बुधवार, 6 अगस्त 2014

कथांश - 12.

*
माँ की भी बुरी आदत है -ये नहीं कि स्कूल से आकर ज़रा आराम कर लें .अभी आईं और रसोई में जुट गईँ .फिर रात में जाग कर कापियाँ जाँचेंगी .
'माँ, थकी हुई आई हो ,थोड़ा आराम कर लो .'
'वर्मा आंटी बीमार हैं खाना भेजना है उनके यहाँ .'
'बस तुम्हीं एक हो सबकी खैरख्वाह !काहे को इतना चढ़ा रखा है कि  सब अपनी जुम्मदारियाँ देने चले आते हैं ? मतलब साधते हैं सब, कोई मौसी कह कर कोई बहन कह कर .. .'
तुम नहीं समझोगे ,मेर भी शरीर चाहता है आराम करूँ ,इच्छा भी होती है पर जो बनाए हैं वे रिश्ते निभाना बहुत ज़रूरी है ..दौड़-दौड़ कर उनके काम न आऊँ तो कौन  मुझे पूछेगा? वक्त-जरूरत यही लोग साथ खड़े होते हैं. सबसे निभा कर चलना यही मेरी कमाई है.देखते नहीं अकेली औरत के साथ क्या-क्या होता है ?लड़की को ले कर यहाँ अकेले रहना..आसान है क्या ?'     
 'पर तुम आते ही उन सब के लिए खाना बनाने बैठ गईं .और लोग नहीं हैं क्या ?'
'माँ, तो हफ़्ते भर से उनके यहाँ नाश्ता-खाना भेजती हैं ,आंटी अस्पताल में हैं तभी से ...'
तौलिये से हाथ पोंछती वसु आ कर खड़ी हो गई थी.
'मैं आटा सानने जा रही हूँ...'कहती हुई चली गई .
' अपनी तबीयत का तो ख़याल करो . औरों के लिए इतनी अच्छी मत बनो कि अपना बिगाड़ कर लो .'
'तुम समझते क्यों नहीं? मुझे इन्हीं लोगो के साथ रहना है. बना कर न रखूं तो कौन बैठा है मेरा सगा !
दूसरों की निगाह में भली बने बिना मेरा गुज़ारा कहाँ ?'
'तुम्हारी पुरानी आदत है किसी को ना नहीं कह सकतीं ,बहाना भी नहीं बना सकतीं.दिन रात जुटे रहने का शौक है '.
'शौक है कह लो ! सब जानते हैं सिर पर कोई नहीं. .तुम सालों से बस आते-जाते बने हो .जानकर भी क्या कर लोगे?...एक दिन जब मयंक रास्ते में वसु का पीछा रहा था यही वर्मा अंकल ,उस की सुरक्षा बन गए .'
ओह,यह तो कभी दिमाग़ में ही नहीं आया था .
'...और कॉलेज में ऐसे-वैसों की कमी है क्या? दोस्ती करने चले आते हैं ,तब सौरभ इसके साथ खड़ा होता है .मन्दा इसकी सहेली है उसके  भाई को राखी बाँधती है .'
मैं  सुने जा  रहा हूँ . 
'...और लड़कियों की बात दूसरी है उनके बाप भाई  स्कूटर से पहुँचा कर आते हैं लोग लिहाज़ करते हैं...इससे  तो कहते हैं हमारी  दोस्त बन जाओ. फिर देखें कोई तुम्हारी तरफ़  आँख
भी उठाए  .
मुझे तो सबसे नब कर चलना पड़ेगा .दुनिया देखती हूँ . दूसरों से अपनापा जोड़ती हूँ ,यह सब न करूँ तो कौन पूछेगा, कौन साथ देगा ? सबको अपना अच्छापन दिखाना मेरी मजबूरी है.'

 मेरे कहने को कुछ नहीं-सच तो स्वीकार करना ही पड़ेगा.
 माँ ,ओ माँ ! क्या करूँ मैं?
अंतर्मन धिक्कार उठा है?
 *
'इज़्ज़तदार ,प्रतिष्ठित परिवार ' मन  में बार-बार खटकता है .
मुझ पर जैसे कोई भूत सवार हो जाता है .नॉर्मल नहीं रह पा रहा .मुँह से कटु वचन निकल जाते हैं.
माँ का मन दुखी होता होगा पर चुप हो जाती हैं.
राय साब अकेले
हैं. माँ से सलाह-मशविरा के बिना उनका काम नहीं चलता. एक बार मेरे सामने भी घर आए थे ,'बेटा-बेटा 'कह हाल-चाल पूछते रहे .नौकरी में सेलेक्शन सुन कर प्रभावित भी हुए बोले ,'अब जिज्जी की निश्चिंती के दिन आ गए.बहुत झेला  है इनने, मैं तो शुरू से देख रहा हूँ .'
गनीमत है पिता की कोई चर्चा नहीं की उन्होंने .   
उन के यहाँ से कुछ-न-कुछ सँदेसा आ जाता है ,और माँ जुट जाती हैं .मुझे ताव आता है .
'जाने-माने लोग हैं, बहुतेरे मिल जाएंगे काम करनेवाले  . माँ,तुम क्यों हलकान हुई जा रही हो .' मन का ग़ुबार अनायास ही निकल पड़ता है .
,'इन प्रतिष्ठित लोगों के लिए तुम ही काम करने को रह गई हो ?तुम्हारा भी कुछ ठिकाना नहीं. '
वे समझ गईं .
'बात तुम्हें लगी है .पर उनने ऐसा कुछ नहीं कहा था .उनकी बहिन थीं तब से मेरा आना-जाना है .उनने कहा था तुम देखना मेरे भाई और भतीजी का ध्यान रखना ये भी उन की जगह मुझे मानने लगे.टका सा जवाब कैसे दे दूँ ?  .और मीता उसके लिए तो मैं कुछ भी उठा  नहीं रख सकती.
हाँ, मीता के लिए ....
उनके मन की व्यथा फूट पड़ी -
 ' हमारा परिवार कम प्रतिष्ठित था ,कम सम्माननीय था ?सबके सामने   इज्ज़त बनी रहे -अपमान ,गालियाँ आरोप सब छाती पर पत्थर रख कर झेलती रही. डरती थी, बदनामी हो गई तो बच्चों को सिर उठाने को जगह नहीं रहेगी .इज़्ज़त घर की होती है. चार जने और क्या देखते हैं --आदमी का आचार-व्यवहार  .एक बार भाँडा फूटा तो सब गया . घर की मरजाद बनी रहे इसलिए उनकी सारी अतियाँ सहती रही. दुत्कारें खाकर भी घर से बाहर कदम नहीं रखा. पर  जब सबके सामने  सामने छोटे बच्चे के साथ मँझधार में छोड़ दिया  तो क्या करती ? भाई पर बोझ बन कर कितना रहती ?...और मैंने कोई घटिया काम नहीं किया . दो पाटों के बीच पिसती रही ,ऊपर से  दुनिया चैन न लेने दे ...

अब तू समझदार हो गया ..
 अब तक सिर्फ़ बेटा था मेरा, अब पढ़ लिख कर आदमी बन गया,बड़ी-बड़ी बातें बोलने लगा  .चलो ,मेरा काम खतम हुआ.'
'माँ ,तुम्हारी बात नहीं थी ,तुम अपने पर क्यों ले रही हो .'
'बराबर देख रही हूँ मुन्ना .तेरा मन समझती हूँ, पर दूसरे पर क्या बीतती है यह तू नहीं समझता .'
'तुम्हारी थकान देखी नहीं जा रही थी. ऊपर से मन खराब था कुछ भी बोल गया. मेरा यह मतलब नहीं था माँ .क्षमा कर दो मुझे !'
 बहुत पछतावा हुआ था उस दिन.
सोच लिया था और थोड़े दिनों की बात है अब तो मैं भी लग्गे  से लग गया .उन्हें कौन सा  यहाँ रहना है!

' नहीं अब यहाँ नहीं रहने दूँगा तुम्हें, माँ.' अब मेरे साथ   रहोगी'

पर बाद में जब उनसे कहा ,' माँ अब तुम्हें आराम चाहिए मेरे साथ रहो.  चलने की तैयारी करो .. .यहाँ क्या रखा है ?.'
वे तैयार नहीं हुईं बोलीं,
'कैसे चलूँगी रे , नौकरी के कुछ साल बचे हैं अध-बिच नहीं छोड़ूँगी  . पेँशन का भी तो  सवाल है  ..'
रिटायर होने से पहले नौकरी छोड़ने का उनका इरादा नहीं हुआ .छुट्टी ले कर चलने को भी कहा .
 पर कोई असर नहीं पड़ा.
' बेटा ,आदत जो पड़ी है . शान्ति से अपनी ड्यूटी पूरी करने में बड़ा चैन है. वहाँ नई जगह खाली बैठ कर ऊबती रहूँगी . चलूँगी ज़रूर तेरी जगह देख-सुन आऊँगी .थोड़ा वसु का भी चेंज हो जाएगा .

 '
बाद में उनके शब्द थे ,'अभी कहाँ छुटकारा !'
'क्यों ,अब क्या? मैं हूँ न !'
'तू तो करेगा ही ,पर अभी मेरे काम पूरे कहाँ हुए .मुझे लड़की की शादी की चिन्ता है.कहीं  तय तो हो ...  देखना  क्या-क्या सुनना-झेलना पडता है
अभी ?'
अचानक फफक कर रो उठा कोई .
ध्यान  गया उधर - वसु थी .दोनों हाथों से  मुँह दबाए  कमरे से  बाहर निकल रही थी. 
अचकचा गए हम लोग.
 ओह, वह यहीं थी - दोनो में से किसी का ध्यान नहीं गया .
  सब सुनती रही , एकदम चुप !
*

11 टिप्‍पणियां:

  1. लड़की की शादी की चिंता माँ जितनी करती है उतना और कौन करता है ..माँ को सबको चिंता रहती हैं

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  2. माँ, आज नेपथ्य के चरित्रों (वर्मा साहब और राय साहब) का सहारा लेकर सामाजिक सम्बन्धों के पारिवारिक सम्बन्धों पर प्रभाव को जिस प्रकार आपने दिखाया है, उसे देखकर मन भर आया. बहुत कुछ अपने आस-पास देखा सुना हुआ. सम्वादों के माध्यम से कथांश का विस्तार इतना स्वत: है कि लगता है कि हम भी वसु के साथ पर्दे के पीछे छिपे सबकुछ देख-सुन रहे हैं. इस प्रकार जीवन की घटनाओं का प्रत्येक चरित्र के द्वारा किया गया आकलन हमें किसी के पक्ष में खड़ा होने को प्रेरित नहीं कर पाता. न हम माँ के पक्ष में ही हो पाते हैं, न ब्रजेश की बातों को ही अनुचित ठहरा पाते हैं. और यह कशमकश न केवल कथा के चरित्रों की है, बल्कि हम पाठकों की भी है. शायद इसी का नाम ज़िन्दगी है!!
    यह शृंखला वास्तव में अनुभव के एक विशाल भण्डार का साझा करना है!!

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  3. भावपूर्ण कहानी.सबकुछ अपने आस-पास घटित होता प्रतीत होता है.

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  4. एकदम जीवंत पात्र रचना .... माँ जैसे कहीं आस-पास हो
    लेखन की उत्‍कृष्‍टता के लिये शब्‍द नहीं है

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  5. कथनों में सार्थकता और कसीदा की तरह कसी हुई प्रस्तुति
    आप किस स्तर की लेखिका हैं परिचय देती है.

    बधाई स्वीकार हो :) :)

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  6. हमारे परिवेश का ही कुछ देखा सुना सा ..... माएं ऐसी ही होती हैं

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  7. एक अकेली महिला ( विधवा नही ) किन किन आघातों को सहती है , अपना मान , अरमान सबको पीछे धकेलकर बड़प्पन ओढे रहकर जिन्दगी को थामे रहती है सब कुछ साकार होगया । बच्चों की बात भी अपनी जगह सही है लेकिन वर्षों से वह जिस राह की अभ्यस्त होगई है उसे छोड़ना भी आसान नही । बेटी की चिन्ता तो है ही ..। बहुत ही दिल में उतर जाने वाला प्रसंग है यह ।

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  8. sachchai ko hu-b-hu akshron me uatara hai aapne pratibha ji .very nice .

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  9. समाज में अकेली औरत को क्या क्या झेलना पड़ता है उसका कितना मार्मिक चित्रण हुआ है आज के अंश में...माँ, पुत्र दोनों ही सही हैं और दोनों ही विवश..

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  10. आपका ब्लॉग पढ़कर अच्छा लगा. अंतरजाल पर हिंदी समृधि के लिए किया जा रहा आपका प्रयास सराहनीय है. कृपया अपने ब्लॉग को “ब्लॉगप्रहरी:एग्रीगेटर व हिंदी सोशल नेटवर्क” से जोड़ कर अधिक से अधिक पाठकों तक पहुचाएं. ब्लॉगप्रहरी भारत का सबसे आधुनिक और सम्पूर्ण ब्लॉग मंच है. ब्लॉगप्रहरी ब्लॉग डायरेक्टरी, माइक्रो ब्लॉग, सोशल नेटवर्क, ब्लॉग रैंकिंग, एग्रीगेटर और ब्लॉग से आमदनी की सुविधाओं के साथ एक सम्पूर्ण मंच प्रदान करता है.
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  11. maa jis sthiti me hain..use achhi tarah samajhti hoon. pariwar me purush ka na hona ya sadaiv upasthit na hona kis seema tak maa ko pareshan karta hoga..usse bhi adhik doosron ka aasra banaye rakhna. kabhi kabhi koft hoti hai mujhe...k jab raktsambandh saath na dein to kyun hum bhala kisi any se sahayta lein..apeksha karein..! magar ghirna se upaji kadwahat se to duniyadari chalti nahin.
    Vasu ke liye bhi kitni pareshani ka sabab hoga bhayi aur maata ke madhya ka ye samwaad. kaisa ghar hai..kaisa pariwaar..har qirdar ke dil me jazbaaton ka amunder hai..apne apne pehloo se sabhi pareshaan hain sabhi majboor bhi...aur sabko hi aage badhna bhi hai isi tarah ke chhote bade mann ke toofaanon se paar hokar.
    maa ki dasha me adhik peeda lagti hai....santaan kee chinta me unke apne dard apni uljhanein to peechhe hi chhoot jaatin hain. itna sab sehna...mann me sahejna..aur bachchon ke hisse kee peeda ka anubhav wo chubhan bhi apne me samaa lena...ek insaan k taur par sochoon to lagta hai ki uff! maa hona kitna mushkil hai !
    aap kaise likh letin hain Pratibha ji itna kuch???? ittni baareeqi se har ek ka mann..!!!! shayad yahi lekhan kee kushalta aur safalta hoti hai..!

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