रविवार, 1 जनवरी 2012

कृष्ण-सखी -19 .& 20.

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19
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'दुर्योधन तो जैसा है सब जानते हैं ,पर वे धूर्त शकुनि मामा ! सदा आग में घी डालते रहते  हैं .योजना-बद्ध नई-नई चालें ,सबमें उन्हीं का हाथ है.'
बड़ा असंतोष है भाइयों के मन में.कृष्ण के सामने मुखर हो ही जाता है .
'यहाँ आकर यही तो कर रहे हैं. राज-वंश की जड़ें खोदने का काम. बहिन ब्याही है, उसका हित भी नहीं देख पा रहे ,' सहदेव ने अपना संशय प्रकट कर दिया .
'बहिन ब्याही है तभी तो ..,'
 कृष्ण ने दीर्घ श्वास छोड़ा ,'वही बहिन जिसने आते ही आँखों पर पट्टी बाँध ली ..जिसने न पुत्रों का मुख देखा न पति का .'
'विचित्र कथा है .कैसे सारा जीवन बिताया होगा एक पत्नी और माँ ने पति की आँखों में झाँके बिना ,उसकी मुखमुद्रा का अवलोकन किये बिना. और सबसे बड़ी बात -पुत्रों पर वात्सल्य-दृष्टि डाले बिना .उनकी बाल-लीलाओं का ,उनके क्रम-क्रम से बड़ी होती अवस्थाओँ का ,क्रीड़ा-कलोल का आनन्द नहीं लिया .कैसा पत्नीत्व और कैसा मातृत्व !'
'यही तो दुख है गांधार नरेश, शकुनि का .'
माधव कुछ देर चुप रह इन लोगों के मुख देखते रहे .
'अपनी रूप-गुण संपन्न भगिनी के सुखी जीवन के विषय में क्या-क्या कल्पनायें की होंगी ,और जब लाचार एक अंधे से व्याहना पड़ा तो लाड़-प्यार में पली ,एक राजकुमारी जिसने भावी जीवन के कितने सपने सँजोये होंगे  उस पर पर जो बीत रही थी  क्या भाई उदासीन रह पाया होगा ?'
'फिर अपनी सोचता हूँ मैंने क्या किया .अपनी लाड़ली बहिन के  लिये .मैंने ,उसका हरण करवा दिया था.इसीलिये कि  अनचाहा दाम्पत्य न भोगना पड़े.'
'हाँ ,मुरारी .'  द्रौपदी ने हुंकारा दिया .
सब चुप हैं .
' क्यों पांचाली ,धृष्टद्युम्न ,तुम्हारा भाई .वह भी तो चुपके-चुपके आया था तुम्हारे पीछे ,पता करने  कि मेरी बहिन को ले कर यह ब्राह्मणपुत्र कहाँ जाता है .क्या तुम्हें तुम्हारे भाग्य पर छोड़ कर निश्चिंत हो सका था वह.कहे चाहे कुछ नहीं बहिन के दुख में भाई का मन तड़पता है.'
'तो क्या गांधार-राज की स्वीकृति नहीं रही थी इस विवाह के पीछे ?'
'स्वीकृति ?'गोपेश ने दुहराया ,'उसकी भी एक कहानी है ,'
 भीम उत्सुक थे ,'क्या हुआ था ,भइया  ?'
'काशिराज-कन्याओँ की गाथा तो जग विदित है .उनके नियोग की बात भी कोई दबी-छुपी नहीं .तात भीष्म के संरक्षण में वे पुत्र युवा हुये तो उनके विवाह की चिन्ता हुई .पितामह ने पात्रियों की खोज शुरू की . इधर तो सबको विदित था कि बड़े कुमार जन्मजात दृष्टिहीन हैं .किसी राजवंश को संदेशा न भेज सके . सुदूर गांधार देश की सर्वगुण-संपन्ना ,परम सुन्दरी ,राजकन्या .की ख्याति उन्होंने सुनी थी और यह भी कि अपनी तपस्या के बल से उसने सौ पुत्रों की माता होने का वर पाया था .उनकी महत्वाकाँक्षा जाग उठी .ज्येष्ठ कुमार के विवाह हेतु तुरंत प्रस्ताव भेज दिया .'
सब सुन रहे हैं .
'इनके अंधत्व से अनजान गांधार नरेश सुबल ने कुरु- वंश से जुड़ना तुरंत स्वीकार लिया.बाद में ...  विवाह के समय देखा..वर अंधा . .
वज्रपात हो गया था सारे परिवार पर  ! हैरान - परेशान पुर-जन  .हर जगह वही चर्चा...'
'हाँ, मैने सुना था -
 गांधार से आई एक दासी बता रही थी वे विवश थे ,पितामह के आदेश की अवहेलना करते तो  सर्वनाश को आमंत्रण देते .राज्य और प्रजा के संकट का निवारण करने को बेटी की बलि चढ़ा दी .
उधर उत्सव की तैयारियाँ हो रहीं थीं, आँसू भरे नयनों से नारियाँ मंगल गीत गा रहीं थी. उनके मन पर क्या बीत रही थी- कौन जानता है ,कन्यादान के समय माता-पिता के मुख पर छाई व्यथा को केवल उन्हीं के लोग समझ रहे थे . वर-पक्ष तो आनन्द मगन था .ऐसी कन्या जिसकी कामना कोई भी श्रेष्ठ समर्थ नरेश करे , ब्याह दी गई एक जन्मान्ध को ,जिसका व्यक्तित्व ही पराङ्-मुख था.'
' और तभी से शकुनि के मन में गाँठ पड़ गई .अपनी बहिन के लिये ,उसका साथ देने ,राज-पाट छोड़ कर यहाँ पड़ा रहता है .देख रहा है अपनी भगिनी और भागिनेयों का सुख ,इस परिवार के प्रति उसके मन में जो वितृष्णा भरी है वही करवा रही है यह सब .'
'गांधार कन्या तो बोलती कुछ..?'
स्तबध थी राजकुमारी . चिन्ता और दुख से हत  माता-पिता को देखा.अपनों के सर्वनाश का कारण नहीं बनना चाहती थी  उसी ने कहा ,'तात अब जो हो रहा है होने दीजिये ,मेरे लिये विधि ने यही लिखा होगा .एक मेरे कारण सब पर संकट न आये .'
भाई शकुनि बहुत उग्र हो उठा..
विनती -चिरौरी कर , प्रजा परिजन, माता-पिता का वास्ता दे कर उसे शान्त किया किसी तरह.
बहिन ने अपनी शपथ दिला दी ,'.मुझे स्वीकार है ,शान्ति से होने दो सारे कार्य.'
भाई ने सोच लिया आज कर लें मनमानी ,मैं भी देख लूँगा .कैसे चैन से रहते हैं .
'आग जल रही है मेरे भीतर. ऐसे शान्त नहीं होने की ..'
'भइया, मेरे घर का चैन नष्ट करोगे ?'
''पगली बहिन ,तेरे लिये और तेरी संतान के सुख के लिये कुछ भी करूँगा ,आज से यही मेरा व्रत .'
उद्विग्न राजकुमार कु-समय देख चुप रह गया
अंधे के साथ वधू-वेष में अपनी प्यारी बहिन को देख उसका हृदय विदीर्ण हो गया ..उसी दिन उस ने ठान लिया कि बहिन के हितों की रक्षा उसका दायित्व .और वहाँ  वह एक-एक को देख लेगा . निपट लेगा जो भी उसकी राह में आयेगा .काँटा निकालने को हर दाँव खेल जायेगा वह .'
'हाँ ,मित्र,समझ रहा हूँ ,' अर्जुन जो अब तक मौन थे .
पहली चोट तो यह कि अंधत्व के कारण ताऊ-श्री सिंहासनासीन न हो सके ..यहाँ भी गांधारी हार गई .'
'लेकिन इसमें हम-लोग कहाँ आते हैं ,हमारा क्या दोष ?'
'दोष किसका - पूरा वंश उस अन्याय का भागी है बंधु .उन राजकन्याओँ  का क्या दोष था ,जिन्हें हर अधिकार से वंचित रखा गया ?
  मनमानी की यह लंबी गाथा चली आ रही है -गांधारी भी अपवाद नहीं .'
काल-चक्र रुका है कभी!
*
 बाद में ब्याह कर आई  कुन्ती बुआ ने पुत्र-लाभ किया, गांधारी वहाँ भी मात खा गई .उसके पुत्रों के लिये युवराज का पद भी अलभ्य हो गया !
अपने भागिनेयों का वही एक  सगा बना रहा. माता-पिता की स्नेह- दृष्टि तो दूर,  कभी उनका लाड़-दुलार भी नहीं मिला उन्हें ,स्वाभाविक परिवार कहाँ मिला ! दास-दासियों से वह सब नहीं मिल सकता जो माता-पिता के सान्निध्य में मिलता  .'
मामा से अपनत्व मिला था ,उन्हीं ने जो संस्कार डाल दिये.प्रारंभ से द्वेष के बीज रोप दिये .'
'अंधे को और क्या सूझता ,सौ पुत्र पैदा करने में लगे रहे.'
'और एक पुत्री भी तो..'
पालन-पोषण का दायित्व दास-दासियों का . .
शकुनि के लिये सब-कुछ असहनीय हो उठा था.
'और उसके लिये हम सब अपने थे ही कब ?किसी भी कीमत पर भागिनेयों के हित-संपादन के लिये ही आया था.उसी ने दुर्योधन की महत्वाकांक्षाओं को जगा कर सदा उसे उकसाया है .'
वातावरण भारी हो उठा था.
'बचपन से खिलाता आया है .अब भी वही खिला रहा है उन सब को .'
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20.
पांडवों को अपने मार्ग से हटाने का पूरा प्रयत्न किया गया पर विधि का विधान कुछ और ही था.तात विदुर की बुद्धि सब भाँपती और निराकरण करती रही .पितामह सब जानते - देखते  विवश रहे..
लाक्षागृह की घटना भी इसी योजना का अंग थी.
स्वयंवर में पांचाली को जीत कर आये पांडवों का भारी स्वागत किया गया, लेकिन मनों में जो मालिन्य घुला था वह कहाँ धुलता .ऊपरी दिखावा चलता रहा .
दुर्योधन को युवराज पद दिया जा चुका था  .
अब बीहड़ खांडव वन का आधिपत्य पांडवों को दे कर चलता करो .
सब के पीछे शकुनि की चाल काम कर रही थी .
मामा-भांजे की सलाह पर स्वीकृति की मोहर भर लगवाना शेष रह जाता  ,जिसके लिये राजा धृतराष्ट्र का पुत्र-मोह पर्याप्त था .
और पितामह भीष्म ? उनका  सिंहासन के प्रति निष्ठा का व्रत .सिंहासन पर धृतराष्ट्र विराजे हैं ,और उनके साथ युवराज  दुर्योधन .मतान्तर का प्रश्न ही नहीं उठता !
 कर्ण, दुर्योधन के उपकारों के बोझ तले ,उसका मित्र बना सदा उसके अनुकूल रहने को बाध्य .अर्जुन की प्रतिद्वंद्विता में जानबूझ कर उसे  नीचा दिखाया जाता रहा .द्रौपदी के अपमान का दंश अंतर में समेटे ,कौरवों के अनुकूल रहना उसकी विवशता थी.  दुर्योधन साथ न देता तो इस मंच पर कहाँ होता वह ?
एक बार युवराज बनने के बाद उन लोगों ने निश्चय कर लिया कि अब किसी भी प्रकार राज छोड़ना नहीं है.
इन पांडवों को क्या अधिकार कि कुरुवंश के राजसिंहासन पर बैठें ?अधिकार तुम्हारे पिता का था ,चलो किसी कारणवश छोटे भाई को दे दिया ,लेकिन वे तो विरक्त हो वन को चले गये वहीं मर-खप गये .फिर तो सिंहासन तुम्हारा था .
वे पाँचो ?कोई अपने पिता का पुत्र  नहीं ,किस-किस की संतान .किसी एक की भी नहीं . कहाँ रहे वे कुरु कुल के वंशज?तुम ,सुयोधन अपने पिता के पुत्र हो .राजा के अंश हो उन्हीं के वंशज !
और हमारे पितामह ?वे उन्हीं की ओर झुके रहते हैं .रहा वह अहीर छोरा कृष्ण ,कहीं टिक कर रहने का ठिकाना नहीं .कौन सा गुण है उसमें ,जनम का कपटी .पता नहीं लोग क्यों सिर चढ़ाये रहते हैं ?'
' भाई दिन-रात बहिन को देखता है.  कैसे स्वाभाविक रह सकता है ?'कृष्ण का कहना था,'अपने ढंग से उनका हित- संपादन कर रहा है .'
 दुर्योधन-मंडली की योजना क्रियन्वित होनी ही थी .
खांडव वन --बीहड़ प्रदेश .किसी के रहने योग्य स्थान था क्या ?
पर धृतराष्ट्र ने बड़े प्रेमपूर्वक ,बहुत सद्भावना जताते हुये .पांडवों को वह स्थान प्रदान कर दिया .
युधिष्ठिर ने सदा के समान नत शीश ताऊ-श्री का आदेश शिरोधार्य किया .
पर कृष्ण जैसा बांधव जिसके साथ हो उसके काम रुके हैं कभी !
*
(क्रमशः)


7 टिप्‍पणियां:

  1. अनुपम धाराप्रवाह रोचक प्रस्तुति.

    नववर्ष की आपको बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएँ.

    समय मिलने पर मेरे ब्लॉग पर आईयेगा,प्रतिभा जी.
    'हनुमान लीला भाग-२'पर आपका इंतजार है.

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  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति,
    नया साल आपके जीवन को प्रेम एवं विश्वास से महकाता रहे,

    मेरी नई पोस्ट --"नये साल की खुशी मनाएं"--

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  3. bahut sunder prastuti hai hamesha ki traha gyaanarjan ke liye bahut mahatvpoorn.

    kabhi kunti putro ke bare me bhi likhe...jo ki aap kayi bar likh chuki hain ki vo pancho...koi apne pita ka putr nahi....

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  4. "बहुत पिराता है, मीत?"
    मुग्ध हूँ!
    मन भर जाता है यह श्रृंखला पढ़।
    आभारी हूँ आपका।

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  5. सराहनीय प्रस्तुति

    जीवन के विभिन्न सरोकारों से जुड़ा नया ब्लॉग 'बेसुरम' और उसकी प्रथम पोस्ट 'दलितों की बारी कब आएगी राहुल ...' आपके स्वागत के लिए उत्सुक है। कृपा पूर्वक पधार कर उत्साह-वर्द्धन करें

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  6. शकुन्तला बहादुर8 जनवरी 2012 को 5:22 pm

    प्रतिभा जी,
    महाभारत की लोकविश्रुत कथा की नये कलेवर और नूतन साजसज्जा
    के साथ की गई प्रस्तुति रोचक,ज्ञानवर्धक और अद्भुत है। मन इन प्रसंगों में डूब डूब जाता है।गांधारी और शकुनि की मनोव्यथा को सजीव करके,आपने शकुनि के चरित्र की गाँठ खोल दी है। सोचती हूँ,काश!भीष्म "देवव्रत" ही रहते,तो महाभारत कभी न होती।आदि से अन्त तक सब कुछ उन्ही का बोया हुआ था,जिसका दुष्परिणाम सब को भोगना पड़ा। अत्यन्त दुःखद !!!

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  7. इस श्रृंखला से चिंतन विस्तार पाता है...बहुत अधिक सोच जाती हूँ सभी के लिए ही। शब्द नहीं होते कहने के लिए कभी कभी....सूक्ष्म से सूक्ष्म संशय भी नहीं रह जाता पढ़ने के बाद.....:)
    नमन प्रतिभा जी आपकी लेखनी को....!!

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