बुधवार, 10 सितंबर 2014

कथांश - 18. & 19.

18.
विवाह जैसे पारिवारिक समारोहों में सम्मिलित होने का अवसर ,वसु को पहली बार मिल रहा था.आगत संबंधियों की समवयस्का लड़कियों में घुलने -मिलने का रोमांच उसके लिए सुखद अनुभव था . 
आगत जनों में सहज उत्सुकता थी  -इनसे हमारी  क्या रिश्तेदारी है ?
राय साब ने स्पष्ट कर दिया , 'मेरी बड़ी बहिन हैं. दीदी के साथ में , और बाद में  तो पूरा ,सब इन्हीं ने सँभाला है .'
उनके घर की महिलाओं  के बीच और बरात के समय भी  ,माँ ने वसु को पूरी निगरानी में रखा.

उसे आँखों तले रखने की कोशिश करती थीं .उन्हें लगता था  महिलाओं में कोई  उससे फ़ालतू बातें न पूछने लगे -बाप के बिना बेटी कितनी निरीह हो जाती है माँ जानतीं थीं .
पिता के आकाश और प्रकाश तले  बेटी सहजमना विकसती है , उसकी छाया में निश्चिन्त साँस लेती है .
वसु को वह सुरक्षा कहाँ मिली ,कहीं एक कसक रही होगी उसके मन में!
मुझे याद है एक बार अकेले में , कुछ झिझकते हुए उसने  मुझसे  कहा था ,' मैंने पिता जी के कभी नहीं देखा .भइया ,एक बार उनसे मिलना चाहती हूँ .'
'कोशिश करूँगा...' मैंने कहा था .क्या पता कभी हो भी पायेगा या नहीं!
*
'कितना सुन्दर गाती है आपकी बेटी, ' एक रिश्तेदार महिला ने माँ से कहा था,' रतजगे में इसे यहीं रहने दीजिये न .'
वसु ने बड़ी आशा से उनकी ओर देखा था माँ  अनदेखा कर गईँ .
'बारह बजे तक तो मैं ही रहूँगी .फिर  एकाध घंटा ही तो और होगा ... इसके बिना वहाँ का  काम नहीं चलता . सारा घर फैला पड़ा है. कामवाली आएगी   ,नहाते-धोते  उसकी भी  चौकसी ज़रूरी ..'

मीता ने साध लिया, अपनी चाची से कहा,'कामवाली पर तो कड़ी नज़र रखनी होती है..पर हाँ अभी पांच-सात मिनट और रुक जाइए . वसु ,मेंहदी लगा ले... . '

हमारे घर जब वह तनय को और मुझे नाश्ता देने आई तो वह बोला था, 'बोला ,'आप ने गाने में हरा दिया हमें .बहुत अच्छी आवाज़ है .एक गाना रिकार्ड करलूँ आपका?'

वह बोली,'मेरा गला खराब है .'

'मुझे तो बिलकुल ठीक लग रहा है.'

'बोलना और गाना क्या एक ही बात है ?'

वह चुप हो गया .चलते समय फिर बोला था,

'अरे वसु जी ,आपको भाभी ने बुलाया है '.

बड़ी बेरुखी  से वसु बोली ,'अच्छा  ?"

मैने ताज्जुब से देखा ये ऐसे क्यों बोल रही है .

बाद में पता चला जूते-चुराई में इन लोगों की खूब लड़ाई हुई है.

कल रात कह भी रही थी,'ये लोग बरात में क्या आए आए अपने को लाट साब  समझने लगे ..'
अपने साथियों के साथ तनय इधर की लड़कियों को ,खूब हँस-हँस कर चिढ़ाता -खिजाता रहा था.

घर वालों ने अपनी लड़कियों को ही हिदायतें दीं उन लड़कों से कुछ नहीं कहा ,इसलिए और  खिन्न थी वह.

ऊँह, शादी-ब्याह में तो ये सब चलता ही है .
*
19.
शादी की तारीख रमन बाबू ने बड़ी सोच कर रखी थी .
 बीच में पड़नेवाली दुर्गापूजा की छुट्टियों का पूरा फ़ायदा विनय को मिला .कॉलेज बंद रहता है उन दिनों  .
मैं बड़ी उलझन में पड़ा  था उन दिनों .शादी के दिन वहाँ रहना नहीं चाहता.भेंट देने का सामान भी खरीदना था .,सोच लिया था, यहीं से  ले कर जाऊँगा .
पूजा की छुट्टियों के पहले वेतन मिलना था - मेरी पहली आय !
समय पर पहुँचाना भी जरूरी - माँ को सामान न मिला तो क्या भेंट देंगी उसे?
महिलाओं के लिए खरीदारी कभी की नहीं ,करना तो दूर साथ में गया भी नहीं था - वह भी जेवर और साड़ी की .दूकानदार  बडे ताड़ू होते हैं . अकेला पा कहीं उल्लू न बना दे .
कुछ  ट्रेनियों से अच्छी पहचान हो गई थी ,उन्हीं में एक शेखर ,जिसके ससुराली संबंधी   नगर में थे ,से बात कर ली .
'काहे ,चिन्ता करते हो .मेरी साली आखिर किस दिन के लिए है ,साथ ले लेंगे.'
उसने बताया हमारी शादी की तो सारी  तो सारी ज्वेलरी यहीं की रही. इस दुकान के पुराने गाहक हैं ये लोग .'
इधर बीच में रविवार था, बीच में एक छुट्टी लेकर मुझे  तीन दिन मिल रहे थे ,वेतन हाथ में आ गया था.
 भेंट खरीद कर   पहुँचानी भी थी  .
 उन लोगों के साथ  खरीदारी कर लाया. 
'पैसों की चिन्ता मत करो बाद में आ जायेंगे' - दुकानदार ने कह दिया था  .
माँ को पहले  लिख चुका था .
पहुँचना ज़रूरी था.साड़ी और चेन के बिना माँ क्या करतीं ?

शाम को पहुँचा .मेरे लिए खाना बना रखा  था.वसु घर आ गई थी ,माँ आनेवाली थीं .रात ही फेरे पड़ जायेंगे .बस ,फिर बिदा की तैयारी तैयारी .
कुछ करने को नहीं मुझे . ट्रेन के सफ़र के बाद नहाने चल दिया .
निकला तो माँ आ गईं थीं .
अटैची से निकाल कर साड़ी और चेन माँ को पकड़ा दी .
वे चेन को हाथ में लेकर वज़न का अनुमान कर रही हैं .ढाई तोले की लग रही है पेंडेन्ट भी सुन्दर  है - मोर का पंख !पर इत्ती भारी क्यों ली?'
'माँ, तुम्हारी भी कोई पोज़ीशन है. किसी से कम क्यों रहो !'
वसु साड़ी निकाल कर देखने लगी ,'अरे वाह,कित्ती सुन्दर  !'
नीले बैकग्राउंड पर रुपहले बूटे , भरा-भरा आँचल !
उसके ऊपर नील रंग खूब खिलता है.
'भइया तुम्हारी पसंद कितनी अच्छी है .'
हाथ में फैलाए  वसु अपलक देखे जा रही है .
'अच्छी लगी न तुझे ,मुझे पता था ,'
 अटैची से एक और नीली साड़ी निकाली लगभग वैसी ही बस ज़रा कम भारी - वसु के लिए भी ले ली थी.
 उसे पकड़ा दी  ,'ले वसूटी !'
दोनों हाथों से साड़ी चिपकाए मुझसे  आ लिपटी,' भैया तुम कितने अच्छे हो !'
'तू उससे गोरी है, और अच्छी लगेगी तुझ पर .'
मुख पर मंद स्मित लिये  माँ परम संतुष्ट भाव से देखती रहीं .
'कुछ अपने लिए भी लिया या सब इन्हीं लोगों पर लुटा आया ?'
'अभी पूरी ज़िन्दगी पड़ी है माँ ,हर महीने पैसा मिलेगा .'
'खूब तरक्की कर बेटा ,बस  मंदिर में प्रसाद चढ़ाना है !'
 'माँ ,मुझे एक बात लग रही है तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर पाया ..'
'कैसी बात कर रहा है मुन्ना,' फ़ौरन टोक दिया उन्होंने .'ये सब मेरे लिए ही तो है. बस यही चाहिये मुझे ,तुम लोग खुश रहो भरे-पुरे- मेरा सबसे बड़ा सुख यही ...'
जानता हूँ अपने लिए कभी कुछ नहीं चाहा उन्होंने . .
'पर्स निकाल कर उनके हाथ में पकड़ा दिया था,'जित्ते चाहिये हों, मां' .
'बस एक-सौ-एक प्रसाद के ..'
निकाल लिए गिन कर और पर्स वापस कर दिया.
'किसी से कह मत देना कि मेैं घर पर हूँ  '
उपहार पैक किया वसु ने, फिर चले गए वे लोग - उसके विवाह के साक्षी बनने.
मैं घर पर हूँ अकेला -
रात ही तो निकालनी है ,बीत जायेगी यह भी  !

*
माँ ने बताया था -इनके रिवाज है पहली बिदा जनवासे में हो जाती है .वहाँ ससुर, जेठ ,ननदोई ,आदि भेटें देकर कुछ खिला -पिला कर वापस भेज देंगे. तब ससुराल के जोड़े में,जमाई को टीका कर ,उसी के साथ कल ससुराल के लिए बिदा होगी .दो प्रस्थान ,एकदम एक आँगन  से न हों, सो शादी के बाद जनवासे के लिए  पहली बिदा हमारे आँगन  से होगी .
नहा कर तौलिया डालने छत पर गया था .
इतने में नीचे से आवाज़ आई ,'माँ  दीदी आई हैं.'
साथ आई लड़कियाँ देहरी के बाहर ही रुकी रहीं. 

वह अंदर आ रही थी .
माँ कह रहीं थीं ,'अरे ,तैयार हो तुम तो ?

'बाबूजी ने कहा सगुन पूरे होना चाहियें ,कोंछा डलवा आओ! माँ, रुकना नहीं है.'
बाहर से एक लड़की बोली ,'विनय भैया ले जाने के लिए  के लिए वहाँ दरवाजे पर इंतज़ार कर रहे हैं ,भाभी जल्दी करना .'
उसने चुपचाप सुन लिया .

माँ कह रहीँ थी, 'हाँ , हाँ वो तो करना ही है .मैं लाती हूँ .'
वे  सामान लेने अंदर गईं

मैं नीचे उतरते उतरते बीच में रुक गया था .

वह उधर चली आई.

'मुझे पता था आओगे .मुझसे बड़े हो प्रणाम कर लूँ  तुम्हें.'

मैं बड़ा हूँ ? हाँ.
 उसने एक बार माँ से पूछा था,' ब्रजेश मुझसे बड़े हैं न ?'

माँ ने माना था,' हाँ ,उन पुराने चक्करों में इसका साल बेकार चला गया था .पढ़ाई में पिछड़ गया !'
वह सामने खड़ी कह रही थी,
'देखो ,तुम्हारी पहली आय में से अपना हिस्सा वसूल लिया न मैंने ?'

 ध्यान से   देखा - वही रुपहले बूटोंवाली नीली साड़ी - सिर ढके नीले पल्ले  का बॉर्डर चेहरे पर दमक रहा था ,भाल बिन्दी माँग सिन्दूर, पेंडेन्ट का मोरपंख ऊपर ही  झलमला गया - जैसे कोई अप्सरा ! 
अपलक देखता रह गया था.

मेंहँदी रचे हाथ जोड़े वह झुकी. अध-बिच ही मैंने  दोनों हाथ बढ़ा कर सिर  साध, जड़ाऊ टीके से सजा उसका भाल चूम लिया ,'जाओ पारमिता ,सुखी रहो!'

अपने को  सँभाल नहीं पा रहा था दृष्टि धुँधला गई . कहीं देख न ले , सिर घुमा कर सीढ़ियाँ चढ़ने लगा .
वह देहरी की ओर चली गई.
 उसे छूट थी सब के सामने खुल कर रोने की , मिल-भेंट कर कर आँसू बहाने की.

माँ सूप लिए चली आ रहीं थीं पहले ही तैयार कर रखा था.

 'अरे वसू , वो  बड़ा रूमाल ले आ ,वहीं रखा है ,इसका आँचल खराब हो जाएगा .'
वे लोग घर की देहरी के समीप खड़े हैं .इस मुँड़ेर की झिंझरी से दिखाई दे रहा है .

'बेटा ,पति के घर जा रही हो मन  में कोई पूर्वाग्रह ले कर मत जाना ,गृहस्थ-जीवन एक कसौटी है ,मुझे विश्वास है खरी उतरोगी तुम !'

'माँ ,कृतार्थ हुई! आशीष तुम्हारे अंतर्मन से निकला है. शिरोधार्य किया मैंने .'

ज़रा रुक गई थी बीच में ,गले में कुछ आ गया था शायद .फिर बोलने लगी -

'...और उनके प्रति शंका न रखना माँ ,विनय ने ख़ुद मुझसे पूछा था ,'आप के मन में कोई बाधा-संशय हो तो मुझे बता दीजिए ,मैं इस शादी से  मना कर दूँगा .आप पर कोई आँच नहीं आएगी .'

'जान कर  कर बहुत संतोष हुआ' 
उनकी आवाज़ में वही भाव झलक रहा था

भावावेश में मीता ने झुक कर उनके पाँव छू लिए.

उसे अँकवार भरते दोनों के आँसू बह रहे  थे .

रूमाल लेकर आ गई वसु.

देहरी पर खड़ा कर माँ  कोंछा डालने  बढ़ीं .सूप में चावल और चने की दाल वाली द्यूलारी,उसमें कुछ लड्डू,और दस-दस के कुछ नोट  .देहरी पर खड़ी मीता ने आँचल पसार कर ग्रहण किया.
माँ ने रूमाल  ऊपर  फैलाया दिया  . सात बार सूप से उसका आँचल भरा, मुट्ठी भर बचा लिया .
 सजल नयन हो बोलीं ,'बेटा,  ये अंजलि  में भर ले , जब चलने लगना बिना इधर घूमे ,मुँह फेरे हुए ही पीछे उछाल देना . और ये पानी -दो घूँट पीकर भरा गिलास वहीं रख देना - मायके में तेरा अन्न-जल बना रहेगा .... फिर आना बेटा !'

रोती हुई वसु को खींच कर पारमिता ने अपने से लगा लिया .नीचे वे तीनों रो रहीं थीं

'दीदी को ले जा बेटा ., वहाँ सब इन्तज़ार कर रहे होंगे .कह देना मैं अभी आ रही हूँ ..'
 पानी का गिलास वसु ने लेकर ताक पर रख दिया .पलट कर देखने की  मनाही थी वह आँसू बहाती चली गई. 
वसु साथ है .साथ की लड़कियों ने अपने बीच ले लिया. 

 माँ सूप लेकर अंदर .
मैं छत पर खड़ा ,ज़मीन पर उसके बिखेरे द्यूलारी के दाने अपलक देखे जा रहा हूँ !
(क्रमशः)
*

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

A LAST WISH .


by
Kishore Asthana
* 
Is there more that I can want than that the flag of my country be draped on my coffin? Yes there is. Is it too much to with that the flag be a proud one, unsullied by the pettiness of the politicians and held up by even a lone statesman?
Statesman, yes, father-figure, no. We do not want father figures - or mother figures - in India. We have too many of them and all of them, perhaps the right men or women at the right time, are the wrong men for now. They stand still as the world passes them by and instead of leading it, they try to hold it back, to keep alive the illusion that they are the right men for ever.
These father & mother figures demand attention, they compel the present to keep looking at the past and they divert those who should be looking at the future and shaping it. Those who should be building for tomorrow are busy planning mausoleum and memorabilia.
We need young people of today to become leaders in their own right not shadows of old people of yesterday. We need to face the rising sun so that the learning of the past is in our being but the facts in our shadow. We need young people to think for themselves, of others. And be mature enough not to feel lost because there is no one to look up to or even because no one looks up to them. From a country of nearly a billion people, it is too much to expect one such? Six? A dozen?
But where are they? Are they waiting for the challenge, the call to arms? Do such people wait for anything? Does the world wait for them?
Unfortunately, we do have some young people posing as leaders but these young people are a mirror image of father figures. They are son figures. We do not want father figures and we do not want ‘son-figures’. Just because their father or grandfather was a leader does not mean they should be viewed in the same light. It is not logical to hire the son or grandson of doctor to cure us just because of his relationship with a doctor. The logic holds for leaders, too.
Perhaps my country has yet to produce a person of today, a person of promise who comes ahead on his own and lives up to this promise. And the time is now for we cannot wait any more. 

In the current context, we have to ask – “Is Mr. Modi such a leader?” Yes, he has come ahead on his own. Now we have to see if he lives up to his promise. If he does not do so, it would be another false dawn. However, if he does live up to his promise, India would have found the kind of leader we need.
And when I die, there is nothing more I ask than that such a person drapes me in my flag, while others rejoice that I had lived with them.
 *

बुधवार, 3 सितंबर 2014

कथांश - 16 & 17.

*  16.

उस दिन उसे छो़ड़ने गया था ! 
पहुँचाने गया होता तो आगे की संभावना रहती.उस दिन छोड़ कर चला आया .
 लौटने से पहले रुका था  कहा था ,' बॉय,चलता हूँ ,पारमिता !'
पारमिता?
निशाना वही बनी थी .हाँ, गोली दाग़ते समय चलानेवाले को भी गहरा झटका लगता है .
मेरी और देखा उसने ,चेहरे की थकान पर कुछ  गहरा-सा पुत गया था, मुझसे देखा नहीं जा रहा था.
वह समझ गई - अबसे वह पारमिता है .
 दोनों होंठ कुछ कस गए ,जैसा अक्सर सोचते समय  देखता था
मुँह से अस्पष्ट  बोल निकले थे  बाद के शब्द सुन पाया, '...  अच्छा ब्रजेश !
फिर उसने हाथ हिलाया था.
क्षण भऱ को दृष्टि मिली  और  हम पलट गए  दो दिशाओँ में .
हाँ, मैं भी अब बिरजू नहीं ब्रजेश हूँ , दोनों को आगे यों ही रहना है.
उसे छोड़ कर मैं  लौट आया था .
 कल के लिए तैयारी भी करनी थी .
*
कपड़े तैयार रखे थे ,सारा सामान एक जगह इकट्ठा.
 वसु ने कहा ,'भइया तुम्हारे कपड़े धुले प्रेस किए तैयार हैं '.
'तूने किये वसु ?'
'मैं करने जा रही थी माँ ने पहले ही कर दिये,यहाँ लाकर मैंने रख दिये .'
वसु को कपड़े खरिदवा दिए थे ,शादी में उसे मीता की बहिन बन कर रहना होगा ,
उसने पूछा था ,'भइया, तुम आओगे?'
माँ ने एकदम टोक दिया ,'वह कैसे आ पायेगा .अभी तो ट्रेनिंग शुरू हो रही है .'
उनने मेरी ओर नहीं देखा .
तुम कितनी अच्छी हो, माँ !
*
हम लोगों ने साथ बैठ कर खाना खाया .मन अब भी भटक रहा था.हाथ और मुँह बार-बार रुक जाते थे ,
'कल जाना है, आज हलका रहूँ तो ही ठीक , कह कर हाथ खींच लिये '.
'अच्छा बेटा, इतनी-सी खीर खा ले .वसु ने तेरे लिए ही बनाई है ,
'ला, बहन दे '
'और ये मठरी हैं थोड़ी-सी ,साथ रख लेना .'
'मठरी ?'
'हाँ भइया ,मीता दीदी दे गईँ थीं तुम्हारे ले जाने को - अलग से ..'
 उसे पता है मुझे मठरियाँ बहुत अच्छी लगती हैं .
उफ़, ..अब बस करो ,नहीं सहन होता यह सब !
ठीक है, कल चला ही जाऊँगा !.
*
रात को वसु बताती रही थी ,उनके घर दीदी के ससुर आए हैं  ,विनय का भाई है न तनय उसे  लेकर .'
'अच्छा!'
  जोड़े बनवाने के लिए दीदी की नाप चाहिये न ..और जेवर के लिए भी पूछना है .
माँ ने बताया  कह रहे थे ,'दुल्हन की बहिन के लिए भी एक जोड़ा बनेगा. .'
'वाह,वसु तेरी तो मौज आ गई .'
'हाँ भइया, वो तो कह रहे थे तिलक लेकर जब भाई लोग जायें तो मेरी बेटी को भी लाना ,अपनी दीदी का घर देख आए .मुझे हमेशा अपनी बेटी कहते हैं ..'
'अरे वो तो वो ,ये राय साब भी मीता के लिए गहने-कपड़े कर रहे हैं ,साथ में वसु के लिए भी.. गहने नहीं कपड़े.मैंने मना किया तो कहने लगे मेरी भांजी है तुम मत बोलो .'
'वाह ,उन्हें यह सब करने की क्या ज़रूरत.मुझे नहीं पसंद मेरी बहिन के लिए कोई और करे .'
'पर कह तो नहीं सकती, न !.
'पर अब मुझे भी मीता के लिए कुछ ढंग का करना पड़ेगा .' माँ कुछ परेशान लगीं .
'क्या करना चाहती हो ?'
'मेरी एक चेन फ़ालतू रक्खी है. वही पॉलिश करवा के और साड़ी तो नई ही  खरीदनी पड़ेगी ...'
'नहीं,नहीं ,तुम अपनी मत देना ,मैं वहाँ से पैसे भेजूँगा .अगले महीने से पे मिलने लगेगी माँ ., .'
'अभी से अपना खर्चा मत बढ़ा ,मैं कौन ज़ेवर पहनती हूँ . '
'नहीं सुनोगी तो मैं  वहीं से खरीद कर ले आऊँगा .'
वसु बोली ,'वहाँ तो खूब डिज़ाइन मिलते होएंगे  यहाँ तो के तो ..बस .'
'तुझे कैसे पता ?'
'दीदी की खरीद में मैं ही तो साथ जाती हूँ .'
'पर शादी से पहले तू  आएगा कब?.
'लगा लूँगा एक चक्कर .'
*
 17.
तनय का नाम कई बार सुना था .रमन बाबू का छोटा बेटा ,पारमिता का देवर .
कोई उत्सुकता नहीं थी कि उससे मिलूँ  .
पर शादी के अगले दिन सुबह-सुबह हमारे घर हाज़िर हो गया  -
'मैंने सोचा बुआजी के घर जाकर फ़्रेश हो लूँ .वहाँ तो अपना नंबर  आने का नहीं.'
'हाँ ,हाँ आओ, बेटा.'
'अरे भैया भी आये हैं .' पाँव छूने आगे बढ़ा .
मैं पीछे हटा,माँ ने रोक दिया ,'रुको बिटिया के देवर हो .पाँव मत छूना .'
 वो तो नहा धोकर वहीं बैठ गया  .माँ चाय-नाश्ता कराने लगीं .. बातें खूब करता है !
मुझसे पूछा ,'भइया, कल आप दिखाई नहीं दिये ?'
मैं टाल गया  ,'सब बिज़ी. मुझे कौन देखता वहाँ ?"
विनय से दो साल छोटा है. प्रतियोगिताओं में बैठ रहा है , ज्यादा पूछने में मेरी कोई रुचि नहीं थी. .
वही अपने आप बताता रहा .
कोचिंग भी लेता है .
कई बार वे लोग इसे भी कुछ कक्षाओँ को कोच करने भेज देते हैं.
अपने  किस्से  बताने लगा-
एक बार क्या हुआ पास के कस्बे में इनका एक क्लास चलता है तीन-चार महीने का.
वहीं के हाईस्कूल-इन्टर के लड़के  आते हैं बहत कम सीरियस ,ज्यादातर यों ही से .
 एक क्लास में शिक्षक नहीं आया था ,सो तनय को भेज दिया  -उधर सामनेवाले कमरे में दूसरी कोई क्लास चल रही थी - जनरल नॉलेज जैसा कुछ लगा  .
,बीच में दरवाजा नहीं था .
थोड़ी देर सब शान्ति से चलता रहा .फिर कुछ गुल-गपाड़ा .
हम भी बाहर निकल के खड़े हो गये .
यहीं आस-पास के कुछ फ़ालतू के लड़के घुस आए थे. तीन थे या चार होंगे .कोचिंग में दबते कहां हैं ये लोग !
क्लास के भी  कुछ  लड़के बाहर निकल आए .

वो लड़के  बड़ी डींग हाँक रहे थे ,हमने ये कर दिया- वो कर दिया .सरकार  हम बनावत हैं . हमसे पूछो का हुइ रहा है.'
कुछ खुराफ़ात करके आये थे, उसी की गर्मी चढ़ी थी.
पहचान के लड़कों को अपनी कारस्तानियाँ सुनाने लगे
 'तुम्हारे ई सब पढ़े से कुछू नायँ होयगा .असली काम तो हम किये हैं .'
क्लास के बाहर खड़े होकर चिल्लाए थे ,'का पढ़ रहे हो ?'
 लड़कों ने जवाब दिया ,'सामान्य ज्ञान '.
'ई जो पढ़ रहे हो सब बेकार है सब गलत-सलत .रद्दी किताबन महियाँ  धरा रह जायेगा.'

'कुछू करन-धरन के  गियान  से तो ई किताबन वारे माश्टर ,सब कोरे  हैं .'
क्लास से एक ने पूछा ,'काहे ?'

'जिन लोगन के नाम गिनाय रहे हैं ,ऊ कोई रहबैया नाहीं. ई सिच्छा-मंत्री ,ऊ स्वास्थ मंत्री, ई फलान- ढिकान सब फालतू की   रटन्ट . .'
'तुम्हें कैसे पता?'.
'अरे, असली करैवारे तो हम हैं ,जो हम करें ,आगे वोई तो ये पढ़ायेंगे.'
'तुमने क्या किया ?'
'सारे  वोट हम लोगन ने  अपने हिसाब से करवाये हैं ,'
सीना  ठोंककर बोला,' हम जानित हैं. ,इनका का मालूम ?'
दूसरा चिल्लाया,'कमरा में किताबें घोटन से कुछू नाहीं होत है .बाद में सब लिखो तो उहै जात है जो हमार  करनी से सामने आवत   है.'
फिर मास्टर  से बोला, 'ई का गियान बाँट रहे हैं ,माट्साब? कान खोल के सुन लेव. तुम लोग  ई सब अट्ट-सट्ट पढ़ाय रहे हैं .खुदै को नहीं मालूम कि का हुइ रहा है.'
उजड्ड लड़कों के सामने मास्टर बिचारा क्या करे  कहा -
'अरे, जो किताब में लिखा है वही तो पढ़ावेंगे.'
 'जराय देउ ई बेकार  किताबन का . अब  तो सब बदलै का परी .लिखि कै धल्लेउ.'
लड़के बात कर रहे हैं,' हाँ ,चुनाव में नये लोग आयेंगे .' 'ये सब गलत हो जाएगा .ये लोग डंडे के ज़ोर पे  वोट डलवाते हैं .'.'सब जगह इनका दखल है.'
'अइसा काहे पढ़ो  जो कल्ल ही बदल जाय?'
'चलो रे छोरों ,.बेफालतू मूड़ी खपावत हो .'
लड़के संशयपूर्वक इधऱ-उधर देख रहे हैं.
'अरे ,ई सब पढ़ा-लिखा बेकार .कुछू काम न आई.एक नौकरी तक ना मिली.'
'ई तो हम करैवाले हैं .जौन  चाहै ,उहै करवाय लेंगे .'.
 'जान्यो , हम सब इन्तजाम पहिले ही कर लिहिन .तुम पढ़-लिख के का कर लेओगे ?'
'अपना  कैन्डीडेट ही जिताय के मानेंगे,चाहे खून-खराबा हुइ जाय'
'क्या ?..क्या कर रहे हो तुम लोग ?.चुनाव में भी गड़बड़  ?'मास्टर ने पूछा
वह दोनों हाथ हिलाकर हँसा -' काहे बतायें ?और तुमहू मास्टर चुप्पे रहो .काहे से कि हमसे पंगा लेन का नतीजा ...'...कहता-कहता लड़कों को आने का इशारा करता घूम कर चल दिया .
कुछ लड़के बात-चीत के दौरान ही उठ खड़े हुए थे चलने की मुद्रा में .उनके साथ और भी मास्टर का उतरा चेहरा  देखते उठने लगे, सब   बाहर भागे. निकल गये क्लास से  .'

मास्टर  कुछ देर हकबकाए-से खड़े देखते रहे फिर परेशान से अपना झोला उठा कर स्कूल की बाउंड्री से बाहर निकल गए .
 झुँझलाते जा रहे थे ,'इन जाहिलन  को सिच्छा देना हमारे बस की बात नहीं .  सुसरी और हवा बिगाड़ के धर दी .पालिटिक्स बदमास-गुंडन की खेती हुइ .गई .--हे राम कौन ठिकाना लगेगा ई देस का ..!....'  

खूब हँस-हँस कर वर्णन करता रहा वह !
ये तो बड़ा मज़ेदार लड़का है, मैंने सोचा - ख़ुश-मिजाज़ और तेज भी .

*
(क्रमशः)

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

कथांश - 15.

*
  'माँ, आज जरा दोस्त के साथ व्यस्त हूँ.'
 स्कूटर ले कर  निकल पड़ा था ,अगले दिन .
कैंटीन से बाहर ही मिल गई वह, आ कर बैठ गई .
शहर के बाहर का रास्ता पकड़ा.
''इधर तो नदी है न ?' उसने पूछा .
'हाँ ,चल रहे है वहीं डूबने !'
'पागल हो गए हो ?'
'घबराओ मत ,तुम्हें कुछ नहीं होगा जब तक मेरे साथ हो .'

नदी किनारे  आ गए ,
स्कूटर खड़ा कर दिया एक ओर सीढ़याँ उतरने लगा,वह भी साथ में
 पानी में पैर डाल कर बैठ गए पास-पास .
पानी बहा जा रहा है ,लहरों की हलचल  और आते-जाते हवा के झोंके  .
'तुम्हें अनुभव करना चाहता हूँ, बस ' -हाथ बढ़ा कर थाम लिया हाथ .बैठी रही चुपचाप .फिर कंधे से सिर टिका दिया उसने .  केशों की लटें उड़-उड़ कर मेरी ठोड़ी को ,गालों को सहला जाती  हैं .
'मीता''
रहा नहीं गया. अचानक आगे बढ़ कर मीता को समेट लिया . सीने से आ लगी है .मुख दिख नहीं रहा सघन केशराशि की मदिर गंध नासिका में समाई है . आँखें मुँद गईँ क्षण को.सीढ़ी से  गिर न पड़े कहीं, अपने से लगा लिया. कब से बहुत समीप अनुभव  करना चाहता था ,आज इतनी पास है .
 ''तुम से बहुत उलटा-सीधा कहा है -माफ़ करोगी मुझे ?
' कुछ मत कहो !'
'मीता ,तुम्हें कितना परेशान किया है मैंने !'
'रुलाओ मत बिरजू !'
समय बीत रहा है .
मैने कहा ,'प्रेम सुख नहीं है .'
मेरे मुख की ओर देखती रही फिर बोली
'प्रेम स्वार्थ नहीं है .'
उसका मुख देखना चाहता हूँ  पर सिर झुका हुआ है उसी सघन केश-राशि की ओट .
धीरे -से गोद में उसका सिर रख लिया . केशों पर हाथ फेरता हूँ.
मुख सीने आ लगा .
 मेरी  पीठ को समेटते हुए उसने दोनों हाथों की अँगुलियाँ फँसा लीं.
हम चुप हैं.
 केशों पर सिर टिका कर आँखें मूँद ली मैने.
लहरों की आवाज़ बीच-बीच में कानों से टकराती है .बहते पानी पर पड़ती धूप  की  झिलमलाहट परावर्तित हो घाट की सीढियों पर रोशनी के जाल बुन रही है. हवा के झोंके बिखरी अलकें उड़ा रहे हैं ,बार-बार अपने कानों, पर गालों पर डोलती उनकी रेंगती-सी छुअन. समेटता हूँ .बार-बार वही गुदगुदाती-सी सरसराहट ,अँगुलियों से फिर-फिर समेटता हूँ .
लगा वह धीरे-धीरे सिसक रही है ,'मीता, रोओ मत .'
कोई उत्तर नहीं.
चुपचाप थपक रहा हूँ .
नदी की लहरें उठती-गिरती बढ़ी जा रही हैं .
एक गहरी साँस निकल जाती है .
कुछ नहीं है कहने-सुनने को .
हम दोनों चुप, परस्पर अनुभव करते हुए.

धूप खिसकती हुई इधर तक आ गई  .
उठो मीता, छाँह में चलें उधऱ .'
उसका औँधा मुख  दोनों हाथों से ऊपर करता हूँ .
दोनों हथेलियाँ आँखों पर रखे रहती है ज़रा देर. खोलती है लाल-सी लग रही हैं ..
मुझे देखती है कुछ क्षण - कैसी स्निग्ध दृष्टि !
वह उठ गई है बिखर गए  केशों को एक हाथ से झटक  दूसरे से पिन निकाल कर दाँतों में दबा लिया ,दोनों हथेलियों से बिखरापन समेट फिर लगाने में व्यस्त  ,दोनों  साइड्स में बारी-बारी से .लहराती सी किरणों की सुनहरी दमक केशों में  भर गई है  .बहुत गोरी नहीं  पर मुख पर एक दीप्ति जो सहज आकर्षित कर लेती है.  
दाँतों में दबा पिन निकाल रही है .इसका इधर का ऊपर का एक दाँत टेढ़ा है  और बहुत पैना -छुओ तो चुभता है ..हँसती है या  बोलती है तो दमक जाता है .निर्निमेष देखता रह जाता हूँ .
 उठ कर खड़ी हो गई .'चलो! '

 अनायास उसाँस !
उठ कर चल दिये दोनों.
'चलो, उधर चलें ,दूर तक छाया फैली है,' उस दिशा में हाथ फैला कर  कर दिखाया उसने  .
'पर मरघट है उधर ..'
'इससे क्या ,जीवन की नश्वरता भी एक सच है, उससे कहाँ भाग सकते हैं !'
सच में दुनिया से कितना दूर चले आए हैं हम !
आगे बढ़ कर पीपल के नीचे एक पत्थर पर बैठ गई  ,मैं भी वहीं उसके पास .
 दोनों चुप बैठे हैं -
सूरज की  तिरछी हो गई किरणें , छायाओं के साथ  गलबाँही डाले थिरक रही हैं . हवाए ताल दे रही हैं ,पीपल के पत्ते झर-झऱ झूम-झूम ताली बजा रहे हैं.डोलते तरुपातों के अंतराल से झरते धूप के सुनहरे  छल्ले  चारों ओर बिखर-बिखर कर नाच रहे हैं -गालों पर केशों पर,कान की लौ वाला नग दमक जाता है बार-बार ! 
*
मरघट सुनसान पड़ा है.
'आज हम हैं कल नहीं होंगे -फिर प्रेम क्यों इतना तपाता है ?'
कुछ बोली नहीं सोचती रही वह .
फिर शब्द निकले,' देह में नहीं आत्म में समाता है .'
'प्रेम डुबा देता है  अंधा होता है' - मैं चुप न रह सका
'थाहता भी है. '
दोनों चुप .
वही बोली, 'छाँह भी बन जाता है - प्रेम अनश्वर है .कभी समाप्त नहीं होता !'
लगा तपते रेगिस्तान में शीतल बयार बह आई .
'मैं कृतज्ञ हुआ, मीता .' 
भीतर उठता  अंधड़ कुछ शान्त हो चला . 
 उसी ने कहा - 'प्रेम विश्वास है ,एक अटूट डोर!'
फिर पूछा ,'विश्वास है न ?'
'हाँ !'
असीम शान्ति चारों ओर ! बस, नदी की कल-कल और हवा में डोलते पत्तों की झर-झर .रह-रह कर पक्षियों की चहक वातावरण को वास्तविक-सा बना देती है .
कुछ देर में उठने का उपक्रम किया उसने ,...
'बैठी रहो यों हीं. '
मैंने हाथ पकड़ कर वहीं बिठा दिया 
 चुप रही वह, हाथ सहला रही है अपना .
फिर कस कर पकड़ लिया मैंने - उफ़ !
'आजकल बड़े ताव में रहते हो न , तुम? '
ठीक कहा उसने .मन का आवेग, हाथों में उतर आता है .
 'आज मेरे साथ बैठ लो ,फिर नहीं कहूँगा .. कुछ नहीं करूँगा .बस, मेरे पास  बैठी रहो तुम !'
चपुचाप बैठी रही .
 'बहुत उल्टा-सीधा सुनाया है मैंने ,भूल जाना ,मीता .'
'बस करो ,बिरजू.  रुलाओ मत.'
'अपने पर  नियंत्रण रख नहीं पाता .क्या करूँ मीता .ऐसा ही हूँ मैं ,बहुत कमियाँ हैं न..? '
 मेरे कंधे से  सिर टिका लिया उसने  .
 'मत सुनाओ यह सब  .. ...ज़िन्दगी बिता लेने दो मुझे!'
  'मीता, अब मैं वह नहीं जो था.'
'मैं भी नहीं , बिरजू .'
फिर आगे उसने कहा,'मुझे तो यह भी नहीं मालूम कि आनेवाला  जीवन कैसा होगा .'
मेरे कहने को कुछ नहीं .
उसी के शब्द सुने ,' ज़िन्दगी बिताना है ,सोचने से क्या होगा !'

 मेरे कंठ में कुछ उमड़ा आ रहा है - गटक लिया.
लौटना पड़ेगा ही .
मैं उठा. वह समझ गई, खड़ी हो गई .
मन  बोल उठा आज के बाद ...बस!
 दोनों हाथ बढ़ा कर अपने में समेट लिया.
तन का परस अपने तन में बसा ले रहा हूँ ,केशों की गंध नासिका समा लेगी .  विकल करता उन्माद चैन पा जाएगा .
 एक हाथ से उसका मुख ऊपर किया आँखें मुँदी -सी .
 गाल,भाल, नयन,नासिका होठों से छू लिए.अधर बंद ही रहे मन में आया टेढ़े दाँत की चुभन इस समय कैसी लगती ?उसने मुँह मेरे सीने में गड़ा लिया है .दोनों हाथ पीठ पर लिपटे .कहीं गिर न पड़े -कस कर  साधे  हूँ .
मैं मौन. केवल बोध ग्रहण करता हुआ .
आज मैंने तुम्हें अनुभव कर लिया. बाहों में ले कर जान पाया कि तुम मात्र कामना या भावना नहीं हाड़ मांस की वास्तविक देह हो ,जिस के स्पन्दन बार-बार  मुझमें प्रतिध्वनित होते हैं .तन के पूर्ण परस में लीन मन शान्त हो चला है .
 देह और मन एक दूसरे के बिना अधूरे लगते थे . एक ही सिक्के के दो पहलू  -एक के बिना दूसरे का अधूरापन रिक्तता को और गहरा देता रहा. मैंने  ,देह और मन से तुम्हारा संपूर्ण परस पाया, शीतल हो गया हृदय .
आज समझ पाया शंकर ने प्रिया को अर्धांग में किस हेतु धारण किया !
        मन में गहन आश्वस्ति ! शब्द पर्याप्त नहीं है , व्यक्त कर सकूँ -यह सामर्थ्य नहीं मेरी  .

अचानक कहीं कुछ ,टकराने की  आवाज़ , वह चौंक कर हिल गई, अलग कर खड़ा कर दिया मैंने . .
एक गाय की खुजली शान्त करने के उपक्रम में स्कूटर गिरते-गिरते मेड़ से सध गया था ,गाय अब भी उससे कंधा रगड़ रही थी.  एक दूसरे को देखा - आशय समझ लिया .
 उधर ही चल दिये हम.
*
लौटते पर मैंने कहा था ,'चलो कहीं चाय पी लें .'
बड़ी श्लथ लग रही थी  बोली,' नहीं ,कुछ करने का मन नहीं, बस, अब घर जाऊँगी '.
फिर उसने पूछा था, 'शादी में आओगे?
 'नहीं आ सकूँगा .'
कुछ पल एक-दूसरे को देखा .
'ठीक है .माँ की ,वसु की चिन्ता मत करना मैं हूँ .'
'जानता था तुम हो ,तभी निश्चिंत हो पढ़ सका .'
खड़ी थी वह  - चलने को तैयार .
स्कूटर को किक लगाई . हलका झटका - वह पीछे आ बैठी है. कुछ  उड़ते से परस बार-बार पीठ सहलाते  वस्त्रों में उलझ कर हवाओं में खो जाते हैं.
कितना सारा जीवन एकदम बीत जाता है !
*

(क्रमशः)

रविवार, 17 अगस्त 2014

कथांश - 14.


*
अजीब होती हैं ये महिलाएँ भी . कितनी भी देर बैठी बतियाती रहें - चलने के लिए  के लिए  दरवाज़ा खुलते ही  भीतर से कुछ ऐसा उमड़ता है कि  कहे बिना चैन नहीं पड़ता . देहरी पहाड़ और ,मन पर गरुआ बोझ.  पाँव कैसे उठें ? सो चौखट के आर-पार से मुँह  जोड़े आलाप में डूब जाती हैं.
 वही मीता और कौन ! 
तब बड़ी जल्दी थी,जाने के लिए उठ गई .अब पन्द्रह मिनट हो गए , बाहर  दरवाज़े पर खड़ी वसु से गप्पें लड़ा रही है .
पता नहीं क्या बातें हैं जो खतम होने का नाम नहीं लेती ! कोई  किसी से कम नहीं.... सब एक सी  .
और मैं यहाँ  बेवकूफ़ों जैसा इंतज़ार कर रहा हूँ .
एक और खीझ - कल  राय साब ने फिर गज़ब किया. मेरी माँ से बहिन का रिश्ता जोड़ , इधर  पूरी पैठ बना ली !
अब तो  मन बिलकुल उचट गया है . कहाँ निकल जाऊँ, जहाँ ये सब देखना न पड़े ! रात बड़ी मुश्किल से गुज़ारी .आगे क्या करना है  , तभी सोच लिया था ,और अब यहाँ खड़ा हुआ हूँ .
मोड़  से, उझक-उझक कर झाँक लेता हूँ -उसका अता-पता नहीं.
बड़ा अजीब लग रहा है कोई देखे तो क्या सोचे ! ....क्या करूँ ? कुछ इधर-उधर करने लगता हूँ ,पर दृष्टि पर बस नहीं , बार-बार उधर  चली जाती है .
चलो ,अब बंद हुआ दरवाज़ा , वह बढ़ रही है . मैं मोड़ से आगे की ओर चल दिया .
इधर ही से तो निकलेगी
'अरे ब्रजेश, तुम यहाँ ?'
'हाँ ,ज़रा इधर जा रहा था , अच्छा हुआ मिल गईँ ,तुमसे एक बात कहनी है .
वह रुक गई 'क्या ? कहो .'
­परसों शाम मैं जा रहा हूँ ,..फिर तुम जा चुकी होगी .सब बदल जायेगा .कल मेरे साथ चल सकती हो ?
'कहाँ ?'
कहीं भी,जहाँ कोई डिस्टर्ब न करे  .
' हाँ .'
मुझे लगा कुछ सोच में है.
'डरो मत. परायी अमानत में ख़यानत नहीं करूँगा ...
'वह बात नहीं ,कल बाबूजी का चेकप है न , अभी कुछ करती हूँ जाकर..बताओ कहाँ ?'
कॉलज कैंटीन आ जाना ,दस के करीब .फिर देख लेंगे .'
'ओ.के .'
वह आगे बढ़ गई.
*
राय साब के बारे  में  सोच कर मन और खटा  जाता है . कर गए न नया तमाशा !
 क्या किया वो भी सुन लीजिये -

उनके यहाँ  तिलक की तैयारियाँ ज़ोरों पर  - कौन आयेगा ,कौन जा जाएगा   ,कब- कैसे -कहाँ  और तमाम बातें -  उनकी समस्या वो जाने !
राय साब चिंतित हैं , रहें, हमें क्या !
 पर माँ से सलाह करने चले आए  .
माँ ने कहा, 'घरवालों को बुला लीजिए ..सहारा रहेगा.'
'अरे जिज्जी,सहारा होता तो बात ही क्या थी .एक बिंदो जिज्जी थीं जिनका आसरा था सो स्वर्ग सिधार गईँ .'
माँ बिचारी क्या कहें !
पर वो बोले जा रहे ,'अब क्या बताऊँ..घर की बातें हैं ..'
और  बिना पूछे , बताए भी  जा रहे -
'... सब को लगने लगा था घर में घरनी का  होना बहुत जरूरी  है ,एक बेटा तो  चाहिये ही .मैंने दुबारा ब्याह को मना कर दिया .  
भाई लोग चाहें उनका लड़का गोद ले लूँ , छोटी बहिन के पति की नीयत का क्या कहूँ ? पहले वे लोग आते-जाते रहे -अरे, अपना मतलब रहा सबका ... पैसे का लोभ ! जब मैंने चाहा कोई आ कर बिटिया को सँभाल ले ,उनकी शर्तें लगने लगीं  .ये बिन्दो जिज्जी  विधवा थीं सो चली आईँ . निभाया भी खूब आज को होतीं तो...'
'सबूरी करो भइया, सब ठीकै-ठाक हो जाएगा ..'
'आप इतना कर रही हैं दिन-रात एक कर रही हैं . बिटिया भी आपके पास भागी रहती है -गुन-ढंग  सब आप ही ने सिखाये .जिज्जी को कहाँ ये सहूर ! मेरे लिए आप बहिन से बढ़ कर..'
'बिटिया हमें पराई कब लगी ? शुरू से अपनापा हो गया था .'
वे चुप सोचते रहे ..अचानक बोले ,'जिज्जी, कितने समय से ये कलाई सूनी है . आप इतना करती हैं तो एक धागा लपेट कर हमें भी सनाथ कर दें ..'
'अरे, पर ...' वे  अवाक् रह गईँ .
राय साब फिर बोले ,'जिज्जी कहता ही नहीं, आपकी उतनी ही इज्ज़त दिल से करता हूँ ..'
'आप परेशान न, हों हम लोग सब तरह आपके साथ हैं ...आपके सगे रिश्तेदार भी आते होंगे ..'
 पर राय साब ने बहिन बना ही लिया उन्हें .बोले ,' सगे होते तो आड़े बखत  में साथ होते ... सब अपने स्वारथ के हैं .'
और हमारा घर भी विवाह क्षेत्र बन गया .

उन्होंने फिर  मेरे लिए पूछा ,' बरख़ुरदार कहाँ है ?'
वसु जब बुलाने आई ,मैंने इशारा कर दिया -नहीं.
 'माँ ,भैया तो कहीं गए हैं .'
'हाँ, परसों जा रहा है ट्रेनिंग पर .तैयारी में लगा है.' 

बहुत हो गया सगापन !  मुझे लग रहा था ये टलें किसी तरह .
 उधर वे माँ से सहानुभूति प्रकट कर रहे थे ,'कैसा अभागा इन्सान है - देवी जैसी पत्नी को ठोकर खाने छोड़ दिया ..'
'भइया प्लीज़ ,इस बारे में कोई बात मत करो !'
अच्छा किया माँ ने .इन्हें हमारे घर से क्या मतलब ?फ़ालतू बातें करते हैं .  मैं तो चुपके-से बाहर निकल गया था.
*
(क्रमशः)

मंगलवार, 12 अगस्त 2014

कथांश - 13.

* 
कोशिश करता हूँ पर  संयत नहीं रह पाता. अंदर -अंदर कुछ उफनता है .कहीं नहीं टिकता मन, बार-बार उखड़ता है .कुछ सोचता हूँ ,कुछ कह जाता हूँ - फिर उस  आँच  में दहता हूँ.
 अभी बारह दिन और निकालने हैं यहाँ .फिर तो ट्रेनिंग पर रहूँगा   .वातावरण बदलेगा ,व्यस्त हो जाऊँगा .
 वह आती है बीच-बीच में .जानता हूँ-  रह नहीं पाएगी , पर कुछ कहेगी भी नहीं.और किसी से कुछ कहे भी तो क्या ?
कहीं से लौटा था -
 टीवी चला दिया , बैठा रहा सामने .
'वसु, माँ कहाँ हैं ?इतनी देर से दिखाई नहीं दीं '
' रायसाब के घर से कहउआ आया था . मीता दीदी को रिश्तेदारों के  नाम दे कर भेजा है ,तिलक में क्या-क्या सामान होना है ,दोनों उस सबकी लिस्ट बना रही हैं .'
 'अच्छा !
'अब दिन ही कितने रह गए दस दिन बाद तिलक, महीने भर में शादी सब फटाफट निपटाना है .'
'तू भी कुछ कर रही है वसु ?'
'दीदी के लिए करना ही पड़ेगा. मेरे लिए कितना किया है उनने , पता है ? एक बार तो शहर में दंगे की ख़बर फैली तो तुरंत आईं, मुझे क्लास से बुला कर साथ ले गईँ . हमेशा ध्यान रखती हैं  मैं किसी मुसीबत में न फँस जाऊँ .
और जो उनके के ससुर हैं भइया, वे बहुत अच्छे हैं ,मुझे बुला कर भजन सुनते हैं.कहते हैं - तू तो मेरी बेटी है.मेरे लिए वहाँ की मेंहदी भी लाए थे  .'
'ओह ,बेटी कहते हैं ! '
मुझे याद आ गया को छुटपन से   'बेटी' सुनने  को और 'पापा' कहने को  लालायित रहती थी . एक बार तो मुकुन्द के पिता को पापा कहने के झगड़े में उसे ही नोच-खसोट  आई थी.
 'हाँ, और तू उनसे क्या कहती है ?'
'अंकल जी .मैं और क्या कहूँगी ?'
मन में कचोट उठी. इत्ती समझ आ गई है किसी को भी 'पापा' कैसे कहे , कांशस हो जाती है.
*
'अब रुक जाओ चाय पी कर जाना, ' माँ कमरे के बाहर बोल रहीं थीं .
' बहुत देर हो गई ,बाबूजी राह देखते होंगे .'
'अभी बस पाँच मिनट में चाय बनी जाती है .' उन्होंने  वसु..को आवाज़ लगाई .
 दोनों अन्दर आ गईँ .
'अरे ,तू आ गया मुन्ना ? कित्ती देर हुई ?'
 'तुम्हें छुट्टी कहाँ है माँ, कि मेरी सुध लो .दुनिया भर के काम तुम्हारे हवाले हैं .'
पर वे  कहते-कहते उत्तर सुनने से पहले ही  बाहर मुड़ गईँ थीं .
मीता कुछ अव्यवस्थित-सी हो उठी ,  दूसरी ओर देखने लगी .चोर-नज़र से वह उतरा चेहरा  देखा  मैंने- मन कसक उठा. 
 वसु उठ खड़ी हुई ,'चाय बना लाती हूँ .'
 'अभी कहीं जाने की ज़रूरत नहीं ,चार बजे पियेंगे चाय .अभी सिर्फ साढ़े तीन है '.
मैंने  वसु का हाथ पकड़ कर वहीं बैठा दिया .
मुँह बिगाड़ती वह चिल्लाई ,'अरे, मेरा हाथ मुड़ा जा रहा, छोड़ो .'
छोड़ दिया एकदम !
 सहानुभूति में मीता बोल गई ' ऐसे कस कर पकड़ता है ,चाहे दूसरे का हाथ मरुड़ जाय..'
'दीदी , तुम्हारा भी पकड़ा कभी ? ..'
अप्रत्याशित हड़बड़ा गई वह ,'नहीं रे ,ये लगता ही ऐसा रफ़ है .'
' माँ ,तुम कहाँ चली गईं थीं ?'
'वो ,बाहर चिंटू से कह आई हूँ ,समोसे ले कर आ रहा होगा .'
*
और पाँच दिन बाकी  , फिर तो ट्रेनिंग पर .
कल कुछ सामान खरीदने गया था . रंजन  मिल गया ,पुराना मित्र  है .  लौटने में देर हो गई .
 वसु नल पर खीरे धो रही थी  ,'भइया बड़ी देर कर दी . चलो ,खाना गरम करती हूँ .'
'तुम सबने खा लिया ?'
'कहाँ ? तुम्हारा इंतज़ार था .'
'माँ कहाँ हैं ?'
'ऊपर छतवाले कमरे में  .दीदी को कुछ सामान दिखा  रही हैं ..अभी बुलाती हूँ .'
'नहीं.नहीं ! तू खाना लगा , मैं बुला लाता हूँ .'
रसोई से नंगे पाँव निकला ,सीढ़ियों पर छाँह है ,चप्पल बिना भी चलेगा .
इधरवाली खिड़की खुली है ,बोलने की आवाज़ें आ रही हैं .
'... मीता, एक बात और समझे रहना औरत क्वाँरी हो ,ब्याही हो चाहे बच्चों की माँ बन जाए ,दुनिया  की नज़रें उसे छोड़ती नहीं ,  चैन से  नहीं रहने देतीं . मैं अकेली रह कर बहुत देख चुकी हूँ. '
वे कुछ रुकीं  -
'ऐसे आदमी हर जगह मिल जाते हैं ,तुम्हारी बात समझ रही हूँ मैं .सहानुभूति दिखाते हैं , मौके पर  सहायता को तैयार रहते हैं, कर भी देते हैं . और इसी क्रम में - अकेली औरत है ,अनुकूल हो जाय शायद . सो कोशिश  भी कर लेते हैं ....क्या पता लगे कौन कहाँ तक पहुँचेगा ! सो सँभल कर  रहना ही ठीक .  ... किसी के माथे पर तो लिखा नहीं है !'
आगे बढ़ते कदम रुक से गए .
मेरे दिमाग़ में घूम गए माँ के कुछ शब्द जो पिता की नाराज़गी पर वे बोलीं थीं,'मुझमें कोई चूक हो तो मुझे दोष दो , या किसी को प्रोत्साहित करूँ तो ...कोई यों ही बात करने में रुचि ले, तो मैं दुत्कार तो नहीं सकती ..फिर वह तो तुम्हारा  दोस्त  ठहरा...'
एक बार और-
मैं थोड़ा बड़ा हो गया था, नौवीं या दसवीं कक्षा में लड़कों के स्कूल में जाने लगा था .
ट्रेन्डग्रेजुएट ग्रेड में माँ की पोस्टिंग हो गई थी.
इन्टर कालेज के एक टीचर माँ को बात-चीत के लिए रोक कर बैठाने लगे थे. माँ के चेहरे से उनकी निगाहें हटती नहीं थीं .बड़ा अजीब लगता था मुझे!
 एकाध बार घर भी आए ,मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगा . लगा था माँ भी  उलझन में पड़ी हैं .फिर पता नहीं क्या हुआ उनका आना बंद हो गया .अभी भी मिलते हैं, कभी कोई काम हो तो करने तो तत्पर रहते हैं .पर हम लोगों ने उनसे कभी सहायता नहीं ली .
मन में उठा - यही है क्या औरत होने का पाप?
अपने सोच में ही डूब गया था . अरे, मैं तो उन्हें बुलाने आया हूँ  -आवाज़ लगाते-लगाते रुक गया .मीता बोल रही थी -
'उस समय एकदम  नहीं मना कर सकी  माँ,  पिता को अशान्ति दे कर,  सुखी होने का सोच भी नहीं सकती. ..'
खिड़की के अधखुले दरवाज़े से दिखाई दिया - मीता माँ के पास बैठी है .हाथ में एक डायरी और पेन .बीच-बीच में पन्ने पलटती है फिर बंद कर देती ह उसकी शक्ल दिखाई नहीं दे रही इस ओर पीठ है , बीच-बीच में  गोद में रख  हाथों पर गिरी बूँदें  पोछ लेती है  .आवाज से पता नहीं लगने देती ,पर स्वर बोझिल - सा   धीमा है .
उन्हें नहीं पता  उनके सिवा कोई और भी इधर है.
'दोषी तुम नहीं .हमें बनाया ही ऐसा गया है कि अपनी सुख-सुविधा से पहले अपनों के कुशल-मंगल का ख़याल आता है.अपना दुख दिखाई दे उसके पहले अपनों की पीर कलेजा चीरती है.'
माँ की सहानुभूति उसके साथ है .वे कहे जा रही हैं, 'राय साब ने अपना कर्तव्य निभाया.  अपनी संतान के लिए ,कोई और क्या देखता है  समाज में सम्माननीय भरा-पुरा समृद्ध परिवार ,लायक लड़का    , दूसरी  बात कोई  कैसे सोचता ?'
उधर से कोई आवाज़ नहीं  .
' बेटी, मैं तो ख़ुद कभी निश्चिंत नहीं हो पाई , अपने मन चोर आज तुम्हारे सामने खोल दूँ.
 पिता की बात आने पर दोनों कैसे  बच्चे बगलें झाँकने लगते हैं  ,कोई उत्तर न बन पड़ता .देख कर क्या बीतती है मुझ पर ! मीता, तब मुझे बड़ा पछतावा लगता  है ..बच्चों का उतरा चेहरा देख , मन में बड़ा मलाल आता है .प्रश्न उठता है - क्या अपनी ही ज़िद के लिए चली आई हूँ ? अपने को कभी दोष-मुक्त नहीं मान पाती. अंदर ही अंदर कोंचन  उठती है कि वहाँ रुक जाना ठीक होता या जो मैंने किया ?
 'माँ , आपने बिलकुल ठीक किया  .''
मेरे मन में भी यही आया था, अच्छा हुआ उसने कह दिया .
वे अपनी कहे जा रहीं थीं,' . ... यही चाहा था मैंने  ,यही कोशिश की थी कि मेरी संतान में  वह ऋणात्मकता न उतर आए ..,जान लड़ा दूँगी उसको एक संपूर्ण व्यक्ति रचने के लिए ,संस्कारित ,संतुलित,समर्थ और उत्तरदायी - देह से  और मानस से भी....' 
'उस स्थिति में आपने इतना सोच लिया ,मुझे ताज्जुब होता है माँ ' 
अरे, इसे तो  बिलकुल मेरी तरह लगता है !
 मुझे भी आश्चर्य है,उच्च शिक्षा नहीं पाई  उन्होंने , फिर कैसे इतना सोच गईं ? पढाई-लिखाई बाद में की है.माँ का मन इतना सचेत कैसे रहा ?उनकी सोच-विचार ,भाषा,व्यवहार से कोई भी उन्हें सुशिक्षित समझता था यह तो मैंने शुरू से देखा है.अनायास ही लोगों का ध्यान  उनकी ओर खिंच जाता था .
बाद में मैंने एक बार पूछ लिया था,' माँ ,तुम्हारी बातें बेपढ़ी स्त्रियों जैसी कभी नहीं रहीं .यह सब तो तुमने बाद में किया ..'
वे हँस पड़ीं थीं ,' समझ गई , इतनी कुबड्ड नहीं थी मैं .नागरी-प्रचारिणी की परीक्षाएँ दी थीं ..'
'अच्छा!'
'हाँ ,विद्या-विनेदिनी ,मध्यमा वगैरा .. विशारद की भी तैयारी थी पर तभी शादी हो गई  और तुम्हारे पिता को लगा  ये भी कोई पढ़ाई है ,घर बैठकर उल्टा-सीधा पढ़ लो और पास !'
'...और जानते हो बाद में जब नौकरी की तो उनका भी  लाभ मिला .
तुम्हें पता है मुन्ना ,मुझे पढ़ने का बहुत चाव था .नानी के घर पड़ोस के कॉलेज प्रवक्ता की दो पुत्रियों का खूब आना -जाना था. हमारी अच्छी पटती थी किताबों का लेन-देन और दुनिया भर की बातें चलती थीं .'
हाँ , माँ बँगला के उपन्यासों की बहुत शौकीन थीं.स्कूल में किसी के पास दिख जाय ,वे अब भी चूकती नहीं - माँग कर  दो दिन में लौटा देती हैं - मैने उन्हें हिन्दी के उपन्यासों की चर्चा करते भी सुना है.
   अब समझ गया हूँ ,डिग्रियों और विश्ववि्द्यालयों से कुछ नहीं होता .अगर व्यक्तित्व में परिष्कृति और ग्रहणशीलता हो तो उनके बिना भी बहुत कुछ हो सकता है .और हाँ , मामा कहते थे वे लिखती भी थीं ,उनके स्कूल की डिबेट के लिए कई माँ ने बार लिखा था जिस पर वे जीते थे 
रात में मैंने  उन्हें कभी-कभी अकेले बैठे सोचते और बीच-बीच में कुछ लिखते देखा है .
उनकी साथिनें अक्सर कहतीं थीं,' ललिता ,तुम बोलती हो तो लगता है किसी ने रेडियों खोल दिया हो ,सधे हुए शब्द ,प्रवाह में निकलते चले आते हैं.'
वहीं खड़े-खड़े किस अतीत में पहुँच गया . अचानक कुछ शब्द सुन कर सजग हुआ .मीता कह रही थी,
  ' तब मैंने कहा था - मैं अड़ने को तैयार थी ,तब ब्रजेश तैयार नहीं हुए . वे  कुछ बन कर दिखाना चाहते थे .  नहीं तो फ़ैसला तभी हो जाता. और बाद में वह मौका नहीं  आया कि योग्यता का प्रमाण ले कर खड़ी हो जाऊँ ?'

'यही कमी तो औरत में है, जो अपनों की कीमत अपने से चुकाती है .'
दो स्त्रियाँ एक दूसरी से अपने अंतर का दुख बाँट रही हैं - मैं साक्षी बन कर क्या करूँगा !
वे भले हलकी हो जायँ , मेरे मन का भार  और बढ़ जायेगा !
नीचे उतर आया.
 'वसु, वे लोग बहुत बिज़ी हैं ,मैंने डिस्टर्ब नहीं किया.दस मिनट और रुके जाते हैं .'
*

बुधवार, 6 अगस्त 2014

कथांश - 12.

*
माँ की भी बुरी आदत है -ये नहीं कि स्कूल से आकर ज़रा आराम कर लें .अभी आईं और रसोई में जुट गईँ .फिर रात में जाग कर कापियाँ जाँचेंगी .
'माँ, थकी हुई आई हो ,थोड़ा आराम कर लो .'
'वर्मा आंटी बीमार हैं खाना भेजना है उनके यहाँ .'
'बस तुम्हीं एक हो सबकी खैरख्वाह !काहे को इतना चढ़ा रखा है कि  सब अपनी जुम्मदारियाँ देने चले आते हैं ? मतलब साधते हैं सब, कोई मौसी कह कर कोई बहन कह कर .. .'
तुम नहीं समझोगे ,मेर भी शरीर चाहता है आराम करूँ ,इच्छा भी होती है पर जो बनाए हैं वे रिश्ते निभाना बहुत ज़रूरी है ..दौड़-दौड़ कर उनके काम न आऊँ तो कौन  मुझे पूछेगा? वक्त-जरूरत यही लोग साथ खड़े होते हैं. सबसे निभा कर चलना यही मेरी कमाई है.देखते नहीं अकेली औरत के साथ क्या-क्या होता है ?लड़की को ले कर यहाँ अकेले रहना..आसान है क्या ?'     
 'पर तुम आते ही उन सब के लिए खाना बनाने बैठ गईं .और लोग नहीं हैं क्या ?'
'माँ, तो हफ़्ते भर से उनके यहाँ नाश्ता-खाना भेजती हैं ,आंटी अस्पताल में हैं तभी से ...'
तौलिये से हाथ पोंछती वसु आ कर खड़ी हो गई थी.
'मैं आटा सानने जा रही हूँ...'कहती हुई चली गई .
' अपनी तबीयत का तो ख़याल करो . औरों के लिए इतनी अच्छी मत बनो कि अपना बिगाड़ कर लो .'
'तुम समझते क्यों नहीं? मुझे इन्हीं लोगो के साथ रहना है. बना कर न रखूं तो कौन बैठा है मेरा सगा !
दूसरों की निगाह में भली बने बिना मेरा गुज़ारा कहाँ ?'
'तुम्हारी पुरानी आदत है किसी को ना नहीं कह सकतीं ,बहाना भी नहीं बना सकतीं.दिन रात जुटे रहने का शौक है '.
'शौक है कह लो ! सब जानते हैं सिर पर कोई नहीं. .तुम सालों से बस आते-जाते बने हो .जानकर भी क्या कर लोगे?...एक दिन जब मयंक रास्ते में वसु का पीछा रहा था यही वर्मा अंकल ,उस की सुरक्षा बन गए .'
ओह,यह तो कभी दिमाग़ में ही नहीं आया था .
'...और कॉलेज में ऐसे-वैसों की कमी है क्या? दोस्ती करने चले आते हैं ,तब सौरभ इसके साथ खड़ा होता है .मन्दा इसकी सहेली है उसके  भाई को राखी बाँधती है .'
मैं  सुने जा  रहा हूँ . 
'...और लड़कियों की बात दूसरी है उनके बाप भाई  स्कूटर से पहुँचा कर आते हैं लोग लिहाज़ करते हैं...इससे  तो कहते हैं हमारी  दोस्त बन जाओ. फिर देखें कोई तुम्हारी तरफ़  आँख
भी उठाए  .
मुझे तो सबसे नब कर चलना पड़ेगा .दुनिया देखती हूँ . दूसरों से अपनापा जोड़ती हूँ ,यह सब न करूँ तो कौन पूछेगा, कौन साथ देगा ? सबको अपना अच्छापन दिखाना मेरी मजबूरी है.'

 मेरे कहने को कुछ नहीं-सच तो स्वीकार करना ही पड़ेगा.
 माँ ,ओ माँ ! क्या करूँ मैं?
अंतर्मन धिक्कार उठा है?
 *
'इज़्ज़तदार ,प्रतिष्ठित परिवार ' मन  में बार-बार खटकता है .
मुझ पर जैसे कोई भूत सवार हो जाता है .नॉर्मल नहीं रह पा रहा .मुँह से कटु वचन निकल जाते हैं.
माँ का मन दुखी होता होगा पर चुप हो जाती हैं.
राय साब अकेले
हैं. माँ से सलाह-मशविरा के बिना उनका काम नहीं चलता. एक बार मेरे सामने भी घर आए थे ,'बेटा-बेटा 'कह हाल-चाल पूछते रहे .नौकरी में सेलेक्शन सुन कर प्रभावित भी हुए बोले ,'अब जिज्जी की निश्चिंती के दिन आ गए.बहुत झेला  है इनने, मैं तो शुरू से देख रहा हूँ .'
गनीमत है पिता की कोई चर्चा नहीं की उन्होंने .   
उन के यहाँ से कुछ-न-कुछ सँदेसा आ जाता है ,और माँ जुट जाती हैं .मुझे ताव आता है .
'जाने-माने लोग हैं, बहुतेरे मिल जाएंगे काम करनेवाले  . माँ,तुम क्यों हलकान हुई जा रही हो .' मन का ग़ुबार अनायास ही निकल पड़ता है .
,'इन प्रतिष्ठित लोगों के लिए तुम ही काम करने को रह गई हो ?तुम्हारा भी कुछ ठिकाना नहीं. '
वे समझ गईं .
'बात तुम्हें लगी है .पर उनने ऐसा कुछ नहीं कहा था .उनकी बहिन थीं तब से मेरा आना-जाना है .उनने कहा था तुम देखना मेरे भाई और भतीजी का ध्यान रखना ये भी उन की जगह मुझे मानने लगे.टका सा जवाब कैसे दे दूँ ?  .और मीता उसके लिए तो मैं कुछ भी उठा  नहीं रख सकती.
हाँ, मीता के लिए ....
उनके मन की व्यथा फूट पड़ी -
 ' हमारा परिवार कम प्रतिष्ठित था ,कम सम्माननीय था ?सबके सामने   इज्ज़त बनी रहे -अपमान ,गालियाँ आरोप सब छाती पर पत्थर रख कर झेलती रही. डरती थी, बदनामी हो गई तो बच्चों को सिर उठाने को जगह नहीं रहेगी .इज़्ज़त घर की होती है. चार जने और क्या देखते हैं --आदमी का आचार-व्यवहार  .एक बार भाँडा फूटा तो सब गया . घर की मरजाद बनी रहे इसलिए उनकी सारी अतियाँ सहती रही. दुत्कारें खाकर भी घर से बाहर कदम नहीं रखा. पर  जब सबके सामने  सामने छोटे बच्चे के साथ मँझधार में छोड़ दिया  तो क्या करती ? भाई पर बोझ बन कर कितना रहती ?...और मैंने कोई घटिया काम नहीं किया . दो पाटों के बीच पिसती रही ,ऊपर से  दुनिया चैन न लेने दे ...

अब तू समझदार हो गया ..
 अब तक सिर्फ़ बेटा था मेरा, अब पढ़ लिख कर आदमी बन गया,बड़ी-बड़ी बातें बोलने लगा  .चलो ,मेरा काम खतम हुआ.'
'माँ ,तुम्हारी बात नहीं थी ,तुम अपने पर क्यों ले रही हो .'
'बराबर देख रही हूँ मुन्ना .तेरा मन समझती हूँ, पर दूसरे पर क्या बीतती है यह तू नहीं समझता .'
'तुम्हारी थकान देखी नहीं जा रही थी. ऊपर से मन खराब था कुछ भी बोल गया. मेरा यह मतलब नहीं था माँ .क्षमा कर दो मुझे !'
 बहुत पछतावा हुआ था उस दिन.
सोच लिया था और थोड़े दिनों की बात है अब तो मैं भी लग्गे  से लग गया .उन्हें कौन सा  यहाँ रहना है!

' नहीं अब यहाँ नहीं रहने दूँगा तुम्हें, माँ.' अब मेरे साथ   रहोगी'

पर बाद में जब उनसे कहा ,' माँ अब तुम्हें आराम चाहिए मेरे साथ रहो.  चलने की तैयारी करो .. .यहाँ क्या रखा है ?.'
वे तैयार नहीं हुईं बोलीं,
'कैसे चलूँगी रे , नौकरी के कुछ साल बचे हैं अध-बिच नहीं छोड़ूँगी  . पेँशन का भी तो  सवाल है  ..'
रिटायर होने से पहले नौकरी छोड़ने का उनका इरादा नहीं हुआ .छुट्टी ले कर चलने को भी कहा .
 पर कोई असर नहीं पड़ा.
' बेटा ,आदत जो पड़ी है . शान्ति से अपनी ड्यूटी पूरी करने में बड़ा चैन है. वहाँ नई जगह खाली बैठ कर ऊबती रहूँगी . चलूँगी ज़रूर तेरी जगह देख-सुन आऊँगी .थोड़ा वसु का भी चेंज हो जाएगा .

 '
बाद में उनके शब्द थे ,'अभी कहाँ छुटकारा !'
'क्यों ,अब क्या? मैं हूँ न !'
'तू तो करेगा ही ,पर अभी मेरे काम पूरे कहाँ हुए .मुझे लड़की की शादी की चिन्ता है.कहीं  तय तो हो ...  देखना  क्या-क्या सुनना-झेलना पडता है
अभी ?'
अचानक फफक कर रो उठा कोई .
ध्यान  गया उधर - वसु थी .दोनों हाथों से  मुँह दबाए  कमरे से  बाहर निकल रही थी. 
अचकचा गए हम लोग.
 ओह, वह यहीं थी - दोनो में से किसी का ध्यान नहीं गया .
  सब सुनती रही , एकदम चुप !
*