बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

एक थी तरु - 6.& 7.


6
घर में घुसते ही बाहर वाले कमरे (बैठक) से महिलाओं के वार्तालाप के स्वर सुनाई देने लगे .गोविन्द बाबू कमरे में जाते-जाते रुक गये और आँगन की ओर चले आये.
रसोई में शन्नो प्याले प्लेटें सामने रखे पतीली के पानी में शक्कर घोल रही थी..चौके के दरवाजे पर खडे होकर उन्होने पूछा ,"कौन आया है ?"

"मथुरा परशादिन और उनकी भौजाई."

सामने-सामने तो वे लोग उनसे चाचीजी कहते हैं ,पर पीठ पीछे इसकी कोई ज़रूरत नहीं समझते -मथुरा परशाद की पत्नी ,इसलिये मथुरा परशादिन ,आपस मे वे लोग ऐसे ही काम चलाते हैं .

वे दूसरे कमरे मे कपड़े बदलने चले गये.आवाज़ लगाई ," गौतम."

"वह मिठाई लेने गया है. "

शन्नो चौके में बैठी भुनभुना रही है, 'अम्माँ की सहेलियों के मारे और मुश्किल !इनके घर जाओ तो हमेशा टालू मिक्शचर (चाय केसाथ जब कोई चलता-फिरता रोज़मर्रा का बज़ारू मिक्शचर चला कर छुट्टी पा ले उसे इन लोगों ने यह नाम दे रखा है) .'

कोई यहाँ आयें तो अम्माँ खातिरदारी में जुट जाती हैं.शन्नो को घुसा देती हैं चौके में -नमकपारे बनाओ ,पापड़ तलो ,चाय बनाओ ,और खुद उनके पास बैठी बतियाती रहेंगी .उनकी प्लेटों मे भरती चली जायेंगी,जिद कर -कर के खिलाती रहेंगी .और वो भी तो किसी न किसी को साथ लेकर हाज़िर हो जाती हैं -कभी बहन आई है कभी भतीजी आई है . आज भौजाई आई हैं.जो आता है लेकर सीधी यहां चली आती हैं-अपनापन दरशाती हुई .शन्नो फालतू है न बनाने- खिलाने को !

कहती हैं ,'अरे , मेहमान हैं .कौन हमारे यहाँ बार-बार आएँगे!'

गौतम से मिठाई का पैकेट पकड़ती,शन्नो ने बताया,"पता है आज क्या बोलीं?आते ही कहना शुरू किया ,'जिज्जी ,देखो तो कौन आया है !हम ने कहा हमारी जिज्जी बडी मोहब्बतिन हैं ,चलो मिला लायें .अरे एक ही तो घर है जहाँ अपना-सा लगे है.'...और यह तरु चुड़ैल कहां जाकर मर गई?काम के टाइम हमेशा ग़ायब ! गौतम, जरा आवाज तो लगा ."

आवाज के प्रत्युत्तर में पड़ोस के आँगन से जवाब आया ,"आती हूँ." और धूल भरे पाँव लिये भागती हुई तरु आकर खड़ी हो गई .

"आज फिर मथुरा परशादिन ! किसे लाई हैं इस बार ?"

"अरे हैं उनकी भौजाई .तरु तू प्याले -पोंछ कर ट्रे में लगा फिर बैठ कर नमकपारे बेल ."

शन्नो ने कढाही आँच पर रख दी.

" जिज्जी, पहले पिताजी को दे आऊँ ?"

नहीं. पहले उधर ,नहीं तो वे नाराज होंगी ."

शन्ने अम्मां से खीजी होती है तो 'वो' कहकर काम चला लेती है.

"वो लोग तो बातों में मगन हैं उन्हे क्या पता चलेगा ,जिज्जी ."

गोविन्द बाबू खाट पर बैठे चाय पी रहे हैं.शन्नो थोडे नमकपारे प्लेट में रख लाई.,"पिताजी ,नाश्ता!"

वे मुट्ठी में थोडे नमकपारे उठा लेते हैं.."तुम लोगों के लिये हैं या नहीं?"

"अभी तो काफी हैं."

अम्माँ कभी नहीं सोचतीं .घर में किसी के लिये बचे या नहीं , बस बाहरवाले संतुष्ट रहें और उनकी तारीफ़ करते रहें !

अँगीठी की आँच में शन्नो का मुँह तमतमा रहा है.पल्ला कंधे पर सिमटा पडा है.वह मुट्टी में नमकपारे भर कर तेजी से आई है,झुक कर पिता की प्लेट में रखने लगी .

"बेसरम कहीं की .बाप के सामने किस बेहयाई से गिरी जा रही है और उन्हें मजा आ रहा है."

अम्माँ नमकपारे की प्लेट लिये आँगन मे खडी हैं .शन्नो ने चौंक कर उनकी ओर देखा ,उसके ऊपर जैसे घड़ों पानी पड गया .पल्ला ठीक करती वह चौके में लौट गई.

गोविन्द बाबू ने धीमे से प्रतिवाद किया ,"काहे को तोहमत लगाती हो ,वह अभी नमकपारे देने आई थी ."

"मैं सब देखती हूँ अन्धी नहीं हूँ."

बाहर वाले कमरे से आवाज आई ,"जिज्जी ,अब कुछ और न लाना ,बस दो गिलास पानी ."

वे लौट गईं.

**
6.
शन्नो बहुत सुन्दर है- गोरा रंग ,गोल चेहरा ,धनुषाकार भौंहें,बड़ी-बड़ी काली आँखें ,माथे पर बिखरी घुँघराली लटें और सुगढ़ गुलाबी होंठ.मुँह धोकर पोंछती हैं तो लाली छा जाती है चेहरे पर .तरु छिप-छिप कर उन्हीं को देखती रहती है .उनके जगमगाते सौंदर्य से अभिभूत है वह .अपनी सहेलियों से तारीफ करते नहीं अघाती ,"देखो ,मेरी जिज्जी कितनी सुन्दर हैं. "


उसकी सहेलियों की बडी बहनों में किसी की नाक मोटी है ,किसी का मुँह बड़ा-सा,किसी के दाँत ऊँचे ,,अबारी चौडी या रंग रहरा .कोई शन्नो की तारीफ करता है तो तरु को गर्व होता है -मेरी जिज्जी हैं .अगर कोई कहे कि तरु की शकल कुछ-कुछ शन्नो से मिलती है,तो फूल उठती है वह .

शन्नो को सजने -सँवरने का भी बहुत शौक है.पर अम्माँ को उनका सजना जरा नहीं सुहाता .जहाँ वे सज कर खडी हुईं अम्माँ का डाँटना शुरू .

खिड़की के उसपार है विमली और तारा शंकर का घर .विमली की बड़ी बहिन मनोरमा से वे बात करती हैं तो भी अम्माँ एकाध चक्कर लगा जरूर जाती हैं..कभी काम में लगी होती हैं तो तरु से कहती हैं ,"तरु,देख ,उधर तारा तो नहीं खडा है ?"

कभी-कभी होता भी है तारा.वह अपने दरवाज़े पर डटा होता है ,शन्नो तो मनोरमा से ही बोलती रहती है. तरु जाकर खडी हो जाये तो वे भगा देती हैं,"क्या बड़ों के बीच सिर घुसाये खड़ी है .जा अपना काम कर ."

झिड़की खाकर तरु भाग आती है.

तारा बोलता कुछ नहीं, अभिभूत-सा देखता रहता है . बातें करने के बाद शन्नो अकेली - अकेली ही मुस्कराती रहती है.
.अम्माँ तरु से पूछती हैं या फिर भेजती हैं तो कह देती है ,"हम नहीं जाते, वे भगा देती हैं."

चौके से अम्माँ बार-बार पता करवाती हैं -शन्नो कहां है ? क्या कर रही है ? कभी-कभी तरु की सूचना उनकी डाँट का कारण बन जाती है .तब शन्नो गौतम से कहती है-"यही चुड़ैल जाकर उनसे जड़ आती है और मुझे डँटवाती है.,किसी से बात भी न करूँ क्या ?"

और गौतम की आँखें लाल, भौंहें टेढी .तरु से वे बात भी ठीक से नहीं करते ,जब बोलेंगे तिनक कर बोलेंगे .

अम्माँ की आदत है बहुत झींकती हैं .बात-बात में अपनी बड़ी बेटी को याद करती हैं.पर मन्नो तो विदेश जा बसी हैं पाँच -छः साल में कहीं एक चक्कर लगता है.अम्माँ की बातों से ही तरु को उनका ध्यान आता है.'हमारी मन्नो तो गऊ थी.जहाँ बैठाल दो उठना भी नहीं जानती थी.लड़की क्या साक्षात् देवी थी.--ये शन्नो हमेशा जी जलाती है.न ढंग से काम कर ना, न रहने का सहूर !'

शन्नो पीछे-पीछे मुँह बिचकाकर कहती ,'मन्नो जिज्जी की कोई कम डाँट पड़ती थी ? उन्हें भी खूब रुलाती थीं ये !"
**
7.

इस कमरे में उत्सव का वातावरण है.

अखबारों से काटी गई गांधी जी की तस्वीर बीच में लगी है ,दोनो तरफ नेहरू और सुभाष बोस के फोटो रक्खे हैं .घर का सिला एक तिरंगा झंडा बाँस पर लटक रहा है ,जिस पर शन्नो ने बडे यत्न से चरखा बनाया है .उत्सव की सूत्रधार भी वही हैं..गौतम कुर्सी पर शन्नो के बराबर में बैठे हैं.

तरु और संजू दर्शक हैं..वे जय बोलेंगे झण्डे को सलामी देंगे और शन्नो का भाषण सुनेंगे.कौतूहल से उनकी आँखें चमक रही हैं .

शन्नो पहले गांधी जी के चित्र को माला पहनाती हैं .बांस हिलाकर झण्डे का कपड़ा फहराती हैंऔर फूल फेंकती हैं.उनका इशारा पाते ही तरु-संजू तन कर सलामी देते हैं..

"वन्दे-मातरम् गा तरु ."

मुझे तो पूरा नहीं आता ."

"भूल जायेगी तो मै बता दूँगी.चल जल्दी शुरू कर--."

इसके बाद बढी हुई उत्तेजना को संयत कर ,गले की आवाज धीमी कर शन्नो बोलने खड़ी हुईं. --

"हम अपना ख़ून देकर आजादी लेंगे.अंग्रेजों ने हमारी भारत माँ को गुलाम बना रक्खा है.ये मुट्ठी-भर लेग हमारे देशवासियों पर अत्याचार कर रहे हैं .हमारे देश का धन विदेश ले जा रहे हैं.(बीच-बीच में वह एक कागज देखती जाती हैं जिस पर भाषण तैयार कर लिख रखा है) हमारी भारतमाता परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ी कराह रही है .वह हमें पुकार रही है .हम उसकी बेड़ियां काटेंगे उसे आज़ाद करेंगे .---।"

तरु चकित है जिज्जी कितनी विद्वान हैं.

शन्नो गले की आवाज दाब कर जोर से बोलने का अभिनय करती हुई कहती हैं,"इन्किलाब --."

तरु-संजू चिल्लाते हैं,"जिन्दाबाद "

इन दिनों अखबारों की खबरें बडे ज़ोर-शोर से पढ़ी जाती हैं.आस-पास के लोग चबूतरे पर इकट्ठे होकर पिताजी से बातें करते हैं.

उनके स्वरों मे उत्तेजना और आँखों में एक विषेश चमक होती है ,गांधी ,नेहरू सुभाष ,जिन्ना आदि के नाम बार-बार आते हैं.सत्याग्रह ,आन्दोलन जैसे शब्द सुनाई देते हैं.वैसे ही जिज्जी भी बोल रही हैं तरु अभिभूत -सी सुन रही है .समझ में कुछ नहीं आ रहा पर शन्नो के जोश भरे चेहरे को मुग्ध होकर देख रही है.

शन्नो बोल रही हैं -"हम सिर पर कफ़न बाँध कर निकल पडेंगे ,देश के लिये सब-कुछ बलिदन कर देंगे .हम अपना ख़ून देकर आजादी लेंगे..हमे आजादी चाहिये ."

वे रुकती हैं फिर कुछ सोचकर कहती हैं,"चलो हम भी अपने ख़ून से दस्तखत करेंगे.."

तरु मंत्र-मुग्ध सी सुन रही थी ,अचानक उसे लगता है ,खून निकालने में दर्द होगा .शन्नो खून निकालने के लिये सुई लेकर आई हैं.

"खून से दस्तखत कौन-कौन करेगा ?"

"मेरे सुई मत चुभाना ,मुझे खून नहीं निकालना है ." तरु सबसे पहले बोल पड़ी.

"कायर ,स्वार्थी ."शन्नो ने हिकारत से देखा .

संजू सुई चुभने के डर से चुपके से खिसक गया

शन्नो धुली हुई निब और सफेद कागज भी निकाल लाईं.सुई हाथ मे लिये उन्होने गौतम की ओर देखा -शायद वे ही पहल करें .गौतम तटस्थ दर्शक बने देखते रहे.

फिर हिम्मत कर के शन्नो ने ही सुई की नोक बायें हाथ की उँगली के पोर में चुभाई . मुँह से सी निकला और सुई हटा निकाल ली ,ज़ोर से नहीं चुभा पाई .पोर को दबाने से खून का लाल कण छलका.हिम्मत करके वे फिर चुभाने को हुईं.

अब तरु से नहीं रहा गया.

"जिज्जी ,अपने आप उँगली में घाव कर रही हो ,फिर काम के मौके पर अम्माँ से कहोगी कट गया.उन्हें तुम्हारे झूठ का पता लग गया तो बहुत नाराज होंगी ."

शन्नो ने क्रुद्ध दृष्टि से तरु को देखा,गौतम पर निगाह डाली और सुई रख दी .

"देखा कैसी चुगलखोर है ! "
**

"हुँह ,इन्हें आजादी चाहिये !अब खिड़की पर खड़े होकर उधर ताकते देखा तो टाँगें तोड़ दूँगी ."अम्मां ने खूब जोर से शन्नो को डाँटा था.


तरु को पूरी छूट है.स्कूल से आने के बाद चाहे सारे दिन मोहल्ले में घूमे ,लडकों के साथ गुल्ली-डंडा खेले ,पेडों पर चढ़ती फिरे !उसे कुछ करने से परहेज़ नहीं. इतना बड़ा तो पीछे का ही बाड़ा है,फिर उधर वालों का बगीचा.,बीच में एक छोटी-सी टूटी दीवार ही तो है.फलाँग कर उधर चली जाती है तरु.

पीछे बाडे में संघ की शाखा लगती है.शाम को खाकी नेकर पहने बहुत से लड़के इकट्ठे होते हैंऔर लाठी भाँजना सीखते हैं..एक स्वयंसेवक उनका मुखिया है उसे सब लोग अल्लमटोला कहते हैं.उनकी प्रार्थना 'नमस्ते सदा वत्सले मातृ भूमे --' सुनना तरु को बहुत अच्छा लगता है.,वे भगवे रंग का त्रिभुजाकार झंडा लगाते हैं -ध्वज ! झंडे की सलामी को कहते हैं ' ध्वज-वंदना ' और उसका उनका अपना अलग तरीका है.
बीच की दीवार फाँद कर तरु,दूसरेवाले बाड़े के पेड़ पर चढ़ कर यह सब देखा करती है.गौतम भी शाखा में शामिल होता है..एकाध बार तरु भी उसी के साथ गई थी. अल्लमटोला ने उसे प्यार से अपने पास बिठा लिया था. पर उन बड़े-बड़े लड़कों के बीच उसे बड़ा अजीब लगता है - बडी झेंप लगती है -समझ में नहीं आता कैसे बैठी रहे, कैसे बात करे .उसे पेड़ पर चढ़ कर देखना अधिक सुविधाजनक लगता है -वह सबको देख ले उसे कोई देख ही न पाये.

शाखा लगती है मुश्किल से घंटा भर.बाड़ा खाली होता है तो वह अपने साथियों के साथ गुल्ली-डंडा या कलामडाला खेलती है .पतली -पतली स्वर्ण-चंपाकी डालों पर वह चढ़ लेती है,घने पेड़ों की शाखाओं मे छिप सकती है और अमरूद तोडने में तो उसकी बराबरी ही नहीं.इमली की तरफ जाने में डर लगता है-कहते हैं वहां चुड़ैल रहती है.

अम्माँ कभी तरु को नहीं डाँटतीं.तरु-संजू छुट्टे बैल हैं. संजू तो अक्सर ही बीमार रहता है.और तरु शुरू से तंदुरुस्त .लड़ाई-झगडे में तरु की संजू से हाथा-पाई होती है..जब देखती है वह बराबर से पीट नहीं पा रहा है तो तरु को उस पर दया आ जाती है.लड़ाई-झगड़ा कितना भी हो एक दूसरे की शिकायत दोनों मे से कोई नहीं करता ..हाँ, दोनों के हाथ-मुँह पर खरोंचें देख कर सबको उनके झगड़े का पता चल जाता है. संजू जब कुछ नहीं कर पाता ,तो खिसियाता है और किचकिचा कर नाखूनों का प्रयोग करता है.पहले तो दाँतों से काट भी खाता था.,जब तरु ने 'कटखना कुत्ता' कहना शुरू किया तब बन्द कर दिया .

स्कूल से आने के बाद खेलने से छुट्टी नहीं मिलती .रात को जहाँ खाना खाकर किताबें लेकर बैठो ,बड़े ज़ोर से नींद आती है .

पिता आवाज़ लगाते हैं ," तरु पढ़ रही हो ?"

तरु रजाई में से मुँह निकाल कर जवाब देती , "हाँ,पिताजी."

"अभी बताती हूँ - तब से ये रजाई ओढे लेटी है",शन्नो धमकातीं .

"तुम कहोगी तो मैं चुप रहूँगी ? मैं भी तुम्हारी बातें कह दूँगी ."

"ऊँह ,मुझे क्या ! अपने आप फेल होएगी. "

पर तरु अच्छे नंबरों से पास हो जाती है .

"चुड़ैल है . बिना पढ़े पास हो जाती है," शन्नो चेताती ,"अभी क्या.अभी तो छोटी क्लास है ,हमारी क्लास में आयेगी तब पता चलेगा ."

"तुम्हारे जैसी किताब खोले ,खिड़की ताकती नहीं बैठी रहूँगी."

तरु कैसे समझाये कि एक बार स्कूल में पढने से जब याद हो गया तो दुबारा पढ़ना बेकार है .क्लास में पोएम और पहाड़े पूछे जाने पर फटा-फट सुना देती है. .पर पढ़ने से ज्यादा उसे घूमना पसंद है .

पिछली बार मन्नो के आने पर दो दिन स्कूल नहीं गई थी.खेल की धुन में किसी से यह भी नहीं पूछा कि याद करने को क्या दिया गया. वो तो क्लास मे बहन जी ने दो-तीन लडकियों से पहले सुना और उनकी गलतियाँ ठीक कराईं तो सुन-सुन कर उसे याद हो गया.अपनी बारी पर फटाफट सुना डाली .

कहीं बहन जी उसीसे पहले पूछ लेतीं तो !

अरे, तो क्या .दो-चार फुटे मार लेतीं हाथ पर .ऐसे क्या मार पड़ी नहीं है कभी !

पर वह सब बहुत पहले की बातें हैं .अब तो मन्नो ऐसी विदेश जा बसीं कि सालों नहीं आतीं .
**
"शन्नो , जे तुम्हारी निकली भई लटें बडी पियारी लगती हैं." मथुरा परशादिन ने हँसकर कहा था .

घर पर अम्माँ ने टोका था ,"और लड़कियां भी तो हैं ,तुम्ही सबसे निराली क्यों हो ?इतनी सौखीनी ,इतना बनाव-पटार ? सब लोग क्या कहते होंगे .तुम्हें ही अनोखी जवानी चढ़ी है !"
शन्नो की सहेलियों के सामने भी अम्मां उसे बुरी तरह झिड़क देती हैं,उसका मुंह जरा-सा निकल आता है .

जिज्जी जब खिलखिला कर हँसती हैं तो तरु को बहुत अच्छी लगती हैं ,पर अम्माँ चौंक कर उनकी ओर देखने लगती हैं .

शन्नो की सहनशीलता जवाब देने लगी है .

- पता नहीं इस घर से कब छुटकारा मिलेगा !
*


(क्रमशः)

7 टिप्‍पणियां:

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  2. मैं संभवतः एक काल पीछे से आता हूँ, या हो सकता है हम सबकी जडें ऐसी होती हों। जो भी हो, मन बहुत जुड़ जाता है ऐसे लेखन से।
    शन्नो और तरु को बहुत पास दे देखा है, ऐसा महसूसता हूँ। और खन्ती मंती!! मेरे यहाँ गीत अलग था, हालांकि अंत ऐसा ही था, लेकिन मीठापन उतना ही है।
    बचपन कितना निश्छल होता है।
    तरु का, उसके भाई बहनों का, अमरुद के गाछ का (अमरुद के लिए पेड़ नहीं निकलता मुझसे, आदत रही है) जो मोहक चित्र अनायास ही खिंच गया, उसका बहुत आभार!

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  3. शकुन्तला बहादुर24 फ़रवरी 2011 को 10:10 pm

    भाई बहिनों के साथ बिताए बचपन के दिनों की यादें आपने उकेर दीं।
    विस्मृति के गर्त में पड़े " खंती मंती खंत खताई"ने तो आत्मविभोर कर दिया। कथा का प्रवाह निरन्तर बाँधे रहा। घरेलू वातावरण के सारे दृश्य आँखों में उतरते चले गये।
    प्रतिभा जी, इस आनन्द के लिये आपका आभार!!










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  4. अच्छा लगा तरु को भाई बहनों के साथ 'खंती मनती' खेलते...इस तरह का कुछ मैंने पहली दफे ही सुना..:)
    अगली किश्त का इंतज़ार रहेगा...!

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  5. oh yahan is upanyas me bhi ek galti ho gayi hai 4,5 &6,7 dono kadiyan same hain.

    abhi ye upanyas shuru kiya hai padhna. comment baad me dungi.



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  6. हाँ अनामिका ,मैने देखा.
    पहली बार डाला तब ठीक था बाद में कुछ संयोजन करने में गड़बड़ियां हो गईं.पढ़ने में व्यवधान पड़ा इसका मुझे खेद है.
    दो दिन मैे सब चेक करके इसे ठीक करती हूँ.
    इतना ध्यान दिया तुमने मैं कृतज्ञ हूँ.

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