सोमवार, 11 अप्रैल 2011

एक थी तरु- 12.& 13.


12 .

अरे ,आप यहीं है ,हमने तो समझा चली गई हैं ?'

मेडिकल स्टोर पर बिल चुकाती तरल नें चौंक कर सिर उठाया .रायज़ादा की बहू, विनती नाम है, पास आ गईं थीं ,'उस दिन पार्टी के बाद से आप दिखाई नहीं दीं .'
रुपये गिन कर थमाती तरल ने सिर हिला कर विश किया ,'मैं कहाँ जाऊँगी ,यहीं की यहीं ..'
' हमने सोचा ट्राँसफ़र करा लिया ,जहाँ सर्विस है .असल में हमारा निकलना भी कम ही हो पाता है .'
ध्यान से देखते हुए बोलीं 'क्या कुछ तबियत ख़राब.. '
'नहीं ,नहीं मैं ठीक हूँ .ये दवाएँ तो अम्माँ की ..'
'लग तो आप भी काफी़ झटकी -सी ..पर अम्माँ को क्या हो गया ?

'स्ट्रोक पड़ गया था. बेड पर हैं '

'अच्छा? तभी .. लेकिन कैसे ?'

तरु ने दोहराया ,'कैसे ?

क्या बतायेगी अशेष ग्लानि !

विनती सहानुभूति प्रकट कर रहीं थीं .

'पहले आपके पिता जी गए अब माताजी बिस्तर पर .बिचारी को झटका लगा होगा .स्ट्रोक तो ... ' शायद तरु कुछ कहे ,कुछ रुकीं वे .

वह तो सिर झुकाए खड़ी है .

स्ट्रोक अचानक ही पड़ता है जानती हूँ ..हमारे फूफाजी ,तो दो साल से बेड पर हैं ..'

महिला बोले जा रहीं हैं .

क्या बोल रही है .तरु समझ रही है या नहीं !

फिर उन्होंने कहा ,' एक दिन वर्मा जी आए थे पूछ रहे थे आपको ..कि कहाँ हैं आजकल .'

'वर्मा जी ?'

' आपसे परिचय कराया तो था पार्टीवाले दिन ..असित वर्मा वही एम आर .'

''हाँ ,हाँ ,याद है."

"आपसे मुलाकात हुई होगी फिर कभी .."

"हाँ ,मिल जाते थे कभी-कभी ट्रेन में ,उनका एरिया उस तरफ़ ही है न .'

'आप छुट्टी लिए हैं शायद ?'

बताया तरु नें .कुछ भी नियमित नहीं रहा .अक्सर ही छुट्टी पर .कभी गौतम चले आते हैं , संजू भी है पर उसके बस का कहाँ .पढ़ाई भी तो है .एक विधवा चाची हैं कुछ दिन को आ गई हैं ,बस चल रहा है किसी तरह .

'सच में बड़ी मुश्किल है सर्विसवाली औरतों की .ऊपर से ये रोज़-रोज़ की दौड़.'

तरु क्या कहे !

'अच्छा चलूँ ,घर के काम सारे पड़े होंगे ..'

'हाँ ,हाँ ,चलिये आप तो .आते हैं हम किसी दिन .कुछ ज़रूरत हो तो हम लोग हैं न '

'ज़रूर,जरूर !'

जल्दी में थीं दोनों .चल दीं फ़ौरन .



कानों में गूँज रहा है - ''पहले आपके पिता जी गए अब माताजी बिस्तर पर ..."

क्रोध से विकृत चेहरा माँ की मुद्रा सामने आ गई .

उस दिन अपने आवेग पर नियंत्रण कर लिया होता तो !

आज का यह पछतावा नहीं होता .

रोक नहीं सकी अपने को क्यों ?

क्या कर लिया कह कर ?

लेकिन अपने आप हो गया - कब का बाँध बिना जाने-समझे फूट पड़ा उस दिन .

एक मात्र सखी मीना भी दोष देने लगी .माँ ,माँ होती है तरु,वह तुम्हारा सदा भला चाहेगी तुम उनकी सुनती क्यों नहीं .उन्होंने खु़द मुँह खोल कर मुझसे कहा कि तुम्हें समझाऊँ .

तरु चुप ,कोई उत्तर नहीं ,कोई समाधान नहीं .बस बात टाल देना.

अब तो कहीं ठौर नहीं बचा !

पर अब जब सब बीत चुका है .स्थितियाँ बदल गई हैं , मैं आगे क्यों नहीं बढ़ पा रही

तरु उलझ जाती है अपने में ही.समय रुक जाता है मन चक्कर खाने लगता है उन्हीं भँवरों में.

*

बात मीना ने की थी .

उसने तरु से पूछा था,"क्यों इन शर्मा जी में और तेरे पिता मे तो अच्छी दोस्ती थी ?तेरी अम्माँ ने तो हफ्तों उनके घर खाना भेजा है .अब क्या हो गया ?दोनो मियां-बीबी हमेशा कुछ -न-कुछ बुराई करते रहते हैं ?"

"इन लोगों की बातों में कौन पडे मीना ,अम्माँ से कुछ बात हुई होगी ."

"तेरी अम्माँ कितनी एफ़ीशियेन्ट हैं तरु !तू कितनी भाग्यशाली है . जब मेरा वे इतना ध्यान रखती हैं तो तेरा कितना रखती होंगी !मुझे तो ईर्ष्या होती है तुझसे --यहाँ तो अपनी माँ की शकल तक याद नहीं !"

मीना का शर्माइन से दूर का रिश्ता है .तरु को पिता के दफ़्तर की बहुत सी बातें मीना से पता लग जाती हैं .

आजकल उनसे बहुत गल्तियाँ होने लगी हैं .बड़े बाबू उनसे सीधे मुँह बात नहीं करते ,साहब अलग नाराज हैं ,ट्रान्सफ़र कराने पर तुले हैं .

तरु आशा से भर उठी --हो जाय उनका यहाँ से ट्रान्सफर!इस घर गृहस्थी से कहीं अलग जाकर रहें .तब वे समय से खायेंगे ,सोयेंगे .चैन से रहेंगे .तब दिन-रात उन्हें यह सब नहीं झेलना पडेगा !

कितना अच्छा हो ट्रान्सफ़र हो जाय उनका .फिर तो बाकी लोग गौतम भइया के पास चले जायेंगे और पिता किसी नई जगह पर .नई जगह में एकदम सबके रहने की व्यवस्था थोड़े ही हो पायेगी .

पर वह नौबत ही कहाँ आ पाई .उन्होंने पहले ही बिस्तर पकड़ लिया .एक दिन ऑफ़िस से लौ़टे तो बाहर ही गिर पड़े .फिर वे उठ नहीं पाये शायद उनकी उठने की इच्छा ही खत्म हो गई थी .

"मीना ने पूछा था ,"तरु तेरे पिता मित्तर बाबू की पार्टी में नहीं गये ?"

"मित्तर बाबू की पार्टी कब हुई ?"

"तुम लोगों को कुछ बताते भी नहीं क्या ?उनके बड़े बाबू थे न उनका ट्रान्सफ़र हो गया --."

"अरे हाँ ,कहा तो था ,मैं कुछ ऐसी धुन में रहती हूँ ,मेरे ध्यान से उतर गया .उस दिन उन्हें खूब तेज बुखार था ,"

"धुन में तो तू रहती है ,यह तो मैने भी मार्क किया है .पर ये शर्मा लोग भी अजीब हैं.कुछ भी कह देते हैं ."

"क्या कहा ?"

"जाने दे ,क्या करेगी सुनकर,बड़े वैसे लोग हैं .''

"फिर भी पता तो लगे ."

"कह रहे थे गोविन्द बाबू बडे मक्खीचूस हैं .चन्दा नहीं देना चाहते इसलिये पार्टी में नहीं आये .--पर तू क्यों फ़ील करती है?लोग तो कुछ भी बोल देते हैं ."

तरुने कुछ नहीं कहा एक लम्बी-सी सांस खींच कर रह गई .

**

"तरु बुआ ,तुम्हें माँ ने बुलाया है . "

"अच्छा थोड़ी देर में आऊँगी ."

विपिन पीछे पड़ गया ,"नहीं अभी चलो ."

वह साथ लिये बिना जाने को तैयार नहीं .

"अच्छा ,चल रही हूँ ."

घर जाकर उसने आवाज लगाई ,"माँ ,बुला लाया ."

विपिन की मां ने बताया ,सुबह से शोर मचा रहा है ,"तुम बुआ को बुलाओ '.मैने चिढ़ाने को कह दिया ,'नहीं बुलाऊँगी ' तो मुझसे लड़ पडा .मुझसे भी ज्यादा वो तुम्हें चाहता है तरु ."

तरु बैठी-बैठी मुस्करा रही है.

"लेकिन आज बुलाया क्यों है ?"

"मेरे मायके सिंधारा आया है .तुम्हारे लिये फूल और मिठाई अलग निकाल गया है ."

घन्टे भर बाद तरु लौटी तो मीना बैठी इन्तजार कर रही थी .अम्माँ बडे प्यार से पास बैठी उसे पापड़ी खिला रहीं थीं .

"अम्माँ जी , मेरी तो इच्छा होती है,रोज आपके पास आया करूँ .."

"तो आया करो न .तुम तो मुझे बहुत अच्छी लगती हो .."

मीना ने तरु से कहा था ,"तेरी माँ कितनी वात्सल्यमयी हैं .तेरे घर आती हूं तो तुझे जो प्यार मिला है उसका थोड़ा-सा भाग मैं भी पा लेती हूँ ..तू भाग्यशाली है तरु .पर तू कितनी अजीब है ,तेरी कुछ बातें मेरी समझ में नहीं आतीं .तुम लोग उनका ध्यान नहीं रखते ."

अनमनी सी तरु ने पूछा ,"उनने कुछ कहा है क्या तुझसे ?"

"कुछ खास नहीं मुझे इतना प्यार करती हैं इसलिये कह बैठीं .पर तेरी तो माँ हैं .तुझे उनकी बात माननी चाहिये ..माँ से बढ़ कर दुनियां में कोई और रिश्ता नहीं होता .और तू अपने पिता को भी समझा ."

"पर कुछ बता भी तो. बात क्या है ?बिना बताये कैसे समझूँगी ?"

"यही कह रहीं थीं कि बाहर के लोग तो खूब आदर मान देते हैं पर अपने घर में कोई कदर नहीं करता .मैं तेरी सहेली हूं इसलिये मुझसे समझाने को कहा ,और तेरे पिता किस टाइप के हैं तरु ?"

तरु के चेहरे का तनाव देख कर वह रुकी ,,"मुझे क्या पता तरु ,ऑफ़िस के लोग तो कहते थे पर खुद तेरी अम्माँ ने जब कहा तो मैंने तुझसे ---."

"मीना , ऊपर से जो लगता है वही सच नहीं होता ..वास्तविकता क्या है इसे कौन जानता है ?"

"ऐसी क्या बात है जो तू मुझे भी नहीं बता सकती ?"

"तू जान ले इतना सब बताने की सामर्थ्य मुझमे नहीं है .सब कुछ इता अजीब , इतना अविश्वसनीय है .मै खुद नहीं समझ पाती--."

"जाने दे तरु .तुझसे बहुत इन्टीमेट हूं और माँ का प्यार मिल गया इसलिये कह दिया .--अरे वो किताब पढ़ ली तूने? कल वापस करनी है ."

**

तरु विपिन को बच्चा समझ कर व्यवहार करती है ,तो उसे अच्छा नहीं लगता .मुख-मुद्रा से जाहिर करने से काम नहीं चला तो उसने स्पष्ट किया ,"बुआ ,मैं बच्चा नहीं हूँ .इतना छोटा नहीं हूँ ,जितना तुम समझती हो .."

''बड़े पते की बात बोलने लगा है .यह तो बडी अच्छी खबर है कि तू बड़ा हो गया ."

"मज़ाक की बात नहीं .मुझे बहुत सी ऐसी बातें मालूम हैं जो तुम्हे भी नहीं पता .."

"अच्छा !क्या मालूम है ?"

वह कुछ क्षण सोचकर बोला ,"नहीं,वह सब तुम्हें नहीं बताऊंगा .लड़कियों को ऐसी बातें नहीं बताते ."

"तुझसे कौन कहता है ऐसी बातें ?"

"हमारे साथ के लड़के .हम बड़े लड़के सब तरह की बातें करते हैं ."

तरु ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा !

वह किशोर विपिन कब युवा हो गया ,तरु ने ध्यान ही नहीं दिया था .आज अचानक अपने से एक मुट्ठी ऊँचे विपिन को अपने सामने खड़ा देखा ,जिसमे यौवन के चिह्न स्पष्ट दिखाई देने लगे थे .

"हां,विपिन ,सच में तुम बडे हो गये !"

**

एक दिन विपिन ने बताया 'अब हम लोग चले डायेंगे ,पिता जी का ट्रांस्फ़र हो गया है . '
तरु के मुँह से निकला ,अरे , तुम चले जाओगे !'
'जाना पड़ेगा,बुआ तुम मुझे याद करोगी न १'
'वाह तुझे कैसे भूल सकती हूँ ' उसका कंधाथपक कर तरु ने आश्वस्त किया,'कब जाना है ?'
'अभी नहीं .अभी तो अम्माँ को सेशन पूरा करना है .
तरु क्या कहे !
"मेरा यहां से जाने का मन नहीं है .वहाँ पता नहीं कैसा लगेगा ?पर जाना तो पड़ेगा ही .हम लोग इम्तहान के बाद जायेंगे अभी तो बाबू जी अकेले जा रहे हैं ."
जाने के पहले वह आकर काफ़ी देर बैठा रहा .फिर चलते-चलते कह गया ," बुआ,मैं फिर तुमसे जरूर मिलूंगा , बुआ ."

**

पिता की मृत्यु बाद मन्नो एक महीने के लिये विदेश से आई थीं .बहुत रो रही थीं -छः महीनो से आने का प्रोग्राम बन रहा था ,हर बार कुछ न-कुछ रुकावट आ जाती थी .उन्हें क्या पता था कि इतनी देर हो जायेगी कि पिता मिलेंगे ही नहीं ..कोई ऐसी बीमारी भी तो नहीं थी .

अम्माँ का हाल देख कर उन्होनें तरु से कहा था ,"इनका दुख तो अब कभी दूर नहीं हो सकता .कितनी कमजोर हो गई हैं .अचानक पड़े दुख से इनकी तो मति ही बौरा गई ."

तब तरु का ध्यान भी गया था कि पिता की मृत्यु के बाद वे बहुत दुर्बल हो गईं हैं .वे किसी से कुछ कहती नहीं चुपचाप बैठी रहती हैं .मन्नो खोद -खोद कर तरु से पूछती हैं -पिता को क्या हो गया था ?"

तरु टुकड़े -टुकड़े कर उत्तर देती रही .क्या कहे ,क्या न कहे !वह सब क्या मुँह से कहा जा सकता है ?

कभी अधपेट खा लिया ,कभी बिल्कुल भूखे ,.धँसी -धँसी आँखें और विवश क्रोध !जो अपने को ही खाता चला जा रहा है .इतना भी दम नहीं कि चिल्ला कर डाँट दें .दिन भर कैसे काम करते होंगे !वह सब सोचना भी आसान नहीं है .सोचती है तो रातों की नींद उड़ जाती है .हफ्तों मन अशान्त रहता है .जो सोचना भी दुःसह है उसे कैसे कहा जा सकता है ?उसे तो सिर्फ अनुभव किया जा सकता है - ऐसा अनुभव जो किसी से बाँटा नहीं जा सकता .स्मृतियों का भारी बोझ मन पर ज्यों का त्यों धरा है.साझीदार कोई नहीं ,कहीं नहीं !

मन्नो पूछती हैं ,तरु बोल नहीं पाती .सोचती है और रो पड़ती है .क्या -क्या बतायेगी ?चाय पीने की आदत थी उन्हें और अम्माँ कोंचने से कभी चूकती नहीं थीं .वे बराबर कुछ न कुछ बोलती रहती थीं. चाय को लेकर क्या-क्या नहीं कह डालती थीं चाय नुक्सान करती है ,पेट जलाती है इसीलिये वे दूध पीती थीं -उनका स्वास्थ्य अच्छा था .लेकिन पिता बाहर रहते थे उन्हे चाय की लत सी हो गई थी .घर में चाय बनना मुश्किल .उन्हें तलब लगती थी सिर दर्द करता था ,आँखों मे धुन्ध सी छाने लगती थी .और वे निढाल से बैठे रहते थे .

पहले तरु अम्मां से चोरी -छिपे बना देती थी .पर एक दिन अचामक उन्होने चाय पीते पकड़ लिया फिर तो तरु की और उनकी जो लानत -मलामत हुई !

कुछ भी कहने से छोड़ती नहीं वे ऐसे मौकों पर .उन्हे झूठा करार दे कर छिप-छिप खाने पीने का आरोप लगा दिया . उसके बाद से तरु कितनी ही जिद करे वे सामने आई चाय पीने को भी तैयार नहीं होते थे .....अरे, एक बात है क्या ,जो कह डालेगी वह ?ऐसी बातें जिनकी यादें घंटों मन पर बोझ-सी धरी रहती हैं ,और ऐसी कितनी -कितनी बातें !

"मुझसे मत पूछो जिज्जी ,मैं नहीं बता पाऊँगी ."

अम्माँ के सामने कोई कुछ नहीं पूछता ,कुछ नहीं कहता .उनके लिये न सुबह ,सुबह है ,न शाम ,शाम .समय के विभाग महत्वहीन हो गये हैं .जब जो चाहती हैं करती हैं .तरु सन्न-सी सब देखती है .शन्नो चली गईं, मन्नो चली जायेंगी. उसे तो यहीं रहना है .

पर रहा नहीं जा रहा अब घर में जैसे .सारी स्थितियाँ उसके लिये असहनीय हो उठी हैं .घर मे बैठे-बैठे क्या करे ?गौतम से कह सुनकर उसने टाइपिंग का कोर्स ज्वाइन कर लिया .

मीना की भी शादी हो गई .तरु ने नौकरी के लिये अर्जियाँ भेजना शुरू कर दिया .मीना के पति ने अपने भाई से कह कर उसे एक जगह नियुक्ति पत्र दिलवा दिया .

गौतम ने शन्नो से सलाह माँगी

"करने दो ब्याह के लिये ही कुछ जुड़ जायेगा .और आजकल सर्विसवाली लड़की की शादी में आसानी रहती है ."

पता लगने पर अम्माँ ने विरोध किया ,"मैं जानती थी ,तुम यही करोगी .पढ-लिख कर नौकरी के लिये तैयारी की थी तुमने?/"

"तो घर में बैठे-बैठे क्या करूं?नौकरी करने में नुक्सान क्या है ?"

'लाज-शरम सब बेचकर निकल जाओ .."

तरु कुछ बोली नहीं .वे बड़बड़ाती रहीं .जब देखा कोई असर नहीं पड रहा है तो अँतिम निर्णय दे दिया ,"तुम कहीं नहीं जाओगी .'

"मै कोई अकेली तो नहीं .कितनी लड़कियां कर रही हैं ."

"उन्होने मेरा कहा न मान कर तुम्हें पढने की छूट दी .उन्हीं ने सिर चढ़ाया है .मेरी तो एक नहीं सुनते थे ..."

पिता पर आक्षेप सुनकर तरु का मुँह तमतमा उठा ,"अगर उनके साथ इतना न किया जाता तो वे अभी नहीं मरते ."

"अच्छा तो मेरी वजह से मर गये ?मैंने मार डाला ?"

"हमेशा उन्हें दोषी ठहराया .हमेशा अपमानित किया ,दूसरों की निगाहों में इतना गिरा दिया .कभी चैन से नहीं रह पाये वे ."

आँखों से आँसू बहते जा रहे हैं वह कहती जा रही है ,"बिना खाये कोई कितना चल सकता है "वे दिन-दिन भर भूखे रहते थे ,तुम खाने के समय क्लेश मचाती थीं .सुबह दो रोटी खालीं तो खा लीं, और सारे दिन सारी रात कुछ नहीं .बताओ दोपहर और शाम को खाना उन्होने महीनों नहीं खाया और किसी को कोई फ़र्क नहीं पडा .ऊपर से तुम दिन-रात झगड़ा मचाती थीं .उनकी चाय छुड़वा दी ---" वह सिसकी भर-भर कर कहती जा रही थी ," चाय नहीं, नाश्ता नहीं ,कुछ नहीं .उन्हें जाड़ा पाला कुछ नहीं लगता था !भरे जाडे उन्होंने एक दोहर ओढकर निकाल दिये ..उनके कपडे फाड देती थीं तुम और वे नये बनवाते भी नहीं थे ."तरु की हिचकियाँ बँध गई हैं ,वह रुक-रुक कर बोलती जा रही है ,"तुमने उनका चेहरा देखा था कभी ?उनका हड्डी रह गया शरीर देखा था ?उनकी धँसी हुई आँखें देखीं थीं ?वे कैसे चलते थे तुम्हें मालूम है ?तुम भूखी रह सकती हो क्या ?ऐसा चेहरा मैंने आज तक किसी का नहीं देखा ऐसी आँखें ---."

अम्माँ का चेहरा क्रोध से विकृत हो उठा ,वे झपट पडीं ,"चुड़ैल कहीं की .इसीलिये पैदा किया था मैने तुझे ?"उन्होने आगे बढकर तरु के बाल पकड़ लिये ,"मैं हत्यारी हूँ ?मैंने उन्हें मार डाला ,ला तेरी भी गर्दन मरोड दूं !"

"हाँ ,लो ,मरोड़ दो गर्दन .इस रोज़-रोज़ की अशान्ति से छुट्टी मिले .पिता जी मर गये मुझे भी मार डालो !''

अचानक उनकी पकड़ ढीली पड गई बढ़े हुये हाथ हवा में लहराये ,आँखों मे अजीब सा भाव आया ,वे सम्हलने की कोशिश में लडखडाईँ और गिर पडीं .

"अरे रे रे ,यह क्या ?"

तरु ने झुक कर सम्हाला .मुँह खुला अजीब पथराई सी दृष्टि .लगता है बेहोश हो गईं .

भाग-दौड मच गई,गौतम डाक्टर को बुला कर लाये .

"पैरालिसिस का अटैक है एक तरफ का शरीर सुन्न हो गया है .

पैसा पानी की तरह बह रहा है .अब घर का खर्च चलना तरु के नौकरी किये बिना संभव नहीं .

**

13

"अरे,बहुत दिन बाद ?क्या आपने किसी दूसरी ट्रेन से जाना शुरू कर दिया?"होल्डाल अपनी बर्थ पर रखते हुये असित ने पूछा .

"नहीं ,इधर एक महीने छुट्टी पर थी .."

"माँ, का क्या हाल है ."

'उनकी तेरहवीं के बाद अब ज्वाइन करने जा रही हूँ ."

"माँ का स्वर्गवास हो गया ? बताया भी नहीं मुझे ?'

कह कर असित को लगा कुछ अधिक कह गया है .उसने फिर पूछा ,"क्या एकदम से हालत बिगड़ गई थी /"

"एकदम तो नहीं .---बहुत दिनों से ऐसी ही चल रही थी .मर्ज ही ऐसा था उन्हें .फिर इस उमर में ---डॉक्टरो ने पहले ही कह दिया था जब तक चल रही हैं तभी तक हैं --."

तरु के चेहरे पर गहरी उदासी ,जैसे दुख आँसुओं में बहने के बजाय भीतर तक जड़ें जमा बैठा हो !

"उनके न होने से आपको बहुत अकेलापन लगने लगा होगा !"

अकेलापन ! तरु सोच रही है पिता की मृत्यु फिर माँ की -बीच में कितना अन्तराल .इन कुछ वर्षों में ही कितना फ़ासला तय कर लिया !

"अकेलापन ?हाँ, लगता है पर अम्माँ की पीड़ा इतनी अधिक थी कि उनका जाना ही ठीक था .मुक्ति पा गईं वे !

'कुछ देर चुप्पी के बाद असित ने पूछा ,'आप इधर ही ट्रान्सफर क्यों नहीं करा लेतीं ?इधर आपके भाई जहाँ हैं ,वहीं रहें तो ज्यादा आराम रहेगा ."

"ट्रान्सफर क्या आसान है असित जी ?अम्माँ की बीमारी के दौरान भी कितनी कोशिश करती रही ,भारी रिश्वत दिये बिना कुछ नहीं होता ."

डिब्बे में काफ़ी भीड़ जमा हो गई थी .बिना रिज़र्वेशनवाले भी बहुत से यात्री चढ़ आये थे .हमेशा ऐसा ही होता है रात दस बजे तक रिजर्वेशनवालों की बर्थ पर जमे बैठे रहते हैं .कभी-कभी तो इसी ज़िद में मार-पीट तक हो जाती है .और आज तो हद की भीड़ है .

इधर की बर्थ पर बड़े ज़ोरों से पॉलिटिक्स डिस्कस की जा रही है .

असित खिड़की से सिर टिकाये आँखें बन्द किये बैठा है .एक हाथ की अँगुलियों से बार-बार सिर दबा रहा है .

इधर की बर्थवाली ने पूछा ,"वो आपके कौन हैं ?"

क्या उत्तर दे ?तरु सोचती है -कोई नहीं हैं मेरे .पर ऐसा भी कैसे कहे ?परिचित हैं - बस? सहयात्री हैं - बस?हर संबंध को नाम दिया जा सकता है क्या ?कोई खास रिश्ता नहीं .फिर लोग सोचेंगे साथ बैठने की क्या जरूरत आ पड़ी ?क्या घुट-घुट कर बातें हो रही हैं ?

"तरु को चुप देख सहयात्रिणी मुस्करा दी .,"अच्छा मैं समझ गई .आपकी चुप्पी ने सब कह दिया ..आप लोगों की शादी होगी न ?"उसने न हाँ कहा न ना चुपचाप सिर झुका लिया ..

असित ने सुन लिया है, मन ही मन मुस्करा रहा है .

"नींद आ रही है आपको ,"तरु ने असित से कहा ,"जाइये, सो जाइये अपनी बर्थ पर .सोने से आराम मिलेगा ."

"नींद नहीं आ रही .बडा अजीब सा सिर दर्द है.आँखें जल रही हैं .आज सुबह से बड़ा बुरा लग रहा है. "

तरु ने फिर वही बात कही ,"आँखें चढ़ी-चढ़ी-सी लग रही हैं .टेम्परेचर होगा .जाइये अपनी बर्थ पर लेट जाइये ."

"उधर जाने की इच्छा नहीं हो रही है ."

इस अपार्टमेन्ट के अनेक यात्री एक दूसरे को शकल से पहचानने लगे हैं .असित और तरु भी उनके लिये नये नहीं हैं .

पास बैठा एक व्यक्ति बोल उठा ,"आप दोनों को इतनी दूर-दूर बर्थ क्यों दे दी ऐसे ही हैं ये रेलवेवाले .मैं उधर चला जाता हूँ, आप यहाँ आ जाइये ."

उसने झट-पट अपना होल्डाल समेट लिया .असित ने तरु की ओर देखा ,वहाँ कोई प्रतिक्रिया नहीं थी ..वह चुपचाप अपना होल्डाल उठा लाया .असित की दृष्टि को अनदेखा करते हुये तरु बिल्कुल चुप बैठी रही . असित ने बिस्तर सीट पर खोल दिया .जूते उतार कर पाँव बिस्तर पर पसार दिये .चुप बैठी तरु को अजीब लग रहा था .

'सबको तो दवायें बाँटते हैं अपने लिये कोई दवा नहीं है क्या ?"

"है न !निकाल दीजिये बैग में से ."असित ने चाबी उछाल दी .

थोड़ी देर में फिर बोला ,"बड़ी बेचैनी हो रही है ,गला सूख रहा है .."

तरु ने पानी पिलाया फिर वहीं एक तरफ बैठ गई .घड़ी देख कर बोली ,"साढ़े दस बज चुके हैं ."

कम्पार्टमेन्ट में हल्की रोशनी फैली हुई है .अधिकाँश लोग सो गये,सर्वत्र नींद की ख़ामोशी छाई है . असित ने तरु का हाथ पकड़ अपने सिर पर दबा लिया .सिर दाबने लगी वह .असित ने उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया .

"दाबिये नहीं ,बस यों ही अपना हाथ रखा रहने दीजिये आपका शीतल स्पर्श बड़ा अच्छा लग रहा है .''

गर्म मर्दानी हथेली का स्पर्श अनुभव कर रही है तरु .अन्दर से कैसा-कैसा लग रहा है !''ऐसे कब तक बैठी रहेगी ?''

असित बाँयें हाथ से दाहिने हाथ की कोहनी के ऊपर का भाग दबा रहा है .

"क्या बात है हाथ में भी दर्द है ?"

"वह भारी बैग लगातार हाथ में लटकाये रहा ....आपको बताया था न ,एक बार रिक्शा चलाया था तब इस हाथ में बड़े झटके से चोट लगी थी .तब तो इतना पता नहीं चला .अब ज़रा सा ज़ोर पडते ही हाथ दर्द करने लगता है ..आज भी ---अरे, आप आराम से बैठिये "

थोडटा खिसक कर उसने तरु के आराम से बौठने भर को जगह बना दी .,वह थोड़ा आराम से बैठ गई.

"कल से बड़ा खराब लग रहाहै .बुख़ार रहा होगा .''

उसने तरु की गोद में अपना हाथ रख दिया .तरु ने धीरे से गोद से उठा कर अपने हाथ पर रख लिया .और धीमे से सहला दिया .

रिक्शे की घटना उसे याद आ गई,असित ने बताया था कैसे दो-दो मुस्टंडे उसके रिक्शे पर चढ़ कर बैठ गये थे और ढाई मील तक दौडा दिया था फिर. मजदूरी के नाम पर एक रुपया टिकाकर चलते बने .

मन में स्नेह उमड पडा .पूरी बांह की शर्ट उसका स्पर्श हाथ तक नहीं पहुँचने दे रही थी .उसने हल्के से कफ़ की बाँहें ऊपर समेट दीं और हल्के हाथों दबाने लगी .

असित बार-बार उसका हाथ अपने सिर पर दबा लेता है .

पहियों की गड़गड़ाहट और भाप की छकपकाहट .मानव ध्वनियाँ शान्त हैं .खर्राटों की आवाज रह-रह कर उठती है .तरु की आँखों में नींद भरी है .वह सो जाना चाहती है ,नींद रोकने के क्रम मे बार-बार उसका सिर नीचे झोंके खाने लगता है .

"तुम भी सोओ अब जाकर .तुम कह रहा हूँ .नाराज मत होना ."

मुँह से कह दिया पर आँखें कह रही हैं तरु न जाये .

"अब सिर कैसा है ?"

''पहले से कुछ ठीक है पर अकेले होते ही फिर घबराहट लगेगी ."

''---तो मैं बैठी हूँ ."

"अच्छा तो पाँव ऊपर कर लो .कुछ आराम मिलेगा.यों लटकाये-लटकाये कब तक बैठी रहोगी ?"

असित को अच्छी तरह उढ़ाते हुये उसने कम्बल समेट दिया और पाँव ऊपर कर लिये .

हल्की रोशनी मे असित की निगाहें उसके चेहरे पर आ टिकी हैं .रुक-रुक कर वह भी देख लेती है .बुखार की तपन कुछ कम हुई या नहीं बीच-बीच में हाथ उसके सिर पर रख अनुभव कर लेती है .असित ने उसका हाथ पकड़ कर अपने गाल पर रख लिया हथेली में सुबह की बनी दाढ़ी की हलकी सी चुभन.तरु सिहर उठी ..

"तरल जी, मेरे पास से मत जाइये ,"व्याकुल सा स्वर उठता है .

"नहीं, मैं कहीं नहीं जा रही ."

एक तपता हुआ हाथ उसके बालों और गालों को सहला जाता है .उँगलियाँ नाक की नोक हिला देती हैं .तरु क्या करे विवश बैठी है .

"पाँव ठीक से फैला लो ,ऐसे कहाँ तक बैठी रहोगी ?"

वह संकोच से भर गई ,"नहीं ठीक है ."

"तो जाओ ,अपनी बर्थ पर सोओ जाकर .ऐसे तो तुम भी बीमार पड़ जाओगी ." असित के स्वर के आक्रोश को तरु ने पचा लिया .

उठ कर चली जाऊँ ? नहीं ,बीमार है -सहारा चाह रहा है -सोचा तरु ने बोली ,"नहीं ,मुझे कुछ नहीं होगा ."

वह कोहनी टेक कर तिरछी होती हुई बैठ गई .उसका कंबल उसी की ओर समेटते हुये अपने को पर्याप्त अलग कर लिया .

असित की उँगलियां तरु के होंठों से आ लगीं वह एक क्षण रुकी फिर हाथ से पकड़ कर अलग कर दिया .बालों की एक छिटकी हुई लट उसने समेट दी.

तरु विवश सी बैठी है .

"तुम्हें बहुत परेशानी हो रही है ." वह उसके चेहरे पर आँखें जमाये है .

क्या उत्त्तर दूँ ,कुछ कहते भी नहीं बन रहा .

"कोई बात नहीं .ठीक है ."

उसने अपनी गर्म उँगलियाँ फिर उसके होंठों पर रख दीं ,होंठों पर दबाव बढ़ रहा है . तरु एक क्षण झिझकी फिर उँगली की कोर हाथ से हल्के से दबा कर हटा दी.

"अब आप शान्त लेट कर सो जाइये न. "

"कोशिश कर रहा हूँ ."

एक झटके से उसे खींचकर असित अपने सीने से लगा लेता है .उसके शरीर के ताप और दिल की धड़कनों का अनुभव कर रही है ,चौंकी हुई तरल .कौन सी धड़कनें उसकी हैं कौन सी असित की वह भेद नहीं कर पा रही .

सम्हल कर छूटने की कोशिश करती है तभी ठोड़ी पर उँगलियों की पकड़ और होंठों पर होंठों का गर्म दबाव ,नोकीली दाढ़ी की चुभन ,मूँछों की चुभती सरसराहट ! विमूढ़ सी हो उठी .रोमाँच हो आया तरु को -जैसे उस स्पर्श को ग्रहण करने शरीर का रोम-रोम सजग हो उठा हो .एक अनजानी गन्ध नासापुटों में समा रही है ,उन्माद में डुबाती -सी .दाढ़ी की नोकें चुभ रही हैं माथे पर नाक पर .

"यह क्या कर रहे हो ."कहते -कहते रुक गई वह .उस हल्की रोशनी में उस चेहरे को उन आँखों को देखती रह गई .फिर अपनी दोनों हथेलियों में भींचकर उसने असित का चेहरा हल्के से उठाया सामने रख कर देखा फिर छोड़ दिया .कैसी चुभन है ?क्या हथेलियों मे भी रोमाँच होता है ?

तरु ने अपने पाँव सीधे किये और सम्हल कर बैठ गई .

"जा रही हो ?.''

असित ने हाथ पकड़ लिया ..

"नहीं जा रही यहीं बैठी हूँ ."

उसका हाथ अपने हाथों में लेकर तरु बैठी रही .असित अपना कम्बल उसे उढ़ा देना चाहता है .

"नहीं मैं ठीक हूँ ऐसे ही ."

"क्या ठीक हो ?"

वह उसके कन्धे तक कम्बल खींच देता है .कुछ देर हाथ कंधे पर टिकता है फिर गर्दन की हड्डी पर .उसकी नज़र फिर असित के चेहरे पर अटक गई है .असित के बहकते हाथ को उसने अपने हाथ में पकड़ लिया है और खोई -सी देखे जा रही है .असित की आँखें उसे ही देख रही हैं .

"तरु!"अनुनय भरा स्वर उठता है .

उन उच्छृंखल होते हाथों को वह बार-बार बरजती है .उसके दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर बैठ गई है .

हाथों का हाथों से स्पर्श ,केवल स्पर्श !

नींद पलकों से उड़ गई ,शब्द होंठों में बन्द रह गये और सारी रात बीत गई .

सुबह के तीन बज चुके हैं .

"तुम्हारे पाँव अकड़ गये होंगे तरु .अब सो जाओ ."उसकी पलकों को बालों को गालों को असित के उतप्त हाथ सहला गये ,जाने की अनुमति देते -से .

वह अपनी बर्थ पर आ लेटी .

बड़ी अजीब सी अनुभूति घेरे है तरु के मन को, न सो पा रही है ,न जाग रही है .असित के हाथों का स्पर्श जहाँ -जहाँ हुआ था ,बड़े मोह से अपने शरीर पर हाथ फेरती है ,और रोमाँचित हो उठती है .कैसी विलक्षण अनुभूति , शब्दों से परे !

यों ही जाने कब आँख लग गई .सुबह नींद जल्दी नहीं खुली .ट्रेन में जल्दी उठ कर करना भी क्या ! लेटे-लेटे बड़ा आराम मिल रहा है .आँखें बन्द किये पड़ी है .सुहावनी भरक शरीर को घेरे हुये है .तरु ओढ़ी हुई चादर को और लपेट लेती है .स्पर्श कुछ नया सा लगा .आधी आँख खोलकर देखा -उसकी चादर के ऊपर किसी ने एक और मोटी सी चादर उढ़ा दी है ,खूब सम्हाल कर .

सामने निगाहें जाती हैं .रात वाला कम्बल असित के बिस्तर पर पड़ा है .असित की चादर ओढ़े वह आराम से सोती रही .पता नहीं कब उढ़ा गया -हैंडलूम की मोटी चादर के भीतर तरु का शरीर रोमाँचित हो उठा .उसने चारों ओर निगाह दौडाई -नहीं ,यहाँ नहीं है !

घडी में टाइम देखा .अरे,साढ़े आठ बज चुके !

उसने बालों पर हाथ फेरा और पल्ला सम्हालती उठ खड़ी हुई .चादर तहाई और असित के होल्डाल पर डाल दी .

"चाय लेंगी ?"

असित आ गया है ,शेव का सामान बैग में रख रहा है .

"अभी नहीं ," वह सिर उठाकर उसकी ओर देख नहीं पा रही है .,"आप लीजिये .'फिर कुछ रुक कर पूछा ,"आपकी तबीयत कैसी है ?"

"बहुत ठीक

.दवा का असर होना ही था ."

**

इसी साड़ी को देख कर शन्नो जिज्जी ने टोका था ,"कितना गहरा पीला रंग है .एक तो काली ऊपर से इतनी पीली साड़ी .कैसी अजीब लग रही है!"

"लगने दो अजीब .मैं तो पहनूंगी .पिताजी ने खरिदवाई है ,मुझे अच्छी लगती है ."

पिता तब अस्वस्थ नहीं थे.

माँ अपने मैके गईँ थीं . बडी शान्ति से दिन बीत रहे थे .एक दिन शाम को आकर बोले थे ,"चौक की दूकान पर एक बडी अच्छी धोती अलग रखवा आया हूँ तरु ,तुम खरीद लाओ .ब्लाउज़ का कपड़ा भी लेती आना ."

वे साड़ी को धोती ही कहते थे .

तरु ने साड़ी देखी ,रंग गहरा लगा .पर पिताजी ने पसन्द कर ली है . चलो एक यह भी सही ! उसने खरीद ली थी .

पिता ने फिर पूछा था ,"तरु ,अच्छी लगी न ! तुम्हारे पास ऐसी कोई नहीं है ."

तरु मन ही -मन मुस्करा दी थी .अम्माँ गोरी हैं जिज्जी गोरी हैं ,मै तो काली हूँ, पिता जी यह क्यों नही सोचते !

पर फिर शन्नो जिज्जी ने टोक दिया था .'ऊँह ,कहने दो उन्हें तो मेरे ऊपर कोई चीज़ अच्छी नहीं लगती. '

एक बड़ी पुरानी घटना तरु के मन में कौँध जाती है -

रिश्तेदारी में कहीं विवाह था .लड़कियाँ सज रहीं थी .खुल कर प्रसाधन सामग्री का प्रयोग किया जा रहा था .शन्नो तो सुन्दर थीं ही उनका रूप सवाया हो उठा था .

तरु ने भी पाउडर क्रीम से चेहरा चमकाया लिपस्टिक पोती ,आइ-ब्रो से भौंहें सँवारीं काजल लगाया और माथे पर चमकीली बिन्दी चिपकाकर शीशा देखा .फिर वह संतुष्ट होकर बाहर निकली .

"आँगन में शन्नो अपनी हमजोलियों के साथ बैठीं थी .तरु को कुछ क्षण देखती रही फिर बे-साख्ता हँस पड़ीं .उनने इशारे से अपनी साथिनों को दिखाया .वे सब भी खिलखिला पड़ीं .

"क्या चहोरा है चेहरे को !" शन्नो हँसी के मारे दुहरी हुई जा रहीं थी .

तरु भाग कर कमरे में जा घुसी .शीशे पर निगाह गई -काजल और आई-ब्रो खूब फैल गई हैं ,पाउडर के धब्बे चमक रहे हैं लिपिस्टिक होंठों के ऊपर और नीचे पुत सी गई है और खिसियाया रोया सा चेहरा ! विचित्र मुखाकृति बन गई है .

उसने सब पोंछ डाला .आँसू गालों पर बहते रहे ,सबके सामने आने की फिर हिम्मत नहीं पड़ी ,वह उसी कमरे में बिस्तर पर पड़ गई.तरु का मन उस दिन से ऐसा खट्टा हो गया कि 'सजने ' शब्द से ही उसे वितृष्णा हो गई .मैं जैसी हूँ, वैसी ही रहूँगी .सिंगार पटार से क्या शकल बदल सकती है ?ठीक है रूप नहीं है मेरे पास, रंग काला सही ,मन तो उजला है ,छल -कपट तो नहीं रखती हूँ अपने भीतर !

और आज फिर पिता की पसन्द की हुई गहरी पीली साड़ी पहने ट्रेन में खिड़की से लगी बैठी है तरु ..

असित बार-बार उसकी ओर देख लेता है .कुछ कांशस हो रही है .

"काली हूँ न !ऐसी पीली साड़ी अच्छी नहीं लगती मेरे ऊपर .पर पिता जी की खरिदवाई यही एक साड़ी बची है मेरे पास ! मुझे यह पहनना अच्छा लगता है .."

"तुम काली हो ?किसने कह दिया ?गेहुँआ ,या उज्ज्वल साँवला रंग.मैं तो बार - बार देख रहा हूँ पीली साड़ी पर पड़ती धूप की चमक से तुम्हारा चेहरा कैसा दमक उठा है !जरा मेरी आँखों से देखो अपने को .-- और बिल्कुल गोरा रंग तो मुझे ज़रा नहीं सुहाता ."

'तुम पहनोगी तो और अच्छी लगेगी .' पिता की बात याद आ गई उसे. असित की निर्निमेष दृष्टि कहीं भीतर तक उतर गई .तरु को लगा जैसे सूरज की किरणों में सातों रंग खिल उठे हों !

अब तो असित दफ़्तर से ही पता कर लेता है कि वह कब जा रही है और उसी के अनुसार अपना प्रोग्राम बना कर रिजजर्वेशन करा लेता है .कहता है सफ़र अच्छा कट जायेगा .तरु को भी आराम है .अकेले जाने की परेशानियों से बच जाती है .

'मेरे पीछे अपना प्रोग्राम क्यों गड़बड़ करते हो ,'वह कहना चाह कर भी कहने की हिम्मत नहीं कर पाती .कोई रागात्मक तन्तु उसे असित के साथ जोड़ गया है .शुरू -शुरू में रिजर्वेशन के लिये पूछे जाने पर तरु ने साफ़ मना कर दिया था .आग्रह करने पर भी वह नहीं मान रही थी .तब असित ने झुँझलाकर कहा था ,"आप इतनी ज़िद्दी क्यों हैं ?"

"जि़द्दी हूँ " --तरु ने सोचा ,'सही बात होगी .सब यही कहते हैं .--पर मन जिसकी गवाही न दे वह कैसे करूँ ?..लेकिन इसमें ग़लत क्या है ?उसने अपने आप से पूछा .भीतर से उत्तर आया --कुछ नहीं .कुछ गलत नहीं .कोई किसी का रिजर्वेशन करा दे तो इसमें क्या गलत हो सकता है !

"अच्छा करा दीजिये ."वह मान गई थी .
**


(क्रमशः)

5 टिप्‍पणियां:

  1. हृदयस्पर्शी रचना है |
    उम्दा शब्दों का इस्तेमाल किये हैं
    बहुत बहुत धन्यवाद|

    ----------------------
    एक मजेदार कविता के लिए यहाँ आयें |
    www.akashsingh307.blogspot.com

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  2. रोचक प्रसंग। आगे का इंतज़ार।

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  3. ''तरु चुप ,कोई उत्तर नहीं ,कोई समाधान नहीं .बस बात टाल देना. ''

    आत्मीयता अक्सर ह्रदय को बहुत संवेदनशील स्थानों पर अत्यधिक सहजता से स्पर्श कर दिया करती है.....फलस्वरूप अस्तित्व झनझना उठता है.....ऐसे में तटस्थता व्यक्तिगत रूप से उपचार का काम करती है........प्रश्न दर प्रश्न स्वयं के कटने से बेहतर संबंध दर संबंध दुनिया से कटना लगता है......

    **
    पहले नहीं सुहाया असित का तरु से इस तरह मैत्री बढ़ाना... ...बाद में सोचा तो लगा कि क्या गलत है....एक रिश्ते में यदि उसे राहत मिलती भी है तो.....बशर्ते यहाँ धोखा न हो...

    विपरीत परिस्थितयां कहाँ ले जाकर इस उपन्यास के पात्रों को छोड़ेंगी..अब यही उत्सुकता होती है....

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  4. तरल का मन, उसकी स्थितियाँ, सब मुखर हो आया है इस अंश में।
    जब बहुत कुछ हो कहने को लेकिन नहीं कह पाने को कोई योग्य पात्र न मिले, कैसा कसैला कसैला सा हो जाता है मन।
    मौन ही सबसे उचित लगता है, टाल देना श्रेयस्कर।
    तरल के पिताजी, उनके मनोभाव जाने, जीवन कितना विवश कर देता है।
    तरल, असित के साथ उनके सम्बन्ध आगे कहाँ जाएँ, कैसे जाएँ, प्रतीक्षा रहेगी।

    इस बाँध देने वाले अंश के लिए आभार स्वीकारें।

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