सोमवार, 20 मार्च 2017

एक बार फिर ...

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     हे अपार करुणामय अमिताभ बुद्ध ,क्षमा करना -मैं एक मंद-मति  नारी हूँ, जो नर के समान  सहज मानव के रूप में तुम्हें भी स्वीकार्य नहीं थी. तुम्हारा सद्धर्म  मेरे  
लिये निषिद्ध रहा ,और जब महाप्रजापति गौतमी के आग्रह पर स्त्रियों को  प्रवेश दे कर इस धर्म ने जो कुठाराघात झेला उससे उसकी जीवनावधि आधी रह गई -तुमने कहा था,“हे आनन्द! यदि मातुगण स्त्रियों ने गृहत्याग कर प्रवज्या अपना तथागत के बताये धम्म और विनय का मार्ग अङ्गीकार न किया होता तो ब्रह्मचर्य (ब्रह्मचरिय) चिरजीवी होता, सद्धर्म एक हजार वर्ष तक बना रहता। किंतु हे आनन्द! चूँकि स्त्रियाँ इस मार्ग पर आ गयी हैं इसलिये ब्रह्मचर्य चिरजीवी नहीं होगा और सद्धर्म केवल पाँच सौ वर्षों तक चलेगा।“
 राजपुत्र सिद्धार्थ ,
बहुत सुख-विलास में पले थे तुम ,जीवन के दुखों से, कष्टों से नितान्त अपरिचित ,हर इच्छा पूरी होती थी तुम्हारी .संसार की वास्तविकताएँ तुम्हारे लिये अनजानी थीं
 , किन्तु जीवन के कटु यथार्थ से कौन बच सका है .राजपुत्र होने से यहाँ अंतर नहीं पड़ता .सच सामने आयेंगे ही -झेलने भी पड़ेगे .जब वे सामने आए तुम दहल गए .उनसे छुटकारा पाने का उपाय खोजने का विचार बहुत स्वाभाविक था .अच्छा किया मार्ग ढूँढ लिया तुमने - साधना सफल हुई, बुद्ध हुए तुम! 
  हे प्रबुद्ध,
 संसार को दुखों से मुक्त करने का निश्चय तुम्हारे जैसे महामना ही कर सकते हैं. हे ज्ञानाकार, दुख और कष्ट क्या केवल पुरुषों को ही व्यापते हैं, नारी को नहीं ?आत्म-कल्याण के पथ पर बढ़ने के लिये सहधर्मिणी को झटक कर , गृहस्थी के सारे दायित्व त्याग अपनी मुक्ति का मार्ग पकड़ ले यही थी सद्धर्म की पहली शर्त .स्त्रियों की मुक्ति पुरुष के लिये बाधक बन जाती है इसलिये उन्हें अपनी मुक्ति की चाह न कर, उसे पुरुष का अधिकार मान, सारी सुविधायें देना अपना कर्तव्य समझना चाहिये.वृद्धावस्था रोग और मृत्यु नारी पुरुष का भेद नहीं करते. मुझे लगता है स्त्री-पुरुष दोनों को समान चेतना-संपन्न मान कर वांछित न्याय कोई कर्मशील कृष्ण ही दे सकता है, वही अपने व्यवहार से भी सुख-दुख दोनो को समान भाव से ग्रहण करने ,कर्ममय संसार में डटे रहने का संदेश  दे सकता है.
 सर्वदर्शी,
 तुम्हारा वक्तव्य पढ़ कर (चूँकि स्त्रियाँ इस मार्ग पर आ गयी हैं इसलिये ब्रह्मचर्य चिरजीवी नहीं होगा और सद्धर्म केवल पाँच सौ वर्षों तक चलेगा.“)पहले तो मैं यह समझने का यत्न करती रही कि इसके लिये दोषी किसे मानें -स्त्रियों को, सद्धर्म में दीक्षित ब्रह्मचर्य निभानेवाले को , या मानव की स्वाभाविक वृत्तियाँ को ?
सोच लेना कितना  चलेगा वह धर्म जिसमें सहधर्मिणी की भी  सहभागिता न हो .जो प्राकृतिक स्वाभाविक जीवन के अनुकूल न हो जो समाज के केवल एक  वर्ग के कल्याण का ही विधान करता हो . 
हे सुगत,
 ऋत सृष्टि के नियमन का,उसके सुव्यवस्थित संचालन का हेतु है, प्रकृति की अपनी योजना है रचना-क्रम एवं पोषण -संरक्षण की, प्राणी  की मूल वृत्तियों का अपना महत्व है. इनसे विमुख होना विकृतियों का कारण बनता है अतः शोधन  के द्वारा  वृत्तियों का ऊर्ध्वीकरण  -संयम और नियमन -जिसके संस्कार हमारी संस्कृति में प्रारंभ से विद्यमान हैं .उनके दमन के बजाय उनका नियमन जो व्यक्ति और समाज  दोनों के उन्नयन में सहायक हों. 
सिद्धार्थ, 
मेरे पापी मन में कौंधता है  अगर स्त्रियों के लिये  भी ऐसे धर्मों या संप्रदायों का चलन होने लगे जिनमें सबसे निरपेक्ष रह कर अपना ही कल्याण देखें तो...
पर उन्हें छूट देने के पक्ष में तुम हो ही कहाँ ?कभी कोई नहीं रहा .गृहस्थ जीवन का पूरा अनुभव था तुम्हें.चिन्तक भी थे तुम. स्त्री- कुछ माँगे नहीं,पूरी तरह समर्पित हो , कभी शिकायत न करे तो उसके हित का विचार किस का दायित्व है? तुम्हारी करुणामय दृष्टि  भी नर का दुख देखकर विचलित हो गई, नारी तक उसकी पहुँच नहीं हुई .
   किसी पीपल तले एक बार फिर ध्यानस्थ होकर बैठो सिद्धार्थ, शायद मानव-मात्र(जिसमें नारी की सहभागिता हो) के लिये सम्मत,समाज के लिये कल्याणकारी , कोई पूर्णतर मार्ग कौंध जाये जो एक सहस्त्र या पाँच सौ वर्षों की सीमा से बहुत  आगे जा सके और तुम्हारी तथागत संज्ञा सार्थक हो सके.
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5 टिप्‍पणियां:

  1. आपने कितना सटीक कहा कि कर्ममय संसार में वांछित न्याय कोई कर्मशील कृष्णा ही दे सकता है..

    बहुत सुन्दर तरीके से आपने जो विवेचना की है, उसकी जितनी भी तारीफ़ की जाए, वो कम है.

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  2. विचारणीय आलेख. मुझे लगता है स्त्रियों के प्रति किसी तरह का द्वेष भाव नहीं था बुद्ध में, हो ही नहीं सकता, जो कहते हैं, जब तक अंतिम प्राणी भी मुक्त नहीं हो जायेगा वह स्वर्ग के द्वार पर ही खड़े रहेंगे, यशोधरा को त्याग कर जाने के पीछे स्त्री को कमतर आंकने का भाव नहीं हो सकता, बुद्ध अपने पिता को भी तो उसी तरह बिना बताये चले गये. मुझे तो लगता है बुद्ध पुरुषों की तुलना करना उसी तरह उचित नहीं है जैसे किन्हीं भी दो व्यक्तियों में तुलना करना, चाहे वे स्त्री हों या पुरुष.

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  3. मैं द्वेष भाव की बात नहीं कह रही ,केवल उनकी ओर ध्यान न जाने की बात कह रही हूँ क्योंकि बाद में उन्होंने स्त्रियों को स्वीकृति दी थी .तुलना नहीं है धर्म की व्याप्ति अधिकतम हो ,विषम स्थितियों से जूझ सके और समय के साथ वृद्धि प्राप्त कर के ,इसलिये पुनर्विचार या व्याख्या कीबात कर रही हूँ.

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  4. मुझे सहसा ही मीराबाई और स्वामी विवेकानंद वाला प्रकरण स्मरण हो रहा है जहाँ एक वेश्या, जिसे पतित स्त्री कहकर स्वामीजी ने उपेक्षित किया था , सूर का यह भजन गा रही है " मेरे अवगुण चित्त न धरो....'। वृन्दावन के गोस्वामीजी मीरा माँ को स्त्री कहकर दर्शन नहीं देते , तब मीरा यह कहतीं हुईं पलट आतीं हैं कि "आज ही जाना श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और भी कोई पुरुष अवतरित हुआ है"।



    संसार की माया ही विचित्र है, कोई बच ही नहीं सकता। हमने अनेकों वर्ग बना रखें हैं। सच ही कहा आपने, कृष्ण ही की भांति कर्मयोगी होना है सबको।

    आभार आलेख हेतु! :"""-)

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