मंगलवार, 11 जनवरी 2011

कृष्ण-सखी -1 & 2.


पाँचाली.
1.
ग्रीष्म की उत्तप्त दुपहरी. इस सघन वन में पाँडव अपना वनवास बिता रहे हैं.
वृक्ष की छाया में द्रौपदी अलसाई लेटी है.थोडी दूर उसके पाँचो पति बैठे हैं.मन ही मन उसे हँसी आ रही है -किसी पुरुष की पाँच पत्नियाँ भी ऐसे हिलमिल कर नहीं रह सकती होंगी जैसे मेरे पाँच पति.विनोद से भर उठी है वह. एक से एक भिन्न स्वभाव के,माँ कुन्ती ने एक सूत्र में बाँध रखा है.शायद इसीलिये उन्होने सब के लिये एक पत्नी की व्यवस्था की,जो सब को  समेट कर एक साथ  रख सके.
क्या बातें करते हैं ये लोग आपस में ! कौतूहल हो रहा है द्रौपदी को -कोई भी तो समानता नहीं .सबका अपना ढर्रा!दो बड़े ,दो छोटे ,बीच में हैं अर्जुन .सबसे संतुलित भी वही .
सबसे बड़े युठिष्ठिर! धर्म और नीति के ठेकेदार - परम धैर्यवान ,हमेशा शान्त .सुख -दुख ,हानि-लाभ ,यश-अपयश से परे !कभी उत्तेजित होते उन्हें नहीं देखा द्रौपदी ने. प्रेम में भी अति शान्त, उत्तेजना विहीन .उनकी मान्यतायें लोक से निराली हैं .माँ के कहने पर भाई की प्राप्ति में तो बँटा लिया,पर जुये दाँव पर सबका हिस्सा लगा दिया !
अपने हिस्से के दिन दाँव पर लगाते . तब तो बड़े बन कर सबके हिस्सों को हार दिया. माँ से पूछने की जरूरत भी नहीं समझी,भइयों से मशविरा करते भी क्यों !द्रौपदी तो भीख में मिला उनका हिस्सा है ,अपने को प्रमाणित करने की क्या आवश्यकता !जो मिला, भोग्य है उनका !
भीम - भोजन भट्ट !वायु प्रधान व्यक्तित्व है. वैसा ही वेग से भर उठनेवाला. सोचने- समझने का धीरज नहीं.आवेग और आवेश उसके स्वभाव में हैं.द्रौपदी के मुँह से जो निकले पूरा करने को सदा प्रस्तुत !डकारें बहुत आती है उसे .प्रथम मिलन की रात्रि में द्रौपदी के सामने मुँह किये एकदम डकार छोड़ दी ,खाने पीने में वैसे ही असंयमी ।द्रौपदी के मुँह पर वह गंध भरा भभका !मुख तिरछा कर लिया था उसने कुछ कहा नहीं .बैठे बैठे डकार छोड़ देना उसकी आदत है ,उसे पता ही नहीं चलता !न भोजन पर नियंत्रण है न वायु पर! ,पेट की सारी गड़बड़ी मुँह से निकलती है.
और अर्जुन ! द्रौपदी ने तो उसी की कामना की थी .बाकी सब तो साथ बाँध दिए गए गए .सधा हुआ व्यक्तित्व,धीर गंभीर और परम पराक्रमी. इन्द्र के अंश हैं,रूप और कान्ति अनुपम ,नृत्य-,गान निपुण , विद्याओं , कलाओँ के प्रेमी  . अर्जुन के प्रति मन में आकुलता निरंतर बनी रहती है.
उन्हीं को चाहा था ,पर कितना कम मिलन होता है .वह भी  पाँचाली को पा कर भी पूरी तरह नहीं पा सका .असीम प्रेम है उसके हृदय में .लेकिन कैसा संताप, कि कहीं टिक कर नहीं रहने देता  ! भटकता फिरता है धरती-गगन में -अधूरी प्राप्ति की टीस से विचलित .
नकुल को अपने सुदर्शन होने का अभिमान है सहदेव सबसे छोटे उन्हें कोई  अपने जैसा विद्वान और बुद्धिमान नहीं लगता .पर दोनों का व्यक्तित्व कभी खुल कर सामने नहीं आता ,बड़ों के सामने दबा-ढँका सा रह जाता है .माद्री-पुत्र हैं रूपवान ,विद्वान. पर पाँचाली को प्रभावित नहीं कर पाते ,उसकी तेजस्विता के आगे मन्द पड़ जाते हैं ।दोनों को अलग-अलग समझ नहीं पाती वह .समझ तो इन सब को नहीं पाती,एक पार्थ को छोड़ कर !
और द्रौपदी पर नियंत्रण है कि सबसे बराबरी से निभाए .सबको समान प्रेम करो- पत्नीत्व के हिस्से सबको बराबर मिलने चाहियें .सारे टुकड़े बराबर हों ,कोई छोटा बड़ा नहीं. क्या नारी के मन-आत्मा कुछ नहीं होती! स्वयं को इतना  साध रखा है माँ कुन्ती ने ?
उनके भी पाँच होते -पाण्डु तो विधिवत् थे ,धर्मराज ,पवन और इन्द्र तीनों पुत्रों के पिता पति ही तो हुये .एक और हो सकता था ,होता तो भी क्या फर्क पडता ,पर नकुल,सहदेव माद्री- माँ के हैं ,एक नाते से वे भी कुन्ती माँ के ही हुये ,सौत का पति ,सो अपना पति .उनके चार पति हुये क्या इसीलिये मेरे लिये पाँच पतियों का विधान किया (यह तो पांचाली को  बाद में पता लगा कि एक पुत्र के पिता  सूर्य भी थे) सब ने सिर झुका कर स्वीकार लिया .
मेरे साथ होने पर सबका व्यक्तत्व भिन्न होता है .पर एक साथ होने पर पाँचो अलग नहीं लगते- बिल्कुल एक . एक सूत्र से संचालित होनेवाले ,जैसे पाँच अश्व एक रथ के वाहक हों.इसी एकता में इनकी निजता निहित हो जाती है .लेकिन इससे अलग उनके जो भिन्न व्यक्तित्व हैं उनसे केवल द्रौपदी परिचित है.
नहीं, अब वह सब अटपटा नहीं लगता.उसने सहज रूप से स्वीकार कर लिया है.एक के साथ होती है तो दूसरे की याद नहीं करना चाहती.बहुविवाह में पति भी अपनी पत्नियों के साथ यही करते होंगे. हरेक के साथ बारी बँधी है,जब तक जिसके साथ हैं तब तक उसके ।पर द्रौपदी  मन से अर्जुन के साथ बँधी रही ।देह का धर्म सबके साथ निभाती है पर सिर्फ उन्हीं तक सीमित कहाँ रह पाती है .सोचने-समझने करने को और भी बहुत कुछ है .मन क्या सबके साथ बँधता है ,जानता सबको है ,मानता सबको नहीं .प्रेम क्या कहे-सुने किया जाता है ?
जिन्हें प्रेम करती हूँ उनके साथ भी भावना एक सी नहीं होती, हरेक के लिये भाव कुछ भिन्न होता है-प्रत्येक से एक भिन्न संबंध.
कृष्ण मित्र हैं.नारी- नर का एक विलक्षण संबंध .निस्वार्थ ,दैहिकता से परे,अति घनिष्ठ.उनसे कुछ भी कहने में संकोच नहीं होता ,मन खोल कर कह लेती है  और हल्की हो लेती है .अब मन शान्त रहने लगा है .सब कुछ जैसे ऊपर ऊपर से निकल जाता है ,बिना प्रभाव डाले ,बिना स्पर्श किए .कृष्ण का साथ होता है तो एक अखण्ड शान्ति,गहन नीरवता साथ रहती है .सब कुछ सौंप देती हूँ उन्हें और वह निस्पृह भाव से स्वीकार कर लेते हैं.
मेरा अपना बचा ही क्या है ?लगता है मन का विचलन रुक गया, मंथन थम गया .तब निजत्व आड़े नहीं आता.तटस्थ होकर विचार कर सकती हूँ.अपना आपा जब केन्द्र में हो तो विवेक सो जाता है ,अशान्ति ही पल्ले पडती है .द्रौपदी शान्त और सुस्थिर रहना चाहती है ,लेकिन चारों ओर उठती हुई आँधियाँ ,झकझोरती हवायें,निरंतर चलती उठा-पटक, मन को बार- बार विलोड़ित कर देती हैं ।
रात विचित्र स्वप्न देखा - इधर उधर लुढ़कते रुण्ड-मुण्ड,रक्त की बहती धारायें जिनमें बहे जा रहे परिचित और प्रिय चेहरे .मन विकल हो उठा.नींद खुल गई-आँखें खोले अँधेरे में ताकती रही .
भीतर ही भीतर अविराम मंथन चलता है .यह कौन सा धर्म है कि पत्नी का वस्त्र-हरण होता रहे और पति निरीह बना बैठा रहे !एक नहीं पाँच-पाँच पति।तब माँ की आज्ञा मानी थी,बाद में भी माँ से सलाह कर लेते!युधिष्ठिर की धर्म और मर्यादा की बातों पर कभी हँसी आती है कभी क्रोध .सारे भाई उनका मुँह ताकते बैठे रहते हैं .किसी पराई नारी का भी वस्त्र -हरण हो रहा हो और अपने को वीर और नीतिज्ञ माननेवाला पुरुष दर्शक बना देखता रहे -उसे मर्यादाशील कहा जायेगा ?
2.
पाँचाली हँस रही है , 'क्यों छछिया भर छाछ के लिये तुम्हें नचाती थीं, ब्रज की गोपियाँ ? ऐसे भोले तो तुम लगते नहीं !'
'मैं नाचता था?'
तिरछी सी मुसकान में कृष्ण के होंठ टेढ़े हो गये,
' उनकी विचित्र भाव-भंगी देखने के लिये सारे खेल करता था सखी ,तुम कभी देखतीं वे सहज ग्राम-बालायें मनो -ग्रंथियों की अस्वाभाविकता से मुक्त हो ,अपने  भाव  कैसे व्यक्त करती हैं.कुल,शील ,मर्यादा ,लाज सारे प्रतिबंध तोड़ मेरे साथ कैसे सहज हो जाती हैं .मैं नहीं नाचता था,नाचती तो मेरे आगे-पीछे वे थीं .मैं भी आनन्दित होता था ,वे भी .'
'बड़े कौतुकी हो तुम! वास्तव में नटवर .लोगों को लगता है तुम नाचे पर तुम तो सबको नचानेवाले हो . स्वयं चैन की बांसुरी बजाते होगे कहीं जमुना किनारे ,राधा के साथ .'
'क्या कह रही हो मैं राधा के साथ ,और चैन की बाँसुरी !बाँसुरी हाथ में लेने का अवसर फिर कहाँ मिला ?हर काम के लिये एक वातावरण होता है .अपने में डूब कर बाँसुरी बजाने का भी !
'वह यमुना का तट ,ज्योत्स्ना भरी रात्रि वे भोले-भाले गोप-जन, और सबसे बढ़ कर वह मन कहाँ से लाऊँ ? यहाँ न शान्ति है, न विश्वास, न वैसा  प्रेम .राग कैसे बजेगा यहाँ ?राधा तो तब के बाद ऐसी छूटी  कि देखने को तरस गया .  बस,एक बार मिली थी.'
द्रौपदी ध्यान से देखती रही,'कृ्ष्ण ,तुम सुखी हो या दुखी मैं  समझ नहीं पाती.'
'क्यों सुखी होना या दुखी होना ज़रूरी है ,जीवन में चैन से बैठने को कब मिला जो अनुभव कर सकूँ ?'
' सच्ची मीत,कभी -कभी तो  मैं घबरा जाती हूँ .समझ नहीं पाती कहाँ जाऊँ ,क्या करूँ.कहीं छुटकारा नहीं दिखाई देता .उन विषम क्षणों में तुम्हारे जीवन के अध्याय याद आते हैं .तब लगता है  ,इतना सब झेलते हुए भी तुम कितने सहज रह लेते हो -कितने निरुद्विग्न ,प्रसन्न-चित्त.'
कुछ रुकी द्रौपदी ,फिर बोली ,'जो बीत गया उससे मुझे क्या ,सोच कर शान्त रहना चाहती हूँ  पर  जो बार-बार घिर आता है ,निकाल नहीं पाती मन से. और भविष्य ?  ..आगे क्या करना है यही उधेड़-बुन लगातार चलती है .....एक तुमसे मुझे जीने की शक्ति मिलती है .'
'जो सोच कर दुख होता है उसे सोचो ही मत सखी .आगे जो करना है उसी का ताना-बाना बुनो.'
 क्या यह संभव है- प्रश्न उठा द्रौपदी के मन में ,उसने कहा,'जीवन तो  चलेगा ही ,क्या  होना है ,कहाँ ,कैसे होना है यह निर्णय मेरा कहाँ .आगे कब क्या होगा कुछ नहीं मालूम .एक से एक विचित्र परिस्थितियाँ  आ खड़ी होती हैं .पहले से  कुछ सोचना-समझना कैसे ?'
चुप हो गए कुछ क्षण दोनों.
अचानक ही पूछा द्रौपदी ने ,'तुम राधा के विषय में सोचते हो?'
कृष्ण के मन में वृंदावन घूमने लगा .लगा यमुना की शीतल लहरें खनक रही हैं ,वन की मुक्त हवा का झकोरा जैसे तन को परस गया हो .
दूर गाएँ रँभा रही हैं , हरित-श्यामल धरती का विस्तार ,फूल खिले हैं .अचानक ही राधा सामने आ कर खड़ी हो गई -नैन तरेरती मुद्रा में.
कानों में स्वर आया -'सखा कृष्ण'
कृष्ण जैसे जाग उठे .
'कहाँ खो जाते हो बार-बार.'
राधा चली गई .कृष्ण चेते.
'तुम कह रही थीं राधा के विषय में सोचना? उसका आभास निरंतर मुझे होता है ,वह मौजूद है .विद्यमान है .कहाँ-कहाँ तक ,मैं स्वयं नही समझ पाता . पाँचाली,तुमसे नहीं छिपाऊंगा.
राधा ने एक बार पूछा था- मैं प्रसन्न होऊँ जो मुझे तुम्हारा प्यार मिला ,या तुम नहीं मिले इसका पश्चाताप करूँ? सुख और दुख दोनों समरूप स्थित हो गये हों जहाँ उसे क्या नाम दें ?इस अंतरंगता को द्योतित कर सके ऐसा कोई शब्द नहीं.'
वह चुप सुन रही है - -
'और जब मैं अकेला होता हूँ वह अचानक चली आती है ,मेरा विचार-प्रवाह रोक कर खड़ी हो जाती है .बिना कहे-सुने समझ जाते हैं हम एक दूसरे की बात .'
'पराकाष्ठा है .'
'काहे की?'
'प्रेम की .'
*
(क्रमशः)

7 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक जानकारी से भरी सुंदर रचना , बधाई

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  2. '' मैं प्रसन्न होऊँ जो मुझे तुम्हारा प्यार मिला ,या तुम नहीं मिले इसका पश्चाताप करूँ? सुख और दुख दोनों समरूप स्थित हो गये हों जहाँ उसे क्या नाम दें ?इस अंतरंगता को द्योतित कर सके ऐसा कोई शब्द नहीं...''

    ''कृ्ष्ण ,तुम सुखी हो या दुखी मैं समझ नहीं पाती.''

    :'(

    ऐसा लगा जैसे दो घनिष्ठ मित्र बैठ कर आपस में दुःख सुख बाँट रहे हों.....पढ़ते पढ़ते भूल ही गयी.....कि...''श्रीकृष्ण'' का ज़िक्र उनके मन की बातें चल रहीं हैं......जिनके चरणों में सारा ब्रहमाण्ड पड़ा है.....सारे देवी-देवता नतमस्तक हैं...वो श्रीकृष्ण...सखी स्वरुप बहन के आगे कितने अकेले असहाय से नज़र आ रहे हैं........एक जगह बड़ा दुःख हुआ श्रीकृष्ण के लिए..आँख डबडबा गयीं......:(

    एक प्रश्न उठ रहा है यहाँ पर......सच्ची बताऊँ प्रतिभा जी......तो मैंने तो वेद वगैरह नहीं पढ़ें हैं....बहुत शुरू से हॉस्टल में रही हूँ....सो इतनी जिज्ञासा हो रही है..कि वास्तव में ऐसा कोई वार्तालाप श्रीकृष्ण और पांचाली के मध्य हुआ था.....या ये बस आपके तसव्वुर ही हैं...... ???

    ....पढ़े तो दोनों भाग हैं अभी अभी.....मगर दूसरे भाग ने वो छोटी छोटी मुस्काने भी हर लीं....जो प्रथम भाग को पढ़कर होंठों पर उभरीं थीं......
    चलिए अब तीसरा भाग पढ़ती हूँ........:(

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  3. 'जिज्ञासा हो रही है..कि वास्तव में ऐसा कोई वार्तालाप श्रीकृष्ण और पांचाली के मध्य हुआ था
    उत्तर-
    "भरोसो दृढ़ इन चरनन केरो"(इसी ब्लाग में एक आलेख) में वल्लभाचार्य जी ने सूर से कहा था -
    इस भौतिक संसार में कहाँ ढूँढ रहे हो सूर, चिरंतन लीला है यह पर मनोमय-कोश की .कौन समझाए तुम्हें !यहां कुछ नहीं मिलेगा .
    नहीं ! कभी नहीं !
    **

    (अपना समाधान इसी में ढूँढ लें, और
    छोटी हैं तो क्या हुआ ,जब तक किसी को साक्षात् न देख लूं उसके लिए मुँह से तुम कैसे निकले तरु जी?)

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  4. शकुन्तला बहादुर30 जनवरी 2011 को 10:46 pm

    प्रतिभा जी,
    किन शब्दों में बधाई दूँ? लगता है कि कृष्ण और पाँचाली के मनों में गहरे पैठ कर उनके सूक्ष्मातिसूक्ष्म संवेगों को बड़ी मनोवैज्ञानिकता से
    अपने सरस,किन्तु गंभीर और चुटीले वाद-संवादों में आपने पिरो दिया है।मैं देर तक उन्हीं भावों में खोयी रही,बुद्धि भी निष्क्रिय सी होगयी।
    अद्भुत चित्रण !!!

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  5. ji......samjhi !!

    aapke lekh ne kal itna vyathit kiya tha mujhe...skri krishn ke liye ek kavita hi likh daali...aur likhne ke baad chain mila.....uska shry aapko aapke shabdon ko......bahut aabhar !!


    saakshaat ??
    aapne fir duvidha mein daal diya...:) abhi abhi apni kavita mein bhagwanji ko ''tum tum'' keh kar aa rahin hoon......ab woh mujhse ladenge...:)

    baharhaal......
    shukriya jawaab ke liye..mujhe apna jawaab to mila hi mila.bahut kuch aur bhi mila usi uttar ke maadhyam se.....:)

    dher sa shurkiya...
    :)

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  6. अभी पहला भाग, पांचाल कुमारी का द्वन्द/विचार ही पढ़ा है,समय ले कर आगे पढना है.
    सचमुच द्रौपदी कि आँखों से पांडवों को, उस युग को देखना एक अनुभव होगा.
    आभार व्यक्त करता चलूँ.

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  7. 'मैं प्रसन्न होऊँ जो मुझे तुम्हारा प्यार मिला ,या तुम नहीं मिले इसका पश्चाताप करूँ? सुख और दुख दोनों समरूप स्थित हो गये हों जहाँ उसे क्या नाम दें ?इस अंतरंगता को द्योतित कर सके ऐसा कोई शब्द नहीं.'

    कितना वजन हैं पंक्तियों में, बखान करना मेरे लिए संभव नहीं जान पड़ता।
    सहेज रहा हूँ, शब्द-शब्द, मर्म-मर्म, क्षण-क्षण।
    बहुत आभार।

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