शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

प्रस्थान से पहले -


लंबे प्रवास पर जाने के पहले  जितना हो सके अपनों मिल लेना ठीक रहता है -फिर पता नहीं  फिर कब संभव हो ! जा रही हूँ मैं भी,तीन दिन के लिये ही सही . महाशिव-रात्रि से अधिक श्रेष्ठ और कौन सा दिन होगा, हरिद्वार जाने के लिये !
प्रकृति  उमा-शंभु विवाह की तैयारियाँ पूरी कर चुकी होगी .हिमालय के वनों में  वसंतोत्सव चल रहा होगा.  जहाँ नव-विकसित दुर्लभ पर्वतीय पुष्पों की सुगंध दिशा-दिशा में व्याप्त हो  मन-इन्द्रियों को आविष्ट कर लेती है . एक बेभान करता सा नशा चढ़ा आता है कि एक अतीन्द्रिय-सा चैतन्य शेष और सारा  आत्म-बोध विलय .ऊंचाइयों पर आरोहण करते हुये उन श्रेणियोंकी परिक्रमा देती  बस में हो कर भी  लगता है  ,उन्मुक्त विचर रही हूँ .एक जगह न रह कर संपूर्ण  परिवेश में व्याप्त हो कर उस  एकान्त रमणीयता का एक अंश मैं !
हिमगिरि की छाया में प्रवाहित सुरसरि का नेह-जल दृष्टिमात्र से ही अंतरतम तक शीतल कर देता है.जीवन के उत्तर-काल में वह सान्निध्य पाने का हिसाब-किताब बैठा लेने भर से कहाँ काम चलता है - सांसारिक बाध्यताओं के आगे  मन-चाही आज तक किसकी चल सकी ?
तो फिर जितना मिले उतना ही सही ! फिर से केलिफ़ोर्निया जाने के पहले एक बार और उस उस अनुभूति को पाने का लोभ  - और अंतर्जाल  से कुछ दिन  छुट्टी !
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8 टिप्‍पणियां:

  1. हरिद्वार घूम कर नयी ऊर्जा के साथ आइये ... हम इंतज़ार कर रहे हैं ॥

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  2. आपको ढेरों शुभकामनाएँ, यात्रा मंगलमय रहे आपकी।
    आपको वो समस्त प्राप्त हो, जिसकी अनुभूति की आकांक्षा है।

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  3. आप तो हरिद्वार में ही तो हैं।

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  4. आपकी यात्रा मंगल मय हो बस यही कामना है हमारी....

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  5. अपने विवाह में नर-नारी दोनों को देख नटराज का मन फिर हुआ होगा नाचने का।

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