शनिवार, 14 मई 2011

एक थी तरु -16 & 17.


16.
*
नव- रात्रियों के सुहाने दिन .

जैसे सारा परिवेश एक सूक्ष्म -चेतना से अनुप्राणित हो उठा हो . जगन्माता के अनेक रूपों की स्तुतियाँ ,हवन ,रतजगे .

माँ के रूप में नारी का कोई रूप अग्राह्य नहीं ,कोप में भी करुणा छिपी है जिसके, उस विराट् जगन्माता के कितने रूप,कितने नाम !

इस संसार में मातृत्व के बिखरे कण उसी की अभिव्यक्ति .परा प्रकृति की

क्रीड़ा में, विकृति कहाँ से आ गई !

यह  इतनी अशान्ति क्यों ?

दुख पिता की पीड़ा के लिए है ,-माँ ,ऐसा व्यवहार क्यों -इतनी करुणाहीन क्यों ?

और इसीलिए माँ के प्रति असंतोष!

'कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति !'

सुप्त आक्रोश जब जागता है चैन नहीं लेने देता .

मन थिर नहीं रहता ,

असित का ध्यान बार-बार आता है - उस दृष्टि का नेह मन स्निग्ध कर जाता है .

पर टिकता वहाँ भी नहीं .रात की गहराइयों में निरंकुश हो चाहे जहाँ चल देता है .

पहली बार नींद कब उचटी थी ?याद आता है तरु को -बहुत छोटी थी ,एक रात अचानक नींद खुल गई। घुटी-घुटी सी सिसकियों की आवाज़ !रजाई के अन्दर अम्माँ रो रही हैं -क्या हो गया इन्हें ?

पिता के स्वर कानों में पड़े -

'सो क्यों नहीं जातीं ?क्यों बेकार खुद भी परेशान हो रही हो ,दूसरे को भी परेशान कर रही हो ?'

'कभी मन का पहना नहीं ,कभी बच्चों को अच्छा खिलाया-पहनाया नहीं .मैं तुमसे कुछ नहीं माँगती .बस मुझे नौकरी कर लेने दो . मैं सबको खुश देखना चाहती हूँ ।बच्चों को तरसते देखना मुझसे सहन नहीं होता। तुम तो सुबह से घर से निकल जाते हो ,तुम्हें क्या पता। मैंने जितना पढ़ा-लिखा है उस पर जब मिल रही है तो क्या नुक्सान है ?'

पिता बिल्कुल चुप हैं ।

''सुन रहे हो ,तुम्हें क्या परेशानी है ?'

वे बिगड़ उठे ,'हाँ,हाँ ,थू-थू कराओ मुझ पर !मैं तो नकारा हूँ ।खिला-पहना नहीं सकता !जीना मुश्किल कर दिया !दिन भर खट कर आता हूँ और यहाँ रात को चैन से सोने को भी नहीं मिलता ।..तुम्हारे कहने से मैंने अम्माँ ,दद्दा से भी पूछा जब उनने भी साफ़ मना कर दिया तो मै क्या करूँ ?'

उन्हें क्या पता यहाँ का हाल !कैसे घर चलता है मैं ही जानती हूँ ।फिर आगे भी जुम्मेदारियाँ ....।'

पिता चिल्लाये ,'मैं तो मर गया हूँ !तुम्हीं सम्हालोगी जुम्मेदारियाँ !अब नौकरी का नाम लिया तो घर छोड़ कर निकल जाऊँगा .राज हो जायेगा तुम्हारा ,दुनिया भर को दिखाती फिरना अपनी खूबसूरती ,खूब पहनना ओढ़ना...।'

फिर वे उठकर दूसरे कमरे में चले गये थे कह कर ,' यहाँ तो तुम यही सब मचाती रहोगी ,मुझे नहीं सोना यहाँ .'

सहमी हुई तरु चुपचाप लेटी रही ,सिसकियाँ क्रमशः धीमी होकर थम गईं ।

सुबह अम्माँ को चुपचाप काम करते देखा उसने।

एक बार और सुना था उसने पिता को चिल्लाते हुये ,'मैं खटकता हूँ ,लो, खून पी लो मेरा ।पैसा चाहिये तुम्हें ,जहर दे दो मुझे और करो जाकर जो चाहो ...'

पिता खा -पी कर चले जाते थे काम पर । सारी समस्यायें घर पर अम्माँ के साथ रह जाती थीं ; बाल-बच्चे खाना -पीना ,पढाई -पहनाई ,तीज-त्योहार ,आये-गये सब उन्हें सम्हालना था । कमाई कुछ बहुत नहीं थी ।कुछ ओवर- टाइम भी करते थे ।कोई लत नहीं थी उन्हें ,बस चाय पीने का शौक था ,सिगरेट पी लेते थे पर बहुत कम ,बच्चों के सामने तो कभी नहीं ।

तरु सोच रही है अगर मुझे हर बात में अपना मन मारना पड़े ,,अगर मेरी कोई इच्छा पूरी न हो ,कुछ करना चाहूँ और सारे शौक उसाँसों में बदल जायें ।ऊपर से बच्चे पैदा होते रहें ,अभावों में जीते रहें ।न ढंग का खिला पाऊँ,न पहना पाऊँ .दिन-रात वही देखती सहती -रहूँ ,सारी क्षमतायें बेकार हो जायें और योग्यतायें कुण्ठित ।तो मुझे कैसा लगेगा ?

पगला जाऊँगी मैं तो !

अगर मैं उबर सकती हूँ ,तो अभावों मे क्यों जिऊँ? क्यों हो जाऊँ वंचित ,कुण्ठित, असंतुलित !

*

अम्माँ बहुत सुन्दर थीं ,शन्नो जिज्जी से भी सुन्दर .वे बहुत शौकीन थीं और बहुत गुणी . उनके खाने का स्वाद! कुछ भी बना दें उँगलियाँ चाटते रह जाओ ।उनकी सेंकी ठंडी रोटियाँ ,तरु को जिज्जी की ताज़ी गरम रोटियों से ज्यादा स्वादिष्ट लगती थीं ।काम करने और ढंग से रहने का भी खूब सलीका था उन्हें .जिस चीज मे हाथ लगा दें सुन्दर हो जाये .तरु को याद आ रहा है वह टाट का टुकड़ा ,जो सुन्दर आसन में परिणत हो गया था .

कहीं से एक पार्सल आया था .अम्माँ ने उस पर लिपटा हुआ टाट बड़े सम्हाल कर खोला ,यत्नपूर्वक सीधा करके बड़ा सा आयताकार टुकड़ा निकाल लिया .फटी साड़ियों की बॉर्डरों से रंगीन तागे निकाल कर उन्होंने उस पर डबल क्रास- स्टिच से कढ़ाई कर ली , पुराने कपड़े का अस्तर टाँक दिया .

देखते रह गये थे सब लोग !कहीं-कहीं पोस्ट-ऑफिस की सील की छाप झलक जाती थी ,पर उस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता था ।

शन्नो जिज्जी ने कहा था ,'अम्मां ,नये टाट पर बनातीं तो ये निशान नहीं आते ,एकदम ताजा और खूबसूरत लगता .'

'नया टाट ,नई तारकशी ?'

अम्माँ के मुँह से निकला ,'उसमें कितने पैसे खर्च होते !यह तो मुफ़्त में बन गया .एक पैसा नहीं खर्च हुआ ।उस पैसे से घर की जरूरतें पूरी होंगी ।'

मनचाहे ढंग से सौन्दर्य की सृष्टि करने की लालसा उनने मन में दबा ली थी ,पर उनके मुख पर एक छाया-सी उतर आई थी .तब पतली-पतली सलाइयों से गठे-गठे स्वेटर बुनने का चलन था , साइकिल की तीलियों पर उनके बुने हुये स्वेटर ,पड़ोस के घरों मे माँग-माँग कर देखे जाते थे .मोहल्ले की औरतें उनसे सीखने, सलाह लेने को उत्सुक रहती थीं ..ओ, अम्माँ ,तुम साधारण क्यों नहीं थीं ?और फिर तो तुम लगातार असामान्य होती चली गईं !

अब तो वह सब बीत गया है ,फिर क्यों उद्वेग जागता है मन में !जब बहुत दिनो तक अच्छी तरह रह लेती है अपने शौक पूरे करने का संतोष होने लगता है ,तब किसी अकेले प्रहर मे अनायास कोई उद्विग्नता सिर उठाती है ,मन अशान्ति से भर जाता है , तरु को लगने लगता है निश्चिन्त जीवन जीकर वह कोई गुनाह किये जा रही है .कुछ बार-बार उमड़ता है ,चैन नहीं लेने देता .

अब तो वह सब समाप्त हो गया ,फिर बार-बार मैं वहीं क्यों पहुँच जाती हूँ?मन का एक कोना रिक्त होकर रह गया है , मौका पाते ही पुराने प्रतिबिम्ब वहाँ उभर आते हैं । पिता की बहुत बाद आती है तरु को ,आज अम्माँ की बातें मन में उमड़-उमड़ कर आ रही हैं.

आज जब अपने ऊपर सोच कर देखा तो बहुत कुछ स्पष्ट होने लगा है .

अपनी जिन योग्यताओं पर उन्हें गर्व था जिस कौशल पर विश्वास था ,वे कुण्ठित होते जा रहे थे ,अपने को कहाँ प्रमाणित कर सकीं थीं वे !वे सिसकियाँ और हिचकियाँ तरु के मन को मथे डाल रही हैं .एक दिन नहीं दो दिन नहीं महीनों ,बरसों ,कैसी यंत्रणा से गुजरी होंगी वे !उबरने का कोई रास्ता नहीं ,आशा की कोई किरण नहीं ,और उत्तरदायित्वों के पहाड़ छाती पर सवार .जब तक हो सका खींचती रहीं वे ,फिर जो घटता गया,उसे रोकना किसी के बस मे नहीं रहा .उनकी सारी आशायें चन्दन पर टिकीं थीं. चन्दन बड़ा होगा,उसकी कमाई से घर का रूप बदल जायेगा ,बहू आयेगी ।जिठानी और ननदों की तरह मैं बड़ी बन कर रहूँगी ,भरी पुरी गृहस्थी में पुत्रवधू से सम्मान पाते हुये .पर चन्दन कहाँ रहा?,सारी आशाओं पर पानी फेर कर चला गया .

उनने कब चाहा होगा कि एक के बाद एक बच्चे पैदा होते चले जायें ।पर हम लोग पैदा होते गये और वे झेलती गईं। अभावों की मार सबसे अधिक गृहिणी को त्रस्त करती है।सबकी जरूरतें मुँह बाये खडीं और ताल-मेल बैठाती अकेली स्त्री ।किससे कहे क्या करे !

यह बात नहीं कि उन्हें बच्चों से प्यार नहीं था .पास लिटा कर कहानियाँ सुनाती थीं ,अनेक तरह की चर्चायें करतीं थीं -जानकारी देने वाली ,मानसिक स्तर ऊँचा उठाने वाली ,एक विचार परंपरा विकसित करनेवाली .एक स्तर था उनका जिसके लिये पूरे जी जान से जुटी रहीं .

पर यह सब कौन जान सकता है .पढ़नेवाला पढ़ता है जीवन की किताब में अंकित कुछ घटनाएं कुछ तारीखें गिने-चुने  विवरण .और वहाँ लिखा है सोलह वर्ष की उमर नें गोविन्द प्रसाद से विवाह. कुछ वर्ष ससुराल की जद्दोजहद में.नई बहू बनी नये परिवार में अपनी जगह बनाती एक लड़की ,दसवाँ करते-करते जिसकी पढ़ाई छुड़ा दी गई है .जो अपनी शिक्षिकाओं की प्रशंसा पाती ,आगे के सपने बुनने लगी थी.
गोविन्दबाबू की नौकरी और .
बीच में ही एक नए घर की नींव पड़ी और गृहस्थी की गाड़ी चल पड़ी .
पहिये आगे बढ़ते रहे ,गाड़ी में नन्हें नन्हें सवार आने लगे .
जिनका हिसाबदर्ज होता गया - दो साल बाद एक लड़की पैदा हुई ,उसके पौने का होते-होते .एक और ,जो कुछ दिन बीमार रह कर चल बसा,फिर साल भर में अबॉर्शन,,फिर लड़की ,दो साल के अंदर  एक और  सड़का ,.उसके बाद लंबी बीमारी .फिर लड़की ,उससे अगली बार जुड़वाँ ,जिनमें से एक ज़िन्दा बच गया . माँ हद की चिड़चिड़ी ,लगातार अस्वस्थ रहनेवाली.
वहाँ अधिक डिटेल्स की ज़रूरत भी नहीं !
 गाड़ी खिंचती चली जा रही थी .
द्वितीय विश्व-युद्ध की विभीषिका .स्थितियाँ तेज़ी से बदल रहीं थीं .
ल -मेल बैठाने की अम्माँ की कोशिशों में कोई कमी नहीं, बाह्य संचालन में कोई बाधा नहीं - पर कभी-कभी असहज-सा गतिरोध उभरने लगा .आंतरिक व्यवस्था में रुकावटें आ कर खड़ी हो जातीं .
हर ओर से टकरा कर आशाओं - आकांक्षाओं का अस्तित्व क्या गुमनाम अँधेरों में ऐसे ही विलीन हो जाता हैं -!

कुंठित प्रखरताएँ या तीक्ष्ण धार के अवांछित मोड़ !

काल की गति रुकती कहाँ है -हिचकोले खाती रहे गाड़ी पर चलने से कैसे रुक जाय !

*17.

शन्नो मायके आई हुई हैं .एक गौतम से ही वे अपने मन की बात कह सकती हैं ,सो मन का आक्रोश व्यक्त करती रहती हैं -

"उससे मुझे कोई आसरा नहीं .क्या अब ,क्या तब .कभी कुछ किया है उसने मेरे लिये ?वो तो मैं ही हूँ जो वहाँ बैठ कर यहाँ की चिन्ता करती रहती हूँ .माँ-बाप के बिना कैसे रहती होगी .मुझे तो अब भी यहाँ की याद कर रोना आ जाता है .एक वह है किसी की परवाह नहीं .किसी तरह उसकी शादी हो जाय तो हम लोग निश्चिन्त हों ."

शन्नो को एक ही धुन है -तरु की शादी .चिट्ठियों में भी आधे से ज्यादा यही सब भरा होता है .गौतम और शन्नो के इस पत्र-व्यवहार में वह कोई भाग नहीं लेती .बड़ा आश्चर्य होता है उसे .शन्नो जिज्जी कैसी हो गईं .वे देश-भक्ति की ,त्याग -बलिदान की आदर्शों से भरी बातें कहाँ हवा हो गईं ?अब किसी न किसी तरह उसे ब्याह देना ही उनका कर्तव्य रह गया है .'किसी तरह अपने घर जाय वे कहती हैं.'

"अपना घर ?" - कैसा होता है अपना घर !जैसा यह घर था जहाँ वह पली ,जैसा वह घर जहाँ असित बड़ा हुआ ?या वैसा घर जैसा शन्नो बना रही हैं ?जहाँ पति -पत्नी और उनके बच्चों के अलावा और कोई दो दिन भी सहजता से खप नहीं पाता !

तरु की घर की कल्पना कुछ और है .उसने असित से एक बार कहा था ,"ऐसा घर जहाँ कोई असंतुष्ट न रहे .बाहर जायें तो बार-बार जिसकी याद आये और लौट आने को मन करे, एक दूसरे के लिये मन में स्नेह हो ,विश्वास हो .मुक्त मन से जहाँ अपनी बात कही जा सके -एक पारदर्शी खुलापन ,जहाँ निश्चिन्त होकर निर्द्वंद्व भाव से रहा जा सके ..बाहर के लोग भी जहाँ अजनबी न रहें अपनत्व पा सकें ."

शन्नो के बच्चे छोटे हैं तरु के ऊपर उन्हें गुस्सा आता है तो खूब ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाती हैं ,बच्चों को पीटने लगती हैं .तरु एकाध दिन की छुट्टी में आती है तो घर की सफ़ाई कपड़े धोना ,प्रेस -कलफ ,बहन के बच्चों के लिये कुछ ,खाना बनाना - नाश्ते-पानी में सारा समय निकल जाता है .

शन्नो को इससे सन्तोष नहीं होता ,कहती है ,"और लड़कियों को देखो ,मायके आती हैं तो निश्चिन्त होकर खाती हैं ,डट कर आराम करती हैं.बच्चों तक की फिकर नहीं .छोटी बहनें सब सम्हाल लेती हैं .--पर यहाँ तो मामला ही उलटा .उसे कभी लगता नहीं कि कुछ दिन छुट्टी लेकर मेरे साथ रहे .

तरु को लगता है वह कभी आये ही नहीं --खास तौर से जब जिज्जी यहाँ हों .पर नहीं कैसे आये ?एक इतवार और आस-पास कोई और छुट्टी पड़ गई तो केजुअल लीव से जोड़ कर रिज़र्वेशन करा लेती है .सोचती है गौतम दादा अकेले हैं और शन्नो जिज्जी आई हुई हैं ,वहाँ जाकर उनका साथ देना चाहिये .

शुक्रवार को तरु आई थी .शन्नो ने उसी दिन कह दिया "सोमवार को छुट्टी लेकर यहीं रहना .कुछ मेहमान आने वाले हैं ..". फिर उसे सुना कर जोड़ दिया ,"लड़का ठीक है.रंग साँवला है तो खुद भी कौन गोरी है .नौकरी भी ठीक है फिर अभी तो शुरुआत ही है .ऊपर उठने के लिये ज़िन्दगी पड़ी है ----उन्हें इसके नौकरी करने में भी कोई एतराज नहीं .फिर माँग भी कुछ नहीं .नौकरी करती है इसीलिये तो तैयार भी हो गये ,नहीं रूप-रंग ,या लेन-देन की बात पहले उठती ."

तरु का मन खिन्न हो उठा .भूमिका से ही अनुमान हो रहा है स्थिति क्या होगी .

"मुझे तो जाना है .जरूरी काम है .शुक्रवार की छुट्टी ले ली है ,शनिवार इतवार बीच में है ,सोमवार की कैसे ले सकती हूं ?"

"ये तो कोई बात नहीं हुई .बड़ी मुश्किल से बातें तय हुईं तो तुम्हारे नखरे !और कौन होगा जो ---."

बीच मे ही तुर्शी भरा तरु का स्वर उठा ,"न तैयार हों तो न करें मुझे करनी भी नहीं है ."

"फिर हमेशा नौकरी करती रहेगी ?"

"नौकरी तो वैसे भी करनी होगी .जब वे लोग चाहते हैं ."

काफ़ी कहा-सुनी हुई .,शन्नो पैर पटकती चली गईं .फिर जीजा ने सूत्र अपने हाथों में लिया . "देखो तरु ,लड़का ठीक है.तुम दोनों की तनख्वाह मिलकर मौज से गृहस्थी चलेगी ."

"मतलब मैं नौकरी न करूँ तो महाशय गृहस्थी नहीं चला सकते ?फिर शादी का शौक क्यों ,मेरी समझ में नहीं आता ."

"फिर क्या चाहती हो तुम ?फ़र्स्ट डिज़र्व देन डिज़ायर ."

"मुझे कुछ नहीं चाहिये फिर इन बेकार की बातों से फ़ायदा ?"

"तो फिर अपने आप करनी है ?"

"अपने आप ही कर लूँगी तो कौन गज़ब हो जायेगा ?"

जीजा ने बात को मज़ाक की ओर मोड़ा ,"कहीं कोई भा गया हो तो हमें बता दो .हम करवा दें .बताओ कौन है हमारा प्रतिद्वंद्वी ?"

"अच्छी बात है, बता दूँगी ."

घर का वातावरण एकदम क्षुब्ध हो गया ..बडी तेज़ी से बातें हुईं .सबके मुँह फूले हैं .गौतम भैया उससे बोलते नहीं .जहाँ वह होती है वहा से फ़ौरन चले जाते हैं .जीजा ने मध्यस्थता की ,इधर के संदेश उधर पहुँचाये .

असित को बुलाने के लिये कहा गया .तरु ने तार दे दिया .वह आया .

बात-चीत हुई .खाना पीना हुआ .वह लौट गया चलते - चलते कह गया ,"आशा तो है मान लेंगे नहीं तो अपना निश्चय रखना .अब वहाँ अगले सोमवार को पहुँचूँगा तब आगे की सोचेंगे . अभी घर में सिर्फ़ रश्मि को मालूम है .वही सब सम्भालेगी .विरोध कोई नहीं कर पाएगा ,निश्चिन्त रहना ,तरु .'

गौतम भैया ने कहा ,"और तो ठीक है पर अपनी जात का नहीं ."

"वह मानेगी नहीं. कहीं भाग-भूग गई तो और नाक कटेगी .उससे अच्छा है सीधी-सादी शादी करके छुट्टी करो .---वह तो मैं ही थी जो बलि का बकरा बना दी गयी , सबकी सुनती थी न --."

और महीने भर के अन्दर तरु असित से ब्याह दी गई .
*



(क्रमशः)

**

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत पहले शुरू शुरू में तरु की माताजी के लिए संशय उभरा करते थे...कि वे ऐसी क्यूँ हैं..?? और उनकी अच्छी बातें भी आप कभी उकेरेंगी या नहीं..?? :) अच्छा लगा आज बहुत उनके बारे में कुछ अच्छा भी पढ़ के...

    और...''निश्चिन्त जीवन जीना कभी कभी वाकई गुनाह ही लगता है..''

    असित के साथ शादी के बाद भी तरल खुश रह पाएगी....मुझे नहीं लगता...हालाँकि ये कहानी है..फिर भी अनुभूति हो रही है...असित शायद अच्छा जीवनसाथी न साबित हो...खैर...आगे प्रतीक्षा रहेगी.......

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  2. अच्छा प्रवाह है...अच्छा लग रहा है पढ़कर..जारी रहिये.

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  3. अपने अपने आकष पर गढ़ लेते हैं हम चरित्रों को, कौन जाने कब कहाँ से कौन सा कारण/स्थितियाँ/परिस्थितियाँ किसे किस सांचे में बिठा जाए।
    इतना विस्तृत, इतना जीवंत और रोचक चित्रण!
    चल रहा हूँ, साथ साथ।

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  4. क्यूँ चुप चाप गुज़ार देती हैं अपनी जिंदगियां, कुछ नारियां। ये जीवन तो बहुत पुण्य कर्मों से मिलता है। इस पर अत्याचार सहकर हम स्वयं के साथ अन्याय करते हैं। कहानी में कुछ सुखद के इंतज़ार में.....थोडा मन उदास हो गया पढ़कर।

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