गुरुवार, 12 जून 2014

कथांश - 6 .


*
वसुधा  ,मेरी बहिन - मुझसे पाँच साल छोटी.
एक दिन माँ ने कहा,' अब इसका विवाह हो जाय तो ठीक रहे  .'
मैं चौंक गया- ' इत्ती बड़ी हो गई ?'

मुझे तो कभी बढ़ती दिखाई नहीं दी  .उस ओर मेरा ध्यान ही नहीं था .
'अठारह पार कर गई है . लड़कियाँ बड़ी जल्दी बड़ी हो जाती हैं.'

फिर बोली थीं ,'इसका घर-संसार बसा देख लूँ  तो मुझे निश्चंती हो .'
' इत्ती भी क्या जल्दी ,उसे पढ़ लेने दो .'
' बाप की छाया के बिना बेटी बड़ी बिचारी सी हो जाती है .'
'माँ, ऐसे मत कहो , मेरी बहिन किसी की दया की पात्र नहीं है. तुमने और मैंने  हमेशा  मन रखा है उसका .'
'वह नहीं कह रही बेटा .मैं दुनिया की बात कर रही हूँ .लोग जब पिता की बात करते हैं उस  पर क्या बीतती है.'
पिता की बात ! क्या बीतती है ?हाँ ,जानता हूँ मैं !
तीन-चार साल की थी वह .मालिनी के ताऊ जी से बहुत हिली थी, उन्हें पापा कहने लगी . वो लोग ताऊ को पापाजी जी कहते हैं , और अपने पिता को चाचा . जब भी वे आते  खुश हो  कह उठती  - 'मेले पप्पा आ गए!'
 अकेले भी बैठी होगी तो बोलती रहेगी ,' ये मेले पप्पा की किताब.'
मैंने पूछा- 'कहाँ हैं तेरे पप्पा?'
'वो हैं न जो मूँछें लगाए हैं, इत्ती बली वाली ..'
वे भी तो - कोई बेटी नहीं है न ,तीन बेटे हैं बस .
 कहते हैं,' बट्टो, तू ही तो मेरी बिटिया है.'
गोद में उठा लेते हैं - ऊपर उछाल देते हैं उसे .जब हाथ फैला कर गुपचते हैं वसु खिलखिला कर हँस उठती है .दोनों बाँहें गले में डाल चिपक जाती है.
 
अरे, एक बार तो मुकुन्द से लड़ गई ,उन्हीं के बेटे से .इससे तीन साल बड़ा!
उसने चिढ़ाने को कह दिया पापा तो मेरे हैं ,और सब लोग तो हमारी देखा-देखी कहने लगे.   मेरे बापू को पापा कहती है और तू भी.. .'
'वो मेले पप्पा हैं ..'
'चाहे पूछ ले किसी से ,वो तो मेरे हैं .'
' जाओ ,नहीं पूछती ' खिसिया कर चिल्लाई .'मैं क्यों पूछूँ,मैं तो कहूँगी .'
'कैसा मुँह बना रही है, बिल्ली .'
वह झपटी ,उसने दोनों हाथ पकड़ लिये, 'बोल अब क्या करेगी?'

मैं बढ़ा, दोनों को अलग करने. तब तक वसु ने किचकिचा कर उसके हाथ पर दाँत गड़ा दिये .
'अरे,अरे ,काटना मत!' मैंने उसे खींच कर हटाया.
मुकुन्द के हाथ पर दाँतों के हलके-से निशान उभर आए थे .
 भूल नहीं सकता वसु का वह खिसिआया चेहरा .
 मेरी बहिन आक्रामक स्वभाव की  नहीं है ,उस दिन जाने क्या हो गये था उसे!


फिर वह रोई थी,सिसकियों से हिलती वह छोटी सी  देह मुझे आक्रोश से भरती रही पर मैं कुछ न कर सका था.
 कितने साल बीत गए पर मुकुन्द 'कटखनी' कह कर अब भी चिढ़ा देता है .
बच्चे कितने सरल मन से किसी को अपना लेते हैं .

मैं तो ये भी नहीं कर सकता . किसी को इस प्रकार पुकार नहीं  सकता .मीता के पिता को , उसी के समान बाबूजी कह सकता था ,पर वह नौबत ही कहाँ आई. 
आज तमाम भूली-भटकी बातें मन में घिर आई हैं .
 एक बार छुट्टी में घर आया तो वसु काढ़ा बना रही थी .
'किसकी तबीयत ख़राब है, ' मैंने पूछा ,बोली .'वो उस घर में पापा जी को  ठंड लग गई है .अम्माँवाला काढ़ा बना रही हूँ .'
तब भी एक गहरी सांस खींची थी माँ ने .
 अपने पिता को कभी देखा नहीं था
उसने.अपने चारों ओर दूसरे बच्चों का लाड़-चाव ,  घुमाना ,चीज़ें खरिदवाना ,हाट-बाज़ार ले जाना सब देखती थी .
  एक बार मुझसे पूछा था,' भइया ,अपने पिताजी कहाँ हैं?'
बातों में बहला दिया मैंने . समझ में नहीं आया उससे क्या कहूँ .

ये भी नहीं कह सकता कि वे नहीं हैं..उफ़, क्या-क्या सोच जाता है मन!
कैसे, कहाँ, क्यों? कोई उत्तर नहीं  .उन्होंने माँ को छोड़ दिया ?माँ ने छोड़ दिया ?कुछ भी मुँह से नहीं निकलता . वे कहाँ हैं, क्या करते हैं,कभी आते-जाते हैं किे नहीं ? 

बड़ा मुश्किल है सब  प्रश्नों के उत्तर देना .

सोच था एक दिन उसे पास बैठा कर बात करूँगा .समझाऊँगा - सब को दुनिया में सब-कुछ नहीं मिलता !

इस सच को,जिसमें मेरी कोई भूमिका नहीं मैं  नहीं पचा पाता .मन के भीतर  उठते दुर्वेग  को झेलते, सहज होने का दिखावा कितना कठिन है !
 बच कर भागने को कोई रास्ता नहीं .जाऊँगा भी कहाँ , सब साथ चलेगा.
माँ के सामने भी यही सब आता होगा .उनने क्या सोचा होगा पता नहीं कैसे झेला होगा  . 

वे  कह देती थीं , 'उनकी नौकरी ऐसी है कि मुझे साथ नहीं रख सकते .'
पीछे-पीछे बहुत बातें करते थे लोग पर धीरे-धीरे समझ में आने लगा.माँ के सौजन्य से ,उनके आचार-व्यवहार , और उनकी दृढ़ता का प्रभाव कि
लोग उनसे सहानुभूति रखने लगे  . जो कहते होंगे पीछे कहते होंगे सामने कोई नहीं बोलता.उनका  सादा रहन-सहन और ज़रूरत पड़ने पर  सहायता हेतु सदा तत्परता ,उन पर विश्वास करते हैं सब ,मन से आदर करते हैं. 
*
माँ को  मामा का ही सहारा था .
मामा के तीनों बच्चे प्रायः ही उनके पास आ जाते थे .वे पढ़ाई में उनकी सहायता कर देतीं थीं, उनका कहना था  लोग यह भी देखते हैं कि इनके घर संबंधी-कुटुंबियों का आना-जाना  चलता है या नहीं .तीज-त्योहार खाली न रहें   मामा भी बहिन का मान रखने की कोशिश करते थे .
 बड़े होते-होते वसु ने मामी से बहुत सी बातें जान ली थीं. फिर भी पर मन में एक उत्सुकता , उन्हें देखने की इच्छा , इस संबंध के प्रति एक ललक ,उसके मन से जाती नहीं थी.
 घर हो चाहे बाहर ,पिता की चर्चा उठते ही मेरा व्यवहार असहज हो जाता  .किसी के सामने घर-परिवार की बातें न ,उठें यही मनाता रहता . 
वे हमारी ज़िन्दगी में नहीं हैं ...मुँह से नहीं कह सकता.एक छाया-ग्रह के समान उनका उल्लेख सारी खुशियों को ग्रस लेता है.  

बचपन से बड़ा चुप्पा हो गया था  .सबसे मिलने-जुलने से कतराता था.
 जो बहुत अपने रहे उन्हीं से अपमानित होता रहा अपनी आलोचनाएँ ही सुनता आया . शिकायत भी
किससे करता !
सामने-सामने मेरी हेठी होती  और मैं चुप देखता रहता ,इसके सिवा और चारा भी क्या था साथ के लोग कहाँ के कहाँ पहुँच गए , पीछेवाले आगे निकल गए .और मैं बस जहाँ के तहाँ  !

 क्या कमी रही .कहाँ चूक हुई मुझसे ?
 एक तार  भंग होते ही आगे का सब तार-तार होने लगता है !
जिसे जो कहना था कह गया ,जाने क्या समझते रहे लोग मुझे. मैं जैसा नहीं था .वही दोष झेलता रहा.सामने कोई कहे ,कोई पूछे तो बोलूँ ,पीछे-पीछे बातें बनती रहें ,कानों तक आवाज़ें आती रहें तो किसे जवाब दूँ ?
मेरे कहने को कुछ नहीं .कोई ऑप्शन नहीं मेरे पास !
   *

10 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीया ,यह कथांश क्या पूरा एक उपन्यास है एक व्यग्रता से एक अन्तहीन तलाश लिये । मन को विश्राम कहाँ । एक संवेदनशील व्यक्ति को हमेशा ही किसी न किसी रूप में विरोध सहना होता है । निराला जी की ये पंक्तियाँ मुझे इतनी आत्मीय लगतीं हैं कि मन द्रवित होजाता है । कहानी बहुत ही अपनी सी लगी । आभार ।

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  2. प्रभावशाली भावपूर्ण भाषा और रोचक कथा क्रम..

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  3. शकुन्तला बहादुर13 जून 2014 को 5:05 pm

    आत्मचिंतन प्रभावी और भावपूर्ण है । कथांश इस बार कुछ संक्षिप्त सा
    लगा । अत: आगे की कथा के लिये जिज्ञासा निरन्तर बनी हुई है ।
    अगली कड़ी की उत्सुकता से प्रतीक्षा है । सुन्दर अभिव्यक्ति के लिये
    साधुवाद !!

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  4. माँ... समय मिलते ही पहले से शुरू करते हुये छठे तक पहुँचता हूँ. इस अंश को पढते हुये सारा लगा कि अपनी ही कहानी जैसा है कुछ!!

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    1. अपनी सुविधा से आना सलिल,तुम्हारी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी.

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  5. सारे कथांश एक साथ पढ़े । मन भावुक हो गया । एक स्त्री की संघर्ष की कहानी और पति के दंभ को उकेरती कथा
    सारे पात्र बिलकुल सहज । आम ज़िन्दगी में आस पास मिलते चरित्र । आगे भी इंतज़ार रहेगा ।।

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  6. आज ऑफिस से आया तो कुछ भी नहीं था पढने या समय बिताने को. सोचा आज इस कथांश के सारे पिछले अंश पढ जाऊँ. अभी बैठ कर लगातार सारे अंक पढ गया.
    और मेरा पिछला कमेण्त अगर आप गौर से देखें तो तो यह बात सिद्ध होती है कि चावल के पकने की जाँच करने को एक दाना ही दबाना पर्याप्त होता है. मैंने कहा था कि यह कहानी बहुत कुछ मेरी कहानी से मिलती जुलती है और जब पिछली कड़ियों को पढ चुका हूम तो दावे के साथ कह सकता हूँ कि मेरी बात सही है. कई बातें तो आपसे भी साझा की हैं.
    इस कहानी को पढते हुये कहीं भी यह नहीं लगता कि यह किसी स्त्री की रचना है. चुँकि यह क हानी एक पुरुष पात्र के आत्मकथ्य के रूप में विकसित हुई है इसलिये इसके वर्णन , शब्दचित्र, सम्वाद और दृष्टिकोण से यह लगना कि यह एक पुरुष की अभिव्यक्ति है, इस कहानी की सफलता है.
    घटनाक्रम इतने सजीव और जीवंत रूप में प्रस्तुत किये गये हैं कि प्रत्यक्ष देखने का बोध कराते हैं. चरित्र यद्यपि बहुत कम हैं, तथापि हमारे समाज का हिस्सा हैं. पुरुष का अहंकार, स्त्री का आत्मसम्मान, एक किशोर का प्रेम की प्रथम अनुभूति को जीना सामाजिक परिवेश और रूढियाँ, सब ज्यों की त्यों दर्शाई गई हैं.
    सम्वादों का सहारा जहाँ कहीं भी लिया गया है, वहाँ एक अलग ही सुन्दरता आ गई है कथा में.
    वह वर्णन, जहाँ ब्रजेश को स्त्री के नाम पर अपने परिवार की समस्त स्त्रियाँ याद आजाती हैं और उनके प्रति उसकी भावना स्वत: अभिव्यक्त होने लगती हैं, मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत पसन्द आया और पूरी कहानी का सबसे सुन्दर अंश भी लगा.
    पिता को हालाँकि 'खलनायक' के रूप में प्रस्तुत किया गया है, लेकिन वह भी टिपिकल विलन नहीं है. जिस पृष्ठभूमि से वह आता है उसमें ऐसे ही पुरुष पाए जाते हैं. हाँ, माँ का चरित्र क्रांतिकारी है.
    कमेण्त बहुत बड़ा हो गया, क्योंकि छ: अंकों का एक साथ लिखा है. अब आगे से हरेक के लिये एक.
    वैसे आपके लिखे पर कुछ भी कहने का सामर्थ्य मुझमें नहीं है, माँ! आशीष दें कि जो लिखा वो ईमानदारी से लिखा!

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  7. हाँ सलिल, तुम्हारी बात,पिता के टिपिकल विलेन न होने की,और उसकी पृष्ठभूमि वाली सही है. पत्नी( भार्या होने के नाते भरण-पोषण पाती है,आश्रिता है) उसी के कारण औरों के सामने उसो अपनी हेठी होती लगती है,ऊपर से लडकों की फब्ती' 'अरे बुड्ढे, हमारे लिए भी तो कुछ छोड़ दे.' एक कांप्लेक्स बन गया है उसमें.
    माँ की मजबूरी- पति द्वारा निरंतर प्रतारणाएँ और मायके में भी अकारण अपमान कर रिश्तेदारों के सामने भी तिरस्कृत कर छोड़ जाने की असह्य स्थिति में अपने आप लौटना वह नहीं कर सकी .
    बहुत पहले से कई कहानियों में पुरुष-पात्र का निर्वाह करती रही. एक बार बड़े ज़ोरों से एक योजना बनाई थी -पूरा नकशा नहीं बना था, बनने की प्रक्रिया में था .
    हुआ यों कि उपन्यास साहित्य पर बहस चल रही थी .अचानक मन में आया एक उपन्यास लिखें मिल कर -एक लेखक एक लेखिका .
    विभाजन के चार सूत्र हो सकते हैं -

    1 पुरुष पात्रों का काम पुरुष लेखक करे ,नारी पात्रों का लेखिका .
    अथवा,
    2. पुरुष पात्रों का लेखिका करे और नारी का लेखक- रचनाकार नारी-पुरुष भेद से परे केवल भोक्ता रहे.

    3 एक-एक अध्याय बारी-बारी से- एक जहाँ से छोड़े वहाँ से दूसरा उठाए .
    4 एक प्रारंभ करेगा.दूसरा समापन .
    भाषा-शैली में अनुरूपता रखी जाए कि पढ़ने वालों को झटके न झेलने पड़ें.एक-दूसरे के अनुकूल बने रहने की लगातार कोशिश करें .
    मन में मैटर जमा होने लगा .
    पर योजना धरी की धरी रह गई .
    मैटर कभी समाप्त होता है क्या -किसी-न किसी रूप में कभी-न-कभी ढल ही जाएगा .
    अब इस रूप में सही.

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  8. सरल सहज भाव से लिखा गया जीवन चक्र जो चलता रहता है...सभी पात्र अपने आसपास चलते फिरते दिखाई देते हैं...रिटायरमेंट के बाद भी जीवन चलता रहेगा ...उत्सुकता है जीवन धारा कैसे बहेगी... इंतज़ार रहेगा... प्रतिभा दी...आपकी टिप्पणी में जो इच्छा दिखी वह बहुत पहले कुछ वरिष्ठ ब्लॉगर एक ब्लॉग के माध्यम से लिख चुके हैं जो आजकल निष्क्रिय है.

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  9. :)

    kabhi aisa bhi purush paatr likhiega Pratibha JI...jo kya soch kar apna jeewan bitata hoga patni aur dudhmuhein bachchon ko tajne ke baad.

    mann kasaila ho gaya padh kar..kuch baatein jeewan se mita dena asambhav sa hai...saalon me bhi shayad nahin sambha ho sakta.
    (wo bahut achha idea hai aapka....ye kaam sher-o-shayri ke sandarbh me to kiya hua hai yahin internet per..katha kahani ke pehloo se pehli dafe sun rahi hoon.)

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