बुधवार, 13 नवंबर 2019

मैं, अश्वत्थामा बोल रहा हूँ - 3.

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द्वापर युग बीत गया. मानव के मान-मूल्यों के क्षरण की गाथा रच, मानव चरित्र का वह अद्भुत आख्यान,अपने अध्याय पूरे कर, छोड़ गया अंतर्चेतना के मंथन से प्राप्त नवनीत - गीता का जीवन-बोध!
संसार की उपेक्षा झेलते बड़ा हुआ मेरा मन कटु हो उठता है .एक पिता ही तो थे मेरे अपने   जो उस धर्मधारी की बलि चढ़ गये.

 तब आदर्शों से व्यावहारिकता का पलायन पहली बार देखा था.फिर तो सहस्राब्दियों लंबा जीवन जीते मानव मानों की घिसावट कितनी बार देख चुका. अपने विचारों में बार-बार वहीं पहुँच जाता हूँ. उस पुराने जीवन में जिसके लिये मुझमें उत्कट जिजीविषा थी , जिसे बहुत पास से देखता रहा था. प्रारंभ से तरसा था हर  वस्तु के लिए, जब राजसी वातावरण में गुरु-पुत्र का का मान पाकर प्रत्येक सुविधा का भागीदार बन गया,तब आगे बढ़ते ,अचानक ही सब छिन गया. पिता की नेह छाया के लपेटे में सब चला गया और दे गया अंतहीन, एकाकी अशान्त व्यथाएँ.


लगता है,वह महागाथा अभी पूरी नहीं हुई. मसि की तरल श्यामता लेखनी की जिह्वा रँग  देती है,पुकार उठती है ,'समर शेष है लेखक,स्याही सूखी नहीं है.' और तब कोई आकुल अंतर से नये पृष्ठ  जोड़ता हैं,जैसे  क्रमशः की एक और  आवृत्ति हुई हो.
  
 प्रायः जिन्हें महान् समझा  जाता है उनकी दुर्बलताएं उन पर आरोपित  प्रभामंडल में ओझल रह जाती हैं. लोक-धारणा अपने  विपरीत किसी बात को सहज स्वीकार नहीं पाती, जिसका प्रतिफल झेलते हैं, कुछ लपेटे में आए बेबस लोग ,जो अपनी बात न खुल कर कह पाते,न अपनी मान्यताएँ बदल पाते हैं. कभी कोई आवाज़ उठे भी तो नक्कारखाने में तूती की आवाज़ किसे सुनाई दे!
जन साधारण  अपने आप में व्यस्त,जो सामने आ गया ठीक, न सच्चाई जानने में रुचि ,न अवकाश,और न साधन. वास्तविकता पर इतने आरोपण कि असली रंग जानना मुश्किल. शासक-शासित के बीच संवाद वाले तत्व,अपने हित या राजहित की करने में लीन ,जानते हैं कि जन में न इतनी क्षमता है ,न चेतना. विश्वास करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं उसके पास .स्पष्ट दृष्टि ही नहीं जहाँ ,वहाँ विवेक की बात करना व्यर्थ है. अपने तात्कालिक हानि-लाभ,हित-अनहित की बात उसकी समझ में आती है, दूरगामी परिणाम में कोई रुचि नहीं उसकी.
यही तब था और अब भी वही. तब का साक्षी रहा  मैं  था और आज भी दर्शक रूप में विद्यमान हूँ ,

मेरा जीवन पूरा कहाँ हुआ. मेरे अतिरिक्त सब बीतता चला गया,  मेरा अपना कोई नहीं है अब. तब भी एक पिता ही तो थे. कैसे छल से जग-विदित धर्मात्मा ने उनकी  हत्या करवा दी. मेरे पिता, जो उन सबके मान्य गुरु थे, पूज्य थे. अपने गुरुत्व से  कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया था अपने शिष्यों को .उन्हीं के साथ ऐसा गर्हित कृत्य.अपने स्वार्थ की सिद्धि हेतु सच के खोल में  सफ़ेद झूठ बोल गये वे, वे जो धर्मराज कहलाते रहे  ?
 हाँ,उन सब की दुरभिसंधि रही थी, मानता हूँ. लेकिन जिसकी येन केन प्रकारेण स्वयं को सही सिद्ध करने का स्वभाव बन गया हो, वह दूसरों की  सुनता कहाँ है !
हाँ, वही युधिष्ठिर,जो  भाइयों को अपने अनुसार चलाता रहा था.
 अब भी याद है मुझे उस दिन दुःशासन ने कहा था-
 'और भाई तो फिर भी किसी न किसी अर्थ  के हैं ये किस अर्थ के? ' शकुनि हाथ नचाते बोल उठा था, 'द्यूत पुरुष हैं वे,कोई अवसर छोड़ेंगे नहीं.भाइयों की कौन सुनता है.सदा अपनी चलाता है वह महा अदूरदर्शी.'
दुर्योधन ने तुरत कहा  - 'वह पत्नी जो पूरी उसकी है ही नहीं, न नीति से न रीति से,जरा-सा चढ़ा दो तो उसे भी दाँव पर लगा देगा .'
शकुनि उछल पड़ा था,'क्या निरीक्षण शक्ति पाई है भागिनेय, रास्ता दिखा दिया तुमने.मिल गई चाबी उसे चलाने की...'
'क्या हुआ मामाश्री?'
'बस अब पूछो मत ,देखे जाओ. भाई कसमसाते रहें ,स्त्री कुढ़ती रहे पर ये वही करेगा जो झक चढ़ गई ,और किसी की सुनेगा नहीं.
अब जीजाश्री को साधे रहना तुम्हारा काम.'

दुर्योधन की बात मुझे  सही लगी. मुझे भी उनके सब कार्य अपनी सुख -सुविधा से प्रेरित लगते हैं, चाहे पांचाली का विभाजन हो चाहे द्यूत के दाँव .दूसरों को माध्यम बनाता स्वार्थी व्यक्ति,जिसमें दूरदर्शिता का लेश नहीं. उनका किया-धरा भुगतने को शेष चार हैं ही,उन्हें काहे की चिन्ता.हर ओर से सुरक्षित . बस अँगूठे दादा बने चारो अँगुलियां नचाते रहने के अभ्यस्त.

वह समय बीत चुका  है ,शेष रह गई कथाओं को आगत जन अपने अनुसार व्याख्यायित करेंगे. कोई निष्कर्ष निकालना असंभव,क्योंकि वह काल खण्ड,अपनी सीमाओं सहित सदा को पहुँच से बाहर हो चुका है. महाप्रयोगशाला की घड़ी के गत-आगत के बीच  डोलते हुये लोलक सा रह गया - मैं अश्वत्थामा!
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3 टिप्‍पणियां:

  1. वाह लगा जैसे मैं ही अश्वत्थामा :)

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  2. प्रतिभा जी ,
    खेद है , मैंने वहाँ टिप्पणी नहीं लिख पाई। पढ़ते हुए अश्वत्थामा के विचारों में डूब गयी। आपके उर्वर मस्तिष्क की मनोवैज्ञानिक
    विचारधारा कितनी दूरदर्शी है !! मैं सचमुच अभिभूत हूँ। किसी अन्य की मानसिकता को अपनी अनुभूति देकर अभिव्यक्त करना
    कितना दुष्कर कार्य है । आपने उसे सत्य सिद्ध कर दिया । और.. भाषा तो सदा की भाँति हिन्दी के विशुद्ध , सरस एवं प्रभावी
    रूप में सीधे मन पर छा जाने वाली ही है , जो अपने सही रूप में भावों का चित्र बना देती है। ऐसे आलेख आजकल कहाँ पढ़ने को मिलते हैं? आपकी लेखनी निरन्तर चलती रहे , यही कामना है।
    पैकिंग वाला लेख भी प्रभावी है।
    - शकुन्तला बहादुर

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  3. उफ़्फ़! कोई कहने सुनने वाला नहीं, बस अकेले जीते जाना, युगों युगों तक!!
    संसार मे सर्वथा एकाकी रह जाना वो भी केवल अपने विचारों और अंतर्मन के रचे बसे या उजड़े जीवन के साथ कितना अधिक पीड़ादायी है। आपके लेखन का ही कमाल है कि अश्वत्थामा के अंतर्द्वंद में मेरा स्वयं का अवलोकन और आंकलन कब आरम्भ हो गया पता ही नहीं चल। अजीब बात है मानस की भी, और अजीब शक्ति भी...सबका अपना एक संसार है...अजीब ताना बाना है जगत और जीवन का। पता नहीं क्यूँ, अश्वत्थामा का विषाद मैने सोख लिया हो जैसे,ऐसा अनुभव हो रहा है। पहले भी पूछ चुकी हूं आपसे परंतु मुझे तो अभी भी लगता है, कुछ अधिक भयंकर ही दंड दिया कृष्ण ने। आगे प्रतीक्षा रहेगी कि मुझे सन्तोषप्रद उत्तर मिलेगा या नहीं। :(

    शकुन्तलाजी के एक एक शब्द से सहमत हूँ। और उनके शब्द कितने संयत हैं और मुझे :( जाने क्यों अश्वत्थामा से सहानुभूति ही हो चली है। एक और पठन चल रहा है महाभारत से संबंधित तो शायद मेरा मन ही भंगुर सा है।

    जाने आप कैसे इतना डूबकर लिख पाते होंगे प्रतिभाजी,आपकी भावनाएं या मन आपके पात्रों से आहत तो अवश्य होता होगा(occupational hazard types)। मैं तो अपने मस्तिष्क में ही एकांकी की तरह पढ़ती जाती हूँ वो भी पूरे अभिनय और भावों को जीते हुए। आपकी लेखनी से निकले शब्द और उनमें निहित अधिकतर निहितार्थ तो मैं स्पंज जैसे सोख लेती हूँ फट से। जैसे एक फ़िल्म देख ली मैंने!। :")

    कभी नहीं सोचा था कि अश्वत्थामा के नाम के अश्रु भी मेरी आँखों मे भर आएंगे। आयु के साथ साथ भावुकता भी दिन दूनी बढ़ती जा रही है मेरी ।

    लिखते रहिये इसी तरह। आपके विशुद्ध लेखन को नमन।

    :"""-)

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