रविवार, 13 फ़रवरी 2011

एक थी तरु - 4 & 5

4.

ट्रेन में चढ़ते ही तरु ने असित को देख लिया . वह अनदेखी कर अपनी बर्थ की ओर बढ़ गई.

उसके सहकर्मी के बडे भाई डॉ.रायज़ादा के घर दोनों का परिचय कराया गया तब भी नमस्ते कर वह वहाँ से खिसक ली थी.'उँह ,मुझे क्या करना ! दुनिया में सब तरह के लोग होते हैं.----और अकेली लड़की को देख कर कुछ लोग और धृष्ट हो उठते हैं .'

कहां इलाहाबाद कहां मेरठ ! लेकिन नौकरी जब यहाँ मिली तो क्या किया जा सकता है .उधर गौतम भैया के पास इलाहाबाद का चक्कर भी लगाना ही पड़ेगा .अम्माँ बहुत बीमार हैं ,न जाये तो भी नहीं चलता .

यह असित का एरिया है,गाज़ियाबाद और समीपवर्ती क्षेत्र . असित उधर है- चार बर्थ छोडकर .वह ज़रा खिसक कर एक ओर हो गई जिसमे सामना न करना  पड़े . मुझे उससे क्या मतलब ?

पर असित ने देख लिया ,वह उठ कर  चला आया और वहीं  बैठ गया.

 "आप भी अक्सर इस गाड़ी से जाती हैं?"

"हूँऊँ" बिना मुँह खोले उसने नाक से आवाज निकाली .

"मुझे भी यही गाड़ी सूट करती है .हफ़्ते में एक चक्कर तो लग ही जाता है."

वह चुप रही.

"आप मुझसे नाराज होंगी ? मुझे उस दिन के व्यवहार पर दुख है."

"नहीं आपका भला  क्या दोष ?" तरु  भरी बैठी थी,"जो महिलायें बाहर नौकरी के लिये निकलती हैं उनका भी कोई मान-सम्मान होता है? आपने कोई नई बात तो की नहीं.अब तो सुनने की आदत पड गई है ,नाराज काहे को होऊँगी ?"

असित का मुँह लटक गया.यह सब सुनने को मिलेगा उसने सोचा भी नहीं था.पर चुपचाप बैठा रहा. तरु होल्डाल उठाये इसके पहले ही उसने उठाकर रख दिया,अटैची एक ओर खड़ी कर दी,फिर बोला ,"थर्मस में पानी भर लाऊँ ?"

पानी लाकर खूँटी पर टाँग दिया.

होल्डाल खोल दिया.

आखिर कहाँ तक खिंची रहती  ,बोलने-चालने से  सफ़र   में कहाँ तक बचा जा सकता है !

फिर उसने चाय के लिये पूछा तो सिर हिला दिया.

"चलो ,आप बोलीं तो .मैंने तो सोचा था दुनिया भर से नाराज़ ही रहती हैं."

चाय पीते-पीते बात करने लगे दोनों .

शुरू में लगा था पर ऐसा बुरा है नहीं, तरु ने सोचा , और मुझे क्या करना ,उसकी अपनी परेशानियाँ होंगी!

*
दस-पन्द्रह दिनों में तरु का एक चक्कर लगता ही है - कभी कभी तो और जल्दी .
बात एक बार की हो तो इंसान तटस्थ रह ले .यहाँ तो ट्रेन में आते-जाते महीने में एक- दो बार आमना-सामना हो जाता हैंृ और अक्सर उसी कंपार्टमेंट में  .

इतने लंबे सफ़र में बात करना भी एक मजबूरी है .फिर जो आदमी सुविधा का इतना ध्यान रखे उससे मुँह भी कैसे फेरे रहे !

काफ़ी परिचय हो गया है आपस में .

"---अब तो अम्माँ का ठीक होना मुश्किल लगता है, मुश्किल क्या असंभव ! पैरालिसिस का ऐसा अटैक !बिल्कुल बिस्तर पर सीमित रह गई हैं.ज्वाइन करके मुझे फिर छुट्टी लेनी पडेगी."

छुट्टियों की बात चली तो असित ने अपना दृष्टिकोण बताया .तरु को ताज्जुब हुआ.

"अच्छा ! छुट्टियों में भी घर पर समय बिताना नहीं चाहते ?"

"एकाध दिन तो चल जाता है फिर ऊबने लगता हूँ."

"घर में कौन-कौन है ?"

"पिता हैं ,माँ हैं ,भाई-बहन सब हैं ."

"फिर भी--फिर भी--- ?."

"कुछ नहीं ,ऐसे ही.कहने लायक कुछ नहीं.शुरू से ही कुछ ऐसा हूँ ,सबसे अलग-अलग रह जाता हूँ.घर में और अकेलापन लगता है....आपको सुनकर अजीब लग रहा होगा ?"

अलग-अलग लोगों का ढंग कभी-कभी कैसा एक सा होता है ,तरु ने सोचा ,और सिर हिला दिया जैसे उसकी बात समझ रही हो .

वह पूछती रही ,वह बताता रहा.

"जाने कैसे जीवन बीता  . वह सब याद करने की इच्छा नहीं होती.मेरी मां बहुत पहले मर गईं थीं ,दूसरी माँ हैं ये .पहले उनसे मांजी कहना बड़ा अजीब लगता था.अम्माँ कहलाना उन्हें पसन्द नहीं आया.तब हम तीन भाई-बहन थे.सबसे बडी बहन अब नहीं हैं.वे डूब गईं थीं ,मर गईं. ...

"पन्द्रह वर्ष का था ,तब से एक दुकान पर नौकरी शुरू कर दी,साथ ही मैट्रिक की तैयारी भी.फिर वही क्रम आगे चला. सुधा दीदी के मरने के बाद घर से मन उचट गया था.बाहर के लोग अजीब निगाहों से देखते थे,नई माँ से बडा डर लगता था.तरह-तरह के इल्जाम और डाँट-फटकार.हमेशा अपमान और आरोप !बुरी तरह परेशान रहता था मैं."

"खाना-पीना?"

"किसी का कुछ ठिकाना नहीं.कभी खा लिया ,कभी यों ही रह गया."

तरु चुप बैठी है.

"इन्टर में कॉलेज ज्वाइन कर लिया .प्राइवेट होकर साइन्स नहीं ले सकता था.डॉक्टर बनने की इच्छा थी और तमाशा देखिये ,बन गया मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव."

वह जोर से हँसा .कैसी खोखली-सी लग रही है यह हँसी !

तरु को अजीब लगने लगा है . क्या बोले कुछ समझ में नहीं आ रहा .असित वहीं जमा बैठा है,तरु के होल्डाल से बची हुई जगह में.तरु होल्डाल पर खिडकी से लगी बैठी है, तिरछी होकर जिससे खिड़की से बाहर भी देखती रह सके .

कुछ तो बोलना  चाहिये, तरु ने पूछा" दुकान के काम के साथ पढ़ाई कैसे चल पाती होगी ?"

"हाई स्कूल मे फर्स्ट था न !दुकानदार ने काफी सुविधायं दे दीं थीं ,देर रात तक उसका हिसाब-किताब करवाता रहता था.परीक्षा के पहले तो उसने काम भी बहुत हल्का कर दिया था.,सिर्फ़ चार घण्टे की ड्यूटी . तभी अचानक प्रिन्सिपल साहब की कृपा हुई होस्टल में जगह मिल गई .इन्टर में भी फ़र्स्ट ले आया.फिर दुकान की नौकरी छोड़ ट्यूशनें पकड़ लीं..

"प्रिन्सिपल की कृपा की भी विचित्र कहानी है ..." तरु कुछ पूछ भी नहीं रही ,चुप बैठी है.

"....रहने का कोई ठिकाना तो था नहीं.एक बार प्लेटफार्म पर जा सोया.सोचा था आराम से चाय-वाय पीकर निकलूंगा पर वहँ फँस गया.कोई ट्रेन बहुत लेट आई थी.बाहर निकलने लगा तो टिकट की माँग हुई और यहँ प्लेटफार्म -टिकट भी पास नहीं था. पकड़ा गया .दुकनदार के यहाँ काम करता नहीं था वहाँ सोने की कोई तुक नहीं थी ,कुछ सामान जरूर उसके स्टोर में रख छोडा था .

"अजीब हालत हो गई मेरी .इतने में प्रिसिपल साहब उधर आ निकले- किसी को सी-ऑफ करके लौट रहे थे.मुझे अच्छी तरह जानते थे ,पढने में अच्छा था न ! कह-सुन कर अपने साथ निकाल लाये ,खाना खिलाया...."

तरु को कैसा-कैसा तो लग रहा है . विचित्र  है यह दुनिया ,जहाँ किसी की बहन ,किसी के पिता दूसरों के अत्याचार सह-सह कर मर जाते हैं या मार डाले जाते हैं और हत्यारे सबकी सहानुभूति बटोरते लम्बी आयु भोगते हैं !

" मैं सामान्य नहीं हूँ तरल जी , मुझे खुद को सम्हालना बडा मुश्किल लगता है .कभी-कभी इतनी उलझन ,इतना बिखराव कि मैं झेल नहीं पाता .मन इतना उद्विग्न  कि अपने आप से छुटकारा पाना चाहता हूँ.यह बाहरी चक्कर मन की भटकन से सामंजस्य बैठा लेता है इसीलिये पसन्द की है यह नौकरी .किसी से कुछ कह नहीं सकता ,कौन सुने-समझेगा ?मेरा कोई अपना नहीं है."

तरु हाथ पर सिर टिकाये वैसी -की -वैसी बैठी है.असित का ध्यान उधर गया .कोई स्टेशन आ रहा है शायद ,गाड़ी की गति धीमी पड़ने लगी है.

"मैं तो बोलता ही चला जा रहा हूँ ,आप भी क्या सोचती होंगी !"

कोई उत्तर नहीं.

इतने में स्टेशन की रोशनी तरु के झुके चेहरे पर पड़ी.

"अरे ,ये क्या ?...आप रो रही हैं....इतना लगता है आपको मेरे लिये .."

आवेश में बढकर उसने तरु का नीचे लटकता हाथ पकड़ लिया .वह सम्हली ,धीरे-से अपना हाथ छुडाकर आँसू पोंछ लिये.

"ग़लत मत समझिये ,आप कह रहे थे और मुझे अपने लिए लगने लगा था. बात आपकी थी पर जाने कैसे मैं अपने में चली गई ... "

सिर उठाकर असित ने ध्यान से उसकी ओर देखा

तरु चुपचाप बाहर देख रही थी
***
5.

तरु के मन में जो उमड़ता-घुमड़ता है, अगर सोचने बैठे तो सिलसिलेवार कुछ याद नहीं आता.सब कुछ जैसे खण्ड-खण्ड होकर बिखर गया है.भीतर-ही भीतर एक सैलाब -सा उठता है,जिसमें सारा का सारा बेतरतीब उतराता चला आता है.

पिता का चेहरा बार-बार उभरता है -अलग-अलग तरह से ,अनेक रूपों में, अनेक भंगिमाओं में. स्मृति की एक लहर लाती है दूसरी समेटती बहा ले जाती है.कुछ भी पकड़ में नहीं आता.उनके एक हँसते चेहरे ,एक प्रफुल्ल मुद्रा को बहुत प्रयत्न करके वह सामने रखने की कोशिश करती है,पर नहीं हो पाता !

बीच-बीच में दिख जाता है विपिन का किशोर-कोमल मुख,जिसकी नव-स्फुटित वय अनायास ही तरु से मैत्री जोड़ बैठी थी. वह किशोर कब युवा हो गया ,उसे पता ही न चला, और एक दिन समझ कर वह चौंक उठी . वह चला गया तब उसने रिक्तता का अनुभव किया था.फिर उसने मन-ही-मन कहा था,'अच्छा हुआ विपिन ,तुम चले गये.तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारा न होना मुझे खटकता रहा ,पर तुम्हारी नई उम्र को फूलों की जरूरत थी और मेरे पास सिर्फ काँटे थे.'

और पृष्ठभूमि में एक भीड़ ,जिसमें बहुत लोग हैं - भाई-बहिन ,नाते-रिश्ते,मित्र-परिचित; बहुत से चेहरे ,बहुत सी भंगिमायें.पर वह सारी भीड़ लहरों में बिखर कर गड्ड-मड्ड हो जाती है.

****

पिता से जुड़ी बहुत-सी घटनाएँ तरु को याद हैं.
 बहुत छोटी थी ,उनका नाम तरु ने दूसरों से सुनकर जाना था 'गोविन बाबू' .  यह तो  बाद में बड़े होने पर  समझी कि उनका नाम गोविन्द प्रसाद है .

 संजू तरु से  छोटा है , साथ का वही है  -मेल के लिए भी और लड़ाई के लिए  भी . शन्नो और गौतम काफ़ी बड़े ,उनसे  तरु का कोई ताल-मेल नहीं बैठता .
दोनों छोटे हैं अक्सर पिता के आस-पास रहते हैं .वैसे उनके पास  समय ही कितना ,सुबह से शाम तक दफ़्तर की नौकरी .

गोविन्द बाबू के लेटते ही संजू पहुँच जाता है.

"पिताई ,खन्ती -मन्ती, " वह बड़े लाड़ में आकर कहता है ,"फिर हम तुम्हारे पाँवों पर कूदेंगे. '

उनकी टाँगें बहुत दर्द करती हैं .एक-एक टाँग पर तरु-संजू को खड़ा कर रौंदवाते हैं तब चैन पडता है.

"अच्छा ,आओ."

पीठ के बल लेटकर उन्होनें तलवे जमीन पर टिकाये और दोनों पाँव घुटने खड़े कर जोड़ लिए.संजू ने घुटनो पर ठोड़ी जमा ली और टाँगों पर औंधा लेट गया . वे उसे ऊपर -नीचे झुलाने लगे और गाने लगे --

''खन्ती मंती खंत खताई .

कौड़ी पाई

कौडी घसियारे को दीन्हीं ,

घसियारे ने घास दीन्हीं ,

घास गाय को दीन्हीं ,

गाय ने दूध दीन्हा ,

दूध की खीर पकाई ,

सब घर ने खाई,

आरे धरी ,पिटारे धरी ,

आई घूस ,ले गई मूस,

(पाँव पूरी ऊँचाई तक उठाकर )

लडके-लडके नीम पे ,

लडकियाँ-लडकियाँ धम्म !

(पांव पूरे नीचे आ गये)

"पिताई और धम्म,धम्म .लक्कियां धम्म .''

लडकियाँ धम्म करने मे संजू बडा खुश होता है ,खिलखिलाकर हँसने लगता है .उसे लगता है वह नीम पर है तरु 'धम्म' हो गई. जीत की खुशी में उलकी आँखे चमक उठती हैं.

पहले तरु झूलती थी.तब पिता कहते थे ,"लड़कियाँ-लड़कियाँ नीम पे ,लड़के-लड़के धम्म,'तब तरु खुश होती थी संजू का मुँह बन जाता था.

अब तरु उतनी छोटी नहीं रही .

" अच्छा, अब तुम हमारे पाँव दबाओ ."

संजू पाँव पर खड़ा हो गया और चल-चल कर दबाने लगा .

"तरु, गौतम क्या कर रहा है?"

"भइया पढ़ रहे हैं ,पिताजी ." तरु आकर खडी हो गई.

"चौके मे क्या हो रहा है ."

"जिज्जी अम्माँ के लिये पानी गरम कर रही हैं ."

"जाकर शन्नो से कहो एक कप चाय बना दे ,मेरा सिर दर्द कर रहा है ."

शन्नो ने सुन लिया आकर बोली ,"पिताजी दूध बिल्कुल नहीं है.शर्माइन का लड़का माँगने आया था ,अम्मां ने सब दे दिया ."

**
पढ़ाई से बार-बार तरु का मन हट जाता है.

गौतम भैया कैसे लग रहे हैं - देख-देख कर उसे हँसी छूटती है.नाक के नीचे हल्की-हल्की मूछें उगने लगी है; उन पर पसीने की बूँदें अटक गई हैं. कैसी अजीब शकल लगती है .

तरु फिर देखती है ,ज़ोर से हँसी आती है उसे.शन्नो उसे हँसते देख रही हैं.

गौतम भइया को जिज्जी भी तो देख रही हैं ,इन्हें मज़ा क्यों नहीं आ रहा - उसने सोचा .वह भाई की ओर देखती है ,फिर शन्नो की ओर और जोर से हँस पडती है. अब गौतम की नाक पर भी पसीने की बूँदें चमक रही हैं.

ये जिज्जी क्यों नहीं हँसतीं ?अभी अम्मा ने डाँटा है .किसी बात पर नहीं हँसेंगी वे. उसने मन-ही-मन समाधान कर लिया.पता नहीं संजू कहां है ,क्या कर रहा है - इस समय वह भी होता तो कितना मज़ा आता .ऐसे मौकों पर दोनों में खूब पट जाती है .

शन्नो तीखी नजरों से तरु को देख रही हैं,और वह हँसे चली जा रही है.हँसी रुकती नहीं.वह अपनी किताब उठाकर आड़ में जा बैठती है.वहीं से झाँक-झाँक कर देख लेती है कि पसीने की बूँदें अभी मूछों पर ही अटकी हैं या टपक गईं.बार-बार हँस उठती है तरु.

शन्नो आकर गौतम के पास बैठ गई,वे तरु की ओर इशारा कर कुछ कह रही हैं..तरु के कानों में कुछ शब्द पडे,'देखा गौतम इस चुड़ैल को...'

"क्यों तरु, हमेशा ऐसे ही फ़साद खड़े किया करती है',गौतम दहाड़े.

शन्नो ने जोड़ा ,'चुगलखोर कहीं की ,झूठी ,बत्तमीज़!"

लाल-लाल आँखें किये गौतम तरु को घूर रहेा हैं .पसीने की बूँदों से भरा उनका चेहरा और अजीब लगने लगा है.पर अब तरु की हँसी समाप्त हो गई है.

"मैनें क्या किया?"

"और झूठ बोल-बोल कर अम्माँ से उनकी डाँट पड़वा , ऊपर से बैठ कर हँसी उड़ा.--अब से मत बैठाकर हम लोगों के कमरे में."

"मैनें क्या किया?"

"हमेशा अम्माँ से जिज्जी की चुगली लगाती है . भाग यहाँ से."

"झूठा नाम मत लगाओ ! मैं तो यहीं बैठूँगी.देखो अम्मां बेकार में मुझे--."

तरु को चिल्लाते देख शन्नो ने दखल दिया ,"चिल्ला क्यों रही है ?बैठ हमारे सिर पर "फिर गौतम की ओर घूमी,"मत कह गौतम,वह फिर शिकायत करेगी और वो मेरे पीछे पड जायेंगी ! "
गौतम कुछ कह नहीं रहे ,आग्नेय दृष्टि से तरु को घूरे जा रहे हैं.तरु वहीं अड़ी बैठी है.

"नहीं जायेगी .अच्छा जा, अब मुझसे मत बोलना."

"अच्छा, "तन कर उसने जवाब दिया,"नहीं बोलूँगी."

फिर तरु और गौतम की बोल-चाल बन्द - महीनों के महीनों.तरु भी एक ही अड़ियल है,अपने आप बोलेगी नहीं और कहीं बाहर जाकर अगर गौतम को ही बोलना पड़े तो ऐसे जवाब दे देगी जैसे दीवारों से बात कर रही हो .गौतम बड़े ठहरे उन्हे भी बोलने में अपनी हेठी लगती है.

"तरु, ऐसा नहीं करते. वो बडे भाई हैं,'अम्माँ समझाती हैं.

तरु अम्माँ से शिकायतत क्यों करे ! अपने आप निपट लेगी.उसे लगता है बड़े हैं तो क्या हमेशा मेरे ऊपर बेकार नाराज होते रहें?जिज्जी मेरे खिलाफ भरती हैं और वे बिगड़ना शुरू कर देते हैं.एक बार पूछ भी तो लें मैनें कुछ किया भी है या नहीं?जब पहले ही डाँट लेते हैं तो मैं काहे को असली बात बताऊँ?मैं क्या फ़ालतू हूँ जो बिना पूछे अपनी सफ़ाई देने पहुँच जाऊँ ?"

गौतम भइया अपनी किसी बात पर डाँटें तो भी ठीक,पर जहाँ जिज्जी ने चढ़ाया उनकी आँखें लाल ,जैसे खाने को दौड़ पडेंगे .और शन्नो जिज्जी भी !इतनी बड़ी हैं खुद नहीं कह सकतीं मुझसे ?हमेशा उनसे डँटवाती रहती हैं.मैं तो अपनी बात पर खुद निपट लूँ ,दूसरों को बीच में क्यों डालूँ?

तरु को गुस्सा तो यह है कि जो उसने किया नहीं उस के लिये सिर्फ जिज्जी के कहने में आकर डाँटना-बिगडना शुरू कर दिया ! नहीं मैं बिल्कुल नहीं बोलूँगी .

अम्माँ उसके हाथ गौतम के लिये कुछ भेजती भी हैं तो पास रख कर चली आती है.वे जबर्दस्ती कुछ कहलातीं तो पास खडी होकर ,बिना नाम लिये ,बिना संबोधन किये बोल देती है.

शन्नो बार-बार समझातीं हैं ,"तू छोटी है तरु .तुझे बोलना चाहिये.उसने अगर ज़रा सा डाँट दिया तो क्या हो गया ?"

"हाँ ,तुम दोनों बड़े हो तो मिल कर बेकार में डाँटोगे !नहीं, मुझे न डाँट सुननी है ,न बोलना है."

वाह ,जिज्जी दोनों ओर से भली बन गईं और मैं बुरी . उसे और खीझ लगती है.

" देखो जिज़्जी ,तुम्हीं ने मेरा झूठ नाम लगाकर डँटवाया.मै क्यों बोलूं?तुम लोगों का गलत काम भी ठीक ?बडे हो इसलिये?"

तरु को लगता है शन्नो खुद तो अलग हो जाती हैं,दूसरों को लड़वा देती हैं.भैया भी कभी मुझसे नहीं पूछते.--न पूछें !मैं क्यों अपने आप सफ़ाई देने पहुँचूँ?

एक तो कुछ किया नहीं ऊपर से अपने आप सफ़ाई !

 ऊँहुँक्.


***

(क्रमशः)
''

5 टिप्‍पणियां:

  1. 'मुझे खुद को सम्हालना बडा मुश्किल लगता है .कभी-कभी इतनी उलझन ,इतना बिखराव कि मैं झेल नहीं पाता .मन इतना उद्विग्न कि अपने आप से छुटकारा पाना चाहता हूँ..''

    हम्म...होता है अक्सर....ऐसे ही वक़्त कोई अपना सा मिल जाए तो संभवत: परिणाम आत्महत्या न हुआ करे........:/:/ मगर असित जिन परिस्थितयों में पला बढ़ा है....मुझे नहीं लगता वो इतना कमज़ोर होना चाहिए.....अपने जीवन से कुछ सीखा हो या न सीखा हो..एक सबक या मूल मन्त्र ज़रूर मिला है.....''मजबूरी और अभाव आपके अंदर सिर्फ और सिर्फ हिम्मत और शक्ति भरते हैं'' जब आपको पता होता है...कोई नहीं आने वाला सहायता को...या आंसू पोंछने...तब आपको रोना आता ही नहीं.........रुलाई का बाँध वैसे भी दिलासा या सांत्वना से ही टूटता है..जब कंधे पर कोई हाथ रख कर कहे ''चुप हो जाओ भाई...हिम्मत रखो..'' दिलासा के दो बोल कमज़ोर करने को काफ़ी हैं......:/:/:/

    ''यह बाहरी चक्कर मन की भटकन से सामंजस्य बैठा लेता है ''

    solah आने sahi बात मगर आपने कितने सुंदर ढंग से कही..:).....मैंने भी बहुत aazmaya है..और सभी आजमाते हैं....व्यस्त हो जाना ...घर से कुछ समय दूर रह लेना....तनाव को कम ही कर देता है...

    ''बात आपकी थी पर जाने कैसे मैं अपने में चली गई ... "

    ये तो मेरी भी तकलीफ़ है..:)...वैसे अच्छा संकेत होता है...पाठक का अपने आप को रचनाओं से जोड़ लेना.....एक शायर की बातें याद आ रहीं हैं...''जब कोई मेरे गम से अपना दुःख सहला लेता है.....तो मैं समझता हूँ मेरा लिखना सार्थक हुआ...''...........:)

    बेहद बेहद उत्सुक हूँ आपकी कहानी की नायिका के baare में jaanne के लिए...jaldi post kijiyega..:)
    और haan.....जी...मुझे फिर से बहुत अच्छा laga baar baar अपना naam padhna....sadaa aabhari rahungi इस cheez के लिए......:D

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  2. बेहतरीन प्रस्तुतीकरण । भावुक कर दिया आपने ।

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  3. कठिन है असित, उसे जानना अच्छा लगा, लेकिन तरल! उत्सुक हूँ आगे जानने के लिए।
    "कुछ तो बोलना चाहिये, तरु ने पूछा" ऐसे ही तो सभी संवाद किये किये जाते होंगे न?और परिणति...जीवन/स्मृतियाँ/सम्बन्ध।
    प्रतीक्षा रहेगी।

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  4. शकुन्तला बहादुर19 फ़रवरी 2011 को 11:49 pm

    कथोपकथन के माध्यम से कथानक का विकास प्रवाहपूर्ण और रोचक है। जीवन की विसंगतियों की झाँकी सहज ही मन को प्रभावित
    कर लेती है।अगले अंक के लिये जिज्ञासा है।आपका साधुवाद!!

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