बुधवार, 3 सितंबर 2014

कथांश - 16 & 17.

*  16.

उस दिन उसे छो़ड़ने गया था ! 
पहुँचाने गया होता तो आगे की संभावना रहती.उस दिन छोड़ कर चला आया .
 लौटने से पहले रुका था  कहा था ,' बॉय,चलता हूँ ,पारमिता !'
पारमिता?
निशाना वही बनी थी .हाँ, गोली दाग़ते समय चलानेवाले को भी गहरा झटका लगता है .
मेरी और देखा उसने ,चेहरे की थकान पर कुछ  गहरा-सा पुत गया था, मुझसे देखा नहीं जा रहा था.
वह समझ गई - अबसे वह पारमिता है .
 दोनों होंठ कुछ कस गए ,जैसा अक्सर सोचते समय  देखता था
मुँह से अस्पष्ट  बोल निकले थे  बाद के शब्द सुन पाया, '...  अच्छा ब्रजेश !
फिर उसने हाथ हिलाया था.
क्षण भऱ को दृष्टि मिली  और  हम पलट गए  दो दिशाओँ में .
हाँ, मैं भी अब बिरजू नहीं ब्रजेश हूँ , दोनों को आगे यों ही रहना है.
उसे छोड़ कर मैं  लौट आया था .
 कल के लिए तैयारी भी करनी थी .
*
कपड़े तैयार रखे थे ,सारा सामान एक जगह इकट्ठा.
 वसु ने कहा ,'भइया तुम्हारे कपड़े धुले प्रेस किए तैयार हैं '.
'तूने किये वसु ?'
'मैं करने जा रही थी माँ ने पहले ही कर दिये,यहाँ लाकर मैंने रख दिये .'
वसु को कपड़े खरिदवा दिए थे ,शादी में उसे मीता की बहिन बन कर रहना होगा ,
उसने पूछा था ,'भइया, तुम आओगे?'
माँ ने एकदम टोक दिया ,'वह कैसे आ पायेगा .अभी तो ट्रेनिंग शुरू हो रही है .'
उनने मेरी ओर नहीं देखा .
तुम कितनी अच्छी हो, माँ !
*
हम लोगों ने साथ बैठ कर खाना खाया .मन अब भी भटक रहा था.हाथ और मुँह बार-बार रुक जाते थे ,
'कल जाना है, आज हलका रहूँ तो ही ठीक , कह कर हाथ खींच लिये '.
'अच्छा बेटा, इतनी-सी खीर खा ले .वसु ने तेरे लिए ही बनाई है ,
'ला, बहन दे '
'और ये मठरी हैं थोड़ी-सी ,साथ रख लेना .'
'मठरी ?'
'हाँ भइया ,मीता दीदी दे गईँ थीं तुम्हारे ले जाने को - अलग से ..'
 उसे पता है मुझे मठरियाँ बहुत अच्छी लगती हैं .
उफ़, ..अब बस करो ,नहीं सहन होता यह सब !
ठीक है, कल चला ही जाऊँगा !.
*
रात को वसु बताती रही थी ,उनके घर दीदी के ससुर आए हैं  ,विनय का भाई है न तनय उसे  लेकर .'
'अच्छा!'
  जोड़े बनवाने के लिए दीदी की नाप चाहिये न ..और जेवर के लिए भी पूछना है .
माँ ने बताया  कह रहे थे ,'दुल्हन की बहिन के लिए भी एक जोड़ा बनेगा. .'
'वाह,वसु तेरी तो मौज आ गई .'
'हाँ भइया, वो तो कह रहे थे तिलक लेकर जब भाई लोग जायें तो मेरी बेटी को भी लाना ,अपनी दीदी का घर देख आए .मुझे हमेशा अपनी बेटी कहते हैं ..'
'अरे वो तो वो ,ये राय साब भी मीता के लिए गहने-कपड़े कर रहे हैं ,साथ में वसु के लिए भी.. गहने नहीं कपड़े.मैंने मना किया तो कहने लगे मेरी भांजी है तुम मत बोलो .'
'वाह ,उन्हें यह सब करने की क्या ज़रूरत.मुझे नहीं पसंद मेरी बहिन के लिए कोई और करे .'
'पर कह तो नहीं सकती, न !.
'पर अब मुझे भी मीता के लिए कुछ ढंग का करना पड़ेगा .' माँ कुछ परेशान लगीं .
'क्या करना चाहती हो ?'
'मेरी एक चेन फ़ालतू रक्खी है. वही पॉलिश करवा के और साड़ी तो नई ही  खरीदनी पड़ेगी ...'
'नहीं,नहीं ,तुम अपनी मत देना ,मैं वहाँ से पैसे भेजूँगा .अगले महीने से पे मिलने लगेगी माँ ., .'
'अभी से अपना खर्चा मत बढ़ा ,मैं कौन ज़ेवर पहनती हूँ . '
'नहीं सुनोगी तो मैं  वहीं से खरीद कर ले आऊँगा .'
वसु बोली ,'वहाँ तो खूब डिज़ाइन मिलते होएंगे  यहाँ तो के तो ..बस .'
'तुझे कैसे पता ?'
'दीदी की खरीद में मैं ही तो साथ जाती हूँ .'
'पर शादी से पहले तू  आएगा कब?.
'लगा लूँगा एक चक्कर .'
*
 17.
तनय का नाम कई बार सुना था .रमन बाबू का छोटा बेटा ,पारमिता का देवर .
कोई उत्सुकता नहीं थी कि उससे मिलूँ  .
पर शादी के अगले दिन सुबह-सुबह हमारे घर हाज़िर हो गया  -
'मैंने सोचा बुआजी के घर जाकर फ़्रेश हो लूँ .वहाँ तो अपना नंबर  आने का नहीं.'
'हाँ ,हाँ आओ, बेटा.'
'अरे भैया भी आये हैं .' पाँव छूने आगे बढ़ा .
मैं पीछे हटा,माँ ने रोक दिया ,'रुको बिटिया के देवर हो .पाँव मत छूना .'
 वो तो नहा धोकर वहीं बैठ गया  .माँ चाय-नाश्ता कराने लगीं .. बातें खूब करता है !
मुझसे पूछा ,'भइया, कल आप दिखाई नहीं दिये ?'
मैं टाल गया  ,'सब बिज़ी. मुझे कौन देखता वहाँ ?"
विनय से दो साल छोटा है. प्रतियोगिताओं में बैठ रहा है , ज्यादा पूछने में मेरी कोई रुचि नहीं थी. .
वही अपने आप बताता रहा .
कोचिंग भी लेता है .
कई बार वे लोग इसे भी कुछ कक्षाओँ को कोच करने भेज देते हैं.
अपने  किस्से  बताने लगा-
एक बार क्या हुआ पास के कस्बे में इनका एक क्लास चलता है तीन-चार महीने का.
वहीं के हाईस्कूल-इन्टर के लड़के  आते हैं बहत कम सीरियस ,ज्यादातर यों ही से .
 एक क्लास में शिक्षक नहीं आया था ,सो तनय को भेज दिया  -उधर सामनेवाले कमरे में दूसरी कोई क्लास चल रही थी - जनरल नॉलेज जैसा कुछ लगा  .
,बीच में दरवाजा नहीं था .
थोड़ी देर सब शान्ति से चलता रहा .फिर कुछ गुल-गपाड़ा .
हम भी बाहर निकल के खड़े हो गये .
यहीं आस-पास के कुछ फ़ालतू के लड़के घुस आए थे. तीन थे या चार होंगे .कोचिंग में दबते कहां हैं ये लोग !
क्लास के भी  कुछ  लड़के बाहर निकल आए .

वो लड़के  बड़ी डींग हाँक रहे थे ,हमने ये कर दिया- वो कर दिया .सरकार  हम बनावत हैं . हमसे पूछो का हुइ रहा है.'
कुछ खुराफ़ात करके आये थे, उसी की गर्मी चढ़ी थी.
पहचान के लड़कों को अपनी कारस्तानियाँ सुनाने लगे
 'तुम्हारे ई सब पढ़े से कुछू नायँ होयगा .असली काम तो हम किये हैं .'
क्लास के बाहर खड़े होकर चिल्लाए थे ,'का पढ़ रहे हो ?'
 लड़कों ने जवाब दिया ,'सामान्य ज्ञान '.
'ई जो पढ़ रहे हो सब बेकार है सब गलत-सलत .रद्दी किताबन महियाँ  धरा रह जायेगा.'

'कुछू करन-धरन के  गियान  से तो ई किताबन वारे माश्टर ,सब कोरे  हैं .'
क्लास से एक ने पूछा ,'काहे ?'

'जिन लोगन के नाम गिनाय रहे हैं ,ऊ कोई रहबैया नाहीं. ई सिच्छा-मंत्री ,ऊ स्वास्थ मंत्री, ई फलान- ढिकान सब फालतू की   रटन्ट . .'
'तुम्हें कैसे पता?'.
'अरे, असली करैवारे तो हम हैं ,जो हम करें ,आगे वोई तो ये पढ़ायेंगे.'
'तुमने क्या किया ?'
'सारे  वोट हम लोगन ने  अपने हिसाब से करवाये हैं ,'
सीना  ठोंककर बोला,' हम जानित हैं. ,इनका का मालूम ?'
दूसरा चिल्लाया,'कमरा में किताबें घोटन से कुछू नाहीं होत है .बाद में सब लिखो तो उहै जात है जो हमार  करनी से सामने आवत   है.'
फिर मास्टर  से बोला, 'ई का गियान बाँट रहे हैं ,माट्साब? कान खोल के सुन लेव. तुम लोग  ई सब अट्ट-सट्ट पढ़ाय रहे हैं .खुदै को नहीं मालूम कि का हुइ रहा है.'
उजड्ड लड़कों के सामने मास्टर बिचारा क्या करे  कहा -
'अरे, जो किताब में लिखा है वही तो पढ़ावेंगे.'
 'जराय देउ ई बेकार  किताबन का . अब  तो सब बदलै का परी .लिखि कै धल्लेउ.'
लड़के बात कर रहे हैं,' हाँ ,चुनाव में नये लोग आयेंगे .' 'ये सब गलत हो जाएगा .ये लोग डंडे के ज़ोर पे  वोट डलवाते हैं .'.'सब जगह इनका दखल है.'
'अइसा काहे पढ़ो  जो कल्ल ही बदल जाय?'
'चलो रे छोरों ,.बेफालतू मूड़ी खपावत हो .'
लड़के संशयपूर्वक इधऱ-उधर देख रहे हैं.
'अरे ,ई सब पढ़ा-लिखा बेकार .कुछू काम न आई.एक नौकरी तक ना मिली.'
'ई तो हम करैवाले हैं .जौन  चाहै ,उहै करवाय लेंगे .'.
 'जान्यो , हम सब इन्तजाम पहिले ही कर लिहिन .तुम पढ़-लिख के का कर लेओगे ?'
'अपना  कैन्डीडेट ही जिताय के मानेंगे,चाहे खून-खराबा हुइ जाय'
'क्या ?..क्या कर रहे हो तुम लोग ?.चुनाव में भी गड़बड़  ?'मास्टर ने पूछा
वह दोनों हाथ हिलाकर हँसा -' काहे बतायें ?और तुमहू मास्टर चुप्पे रहो .काहे से कि हमसे पंगा लेन का नतीजा ...'...कहता-कहता लड़कों को आने का इशारा करता घूम कर चल दिया .
कुछ लड़के बात-चीत के दौरान ही उठ खड़े हुए थे चलने की मुद्रा में .उनके साथ और भी मास्टर का उतरा चेहरा  देखते उठने लगे, सब   बाहर भागे. निकल गये क्लास से  .'

मास्टर  कुछ देर हकबकाए-से खड़े देखते रहे फिर परेशान से अपना झोला उठा कर स्कूल की बाउंड्री से बाहर निकल गए .
 झुँझलाते जा रहे थे ,'इन जाहिलन  को सिच्छा देना हमारे बस की बात नहीं .  सुसरी और हवा बिगाड़ के धर दी .पालिटिक्स बदमास-गुंडन की खेती हुइ .गई .--हे राम कौन ठिकाना लगेगा ई देस का ..!....'  

खूब हँस-हँस कर वर्णन करता रहा वह !
ये तो बड़ा मज़ेदार लड़का है, मैंने सोचा - ख़ुश-मिजाज़ और तेज भी .

*
(क्रमशः)

7 टिप्‍पणियां:

  1. राजनीति और गुंडागर्दी एक वक्त में पर्याय ही बन गये थे..अब शायद कुछ बदलाव आने को है

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  2. सुंदर प्रस्तुति , आ. धन्यवाद !
    Information and solutions in Hindi ( हिंदी में समस्त प्रकार की जानकारियाँ )
    आपकी इस रचना का लिंक दिनांकः 5 . 9 . 2014 दिन शुक्रवार को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर दिया गया है , कृपया पधारें धन्यवाद !

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  3. सोलहवां कथांश एक अच्छी आर्ट-फिल्म जैसा लगा । कुछ कुछ रेनकोट की याद दिला गया । मीता मठरी देजाती है और ब्रजेश उपहार के लिये पैसे । दोनों चाहकर भी नही भुला पाएंगे एक दूसरे को । प्रेम कहाँ मिटता है ,यदि वह सच्चा है ।
    सत्रहवां कथांश आधुनिक शिक्षा के खोखलेपन और शिक्षार्थियों की अराजकता को भयावह तरीके से प्रस्तुत करता है । आपकी इस श्रंखला की प्रतीक्षा रहती है ।

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  4. पहली बार ही पढा है इस ब्लॉग( कथा) को पर मन मोह लिया। सतरहवा अंश धरातल पर ले आता है। पर अब कुछ हालात सुधरें।

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  5. शकुन्तला बहादुर5 सितंबर 2014 को 7:30 pm

    विवाह के पूर्व की जा रही कपड़े- गहनों की ख़रीदारी और धूमधाम में मन
    रम गया किन्तु जिस व्यक्ति के कारण दोनों परिवार जुड़े थे - उसका अब तटस्थ हो जाना मन में कहीं करक उठाता है ।होनी को कौन टाल सकता है ?

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  6. शकुन्तला बहादुर5 सितंबर 2014 को 7:41 pm

    आधी टिप्पणी जाने कैसे चली गई ? १७वाँकथांश आज के विद्यार्थियों
    की उच्श्ृँखलता का चित्रण करता है । लोकभाषा में उन असभ्य एवं
    अशिक्षित छात्रों की उद्दंडता और राजनीति का परिचायक है । आगे के कथांश के लिये उत्सुकता है ।

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  7. shakuntala ji se sehmat..ki jiske karan do pariwar itne sameep aaye wahi aaj tatasth hai. halanki ye saari khushiyaan uski bhi ho sakti thin.
    baharhaal, maa kee sthiti mujhe fir adhik peedadayi prateet hoti hai. maayein kaise ek ek armaan chun chun ke sajaatin hain hriday me ...chahe bahu k liye hon athva beti hetu.jaane kaise wo ek ek rasm me meeta kee buaji cum maa adhik bankar uttardayitv nibhayengi!...Brajesh to saaf bach hi gaya...kam se kam ekaant me apne dukh ko kshobh ko aur katuta ko netron se maarg de hi sakta hai..athva swayam se hone wale vartaalaap me..kintu maa...vasu ...inhe to badh chadh ke shadi ki zimmedariyan bhi nibhani hain aur khush bhi dikhna hai...ye baat meeta k liye bhi satya hai..ya aur bhi adhik kathin hai.naye navele doolhe bhavi vadhu ke mukh ko pustak ki bhaanti padhte ho rehte hain. achha hai vivah me ghoonghat kee pratha hai. itni bheed me chehal-pehal me aanchal kee hath bhar kee ot hi kaafi hai. :)

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