मंगलवार, 10 जनवरी 2012

कृष्ण-सखी .- 21. & 22 .



*21
खांडव वन की परिणति अति रम्य और सुनियोजित, सुस्थापित वैभवपूर्ण नगरी में हो चुकी थी , नाम करण किया गया- इन्द्रप्रस्थ !
सब कुछ सुचारु रूप से संपादित होता रहा.
कृष्ण के साथ विचार-विमर्ष में निश्चय किया गया कि  लोक में प्रतिष्ठा-पूर्वक स्थापित होने के लिये राजसूय यज्ञ का आयोजन हो ,इस भूमि पर गुरुजनों के चरण पड़ें .अपनी  सामर्थ्य से अर्जित इस वैभवपूर्ण नगरी को सब देखें .मान-सम्मान में वृद्धि हो .
समारोहपूर्वक आयोजन किया गया .
देश-देश  के नरेश, महार्घ उपहार ले-ले कर उपस्थित हुये .धन-संपदा का कोई ओर-छोर नहीं कौरवों को सपरिवार-परिजन आना ही था वे तो  घर के ही लोग थे .
बड़ा भव्य आयोजन था !
 वासुदेव कृष्ण को देवपूजा का परम-सम्मान देने के धर्मराज के मत को अधिकांश का समर्थन मिला . दुर्योधन आदि परम असंतुष्ट .पर जब पितामह ने सहर्ष स्वीकार कर लिया ,वे विरोध कैसे करें !
द्वारकाधीश कृष्ण पट्टमहिषी रुक्मिणी के साथ पधारे थे .श्यामल जनार्दन  के संग, नाम के अनुरूप हिरण्यवर्णी आभा से दीप्त रुक्मिणी .सबके नयन उस दिव्य जोड़ी पर टिक गये  .
शिशुपाल ने देखा ,उसके नेत्र रुक्मिणी की ओर से से हट नहीं रहे थे   -मेरी वाग्दत्ता थी यह ,आज मेरे संग होती !मेरी वस्तु को .यह चोर ग्वाला हर ले गया .कैसी अनीति ! कृष्ण का वहाँ होना सहन नहीं कर पा रहा था वह.ऊपर से अग्रपूजा का सम्मान भी उन्हीं को अर्पित.
पितामह भीष्म ,और अन्य पूज्य गुरुजन जहाँ विद्यमान हों, वहाँ एक प्रपंची अहीर का छोरा ,उच्चतम सम्मान का भागी बने ,आक्रोश से भर उठा वह . यह पाखंडी राजा बन गया तो क्या !रहेगा तो वही पशु चरानेवाला ग्वाला , पराई स्त्रियों को बहकाने से कभी चूका है !
  चेदिराज शिशुपाल का संचित आक्रोश फूट पड़ा .यहाँ दुर्योधन की मंडली को  अपने अनुकूल पा उसका साहस बढ़ा .विरोध करने पर उतारू हो गया . खुल कर अपशब्द और गालियों  का कोश खोल दिया .
जनार्दन वचन-वद्ध थे .शान्त रह  मन ही मन सौ तक अपराध गिन -गिन कर क्षमा करते रहे .और हर दुर्वचन के बाद शिशुपाल का साहस बढ़ता गया .सारी सीमायें लाँघ लीं उसने .
कृष्ण ने चेतावनी दी ,';बस ,अब आगे नहीं .'
मद में चूर था शिशुपाल .और उत्तेजित होकर चीखने लगा .
बस ,एक सौ एकवीं गाली उसके मुख से बाहर आई और वासुदेव ने सुदर्शन चला दिया .
इतने कुवचन  सुनते-गिनते ,उद्विग्न-मना जनार्दन से ,चक्र के संधान में  पूरी एकाग्रता नहीं रही .चक्र की तीखी धार  उन की अँगुली से रगड़ती, घायल करती चली  गई .
कृष्ण हाथ उठाये रह गये . फिर सामने ला कर देखा - रक्त रिसने लगा था
 युठिष्ठिर त्वरा से बढ़े कहीं वे बूँदें धरती पर न गिरें ,अनर्थ हो जायेगा !
 भैया का हाथ पकड़ ,अँगुली मुट्ठी में दबाली .
महारानी द्रौपदी विचलित.
आसन छोड़ उठ आईं .'आह, मेरा बांधव !'
युठिष्ठिर हतबुद्ध - कैसे रुके उन बूँदों का प्रवाह?
महारानी ने क्षण भर भी विलंब किये बिना ,चर्रर् से  अपने चीनांशुक का आँचल फाड़ा .
 सारी सभा स्तब्ध !
शिशुपाल का शीश तो उड़ गया पर उसे देखने का अवकाश किसे !
वस्त्र की चीर, फाड़ कर याज्ञसेनी ने बंधु की अँगुली को वस्त्रावृत्त करने लगी .
कृष्ण की आपत्ति को स्वर भी न मिल पाया , कृष्णा ने हाथ पकड़ा और सँभाल कर घाव को  लपेट दिया ..'
'कैसा ऋण चढ़ा दिया, शुभे ' वे  बुदबुदाये किसी ने सुन नहीं पाया.
पाँचाली को लगा पीड़ा के उद्गार हैं .
'बहुत पिराता है, मीत ?'
'नहीं ,परम शान्ति पड़ गई- तुम्हारा नेह !.....पर तुम्हारा मंगल-वस्त्र ? यज्ञ में व्यवधान पड़ गया न !'
'खल-जन कहीं बाधा डलने से नहीं चूकते .पर जहाँ तुम हो कुशल-मंगल में काहे की बाधा !'
कृष्णा भावुक हो उठी .
कहीं नयन न छलक उठें  मुरारी ने सिर हिला कर बरजा उसे .
दृष्टि फिरी सबकी तो देखा ,सुभद्रा  नये परिधान लिये  खड़ी हैं .चित्रांगदा,उलूपी आदि राज-रमणियाँ व्यग्र-सी उसके साथ .
'देवी ,चलिये ' वे तत्परता से पांचाली को लिवा ले गईं- सुपरिधानित करने हेतु .
पुत्रों की मंडली सचेत हो गई थी ,
इरावान ,वभ्रुवाहन ,घटोत्कच ,अभिमन्यु द्रौपदी के पाँचो पुत्र, उन के सहयोगी मित्र आदि सचेत हो गये थे .सबकी दृष्टि इधर ही लगी थी .
राज-महिषी के चीनांशुक की पट्टी- बँधा, दाहिना हाथ उठा कर लहराया कृष्ण ने ,सबको आश्वस्त करने कि सब ठीक है.
  कार्यक्रम फिर चल पड़ा था, जैसे कुछ हुआ ही न हो .

*

22.
 यह तेरह वर्ष का वनवास, एक वर्ष अज्ञातवास सहित -  उत्तरदायी कौन ?.
उधर पार्थ गिरि-वनों की धूल मँझाते  लोक-परलोक एक करते एकाकी  भटक रहे हैं . तपस्या ? दंड ?प्रायश्चित ? या इन अवांछित ,असह्य स्थितियों से दूर चले जाने का बहाना ?
   पूरा परिदृष्य चल-चित्रों सा पांचाली की स्मृतियों में घूम गया -     .
राजसूय-यज्ञ का  समारोह विसर्जित . पितामह ,महाराज, दुर्योधन आदि  ,कर्ण , सभी का  लौट जाना .
अगले क्रम में आतिथ्य ग्रहण करने की बारी पांडवों की  .
हस्तिनापुर से निमंत्रण आया - बहुत दिन हो गये हम सभी भाई एकत्र हो कर आनन्द नहीं मना पाये .,अब कुछ दिन हस्तिनापुर आ कर महाराज धृतराष्ट्र को अपने सामीप्य का सुख दीजिये .
कुछ समय चैन से बीता और एक दिन शकुनि और दुर्योधन ने  द्यूत का प्रबंध कर डाला .धर्मराज कुशल खिलाड़ी थे और द्यूत के व्यसनी भी .राजाओं के लिये द्यूत के निमंत्रण को अस्वीकार करना शिष्टचार के विरुद्ध है .
फड़ जम गई और खेल ही खेल में दाँव चलते रहे. शकुनि के पाँसे  निर्णय करते रहे  जिसकी चरम सीमा थी पांचाली का  चीर-हरण .
पूरा घटना-क्रम पांचाली की स्मृति में घूम गया .
उस चरम निराशा और और घोर अपमान की दारुण स्थिति में भी याज्ञसेनी की विचार-शक्ति कुंठित नहीं हुई थी ,प्रखर बुद्धि , तेज-हत नहीं हुई थी,अनीति और औचित्य पर प्रश्न उठाती  रही थी वह .
धृतराष्ट्र हतप्रभ थे - भीम और  पांचाली की प्रतिज्ञाओं से विचलित. तेजस्विनी कुल-वधू कहीं शाप न दे दे इसका भय और अपनी भी तो साख बचानी थी उनको .उदारता का प्रदर्शन करने लगे .
  नारी ने अपनी लज्जा बचा ली थी , पुत्रों का भविष्य दाँव पर लगा दिया गया था .  कैसे छोड़ देती जीवन भर अपमान सहने के लिये !उन्हें कोई दासी-पुत्र ,या दासों की संतान न कह सके - वस्त्रभूषण रहित, दैन्य ओढ़े ,  बेबस पतियों को दासत्व से मुक्त दिलायी ,उनका राज-पाट वसूला  और अंत में अपने लिये कुछ  माँगने की बात पर  स्पष्ट मना कर ,क्षत्राणी के उपयुक्त स्वाभिमान को हत नहीं होने दिया.
दुर्योधन का कुचक्र कुंठित होगया, सबके शीश झुक गये .
सब-कुछ पुनःपूर्ववत् हो जाये इसका प्रबंध कर लिया था पांचाली ने अपनी प्रपन्नमति , साहस और नीतिमत्ता से ,फिर कैसा व्यवधान आ खड़ा हुआ कि उसका किया-धरा सब बेकार हो गया .और आज वनवास में जीवन बिताना पड़ रहा है .
सब का अग्रज , सबसे अधिक उत्तरदायी था जो व्यक्ति ,निर्णय फिर उसी ने लिया था .
वह समझ नहीं पाती कि उनके मन में क्या है ,या सबसे ही - उदासीन हैं.जो होता है उसे वैसा ही होने दो .
क्या यही धर्म है ?
अनीति होते ,अत्याचार होते देखते रहना नीति है या धर्म ?धर्म अत्यंत  गूढ़ वस्तु है या सहज-स्वाभाविक !.
अगर गूढ़ है सब उसे समझ नहीं सकते तो वह सबके लिये साध्य नहीं हो सकता ! इतना सहज हो कि सर्व-सुलभ, सर्वसाध्य-सर्वमान्य हो सके .सबके कल्याण का सबके सुख का मार्ग प्रशस्त कर सके .सहज प्रस्फुटित हो अनायास अंतर में जागे, सुन्दर संकल्प के समान.
याज्ञसेनी को लगता है वासुदेव धर्मराज के परम मान्य हैं , वे ,उन्हें धर्म की मर्यादा का स्थापक मानते हैं . फिर उनकी तरह विचार क्यों नहीं कर पाते !इन्हीं के  उस बंधु ने कितनी रूढ़ियाँ निश्शंक हो कर तोड़ दीं .नई मर्यादायें रच दीं .एक सहज मानवी दृष्टि लेकर जो उचित लगा उससे विरत नहीं हुआ किसी का कुछ कहना कभी उसके आड़े नहीं आया .
उसने पति से कहा था  ,' नीति की आड़ ले कर जो विकृत खेल खेला जा रहा है उससे विरत तो रह ही सकते हैं .आप की इच्छा-शक्ति को कोई कैसे विवश कर सकता है?'
'बात इच्छा-शक्ति की नहीं ,अगर सद्भाव-पूर्वक सब ठीक हो जाये ,सारा मनोमालिन्य धुल जाय तो सबसे अच्छा .प्रयत्न से क्यों विरत हों हम !'
पांचाली को लगता है कृष्ण ने कितने विरोध झेल कर अनीति पूर्ण मान्यताओं को जड़ से उखाड़ फेंका .और बहुत सहज रहते हुये नये मान स्थापित कर दिये .पर उसने पति से  कहा नहीं - कहीं यह न समझ लें  कि   तुलना की जा रही है या हीनता-बोध कराना चाहती है .
पूरे परिवार को ऐसी विषम स्थितियों और कुत्सित षड्यंत्रों से घिरा देख वे कैसे शान्त रह लेते हैं ,उसे विस्मय होता है .
*


(क्रमशः)

12 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! आपकी प्रस्तुति की शैली गजब की है,प्रतिभा जी.
    बहुत आनन्द आता है पढकर.
    बार बार पढ़ने को मन करता है.

    आभार.

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  2. कितनी सूक्ष्मता से लिखी है हर बात ... मन तृप्त हुआ पढ़ कर

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  3. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 12- 01 -20 12 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज... उठ तोड़ पीड़ा के पहाड़

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  4. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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  5. bahut acchhi gyanvardhak prastuti hai...jo aage ki kadi ko padhne ki utsukuta ko badha deti hai aur ham fir se intzar me baith jate hain ki next post kab aayegi.

    kaisa sanyog hai ki maini is vishay 'naari kya maadhyam hai purush ki sarthta dikhane ka' par ek post likhi hai jo 1-2 din me aayegi.

    sunder prastutu.

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  6. बहुत रोचक प्रस्तुति...आभार

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  7. बहुत ही रोचक प्रस्तुति ऐसा लगा जैसे यह सारा वार्तालाप एक धरवाहीन कि भांति आँखों के सामने ही चल रहा हो :)

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  8. बहुत सुन्दर और रोचक प्रस्तुति...

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  9. मंत्रमुग्ध पढ़ रहा हूँ! हर्षित करने वाला विवरण है।

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  10. बहुत बेहतरीन और प्रशंसनीय.......
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

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  11. द्रौपदी की कुछ बातों के लिए मेरे स्त्री मन ने भी कभी कभी विरोध किया है। इस अंश के अंत तक पहुँच कर भी कुछ स्पष्ट से भाव नहीं हैं मन में। इन दिनों ४-५ पुस्तकें (सभी श्रीकृष्ण और महाभारत से संबंधित) एक साथ पढ़ रहीं हूँ...पांचाली पढ़ते हुए विशेषत: गीता के शब्द बहुत अधिक आते हैं ध्यान में। ऐसे ही 'पांचाली' की कई सारी घटनाएँ दिमाग में घूमती हैं...उन्हें गीता के श्लोकों की कसौटी पर तौलती रहती हूँ..साथ ही सोचती हूँ कई बार कि, कैसे कितना अधिक चिंतन मनन के पश्चात 'पांचाली' के अंक हम पाठकगणों को उपलब्ध होते हैं..नमन करना चाहूँगी पुन: आपके लेखनी को ..
    सौभाग्य मेरा कि मैं इस श्रृंखला की पाठिका हूँ..:)

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