शुक्रवार, 8 जून 2012


भानमती की बात - कहिनियाँ .

'अरे ,कहाँ चली गईं थीं भानमती , कितना याद कर रही थी तुम्हें ?.'
'सच्ची .कित्ते दिन से नहीं मिले आपसे, बहुत कहना इकट्ठा हो गया .'
बस,अब वह चालू हो जायेगी.  देखना,मुझे बोलने का मौका कब  मिले !
एक  बात तो  है बहुत दिनों तक उसकी बात न सुनूं  तो भीतर हुड़कन  उठने लगती  है. कुछ कमी- सी लगती है ,जैसे  मन कोई कोना  सूना-सा पड़ा हो . इसी भानमती के बहाने जुड़ जाती हूँ उस सबसे जिनका साथ दूर हो गया है .
 दो हैं जो अपनी संस्कृति से हमें जोड़े रखती हैं, पोषण-कर्त्रियाँ भी कह सकते हैं , एक भाषा दूसरी नारी . नारी भी, जो अभी अपने ही रंग में  है ,बदला नहीं उसने  अपना मूल-चरित्र .जैसे भानमती जिसके बहाने लोक-मन का सामीप्य पा लेती हूँ .
उसके साथ हो कर बहुत कुछ पढ़ती-गुनती हूँ .जीवन की वे सहज किन्तु  दुर्लभ बन गई बातें .जो किताबों में कहीं नहीं मिलतीं.
'आप जौन  कहिनियाँ पूछे रहीं  सो आपुन भौजी से पूरी करवाय लाये. काहे से कि  हम तो बीच-बीच में भुलाय जात हैं. '
मैं उत्साहित हो उठी .व्रत-पूजा के अवसर पर  जो कहिनियाँ सासू-माँ ,सुनाया करती थीं स्मृति से उतरती जा रही हैं ,कहीं आगे कहीं पीछे .किसी का किसी में जोड़ बैठती हूँ .
पिछली बार भानमती साथ थी , बोली ,'काहे परेसान हैं ,हम पूरी लाय देंगे .'
' अपने गाँव  गई थी  ,उसकी ददिया सास विधिपूर्वक व्रत-कथायें सुनाती हैं .गली मोहल्ले की स्त्रियाँ गहने-कपड़े पहने ,सेंदुर मेंहदी रचाये उन्हे घेर कर बैठ जाती है ,'हाँ अजिया ,सुरू करो ..'
वे सब व्रतार्थिनियों की अँजलि में अक्षत-पुष्प-जल दे कर ,
(कथा-समाप्ति पर गौर को अरपने के लिये ) प्रारंभ करती हैं -
' आरी-बारी ,सोने की दिवारी ,
कहाँ बैठी बिटिया कान-कुँवारी .
का धावै ,का मनावै ,
सप्ता धावै,सप्ता मनावै .
सप्ता धाये का फल पाए ?

पलका पूत ,सेज भतार ,
आम तर मइको ,महुआ तर ससुरो .
डुलियन आवैं पलकियन जायँ .
भइया सँग आवें ,सइयाँ सँग जायँ .
चटका चौरो ,माँग बिजौरो ,
गौरा ईश्वर खेलैं सार .
बहुयें-बिटियाँ माँगें सुहाग ,
सात देउर दौरानी ,सात भैया भौजाई,

पाँव भर बिछिया ,माँग भर सिंदुरा ,
पलना पूत, सेज भतार ,
कजरौटा सी बिटियां सिंधौरा सी बहुरियाँ ,
फल से पूत, नरियर से दमाद.
गइयन  की राँभन,घोड़न की हिनहिन .

देहरी भरी पनहियाँ ,कोने भर लठियाँ ,
अरगनी लँगुटियाँ
चेरी को चरकन ,
बहू को ठनगन
बाँदी की बरबराट,काँसे की झरझराट,

टारो डेली,बाढ़ो बेली,
वासदेव की बड़ी महतारी .
जनम-जनम जनि करो अकेली .
 *
मैं जानी बिटिया बारी-भोरी ,
चन मँगिहै ,चबेना माँगिहै ,
बेटी माँगो कुल को राज .
पायो भाग  , सत्ता दियो सुहाग !
जैसी उनकी ,तैसी सबकी होय!'
*
समापन पर वे सब अपनी- अपनी अक्षत-पुष्प-जलांजलियाँ  ,गौरा को समर्पित कर उनका वंदन करती हैं ,एक स्वर में दोहराती हुई ,'.जैसी उनकी तैसी सबकी होय !'
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया !
भारत की  नारी ,तुम्हारे सारे  व्रत-पर्व ,इसी मूल भाव से संचालित हैं .
*
- प्रतिभा सक्सेना.
(क्रमशः)

6 टिप्‍पणियां:

  1. भानमती ने बहुत सुन्दर कहानी सुनाई .... आभार

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  2. शकुन्तला बहादुर11 जून 2012 को 4:54 pm

    आपकी भानमती बड़ी ज़ोरदार है।कहाँ कहाँ के किस्से कहानियाँ सुनाकर आपका मन बहलाती है,साथ ही दादी-नानी के ज़माने की पूजा से जोड़कर पुरानी व्रत-पर्व की परम्परागत पद्धति की याद दिलाती है। कहानी मज़ेदार है, अपनी अभीष्ट-सिद्धि कराने वाली प्रतीत होती है। आभार!!

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