रविवार, 10 जनवरी 2010

बन-सिमिया

'मम्मी आप काहे की सब्ज़ी लेंगी ?बनसिमिया की भी है,' प्रणति ने पूछा.
बनसिमिया -!एकदम नया शब्द !मेरे कान खड़े हो गये ,मन उत्फुल्ल उत्सुकता से भर उठा ।चकित सी मैंने कहा ,'क्या ?बनसिमिया ??कहाँ है? लाओ ।'
उसी बीच मेरा बेटा बोल उठा ,' काहे की सब्ज़ी?'
वह उसके उधरवाले शब्दों पर हँसता है ।
'हाँ ,हाँ ,ग्वार की फली ! '
उसे याद आ गया होगा यहाँ यह शब्द नहीं चलता ।
प्रणति बहू का नाम । मेरी बहू इलाहाबाद की है ।
और मैं ?मैंने बहुत प्रान्तों की खाक छानी है ।शादी के पहले मध्य प्रदेश के मालवा,जिसके लिये 'देस मालवा गहन गँभीर डग डग रोट पग-पग नीर' 'प्रचलित था , विशेष रूप से उज्जैन और शाजपुर में रही ।विवाह के बाद हिमालय की तराई में रुद्रपुर पहुँची ।बारह बरस पश्चिमी उ.प्र ,मुजफ़्फ़रनगर रही ।फिर कानपुर एक लंबा समय और अब भारत-अमेरिका के बीच शटल बनी हूँ ।बीच-बीच में बड़ौदा ,मथुरा ,दिल्ली ,बीकानेर ,हरियाणा ,बेगूसराय भी छूटे नहीं और घूमा कश्मीर और कन्याकुमारी तक ।वि.वि कक्षाओं को भाषा पढ़ाते समय संविधान की अष्टम अनुसूची की भाषायें ,उनके स्वरूप और अंतर्संबंध स्पष्ट करती रही ।करेला और नीम चढा !
शुद्ध लिखने-बोलने का खब्त मुझे शुरू से रहा है ।जिन दिनों लिखना सीख रही थी पिताजी के स्कूल का एक नौकर छुट्टी पर जाने पर उसके एवज में दूसरा बुला लिया गया ।घर पर फाइल लेने आया तो माताजी ने पूछा ,'यह काम तो जगेसर करता था ,तुम कैसे ?
वह बोला ,'हाँ माताजी ,जगेसर की एवजी पर हम आये ।हमरा नाम हुकुम सिंग है ।/
मैंने अपनी कापी पर लिखा था जगेसर की एफ़. जी पर हुकुम सिंह काम पर आया ।'
मैंने इसके पहले बताया भी था कि एफ़ .जी.वाली बात लिख रही हूँ किसी ने कुछ नहीं कहा,मैंने बाकायदा अंग्रेजी के एफ़ और जी लिखे।बड़े भाई ने अंग्रेजी छौंक की हँसी उड़ाई थी -मुझे याद है ।

भाषा के बारे में ठेठ बचपन से झक्क-सी रही ।जब गोआ तक नहीं पहुँची थी ,गोया को असली मानती थी और जब गोवा अशुद्ध । मैंने लिखा गोया में पुर्तगाल से लोग आए थे तो मेरी खिल्ली उड़ी।पर इससे मुझे विशेष फ़र्क नहीं पड़ा था ,शुद्धता अभियान चलता रहता था ।वह खब्त ही क्या जो खत्म हो जाये ।
सात- आठ साल की रही होऊँगी- राजस्थान के सिरोही कस्बे में थी कुछ समय ।वहाँ मेरी एक सहपाठिन के पिता नाम चिमन लाल जी था।चिमन शब्द का कोई अर्थ ही नहीं होता ,कम से कम मुझे तो अब भी नहीं पता ।
घर पर आकर मैंने भाई से कह ,'मैं चुम्बन लाल जी के घर गई थी ।'
मतलब तो मुझे चुम्बन का भी पता नहीं था तब। पर यह शब्द कई गानों मे मैंने सुना था मतलब अच्छा ही होगा ,सुनने में भी मधुर था ।
विस्फारित नेत्र भाई बोले,'क्या? क्या बक रही हो ?'
मैंने दोहरा दिया ।मैने सोचा किसी ने बिगाड़ दिया है इनका नाम ।जैसे गोवर्धन का गोरधन कर दिया भगवती का भगौती ।
उन्होंने कहा ,'यह नहीं होगा चिमन लाल जी होगा ?।'
मैंने विश्वासपूर्वक कहा ,'
'नहीं ।!चुम्बन लाल जी है।'
भाई बेचारे चुप हो गये ।
ऐसे ही एक शब्द है 'नकबजन' ! मुझे लगता था इसका मतलब नाक बजाना होता है ।नकाब वाला अर्थ पता नहीं था ।अखबार में पढती या लोगो से नकबजनी या डाका पड़नेवाली बात सुनती तो सोचती थी नाक कैसे बजाते होंगे ।फिर सोचा इनका कोई रिवाज होता होगा जैसे बंगाली महिलायें मुँह से उलू ध्वनि करती हैं ।वैसे ऐसी बाते मैं किसी से पूछती नहीं थी अपनी बुद्धि से मतलब भर का अर्थ निकाल लेती थी ।
भूगोल पढ़ा था तो पाया था महाद्वीपों के पूर्वी भाग उपजाऊ ,हरे-भरे और वर्षा वाले होते है । पश्चिम की ओर वर्षा कम ,हरीतिमा भी कम ओर रेगिस्तानों की उपस्थिति विशेष होती है । पृथ्वी के घूर्णन की दिशा, हवाओं के संचरण तथा ऋतुओं के आवर्तन की योजना ऐसी स्थितियों का निर्माण कर देते हैं कि सागरों से उठे वर्षा के मेघ पूर्व से चल कर नमी बाँटते-बाँटते पश्चिम तक पहुँचते - पहुँचते , जल से रिक्त होते जाते है ।लगता है प्रकृति की यह बाँट अन्य रूपों में भी है। भाषा को ही लें- पूर्व और पश्चिम की भाषाओं में यह भेद स्पष्ट देखने को मिलता है । कहाँ कठोर स्वरों को भी कोमल करती ध्वनियाँ और कहाँ मधुर स्वरों को भी झिंझोड़ कर खड़खडा देनेवाली बोलियाँ ! विद्यापति ,आदि की भाषा में बड़ी सरसता और कोमलता है उधर पश्चिम में दिल्ली हरियाणे की बोली एकदम खड़ी जैसे कोई लट्ठ लिये पीछे दौड़ा आ रहा हो !बहुत दिन रही हूँ मुज़फ़्फ़नगर में और वहाँ की बोली झेलती रही हूँ ।हाँ महाराष्ट्र ,गुजरात वगैरा भी पश्चिम में हैं पर उधर अपार सागर लहरें लेता है, हवायें सोंधे-सलोनेपन से भरी होती हैं ।हवाओं की रुक्षता हरियाणा-राजस्थान तक बढती जाती है ।और भाषा जीवन के साथ-साथ चलती है ।
मालवी का एक शब्द है 'छो रेता ' इस जोड़ का कोई शब्द मुझे अभी तक नहीं मिला ।'एक विशेष प्रवाह में बोला जाता है ।दूसरे लोग न वैसे बोल पाते हैं न समझ पाते हैं । 'छो रेता' अर्थात् जो है जैसा है उससे मैं पूरी तरह संतुष्ट हूँ ,किसी बदलाव की इच्छा नहीं ।
हाँ , तो बात बनसिमिया की थी - वन की सेम ।उसे इधर ग्वार की फली और दरहरी की छियाँ भी कहते है । बहू के घर में पीछे कुछ कच्ची -पक्की कुठरियाँ बनी थीं जिनमें महराजिन माली आदि रहते थे ।वे लोग चूल्हे जला कर लकड़ी या कंडे की आँच पर खाना बनाते थे ,मिट्टी के घड़ों में पानी भरा होता था ।ये वहीं पहुँच जाती थी और उनके घरों में घुस कर खा आती थी ।चूल्हे के खाने का स्वाद ही निराला होता है ,ऊपर से वे कभी मिस्सी रोटी , लिट्टी कभी भुने आलू,शकरकंद,मूंगफली और जाने क्या क्या ! जिनमे चूल्हे की भूभल में दब कर भुनने के कारण अनोखा सोंधापन आ जाता था ।वे लोग भी प्रेमपूर्वक खिलाते थे -कन्या आई है ,अपने घर का पकवान छोड़ कर हमारा रूखा-सूखा खाने ।।वहीं इसने उनकी बोली भी सीख ली तभी तो ग्वार की फली और दरहरी की छियाँ जैसे रूखे शब्द न बोल कर बनसिमिया कह रही है ।
इस के साथ मेरे मन में बनफूल ,बनमाला ,बनतुलसी ,बनलता जैसे मीटे-मीठे शब्द झंकृत होने लगे ।कैसे रूखे शब्द -ग्वार ,दरहरी ।लोक-भाषा के शब्दों का माधुर्य निराला होता है । कर्कश और अप्रिय शब्दों को भी कोमल और ग्राह्य बना देता है। हिन्दी के थिसारस में एक शब्द देखा 'रामजना 'अर्थ दिया था जारज ,वर्ण संकर और राम जनी माने वेश्या' ।लोक मानस कितना उदार और विदग्धता संपन्न है ।राम के जने तो लव-कुश थे पर उनके जन्मदाता का नाम किसी को नहीं मालूम था । वे सीता के पुत्र कहलाते रहे जब तक राम ने उन्हें स्वीकार नहीं किया ।जिनके पिता अज्ञात रहें वे जारज ही मानते हैं लोग !ऐसे सब पुत्रों को राम के नाम कर दिया । बड़ी सटीक और तीखी व्यंजना से संपन्न है लोक मन ,साथ ही बड़ा विनोदी । इशारे -इशारे में मर्म पर चोट कर जाता है ।बात कही किसके लिये और कहाँ पहुँच रही है ।राम के कोई पुत्री नहीं थी इसीलिये 'रामजनी ' जारज पुत्री के लिये प्रयुक्त न कर वेश्या के नाम कर दिया (हिन्दी थिसारस)।
शादी के बाद मालवी के कुछ शब्द मेरी जिह्वा पर चढे थे ।मैं चबूतरे को ओटला ,खपरैल को कवेलू और चोकर को चापड़ कहती थी ।यहाँ कामवाली को 'बाई' कह दो तो गुनाह हो जाता है और वहाँ बड़ी से बड़ी महिला 'बाई' लगा कर सम्मानित होती है ।

कई ठेठ पुरबिया शब्द मैंने उसके मुँह से सुने हैं -वह कहती है -घी टिघल गया है । प्रशान्त ' घी टिघला ' दुहराता है 'मम्मी,प्रणति का घी पिघलता नहीं टिघलता है ' उसी ने मुझे बताया था । इस पर मुझे भी हँसी आती है मैं मुँह दूसरी और घुमा लेती हूँ ।
वह चाबी को चाभी कहती है ।
क्या फ़र्क पड़ता है ।पूरव में व को भ बोला जाता है ।वहाँ लोग गा-गा कर बोलने हैं -ऐसा मुझे लगता है 'आइय़ेगाआआ.., ।बिहार में यूनिभर्सिटी ,भोट भैलून का चलन है ।वे विमला को भिमला बना देते हैं ।इनलोगों ने व को ब के स्थान पर भ बना दिया है जैसे दक्षिण की कुछ भाषाओं में सीता को सीथा बोलते हैं ।ऐसे ही ग का घ और ज का झ हो जाता है ।जब कि बंगाली जन भ को व और व को ब बोलते है अमिताव ,सौरव और बिमल बासु आदि ।हरियाणवी की बात मत पूछिये ,लगता है वीरतापूर्ण ध्वनियाँ निकाले बिना बोलने का उद्देश्य पूरा नहीं होता।जैसे कोई हड़काता हुआ पीछे दौड़ा चला आ रहा है ।वे बोलेंगे -ठ्ठाले (उठा ले ),बणन लग रे (बनने जा रहे है )।रुक्का देण लग री -रुक्का माने कोई लिखा हुआ काग़ज़ नहीं उलाहना या शिकायत होता है ।
बंबइया बोली का एक मज़ेदार किस्सा है ।अमेरिका में अलग-अलग प्रान्तों के लोग आपस में आपस मे मिलते रहते हैं ।प्रशान्त के एक बंबईवासी मित्र के माता-पिता आये थे ।उन्हें हिन्दी आती है ऐसा मुझे बताया गया ।कई लोग थे याद नहीं सीधे उनसे कैसे-क्या बात हुई ।
चलते समय मैंने उनसे कहा ,'कभी आप हमारे घर आइयेगा ।'
इन्होंने मुझे कोई उत्तर नहीं दिया अपने बेटे से पूछा,'काय म्हणते ?'
उन लोगों में कुछ बात हुई और प्रशान्त के मित्र ने स्पष्ट किया ।
मैने पूछा 'इन्हें तो हिन्दी आती है ?
प्रशान्त ने हँसते हुये बताया 'बंबइया हिन्दी आती है ।आप को कहना चाहिये था - तुम हमारे घर पे आना - तो वे समझ जातीं।
बंबइया हिन्दी भी अलग चीज़ है !
राजस्थानी में रजवाड़ों का ज़ोर रहा था कभी ,उसी समय की शब्दावली है। जिसमें मिलते समय सम्मानपूर्वक कहते हैं -'घणी खम्मा ' मुझे लगता है खम्मा ,क्षमा का बिगड़ा रूप है यहाँ कृपा के अर्थ में ,और घनी माने बहुत अर्थात् आपकी बहुत कृपा ।
मराठी में कभी महिलाओं को 'अग बई' कहते सुनिये आश्चर्य और विस्मय मुद्रा पर अंकित हो जाता है ।
गुजराती में किसी के घर से चलते समय कहा जाता है 'आवजो ' -फिर आइयेगा ।
इन शब्दों को कोई अललटप्पू नहीं बोल सकता ।एक खास भंगिमा जुड़ी होती है इनके उच्चारण के साथ ।
हाँ ,चर्चा तो बनसिमिया की थी । याद आया, शाहजहाँपुर-बरेली के क्षेत्र में इसे वावा की फलियाँ भी कहते है ।मैंने पूछा था -वावा ये कैसा नाम !उत्तर मिला -बिल्कुल सही नाम है ,जो खाये वह वाह वाह करे ;और जिसने न खाईं हों वह भी कहे -वाह इन्हें भी खाते है !मुलायम (राजनीति वाले नेता जी मत समझियेगा ) ,ताजी बनसिमिया की सब्ज़ी बहुत स्वादिष्ट होती है सादी छौंक लो ,मसाले की या बेसनवाली ।वैसे कुछ लोग इसके कोफ़्ते भी बनाते हैं ।मैंने खाये नहीं हैं पर अच्छे ही होते होंगे !पूरब की सारी बोलियाँ ,मैथिली ,भोजपुरी ,बँगला ,उड़िया असमिया लगता है जैसे कोई गाना गा रहा हो ।और दिल्ली ,हरियाणा. पंजाब की बोलियाँ उनसे एकदम अलग ।क्या अंतर है बताना ज़रूरी नहीं समझदार के लिये इशारा काफ़ी है ।
***

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लेखनी जादू कर देती है .... रोचक वर्णन ... बन -सिमिया हमेशा याद आएगी

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  2. भोत बढ़िया ! बड़ा नीमन ! चोखो ! खूब भालो ! झक्कास !
    भाषा की तुलना में बोली हमेशा दिल के करीब होती है, और उस क्षेत्र की और लोगो की पहचान होती है . इसी तरह मुझे भी एक किस्सा याद आया , जो मेरी नानी के साथ हुआ था . नाना की पुलिस में नौकरी लगने के बाद नानी भी बक्सर , बिहार से सागर , मध्य प्रदेश आई . (भोजपुरी से बुन्देलखंडी क्षेत्र में ) उन्हें बुन्देलखंडी नही आती थी , एक बार वे पड़ोसन से बोली मुझे पापड़ बनाना है . तो पड़ोसन ने कहा - तुम कल सुबह दाल बाँट लेना (बुन्देलखंडी में पीसने को बाँटना कहते है ) फिर मैं आके पापड़ बनवा दूंगी . अब मेरी नानी बड़ी परेशान कि पापड़ बनाने के लिए दाल बांटनी है ! फिर सोचा शायद यह ऐसा ही होता होगा . जब दुसरे दिन दाल बांटने पड़ोसन के यहाँ गयी , तो पड़ोसन भी हैरान ! जब असली बात पता चली , तो दोनों लोट- पोत हो गयी .
    इसी तरह तेलगु में इधर आओ को" रेंडी " कहते है , और हिंदी में इसी से मिलता-जुलता शब्द "रंडी " है , जिसके कारन नये नये आन्ध्र प्रदेश पहुचे हिंदी भाषियो के लिए मुसीबत हो जाती है , अब मुसीबत क्या - समझदार को इशारा काफी है !

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