रविवार, 7 अक्तूबर 2012

पीला गुलाब - 2 & 3 .



*
चार साल बीत गए.
उस दिन शृंगार किए बैठी रह गई थी ,आज फिर विवाह-मंडप में उपस्थित है -किसी दूसरे के लिए .
वस्त्राभूषण का चढ़ावा सम्हालती भाभी रुचि को लिवा ले गईं.
कर्नल साहब फिर सोने नहीं गए .
वहीं साइड में पड़े काउच पर बैठ गए .किसी से कुछ बात-चीत नहीं .वैसे भी उनके  व्यक्तित्व से सब रौब खाते हैं .
दोनों पक्षों की हँसी ठिठोली चलती रही .उनके संयत गंभीर व्यक्तित्व के सामने किसी की हिम्मत नहीं पड़ी कि कुछ कहे .उन्होंने ने सूट की जेब से सिगरेट केस निकाल कर एक सिगरेट निकाली .छोटे बहनोई ने लाइटर से जला दी .वे चुपचाप शून्य में ताकते बैठे सिगरेट पीते रहे । ख़त्म होते ही दूसरी जला ली .
वर को लाकर बिठाया गया .रस्में पूरी की जाती रहीं . कन्या के पिता कन्या के भाई ,सबकी पुकार लगती रही ।सब आ-आ कर अपना रोल निभाते रहे .
'कन्या को बुलाइये .'
कन्या की सखियाँ उसे मंडप में ले आईं .
उन्होंने तीसरी सिगरेट जला ली थी .
'नहीं अभी कन्या वामांग में नहीं ,दाहिनी ओर बिठाइये .
फूल माला जल, अक्षत ,मधुपर्क ,खीलें ,कलावा -
सिगरेटें खत्म होती रहीं ,जलती रहीं .
पाँचवीं सिगरेट !
ट्रे घूमती रही ,कभी कोल्ड-ड्रिंक कभी चाय ,कॉफ़ी .
कर्नल साहब ,बिना देखे ,सिर हिला कर मना करते रहे .
इधर -उधर बैठे लोग शादी की मौज में रमे रहे .कन्या-पक्ष की लड़कियों को छेड़ते रहे .
छोटे -बड़े बहनोई अपने साथियों के साथ बैठे हँसी-ठिठोली करते रहे .कन्या-पक्ष की बहुयें और लड़कियाँ हँसती रहीं.
ये सातवीं सिगरेट है .
' हमारे लड़के से तो सब कहलवा लिया पंडिज्जी ,उनसे भी तो कहलवाओ .'
पंडिज्जी मुस्करा दिये -कन्या ज़ोर से कैसे बोलेगी ?'
'क्या पता उनने प्रतिज्ञा की या नहीं एक बार तो 'हाँ' कहला दीजिये .'
'हाँ और क्या धीरे से ही कह दें, हम कान लगाये हैं .'
  वर पक्ष के लड़के  , कौतुक भरे मुख से  ,दुल्हन की ओर कान  किये हैं .
'कह दो बिटिया - हाँ .'
आवाज़ नहीं आई .
'भई ,ये तो गलत है .एक से सब कबुलवाना ,दूसरे से कुछ नहीं ।'
'मौनं स्वीकृति लक्षणम् ',पडित जी ने व्यवस्था दी .
फिर हँसी मज़ाक हुआ .
सातवीं भी जल चुकी .
'लाजा होम के लिये कन्या का भाई आये ,' पंडित जी  ने पुकारा .
भाई ने आगे बढ. खींलो से भरी थाली उठा ली .'
' इधर  कन्या के पीछे रहना बेटा ,..हाँ, दोनों जन खड़े हो जाइये ,बस ऐसे थोड़ा आगे-पीछे.'
भाई ने खीलें बहिन के हाथ में दीं 
' वर के हाथ  में दे दो बिटिया .लाजा होम दो..'
लाजा होम ! रुचि ने सुना  - किसके हाथ? 
ओह ,चुप हो जा  मन !
 सिर झुकाये उसने  शिब्बू के फैले हाथ में ...लाजा सौंप दीं .तीनों बार !
कन्यादान ,फेरे, सिंदूर-दान , सब  कर्यक्रम चलते रहे, एक के बाद एक .
 ..दसवीं सिगरेट फुँक चुकी .
अभी रात के सिर्फ.
 दो बजे हैं .कितन सिगरेटें फूँकीं उन्होंने उस रात -गिनने की फ़ुर्सत किसे ?

*
रिश्तेदारों में वही चर्चा चल रही है .
चार साल पहले भी यही बरात आई थी इसी लड़की के लिए .
कोई कह रहा था -जा रही है उसी घर में ,पर चार साल बाद किसी दूसरे से गाँठ बाँध कर !
' अच्छा !'
'पर हो क्या गया था ?
हुआ क्या था ? बारात का स्वागत हो चुका था .जयमाल पड़ चुकी थी .
पर बारात लौटा दी .
किसने ?
लंबी कहानी है -होता वही है जो किस्मत में लिखा होता है ।जाना उसी घर में था पर बड़े के बजाय छोटे से गाँठ जोड़ कर ।'
कहानी वही सुन्दर पढी-लिखी लड़की -ब्राह्मण परिवार की.किस्मत से संबंध तय हो गया अच्छे घर में,लरिका सेना में बड़ा आफिसर रहे -कोई माँग नहीं.काहे से कि लरिका के मन भाय गई थी.
हवाई जहाज़ से बारात आई .तब तक सब ठीक- ठाक रहै .
पर ऊ फौज के लोग ,उनके दोस्त आये रहे .उन्हें कहाँ खाने-पीने से परहेज़ .
बोतलें खोल लीं ,बाज़ार से नॉनवेज मँगा लिया मस्ती कर रहे थे.किसी ने जाकर घर की औरतों को फूँक दिया .बस,हल्ला मच गया ,शराबी-कबावी हैं .कैसे गुजर-होगी लड़की की .
शराब की लत में बर्बादी के जाने कितने किस्से याद किए जाने लगे .रोना-धोना मच गया.
और नतीजा ये कि कहला दिया लड़की ब्याह से मना कर रही है .
वो लोग पहले तो कहते-बताते रहे . 
लड़के ने ख़ुद कहा  एक बार सुरुचि  को सामने बुला दो. वो आकर कह दे ,हम चुपचाप चले जायेंगे .
पर इन लोगों ने लड़की को सामने लाने से से साफ़ मना कर दिया .
क्या करते बिचारे !दो-दो पेग और चढ़ा लिए ,लौटने की तैयारी करने लगे .
*
पर होनी को कुछू और मंजूर रहै .बड़ेन को  लगा बिना बहू बरात कैसे लौटे ?
सोच-विचार होने लगा .बरात में जौन लोग हते ,सभै हल सुझावै लाग .एक संबंधी हते  तिनकी यहीं उनकी रिस्तेदारी में एक कुआँरी  लड़की रही, बिन माँ-बाप की,अच्छी रहै ,दहेज का भरना कौन भरे सो बियाह नाहीं होय पा रहा था . मामा के पास पली बढ़ी रहे ,
सँदेसा ले कर पहुँच गये ुउनके घर .भाग खुल गये उनके तो चट् तैयार हुइ गये
 आगे बढ़ के  के ब्याह दी  .आई है बरात में कर्नल पति के साथ !

और इहका  जब एक धब्बा लगा लग गया.जहाँ जायें ,बात चलायें सब इहै पूछैं बरात काहे लौट गई?बाम्हनन के दिमाग ठहरे .जरा में सनक जात हैं. बस इहैं बात अटक जात रही .
चार बरस बाद एक लरिका की खबर मिली  लड़का  मामूली क्लर्क रहे ,वइसे कुल परवार सब दुरुस्त  .सो का करते कब लौं लरकिनी बैठाए रखते .
बात चलाई ऊ तैयार हुइगे .कहे लाग हाँ,हाँ लरकिनी हमार देखी भई है .ई लरिका सराब छुअत भी नहीं .पक्का बिरहमन .
भवा का कि उहै आरमी ऑफिसर केर छोट भाई रहे .
अउर का !
' हाँ कर्नल साहब का छोटा भाई है ।'
उमर का कितना फ़रक है भाइयों में ?'
'डेढ साल का ।'
'अच्छा !पर जमीन -आसमान का फरक है दोनो में  ।'
'हाँ वो तो हई है ।'
'वो थोड़े साँवले लंबे हर चीज़ के शौकीन .और ये रंग थोड़ा साफ़ है पर उनसे बित्ते भर छोटे .घर में बैठे रहेंगे कहीं आने-जाने से भी जी चुरायेंगे .'
'इसीलिये न खेलने में रहे न पढ़ने में ।इस्कूल में किलर्क की
नौकरी लगी है ,उस इ में परम संतुष्ट !'
'महतारी तबैं नाहीं रहीं थीं . इलात-विलात फिरत रहा ,बड़ा हुइगा .कोऊ ध्यान न दिहा सो क्वाँरा रहै. उन्हका तो छप्पर फाड़ के मिला .सुन्दर लरकिनी, पढ़ी-लिखी जाने-बूझे घर की ऊपर से कमाऊ.काहे बारात लौटी रही, सोऊ सब जान रहे  .ई भी तो इन्टरै कालिज में पढ़ाती हैं पिछले तीन साल से .चट्ट हाँ कर दिहिन.'
'कहाँ कर्नल साहब और कहाँ ई किलर्कवा सब किस्मत की बात .'
' करनल  तो अब भवा ,ई सादी तय  होवन के बाद  .'
*
3 .

ससुराल में ननदें आईं उतारने .
एक ने ठिठोली की ,' वाह !चार साल पहले आनेवाली थीं ,अब आईं हैं आप ?'
दूसरी बोली ,'आना तो यहीं पड़ा न इसी घर में ?चलो अच्छा है पहले बड़ी बन कर आतीं अब छोटी बन कर आई हैं .'
एक लड़की बोली ,'क्या इनकी शादी चार साल पहले से तय थी ?''
ननद बोली ,'तय क्या ?बरात तक चली गई थी इन्हें लेने .तब बड़के दादा के लिये .'
' बड़के दादा के साथ ?अच्छा.... !'
,'अरे ,बक-बक बंद करो अपनी ,और ले जाओ इन्हें अंदर ,' सामान उतरवाते बड़के दादा बोले।
*
'परछन की तैयारियाँ हो रही हैं .अभी बहू को बाहर ही रोक कर रखना ,' जिठानी ने दरवाज़े पर आकर कहा .
पड़ोस के बाहरी कमरे में बहू के बैठने का इन्तज़ाम कर दिया गया.
' रात भर का सफ़र करके आई है बिचारी .तनिक फ़्रेश होले .चाय वग़ैरा वहीं पहुँचा देना .'
जिठानी ,बड़ी ठसकेदार ऊपर से कर्नल की बीवी .उनका कहा कोई टाल नहीं सकता .सारा प्रबंध उन्हीं को करना था .
बहू तैयार हो गई .
'अरे ,अब छुटके कहाँ ग़ायब हो गये '
'शिब्बू ,पहले ही घर में घुस गये .नहाय रहे हैंगे .'
' अकेले घर में घुसने किसने दया उन्हें ?निकालो जल्दी बाहर, निकरौसी के बाद तो दुलहिन के साथ ही गृह-प्रवेश होगा .'

दरवाजे के अंदर परिवार की सुहागिनें स्वागत को तैयार .लड़कियों को पीछे धकेल दिया .'यहाँ परछन में तुम्हारा क्या काम   ?तुम जाकर दरवाजा रुकाई करना .'
कोई नहीं हट रहीं ,आगे पीछे हो कर सब वहीं जमी हैं .
कुछ  लड़कियाँ बाहर आ गईं , दूल्हा-दुल्हन के आस-पास.
एक तरफ़ परजा-पजारू सिमट आये (नाउन बारिन महरी आदि)निछावर वसूली करनी है न !
ठोड़ी तक घूँघट लटकाये नवेली दुल्हन खड़ी है,शिब्बू से गाँठ  जोड़े.देहरी के
उस पार 
आरती का थाल लिये इस पार  महिलायें इकट्ठी .अगुआ हैं बूढ़-सुहागिन ताई.
'अरे, सिर पर  मौर नही धरा  !' ,
शिब्बू भिनके , 'अब नहीं लगाना मौर. ' .
बहू के तो पहले ही मौरी बाँध दी है लड़कियों ने .शिब्बू सुनते  नहीं.
'धर देओ सिर पे,  सगुन की बात है अउर का .'

बड़-बूढ़ियाँ बहू को घूँघट में से ही रोली -अक्षत लगाये दे रही हैं .मुँह -दिखाई के बिना कैसे  चेहरा खोलें 

आरती- निछावर होने लगी .
अब जाने क्या-क्या दिखाया जा रहा है नवागता बहू को .
 -ले बहू गुड़, गुणवंती हो .
ले बहू रुपया रूपवंती हो ,
इत्ते में कोई बोली,'और  सतवंती के लिये क्या ?
ताई ने सुझाया ,' नेक सत्तू लै आओ .'
ताई की बहू  हँस रही है  ,'अरे वाह , बहू को सत्तू दिखा के सतवंती बनाओगी ?' ..
 परिवार की पुरखिन ताई को कुछ याद आ गया ,आवाज़ लगाई ,'अरे ,तनी मूसर तो लै आओ, बहुयें-बिटियां सब भूल जाती हैंगी ....'
किरन ने दोहराया ,'अरे हाँ मूसल ..!'
महरी की लड़की तुरंत बखारे में दौड़ी
ऊपर से  बड़के भैया सीढ़ियों से  उतर रहे थे  .
'ये क्या हो रहा है ?'
वह मूसल घसीटते बोली, ' नई बहू की परछन के लै मँगाओ है .'
किसी महिला ने बताया ,' मूसल देख लेगी घर में ,तो दब कर रहेगी न !'
'ये कौन बात हुई ?
'अरे ,तुम काहे बोल रहे ये तो रीत है .'
'बेढंगी रीत...क्या तमाशा खड़ा किये हो  .' लड़की  की ओर घूम कर बोले .'ले जा मूसल .'
पति की बात सुन किरन चट् से बोलीं ,'
 'हमें मूसर दिखाओ तब तो कुछू नहीं बोले ,उनके लिये बड़ा तरस आय रहा है !'
लड़की दीवाल से मूसल टिकाये ठिठकी खड़ी है
'अपनी शादी में कौन बोल पाता है. अब  हम बड़ों में हैं .'
 कस के जो लड़की  को देखा ,वह मूसल घसीटती वहीं से लौट ली .
*

परछन के बाद मुँह-दिखाई  .किसने क्या दिया ,रुपया ज़ेवर सबका हिसाब रख रहीं थी पास बैठी बड़ी बहू .सब उठा-उठा कर चेक करती लिखती जा रही थी .बड़ी लंबी लिस्ट थी.
'पूछ तो सबका रही हैं ,आप क्या दे रही हैं बड़ी भाभी ?'
'मैने तो अपना देवर ही दे दिया .'
'हुँह ,ये भी कोई बात हुई ?'
देख लो ,लिखा है सबसे पहले .'
झाँक कर देखा - मिसेज़ अभिमन्यु के नाम पर लिखे हैं हीरे के टॉप्स !मिसेज़ अभिमन्यु माने कर्नल साहब की पत्नी .
अगले दिन बात उठी सब रिश्तेदारों से बहू का परिचय करवा दो -पता नही कौन कब चला जाय .
परिचय अर्थात् खीर खिलाई .बहू अपने हाथों बनाई खीर परस-परस कर सब को देगी ,उनके पास जाकर जैसे ननदोई से ,'जीजा जी लीजिये .'कह कर चरण स्पर्श करती .
और वे खीर लेकर उसे कुछ भेंट देंगे .
'अरे इतनी सी खीर ?भई बड़ी मँहगी पड़ी .'
उसे भेंट या रुपये पकड़ा देते .वह सिर झुकाये झिझकते हुये ले कर साथ परिचय देती चल रही ननद को पकड़ा देती .
'ये तुम्हारे ससुर जी हैं ?क्या कहोगी पापा जी या बाबूजी ?'
'जो सब कहते हैं वही तो कहेगी ,'जिठानी बोलीं .
'बाबूजी' कह कर उसने पाँव छुये .
उन्होंने सिर पर हाथ रखा ,'आज को तुम्हारी सास होतीं तो ...'
'अरे बाबू जी ,' अम्माँ नहीं हैं तो क्या बहू बड़ी आदर्शवादी है .कुछ कहने समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी .'
उन्होंने एक जोड़ कंगन पकड़ा दिये .'तुम्हारी सास ने दोनो बहुओं के लिये एक से बनवाये थे .'
उसने झुक कर दोनों हाथों से विधिपूर्वक चरण छू कर माथे से लगाये .
ये ताऊ जी ,ये चाचा जी -ये जीजाजी , बरेलीवाले जे ,ताऊ जी के मँझले बेटे .'
अरे ,नाम बताओ ।ऐसे कैसे याद रखेगी ?'
'हाँ इनका नाम सुरेन्द्र बहादुर .क्यों लल्ला जी ,क्या बहादुरी दिखाई आपने
.'
'कहाँ भौजी ,बहादुरी दिखाने का ठेका तो कर्नल साहब का है .हम तो आपके सामने कलेजा थाम कर रह जाते हैं .'
ज़ोरदार ठहाका .
लोग छँटते जा रहे हैं .
'काहे भौजी , कंडैल साहब को कहाँ दुकाय दिया ?कंजूस कहीं के ..'
'काहे गँवारन की तरह कंडैल-कंडैल कहते हो ?नई बहू तुम्हें अपढ समझेगी .'
'समझन देओ .बस तुम हमें समझती रहो ,हम उसई में खुस .'
''ये तुम्हारे जेठ प्रिन्सिपल हैं ,अपढ-गँवार मत समझ लेना .तुम्हें भी पढ़ाय देंगे !.
'चलो मनुआ हो !कहाँ खिसक लिये ?बड़े कंजूस आदमी हो भाई "' उन्होंने आवाज़ लगाई .
उसने सोचा था कर्नल साहब को अभि कहा जाता होगा पर घर उनका घर का नाम मनू है .
'हम तो आही रहे थे .'
'लल्ला जी ,वो खिसके नहीं थे माल लेने गये होंगे .'
' उन्हीं की ओरी लेंगी न!'
देख लो भाभी ,पहले तुम्हारी जगह यही आने वाली थीं .'
'तो हमने कौन रोक दिया था देवर जी !काहे नहीं आ गईं ?
' लिखी तो शिब्बू के नाम रहीं ,उन्हें कइस मिल जातीं ,' किसी बड़ी-बूझी की आवाज़ थी ,'तभी न दरवाजे से बरात लौट आई .'
'क्या बेकार की बातें लगा रखी हैं '  कर्नल साहब ने चुप कर दिया सबको .वे  रस्म के लिये आ कर खड़े हो गये थे 
'उन्हें ये सब बातें अच्छी नहीं लगतीं ,' जिठानी बोलीं ' क्या फ़ायदा ?जो हो गया खतम करो .'
खीर भरी कटोरी बहू के हाथ में पकड़ाती छोटी ननद बोली ,'तो भाभी ,अपने जेठ के पाँव छुओ कहो जेठ जी !'
'जेठजी कौन कहता है ?भाई साहब कहो ,नहीं तो दादा जी ...',जिठानी का सुझाव था .
सिर झुकाये ही खीर की कटोरी उसने उनके हाथ में पकड़ाई ,और झुक गई पांवों पर.कर्नल साहब ज्यों के त्यों सन्न से खड़े रह गये .
'अरे ,उसे खीर खिलाई तो दो ,'जिठानी ने टोका तो वास्तविक जगत में आये ।पत्नी ने जो हाथ में पकड़ा दिया लेकर उसकी ओर बढ़ा दिया और घूम कर चल दिये .लौटते-लौटते जेब से रूमाल निकाल कर पाँवों पर टपके दो बूँद आँसू उन्होंने धीरे से पोंछ दिये .
पीछे से आवाज़ आ रही थी ,'क्या दिया बड़के दादा ने ?
' जड़ाऊ पेन्डेन्ट.'
'अरे वाह ,लटकन में कन्हैया जी लटकाय दिये हैं ,ले ओ छोटी भाभी,मीरा बाई बन जाओ अब .'
' वाह !'
आँसुओं से धुँधला गई आँखों से वह कुछ देख नहीं पा रही थी .
घूँघट से कितनी सुविधा हो जाती है!
*
(क्रमशः)

टिप्पणियाँ -

  1. सुंदर कहानी के लिए साधुवाद! मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है!
    कहानी काफ़ी रोचक है
    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सरल कहानी है प्रतिभा जी.....आपके शब्दों में बेहद सादगी थी..अच्छी लगी जो बहुत...:)
    मैंने तो नायक और नायिका अपने प्रिय संजीव कुमार और जया भादुड़ी को चुन लिया था......ऐसा लगा शब्दों के साथ साथ एक फिल्म भी देख ली.........अंत में घूंघट के अंदर से भरी भरी आँखें लिए जया जी का close-up और मुंह फेर कर जाते हुए संजीव कुमार जी के चेहरे की गंभीरता....वाह!!और तो और सह कलाकार भी सारे वासु दा,ऋषिकेश मुख़र्जी,और गुलज़ार की फिल्मों से लिए थे....:):)

    ''घूँघट से कितनी सुविधा हो जाती है''.....:)
    ....वाकई..!! कोई भी चीज़ नाकारा नहीं होती....कहीं न कहीं सबका कोई न कोई महत्व है ही..:)

    ''समझन देओ .बस तुम हमे समझती रहो ,हम उसई में खुस .''

    ये संवाद..सुबह से मेरे दिमाग से निकला नहीं....बार बार ''उसई में खुस'..'' याद आता और मैं हंसने लग जाती थी...:D
    वास्तव में आज सुबह सुबह ये कहानी पढ़ी..३ ४ बार 'टिप्पणी' पोस्ट की मगर तकनीकी गड़बड़ हो जा रही थी.......अब जाके हुई :)
    कहानी के नायक और नायिका आगे कैसे जिंदगी निर्वाह करेंगे.....काफी देर तक सोचती रही...फिर सोचा...कलयुग है..सब तरह के समझौते यहाँ संभव हैं....कोई मन मार लेगा..कोई ज़मीर..कोई आत्मा.....

    खैर..
    बधाई इस पीले गुलाब के लिए...:)


15 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर कथा-
    पढ़ रहा हूँ-
    सादर -

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  2. ज़िंदगी की सच्चाईयों को उकेरती अच्छी कहानी ... किस्मत बहुत कुछ देती है जिसे हम अपने आप खो देते हैं ....

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  3. picchli kadi me kayi baate saaf nahi ho payi thi jo is kadi ko padh kar ho gayi. kitna man ko ashant kar dene wala ghatna kram hai....ki jis ghar me chaar sal pahle jana tha aaj chhote bhayi ki patni ban kar jana aur har waqt us insan ka saamna karna jiski baarat lauta di thi...kayi jakham jindgi bhar nahi bharte...ye bhi shayed unme se ek hai.

    dulhan ka grah pravesh....ghar ki istriyon ki baaten aur nayi dulhan ki prichay rasm ko bahut bahut hi baareeki se prastut kiya hai...vastvikta ki jameen banati shrinkhla.

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  4. ्कहानी अपने प्रवाह मे बहा ले जा रही है………आगे का इंतज़ार है अब्।

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  5. आपकी इस उत्कृष्ट प्रस्तुति की चर्चा कल मंगलवार ९/१०/१२ को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी

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  6. बहुत बारीक चित्रण है। लगा,जैसे सीधा प्रसारण हो।
    आत्म-निर्भरता के बावजूद,वैवाहिक मामलों में समाज का दृष्टिकोण और स्त्री की विवशता चिंता का विषय हैं।

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  7. शकुन्तला बहादुर8 अक्तूबर 2012 को 11:24 pm

    वाह प्रतिभा जी,हमारे घरों में होने वाले विवाह-समारोह का ऐसा माहौल बनाया है कि आँखों के सामने चित्र सा आ गया।ऐसा लगा कि मैं भी उन्हीं के बीच शामिल होकर उन रस्मों का आनन्द ले रही हूँ।घरेलू स्त्रियों के लोक भाषा में वाद-संवादों और हास-परिहास ने उस माहौल को और भी सजीव सा कर दिया है।खीर खिलाई, मुख दिखलाई,बहू बेचारी सब सुनती है पर बोल नहीं सकती है।
    आपकी लेखनी का जादू सिर पर चढ़ कर बोल रहा है-साधुवाद!!

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  8. श्रृंगार ,क़ुबूल वाना ,सामने ,कन्या पक्ष ,पंडित ,पंडित जी .,

    बेहद सशक्त परिवेश और अंचल विशेष की रस्मों को सजीव करती कहानी का आकर्षक अंक .अगले अंक का इंतज़ार रहेगा .

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  9. एक लंबी रचना लेकिन पूरी पढ़ गया। अगले अंक की प्रतीक्षा है।

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  10. आँखों के सामने चित्र सा आ गया.........अगले अंक की प्रतीक्षा है।

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  11. सुन्दर......
    अब आगे के इन्तेज़ार में...

    सादर
    अनु

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  12. मूक अभिव्यक्ति....!
    आधे पे क्यूँ छोड़ दिया...??
    इंतज़ार....कब तक...????

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  13. बहुत ही अच्छी ,रोचक कहानी..

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  14. लेखन की रोचक शैली में घरों में होने वाले शादी समारोहों , हंसी ठिठोली के दृश्य जैसे सामने उपस्थित हो उठते हैं!
    रूचि के लिए सबकुछ इतना आसान नहीं रहने वाला है , ऐसा प्रतीत हो रहा है !

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