्या होता ?"

आँसू फिर टपकने लगे .

"पागल हुई हो क्या?मै होता कैसे नहीं ?मै तुम्हारे लिये था .--और मेरा भी अपना कौन है ?तुम्हीं तो हो ,बस .हम-तुम और कोई नहीं ."

"नहीं असित और भी बहुत लोग हैं ."

"होंगे,हमे उनसे क्या ?"

उसका रोना अब थम गया है .मन में उठता है - हमें किसी से कुछ मतलब नहीं ?है .सबसे मतलब है .नहीं तो हम दोनो कहाँ रह जायेंगे ?हम बिल्कुल अकेले कहाँ हैं ?

"असित ,हमारे सुख ,हमारे दुख अकेले हैं ही कहाँ ?वे तो दूसरों पर निर्भर हैं .औरों के बिना हम लोग कहीं बचते ही नहीं ."

"ओफ़्फ़ोह ,तुम तो पहेली सी बुझाती हो .क्यों फ़ालतू दिमाग खपाओ ?चलो ,नावेल्टी में अच्छी पिक्चर लगी है ."

***

यहाँ से आदमी का संसार-प्रवेश होता है .

अस्पताल का मेटरनिटी वार्ड .

कितनी दारुण वेदना के क्रोड़ से जीवन का अंकुर फूटता है .डेढ़ दिन और पूरी रात !कल दुपहर एडमिट हुई तरु और आज शाम हो गई .

क्षण-क्षण उठती दर्द की लहरों से छटपटाती देह .वेदना इतनी भीषण कि शरीर के अंग भी काट डालो तो पता न चले .तड़पाती,चीरती ,बार-बार मरोड़ें खाती भीषण दर्द की लहरें,जैसे समूचे प्राणों को ले कर ही शान्त होंगी .

कितनी विषम वेदना ,भयंकर अव्यवस्था और अनिश्चयभरी दारुण पृष्ठभूमि में नये जीवन की शुरुआत होती है .वहाँ आनन्द नहीं होता ,सुरुचि नहीं होती- होती है चरम नग्नता और मरणान्तक यंत्रणा !जन्म देनेवाली और लेने वाला दोनों जूझते हैं -नग्न ,वीभत्स और रक्त-स्नात !

फिर विकृतियों और कुरूपताओं के बीच से जीवन की कली चटकती है .

दर्द के प्रचण्ड प्रहारों से पेट की खाल झुलस कर काली पड़ गई है .वेदना के तीक्ष्ण नखों के खरोंचे भीतरी पेशियों को नोचते बाहरी सतह तक उभर आये हैं पेट के निचले भाग,जाँघ और कमर पर जगह-जगह लम्बी गहरी लाल-साल खरोंचे जैसी धरियाँ उभर आई हैं .आँखों से कुछ दिखाई नहीं दे रहा ,होंठ असह्य पीडा से नीले, टपकती हुई पसीने की बूंदों को पोंछने का होश किसे है .समस्त चेतना उन भयंकर दर्द के झटकों में निचुड़ -निचुड़ जा रही है .

तरु को लग रहा है अब नहीं बचेगी .जाने कितनी स्त्रियाँ इस तरह मर जाती हैं .नहीं सहा जा रहा अब .बिल्कुल नहीं .सूखे होंठों पर जीभ फेरना चाहती है पर जीभ सूख कर काठ हो गई है .

दाँतों से होंठ दबाये उसकी देह फिर तन जाती है ,मुख पीड़ा से विकृत हो उठा है .बार-बार चीख गूँज जाती है .

"बस,बस हो गया !"

डूबती चेतना को लौटने में कुछ समय लग ही जाता है .दीर्घ यंत्रणा से श्लथ शरीर जब चैतन्य हुआ तो शिशु-रुदन की ध्वनि ने पलकों को खुलने को प्रवृत्त किया .

"क्या है ?"

'बिटिया .लक्ष्मी आई है ."

असित बिटिया ही चाहते थे ,बाप का बेटी पर बहुत लाड़ होता है .

कपड़े में लिपटा शिशु नर्स ने दिखाया ,"देखिये ,कितनी सुन्दर है आपकी बेटी !"

'आपकी बेटी "--तरु पुलक उठी .दृष्टि उठी .नन्हीं सी देह ,इतनी सुकुमार कि स्पर्श करते डर लगता है .कन्या को देख मन आश्वस्त हुआ -सचमुच सुन्दर है !गोरा रंग ,मुँदी हुई अर्ध वृत्त्कार सीप सी पलकें ,सिर पर सुनहरे बाल और नन्हे-नन्हें गुलाबी बन्द कली जैसे होंठ !

दही केशर और फलों का रस सफल हुआ .मेरी बेटी काली नहीं है .सुन्दर है ,अति-सुन्दर -कह रहे है सब लोग .वह मेरे जैसी नहीं .मैंने जो उपहास झेला मेरी बिटिया को नहीं झेलना होगा !

बुआ औऱ दादी उसे दुलरा रही हैं ,शहद चटाती हैं ,बार-बार पुचकारती हैं .रश्मि कह रही है ,"कितनी प्यारी है ."

तरु का मन आन्तरिक सन्तोष से भर उठता है .उसने नवजात कन्या को देखा ,हर्षपूर्वक बार-बार देखा और अपने पास समेट लिया .

"तुम ,जो मेरे विषम क्षणों में मुझे साधते हो,मुझे बल देते हो मुझे आश्वस्त करते हो .तुम जो हमेशा मेरे साथ रहते हो .ओ,मेरे अंतर्यामी ,मै तुम्हारी परम आभारी हूँ ,इस सुन्दर कन्या के लिये !"

परम सन्तोष से सो गई तरु .

पता नही कितनी देर सोई, नींद खुली तो असित सामने थे .

"तुम्हारी बिटिया बड़ी प्यारी है ." स्नेह-विगलित कृतज्ञ स्वर था .

"अधमुँदी आँखों से देख गद्गगद् स्वर में उसने सिर्फ इतना कहा ,

"तुम्हारी है .'

21.

तरु को लगता है अब वह वो नहीं है जो पहले थी .एक में से कितने रूप जन्म लेते गये .वह जो एक छोटी सी बच्ची है -नादान कौतूहलभरी दृष्टि से चारों ओर देखती हुई ,समझने का प्रयत्न करती हुई .अपने आप में विभोर ,कुछ रहस्यमय अनुभूतियों को जीती हुई ,अपरिचित गन्धों को पीती हुई ..मन्दिर के घंटे,जैसे उसी के लिये बजते हैं :सुबह जिसके लिये मधुर कलरव मय ध्वनियों और रंगों के सन्देश लेकर आती है , अँधेरे और सघन परछाइयों से भय खाती वह बालिका कहीं लुप्त हो गई है .उनमें से बहुत से रहस्य खुलकर जीवन का आनन्द कम कर गये हैं .आकाश और बादलों के रंग पहुँच से दूर होते जा रहे हैं .

दूसरी किशोरी तरु -अपने आप ही बड़ी होती हुई .बड़े होने के क्रम में जो जानना चाहिये उससे अनजान ,धक्के खा-खा कर सम्हलती हुई .विचित्र परिस्थितियों से जूझती हुई.अस्त -व्यस्त ,घबराई सी तरल !

तीसरी -जो अपने चारों ओर की घटनाओं की साक्षी है,जिस पर किसी के कहने-सुनने का असर नहीं पडता .अपने भीतर -भीतर उतरती हुई ,जहाँ एक किशोर मन उसकी संवेदनाओं से जुडता है और परिस्थियों का चक्र उसे दूर खींच ले जाता है .

फिर राग - सिक्त तरु ,असित की स्मृतियों में डूबी,मन में जागे नवोदित राग में लीन !

और अब यह सबसे नवीन तरु-चंचल की जननी .

हर क्रम में बदलता हुआ एक व्यक्तित्व ! फिर मैं क्या हूं ?

और असित?

वे वहीं के वहीं हैं तरु के पति .वहीं रह जायेंगे कि और आगे बढेंगे ?पिता बनकर वत्सलता आ गई है .पर ऐसी वत्सलता तो प्रत्येक हृदय मे सोई रहती है .मन को रँग डाले ऐसी नहीं है .वैसा ही तन है उनका ,वैसा ही मन .तरु से कहते हैं ,'ये तो दुनिया है .तुम्हारे करने से कुछ नहीं होगा सब अपना-अपना कर लें वही बहुत है .तुम अपनी ओर देखो तरु ,तुम्हें औरों से क्या ?"

ठीक कहते हैं तरु सोचती है -उनका कहना भी ठीक है .बचपन में जिसे घर सा - घर न मिला हो ,अजीब स्थितियों में पले बढे और अब भी महीने में बीस दिन जो घर से बाहर रहता हो वह लौट कर घर ही तो चाहेगा ,सुख ,शान्ति और अपनापन चाहेगा ..यह चाह गलत कहाँ है ?

उसे सुनना पड़ता है "चंचल के पीछे ही घूमती रहोगी ,बस उसी में लगी रहोगी ,जैसे मैं तुम्हारा कोई नहीं हूँ ."

'वह हँस कर उत्तर देती है ,"वह भी तो तुम्हारी ही है .बाहर जाते हो तो तो उसके लिये कुछ न कुछ ले कर आते हो .तब मेरा ध्यान आता है तुम्हें ?"

"तुम्हारा ध्यान तो हर समय रहता है.तुम्हारे पीछे ही तो दौड़ा-दौड़ा चला आता हूँ,.तुम न हो तो घर मेरे लिये कुछ नहीं है ."

उसकी बहुत सी बातें असित को मूर्खतापूर्ण लगती हैं .चंचल की ज़रा-ज़रा सी बात पर परेशान हो जाना ,उसके लिये हर बात की चिन्ता करना ,उसकी हर मुद्रा के अर्थ लगाना ,क्या बेवकूफी है ! असित को चह सब बेकार लगता है .

पर तरु को लगता है चंचल का हँसना-रोना,हाथ-पैर पटकना सब अर्थपूर्ण है.वह

उसके साथ तोतली बोली में बात करती है,उसे गुदगुदाकर स्वयं हँस पड़ती है.

"तुम तो उससे भी छोटी बन जाती हो ,"असित कहते .

उनका कमेन्ट ऊपर-ऊपर से निकल जाता है .उसे लगता है चंचल के मन से उसका मन ऐसा जुड़ा है कि उसके रूप में वह फिर से बचपन में जा बैठी है .

बच्चे का माँ की ओर देखना ,देख कर मुस्कराना ,लपकना ,मुँह बनाना सब बेकार होता है ?चंचल के चेहरे से वह अपनी निगाहें बार-बार हटा लेती है -कहीं नजर न लग जाय !

माँ बन कर स्त्री कुछ और होजाती है .इस स्तर से गुजर कर गँवार से गँवार स्त्री मानसिकता के जिस स्तर को पा लेती है,विद्वान से विद्वान पुरुष भी वहाँ तक नहीं पहुँच पाता .तभी बहुत-सी बातें उसके लिये सार्थक हैं ,असित के लिये मूर्खतापूर्ण .

एक जीवन के दाँव पर दूसरा जीवन आता है जिसकी पूर्व भूमिका की उलझनें ,उखाड़-पछाड़ और अव्यवस्था ,अनजानापन और अनिश्चितता झेलनेवाले की चेतना का पुनः संस्कार कर जाती है .व्यक्तित्व अपने में ही सीमित न रह कर एअधिक व्याप्ति पा लेता है .

वे स्थितियाँ मै नें भोगी है ,असित तुमने नहीं .तुम उनके न शारीरिक दृष्टि से हिस्सेदार रहे न मानसिक रूप से .जिसे यंत्रणायें झेलनी थीं वह अकेली मैं थी ,तुम नहीं .शरीर की विकृतियों और मन के बदलाव में तुम भागीदार नहीं बने .तरु को लगता है वही है एकान्त सृजनकर्त्री - प्रारंभ से अंत तक सब झेलनेवाली .यह आनन्द और तृप्ति उसी का प्रसाद है .सृजन के इस रहस्य और गाम्भीर्य को तुम्हारा चिर-अतृप्त मन कहाँ पा सकेगा असित !

तरु सोचती है - माँ बन कर चेतना के जिन सूक्ष्म स्तरों तक उसका मन पहुँच गया है,असित की पहुँच वहाँ नहीं है.वह बच्चे के मन की बात जान लेती है,उसके सुख-दुख, भूख-प्यास को उसी तीव्रता के साथ अनुभव करती है,कब उसे क्या चाहिये अनायास ही समझ जाती है .उसे लगता है उसका अहं विसर्जित होगया है शायद अधिक व्यापक होकर ,पर असित का अहं सदा उन पर छाया रहता है.चंचल के साथ मेरा संबंध जितना गहरा है,असित का नहीं हो सकता. तृप्ति के एक क्षण में जिसे पाया था ,मैंने उसे अपने रक्त-माँस से रचा है ,मेरे प्राणों से नये प्राण जन्मे हैं.मातृत्व की कीमत मैंने दी है -तन से मन से और जीवन के बदले हुये क्रम से .तुम्हें पितृत्व अनायास ही मिल गया ,तभी तुम वैसे के वैसे ही हो..लगता ही नहीं -बिटिया के बाप हो गये !

मेरी उस एकान्त सर्जना को भले ही तुम अपना नाम देकर कृतार्थ हो लो ,पर असित ,तुम यहाँ भी पिछड़ गये हो !
*


(क्रमशः)

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया..देश का ईश्वर ही मालिक है ! सुन्दर लेखन के लिए बधाई !
    मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है : Blind Devotion - स्त्री अज्ञानी ?

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  2. शकुन्तला बहादुर6 जून 2011 को 2:30 pm

    कथा का विकास सहज स्वाभाविक एवं रोचक चल रहा है।समाज की
    दुरवस्था और राजनीति के हथकंडों का सीधा-सच्चा खुलासा भी कथा
    को नीरस नहीं बनाता है।सुन्दर कथा-प्रवाह के लिये साधुवाद!!

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  3. मन के सुदूर दुखते हुए कोने...यदा-कदा छलकते नयन, स्वयं से ही साक्षात्कार.....जितना आनंद इस तरह की पीड़ा को पढने लिखने और सोचने में आता है मुझे.....और कहीं नहीं मिलता.....सुख की आकांक्षा अच्छी है....सुख प्राप्त हो जाना उससे भी अच्छा है...परंतु सबसे बढ़कर ये दुःख ही होते हैं.....बीती घड़ियों की बूंदों से भीगा मन जब भी कोई निचोड़े तो उससे सृजन,संबल और अनुभव ही मिलता है..और साथ ही सकारात्मक ऊर्जा का सतत प्रवाह भी उसी चिर-स्थायी पीड़ा से होता रहता है.......कुछ स्थान तो रहने ही चाहिए हृदय में जहाँ विशिष्ट से भी विशिष्ट प्रियजनों का हस्तक्षेप नहो सके....खैर..ये मेरा व्यक्तिगत दृष्टिकोण है|

    पहले पहल पढ़ते हुए नाम और स्वभाव की वजह से किरदार मन से जुड़ जाते हैं...और ऐसे ही उनकी भावनाएं......किंतु जैसे ही स्वयं को तटस्थ कर पुन: पढ़ने का जतन करती हूँ.....पात्र अपने अपने चित्रण के साथ मन से उधड़ते चलें जाते हैं......और संवादों का,परिस्थितियों का, शब्दों का स्वाद मानस पटल के अधरों पर शेष रह जाता है......इस बार तरल के हृदय की उदासी का चित्रण स्वादिष्ट लगा|विपिन और शेष पात्रों की राजनीतिक चर्चा में उतना मन नहीं लगा....कहानी में दुबारा विपिन का आना ऐसे लगा जैसे महत्वूर्ण काम के बीच कोई अनचाहा मेहमान आ जाए|
    समाज में अब कौन बचा है प्रतिभा जी.....आजकल के डॉक्टरों (अपवाद छोड़कर) को तो भगवान का रूप कहना सरासर भगवानजी का अपमान करना है....आपने जो लिखा एकदम सच है..ऐसा ही तो होता है बिलकुल..बाक़ी बातों से भी सहमत हूँ......मासूम सा विपिन याद आता रहा...जो तरु के बाबूजी को चुपके से खाना देने जाता था......अब काफी बड़ा हो गया hai|

    एक चीज़ मुझे आरम्भ से अच्छी लगी है, bas keh nahin paayi thi...वो तरल और उसके पिताजी का अटूट स्नेह-बंधन....तकरीबन १० साल पहले एक बहुत मार्मिक कहानी पढ़ी थी एक उर्दू रिसाले में.....''तनहा-तनहा''.....तरल जब भी पिताजी को याद करती है...उस कहानी कि बहुत सी बातें खुद-ब-खुद ज़हन में तैरने लगतीं हैं.......

    आगे पढ़ने की काफी उत्सुकता है....क्यूंकि ऐसा लग रहा है...कि सब कुछ अच्छा अच्छा तो चल रहा है.....कहानी क्या मोड़ लेगी वही अटकलें लगा रही हूँ स्वयं ही|

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  4. पुराने अंश पढ़ना है अभी...

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  5. हर कोण से कहानी विस्तार लेती है, और खासकर उसका पहला भाग, तरल की मनःस्थिति लॉन में आना-लौटना, उसका चित्रण बहुत मनभावन लगा।
    रोचक-सहज बहाव है जो हर पात्र से मन को जोड़ता है।
    आभार।

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