सोमवार, 18 जनवरी 2010

गंगा तीरे !

देवात्मा हिमालय बार बार पुकारता है आओ ,चले आओ पूरव -पश्चिम दोनो ओर बाहें पसारे कब से खड़ा हूँ ! मेरी छाँह में अंतर में सोई हुई की दिव्यता जाग उठेगी - तन-मन की रिक्तता को सिक्त करती हुई ,उस गहन शान्ति में अवगाहन कर मानस स्निग्ध उज्ज्वलता से आपूर्ण हो जायेगा ! इधर कई सालों से उधर हीं नहीं जा पाई थी - न हरद्वार ,न ऋषिकेश ।मन हमेशा उधर ही दौड़ता रहा पर दुनिया के जंजालों में ऐसी फँसी रही कि उधर का रुख न कर सकी । निश्चय कर लिया कि इस बार जरूर जाऊँगी -जिस भी मौसम में जाऊँ । उस पुकार को अनसुना करना अब मेरे बस में नहीं है ।

पिछली बार हिमालय की और गई तब बद्रीनाथ ,केदारनाथ के दर्शन भी कर आई थी ।अलकनन्दा ,मन्दाकिनी ,भिलंगना आदि सरिताओं के नाम मन को खींचते थे ।देख कर नयन तृप्त हुये ।पर यह तृप्ति तो और भी तृषा जगातनेवाली निकली ।बार-बार वहीं जाने की कामना जगा जाती है ।इस बार मार्च में जाने का अवसर मिला ।मौसम अच्छा था ,न अधिक सर्दी ,न गर्मी ।हरद्वार में बाबा रामदेव का पातंजलि योगपीठ जाने का भी विचार था ।
यात्रा ठीक ही रही ,रात को चले थे सुबह पहुँच गये ।उधर की हवाओं में बहनेवाली पावन शीतलता का स्पर्श होते ही अनुभव होने लगा कि हम साधारण धरती से ऊपर आ गये हैं ।देवभूमि में प्रवेश करते मन-प्राण जुड़ाने लगे ।यहाँ धरती का रूप ही निराला है ।कल पानी बरसा था ।ऊँचे घने हरे-भरे पेड़ों से समृद्ध धरा गुल्मों ,झाड़ियों और वनघास से आच्छादित।जगह-जगह ताल-तलैयों के दर्पण में झाँकती हरियाली और आकाश का अथाह नीलापन ।ऊँचे घने आम्र-तरु सुनहरे बौरों से ढँके खड़े हैं ,लगता है हरीतिमा ने स्वर्णिम दुशाला ओढ़ लिया हो ।ऐसे पेड़ देखे युग बीत गये । सूखी धरती और बचे-खुचे झंखाड़ से पेड़,हरे नहीं चारों ओर उड़ती हुई धूल की पर्तें ओढ़े, रूखे-सूखे छितरी डालोंवाले । यह शुष्कता और वीरानापन झेलते भीतर की अतृप्ति बढ़ती जा रही थी। तन-मन पर एक विषण्णता, एक अजीब सी विरक्ति छा गई थी । यहाँ इस सुफला-सुजला धरती को, निस्सीम निर्मल गगन को ,इस झूमती हरियाली को और इनके साथ ,भाव-भक्ति भरे सरल लोगों की भंगिमा निरख, हृदय उल्लसित हो गया ।यहाँ आ कर विस्तृत वेगवती पावन जलधारा को नयनों मे भर जी जुड़ा गया !ऐसी तृप्ति जिसकी स्मृति से ही विलक्षण शान्ति मिलती है । हरद्वार आकर सारी क्लान्ति मिट गई ।चित्त को उन्मुक्ति और धन्यता का आभास होने लगा ।जैसे मन-प्राण को विदीर्ण करती तृषा शान्त हो कर तरल उल्लास से आप्लावित हो जाये ।बहुत दिनों तक याद रहेगा यह अनुभव ।मैं फिर आऊँगी ,बार- बार आऊँगी जीवन्त रूप में इस अनुभव को ग्रहण करने ।सचमुच देवभूमि है यह ! पग पग पर दिव्यता का आभास होता है ।यहाँ आने को यह सब पाने को बार बार भीतर से पुकार उठती थी -चलो यहाँ से चलो ,वहाँ चलो ।और कितनी लंबी प्रतीक्षा के बाद मैं आ सकी ।जब पाने का मुहूर्त होगा तभी तो आ सकूँगी ।उसे पहले लाख कोशिश कर लूँ कुछ नहीं होने वाला । पर अबलगता है कामना की तीव्रता के आगे बाधाओं का बस अधिक नहीं चलेगा ।अंतर्मन से उठने वाली सच्ची पुकार निरर्थक नहीं जायेगी ।
शिवताण्डव स्तोत्र में व्यक्त रावण की कामना इस समय याद आ रही है । उसकी कामना अपनी पूरी तीव्रता से व्यक्त हुई, शिव के प्रति उसके आत्म-निवेदन में । भीतर ही भीतर गहन वैराग्य जाग रहा है।चाह उठती है कि इस सब का परित्याग कर, पुत्र को राज्य सौंप, शान्तमनस् , जिह्वा पर शिवमंत्र धारण कर आत्मलीन हो शान्त जीवन व्यतीत करूँ -गंगा तट की किसी गुहा में अपना निवास बना कर ।सारे विश्व से अपने भुजबल का लोहा मनवाने के बाद,असीम ऐश्वर्य भोगने के बाद क्या शेष रह गया था पाने को ? पर तृप्ति कहाँ मिली ?क्या कमी थी उसे ? कौन सा सुख,विलास ,सम्मान ,सुयश बाकी रह गया था ?।पर आत्मिक शान्ति और संतोष कहीं नहीं नहीं मिला ।
उसके जैसा महाप्रतापी ,विश्व के सभी सुख-विलास भोग कर भी तृप्ति नहीं पाता ।एक उत्कट कामना हृदय में पाले है जो रह -रह कर उसके काव्य में व्यक्त होती है ।
' कदा निलिम्प निर्झरी नकुंज कोटरे वसन ,
विमुक्त दुर्मति सदा शिरस्यमंजालिवहन् !
वमुक्त लोल लोचनौललाम भाल लग्नकः,
शिवेति मंत्र उच्चरन् सदासुखी भवाम्य.हम् ! '
सारा कुछ जो अपने भुजबल से अर्जित किया है ,सारे सुख ,सारा वैभव बेमानी हो उठा है ।जी भर गया है इन ऊपरी आडंबरों से ।अपने भीतर उतरता है ,सब व्यर्थ लगता पर है।किन्तु उसकी कामना कहाँ पूर्ण हो सकी ।कितने जन्मों के पुण्य संचित होते होंगे तब सुरसरि का सान्निध्य हो पाता होगा !गंगे ,तुमने तो मानवी रूप धरा है। नारी संवेदनाओं को जिया है ।अष्ट वसुओं की माँ गंगे ,।सात पुत्र समर्पित हो गये इसी जल में शाप-मुक्त हो गये ।एक भीष्म -देवव्रत को जीवन मिला ।तुम साक्षी हो उस विडंबनामय जीवन की ।तुम्हारे मन की करुणा कितनी बार उमड़ी थी माँ ,समझना मेरे मन को भी ।जो बीत गया बीत गया ,अब शेष दिन अपनी रुचि के अनुकूल अपने ढंग से जीना चाहती हूँ ।उस आनन्द को पाना चाहती हूँ कि जीवन, जीने की लाचारी न बन उत्सवपूर्ण यात्रा बन जाये और इसी सहजता से उस तट तक पहुँच जाऊँ ।
विधाता ने जैसी विचित्र इच्छायें मेरे भीतर उत्पन्न की हैं ,उन्हें प्रायः उतने ही अप्रत्याशित ढंग से पूरा भी किया है ।जब तक पूरी नहीं होतीं मन तृषित मृग सा भागता रहता है-व्याकुल भटकता ,खोजता ।ऐसी बहुत सी इच्छायें जो किसी से कहते भी नहीं बनतीं ।कहूँ तो लोग मेरी बुद्धि पर संदेह करेंगे ।बहुत मन करता रहा था- सघन वन में हरी-सुनहरी घासों की चादर बिछी हो ,बीचबीच में छोटे-बड़े पेड़ पुष्पित लताओं के हार पहने खड़े हों ।वनपुष्पों की मदिर गंध चतुर्दिक् व्याप्त हो ।परियाँ जहाँ पूरे चाँद की रातों में विहार करती हों ,और मैं इस सब का प्रत्यक्ष अनुभव करूँ ।महाबलेश्वर की सुरम्य वनखंडिकाओं में मुझे यह सब अनायास मिल गया । वह पुष्पित तरु-गुल्मों को छू कर आते सुगंधित पवन की स्मृति अब भी कभी-कभी राह चलते अनायास उदित हो जाती है जो क्षणाँश को ही सही मन में उल्लास बिखेर जाती है।
और आज यहाँ गंगा मेरे परम निकट बह रही हैं ।जहाँ निवास मिला है वह भवन गंगा के तट पर स्थित है और जिस कक्ष में मैं हूँ वह तो गंगा से लगा हुआ है ।एक हाथ भी दूर नहीं, इस खिड़की के नीचे प्रवाह है ।लगता है गंगा सट कर बह रही हैं ।इतनी निकटता क्या कभी किसी को मिली होगी !लगता है हाथ नीचे लटकाऊँ तो लहरों को छू लूँगी ।वे तो मेरे बिल्कुल पास हैं, दूरी बिल्कुल नहीं ।अब तो प्रयास मुझे ही करना है उनका स्पर्श पाने को । दिन में भी रात में भी लगातार पाँच दिन ।
प्रातःकालीन सूर्यरश्मियाँ लहराती जल राशि को एक नई आभा से भरती हैं ।परावर्तित होकर वह दीप्ति मेरे कक्ष में समाती है, लहरें झिलमिलाती हैं उनकी दमक इन दीवारों पर नाचती है ।जल की तरलता प्रकाश बन कर लहराती है । मेरा तन-मन भीग उठा है उस तरल ज्योति की छलकन में ।गंगा की लहरें ज्योति रूप धर मुझे स्नान करा रही हैं । विहँसता प्रकाश मेरे कक्ष उजास भरता बिखर रहा है ।मेरे कक्ष में गंगा लहरा रही हैं ।सर्वत्र प्रकाशमान ।मेरा अंतःकरण उस ज्योति से दीप्त हो उठा है ।माँ ,तुम्हारा प्रसाद !
लहरों के साथ किरणों का खेल चलता है ।खिलखिलाती हुई लहरें दौड़ती हैं रश्मियाँ घूम घूम कर पकड़ती हैं जल में धूप-छाँहीं आभा बिखरती है ।प्रवाह के हर-हर-नाद के साथ नृत्यरत लहरों की पायलें खनक रही हैं ।जल पाँखी लाइन लगाये बैठे हैं ।एक नीली चिरैया आसमान तक उड़ती है फिर नीचे आकर जल का स्पर्श कर उड़ गई ।
दिन में सूर्य का प्रकाश और रात्रियों में कभी तो चन्द्रमा की स्निग्ध ज्योत्स्ना या तट के बल्वों का ।और लहरों से उच्छलित उजास ज्योति- गंगा बन मेरे कक्ष में लहराती रहती है।मैं अपने बिस्तर सहित उन्हीं लहरों से सिक्त होती रहती हूँ । निरंतर स्नात- कभी गंगा के जल मे स्नान कभी प्रकाशगंगा में ।रात में लहरें मंद हो जाती हैं ।श्यामल सतह पर रुपहली चंचल रेखायें - लगता है कोई मृदु-मंद स्वरों में गुन-गुनाता हुआ अदृश्य अँगुलियाँ से रम्य कविता लिखे जा रहा है ।
कहाँ से चला आ रहा है ये अजस्र प्रवाह ? अनादि काल से ऊँचे शिखरों से उतरता ।एक दिन विलक्षण अनुभव हुआ ।गंगा के हरहराते स्वर को सुनते हुये खिड़की से गंगा के प्रवाह को देख रही थी इतना चौड़ा पाट कि उधर घाट पर दृष्टि ही नहीं जा रही ।खिड़की का भान खो गया लगा मैं उधऱ बढ़ती चली जा रही हूँ ।जल का विस्तार मेरे सामने ।और मेरे पाँव पानी पर ,मैं उस पर चल रही हूँ ।उधर चलती जा रही हूँ जिधर से प्रवाह आ रहा है ।मैं गंगा के उदगम की ओर बढी जा रही हूँ ।ऊपर और ऊपर पर्वत दिख रहे हैं ।मैं बढ़ती जा रही हूँ । विचित्र अनुभूति !मैं चमत्कृत हूँ ।उस पल क्या हो गया था मुझे
हरद्वार के साथ भोले शंकर का नाम जुड़ा है ।और वहीं पास में कनखल में सती के पिता दक्ष का निवास ,जहाँ यज्ञ में सती ने पति का अपमान न सह पाकर देह त्यागी थी ।याद आता है गणों द्वारा यज्ञ ध्वंस और शिवप्रिया का करुण अवसान ।अपने अनादर की बात सुन कर चुप रहे थे शंकर, पर पत्नी के प्रति दुर्व्यवहार और उसकी परिणति पर वे क्रुद्ध हो उठे ।यज्ञ-भंग कर दक्ष का सिर काटने के बाद सती की मृतदेह कांधे पर डाल उन्मत्त-से भटक रहे है ।लाल नेत्र ,बिखरी जटायें ,दिशाओँ का भान नहीं ,धरती आकाश मँझा रहे हैं ।कुछ कहा नहीं बस पत्नीत्व के अधिकार से वंचित कर दिया ।क्या अपराध किया था ?सीता का वेश धरा था राम की परीक्षा लेने को । मैंने क्या कभी वेश नहीं बदले ?पत्नी की बात आते ही दृष्टि इतनी संकुचित क्यों हो जाती हैं ? कितनी गहन वेदना रही होगी! प्रिया की अंतर्व्यथा की स्मृति आते ही नयनों से अश्रु झरने लगते हैं - रुद्राक्ष बिखर जाते हैं। ।मन में दुःख है क्रोध है ,चिर-विरह की वेदना भीतर ही भीतर दग्ध कर रही है ।विचलित हो उठे हैं शंकर ,उचित अनुचित का भान भूल कर सती देह बाहों में समेटे बादलों को रौंदते बिजलियों को कुचलते उद्भ्रान्त से भटक रहे हैं । क्या-क्या याद दिला देती है गंगा !
हर की पौड़ी की हर शाम उत्सवमयी होती है ,हर शाम ।चंदन कपूर के साथ पूजा में अर्पित पुष्पों की सुगंध वातावरण में व्याप्त है।अवसाद-नैराश्य का कहीं नाम निशान नहीं । शान्ति ,संतोष और प्रसन्नता के साथ परम शान्ति की अनुभूति।गंगा मैया का प्रसाद है यह !लहरों की उठा-पटक में बता रही हैं काल-प्रवाह का उतार चढाव है -यह ,जीवन जीवन की चिरंतन धारा नित्य-प्रवाहित है एक ही प्रवाह के कितने रूप !जन्म से लेकर विलय पर्यन्त ।कितने संगम और कितने भूतल ,ग्राम-नगर,वन-उपत्यका ।लंबी यात्रा पर्वत से सागर तक !अनुभव बाँटती चलती हैं गंगा ।गंगा की आरती उसी शाश्वत जीवन की आरती है जो भूतल पर बह कर भी उसमें लिप्त नहीं होता । जीवन के सब रूपों को झेलती चलती है गंगा शैशव से विलय पर्यन्त ।सुरसरि -प्रवाह में दीप दान का दृष्य मन को विभोर करता है ।पत्तों की द्रोणियों में सुगंधित पुष्प भर कर बीच में प्रज्ज्वलित अगरबत्तियों के साथ दीप की लौ लहरों के साथ लहराती बलखाती बढी जा रही है -प्राणों की ज्योति से दीप्त जीवन की अनवरत धारा में प्रवाहित हो रही है - श्रद्धा भक्ति के पुष्पों के साथ त्रिविध-ताप की सुलगती अगरबत्तियों की धूमरेखा से सज्जित !उच्छल लहरें प्रकाश किरणों की खींचतान करती चारों ओर बिखर रही हैं ।
मेरी दृष्टि जा रही है अब तटों पर उमड़ते जन-गंगा के प्रवाह पर ।उत्तर दक्षिण पूरव पश्चिम चारों ओर जन ही जन -भक्ति से भरे ।जितने मूड हैं इस अनवरत प्रवाह के, जनगंगा के भी कितने-कितने रूप ।चारों ओर से प्रवाह आ आ कर मिल रहे हैं ।भिन्न भूषा ,भिन्न भाषा भिन्न रूप रंगों की कितनी धारायें आत्मसात् किये है यह जनगंगा ।यहाँ एक प्रवाह में बह रहे हैं सब ,एक भाव-धारा के अधीन ।सारा अलगाव बह गया है ।यहाँ आ कर वे जुड़ गये हैं माँ गंगा से ,एक दूपरे से ।किसी के प्रति अलगाव नहीं वरन् अपार सहानुभूति ।इतनी भीड़ में भी दूसरे को धकिया कर आगे बढ़ जाने की बात मन में आ नहीं सकती, सबको जगह देते, एक दूजे के प्रति सम्मान की भावना और अपार सहानुभूति लिये बढञे जा रहे हैं ।इसी लिये कुंभ का इतने बड़ा मेला सह अस्तित्व की भावना के बल पर ही इतनी सफलता से संचालित होता है ।
लोग अपने भीतर घुसे रहे हैं दूसरों के बारे में सुनन-जानने की फ़ुर्सत ही किसे है ।

मेरे सिरहाने गंगा बहती रहीं ।पूरी छः रात और दिन गंगा मेरे साथ रहीं ।अनवरत बहता वह पुण्य-प्रवाह और लेटे-लेटे कलकल निनाद सुनती मैं । लहरें कानों में लोरी सुनाती रहीं ।बीच में जितनी बार उठी खिड़की से पूरे प्रवाह के दर्शन के बिना,चैन नहीं पड़ता था ।इतना सुन्दर अनुभव , इतनी लीनता मन को डुबा देन वाली ,किसी इच्छा अस्तत्व ही नहीं रहता जहाँ ,कोई कामना करवट नहीं लेती पूरी तरह तन्मय ।परम शान्ति ! मन नहीं मानता ,देख देख कर जी नहीं भरता ।
यह अनुभव कभी भुला नहीं पाऊँगी ,इसे पुनर्नवीन करने फिर फिर आऊँगी ,रुकूँगी ऐसे ही किसी कक्ष में जहाँ दिन-दिन भर रात-रात भर गंगा मेरे समीप बहती रहें ।
कब से संचित एक विचित्र कामना थी- मेरे बिल्कुल समीप विस्तृत वेगवती सरिता का प्रवाह हो जिसे मैं पल पल अनुभव करती रहूँ ।धारा की -हर के साथ लहरों तरल कल-कल सुनते सो जाऊँ ।आज देखती हूँ जहाँ लेटी हूँ बिल्कुल बराबर में गंगा बह रही हैं मेरे सिराहने गंगा ,लगता है खिड़की से हाथ बढाऊं तो लहरों की तरलता का अनुभव कर पाऊँगी ।जैसी अटपटी इच्ठायें मेरे भीतर भर दी हैं ,ओ मेरे अंतर्यामी उन्हें उतने ही अप्रत्याशित ढंग से पूरा भी किया है तुमने !तब लगता है मेरी चाह सफल हो गई है ।शान्ति संतोष के साथ पूर्णकाम होने का अनुभव ।
जो कुछ बीत गया ,जैसे बीत गया उससे कोई शिकायत नहीं है ।पर अब बचे-खुचे जीवन का एक भी पल गँवाना नहीं चाहती ।अब तक जिन चक्करों में पड़ी रही अब इससे अलग होना चाहती हूँ ।चाहती हूँ अपने आप में सीमित ,छोटे-छोटे घेरों में दौड़ते रहने की थकान ,मन की क्लान्ति से मुक्ति मिल जाये ।
शेष समय तुम्हारे सान्निध्य में बिताना चाहती हूँ ,माँ गंगे !अपनी यह आनन्दमय कामना तुम्हें अर्पित करती हूँ ! देवि ,अब दायित्व तुम्हारा है !

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपके शब्द मुग्ध कर गए.....बहुत सुंदर लेख है..बहुत ही सुंदर संजोया है आपने यादों को....न जाने क्यूँ पूरा संस्मरण समाप्त करने के बाद...कुछ समय के लिए ऐसा लगा सब रुक गया....आंखें भर आयीं थीं....:(

    ..अभी हाल के ही महाकुंभ में हरिद्वार गयी थी पूरे ४ दिन ४ रातें............आपका एक एक शब्द उस यात्रा को ताज़ा करता रहा...ईमानदारी से स्वीकार करना चाहूंगी.....इतनी शिद्दत से माँ गंगा को नहीं महसूस कर पायी थी...शायद कोशिश नहीं की थी...और भूल भी चुकी थी सब कुछ... अभी आपके शब्दों में छुपी माँ गंगा को देखा...महसूस किया...और मन भारी है..कि मैंने वहां हरिद्वार में किया तो क्या किया....?? खैर अब बीत गया वो वक़्त भी..फिर जाना होगा तो माँ गंगा से करबद्ध हो क्षमा मांग लूंगी..:(....हाँ जी मगर उस भूमि,जल और वायु ने मेरे मन में जो वैराग्य जगाया था...वो आज भी है....और रोज़ तिनका तिनका बढ़ता जाता है.....ये नव वर्ष श्रीकृष्ण के संग मनाया जब वृंदावन में......तो मैंने भी यही कामना की थी....वहीँ स्थायी वास दे देने की....कैसे भी किसी प्रकार भी।

    आपके शब्दों में डूब गयी एकदम....
    आज आपको जितना पढ़ा...उसमे कहीं व्यंग्य..कहीं सरल लेख...कहीं हलकी उदासी तो कहीं...गहरी मुस्कान ही मिली......मुझे शायद इस तरह के संस्मरणों में आपको पढ़ना ज़्यादा अच्छा लगता है....जैसे आप सामने बैठ कर कह रहीं हों.....और मैं लीन होकर सुन रही हूँ.....शब्द जैसे एक एक दृश्य का चित्र उपस्थित कर देते हैं......वो भवन...वो खिड़की...आपका हाथ...और हलकी सी कल कल...लहरों की ध्वनि...और आपके अनदेखे चेहरे पर पूर्ण शान्ति और भक्ति के भाव....सब कुछ मानों मैंने आँखों देखा है अभी अभी......

    आपके शब्दों ने मन इतना धो दिया है..कि लग रहा है...सब कुछ यहाँ लिखती जाऊं...मगर...रोकती हूँ खुद को......फिर से ये लेख पढूंगी.....:)
    चलिए शुभ रात्रि.....

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  2. ऐसा सजग(प्रबुद्ध भी) पाठक देने के लिए अविनाश के प्रति अपनी कृतज्ञता किन शब्दों में व्यक्त करूँ !मेरा बहुत-बहुत आभार -पहुँचा देना तरु.
    अपना लेखन सार्थक लगने लगा है.
    आभार तुम्हारा भी !

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  3. हम्म,
    मुझे ना आभार दीजिये कृपया...:(...अभी समय है न तो...एकदम फ़ुरसत में होती हूँ दिन भर...और पढ़ना मुझे बेहद पसंद है...आप एकदम वही लिखतीं हैं...जो मुझे भाता है...सो आपकी हर पोस्ट पर कुछ न कुछ लिखने को स्वयं ही मन अधीर हो जाता है.....:)
    एक बात कहना चाहूंगी...कि व्यस्त क्षणों में अगर समय निकाल कर पढ़ती...इतना कहती...तो आपका आभार रख भी लेती..:(.....अभी तो इस आभार की अधिकारी नहीं ही हूँ...:(..अविनाश है...तो बिलकुल उस तक मैं आभार पहुंचा दूँगी....उसे डांटना भी है ...कि उसने इतने दिनों के बाद क्यूँ लिंक दिया...:)
    इत्ता सारा कहने के लिए क्षमा...:(...नहीं कहती तो आपका आभार थोडा भारी लगता रहता..:)

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