शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

New-दो संस्कृतियों के बीच काश, पथ बनता..




7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पुस्तक की समीक्षा पढ़ी ...बहुत बहुत बधाई ...

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  2. आज ही (७ मार्च) आपकी पुस्तक मिली...आभार अविनाश का फिर से..उसने उपलब्ध करवाई..अन्यथा बहुत प्रतीक्षा करनी पड़ती.....हम्म पढ़ भी डाली आज ही...एक ही सांस में....पहले तो विचार था आराम से घर पर पढूंगी...फिर ''काशीराम शर्मा जी'' की बात पढ़ी...''आवश्यक है पाठक एक ही वचन में भूमिका से अंतिम प्रणाम तक पारायण करे''......तो सोचा..लैब में ही पढ़ लेती हूँ यूँ भी कोई केस नहीं था..काम कम था.....

    यूँ तो पूरी किताब बहुत अच्छी है..मगर कुछ स्थान जहाँ विशेष रूप से ह्रदय ठहरा...नेत्रों ने दृष्टि थामी...उनका उल्लेख करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही....

    क्रम से ही चलती हूँ.....

    वाल्मीकि) ''नयनों में करुणा के कण मणि से जड़े हुए'' इस पंक्ति छटा ने विवश किया..इसे कई कई बार पढ़ने के लिए......एक वृद्ध ऋषि महाराज के अश्रुपूरित नयन आँखों के आगे आ gaye...

    सर्ग-४) ''कुछ श्याम मेघ घिर आये नभ.....कन्या तक छाई..''
    इस पद में अद्भुत संयोजन किया है प्रतिभा जी...वृष्टि और माँ सीता को मिली ममता का...

    सर्ग ५ मंदोदरी) ''जग के सम्मुख....पत्नी का महत्व..'' - यहाँ रावन के संवादों ने दिल जीत लिया...मन्त्र मुग्ध सोचती रही देर तक...कि रावण ...''रावण'' ऐसा कह रहा है मंदोदरी से.....?? हाँ जी वाकिफ़ हूँ अच्छे से..रावण प्रकाण्ड पंडित था...ज्ञानी था..मगर यहाँ अपने जो चित्रण किया है उसके चरित्र का एक पति के रूप में......उसके लिए बधाई...मेरे जैसी लड़की भी आँख बंद कर रावण के लिए अच्छा सोचने पर विवश हुई......

    ''था वातावरण.......गहरा स्वर''........कितना प्यारा रेखांकन है ह्रदय पर आते बोझ का....खासकर ''प्रयत्न करता 'सा'... इस ''सा'' ने तो लंकापति कि क्षीणता में मानों चार चाँद लगा दिए....:( क्षमा आपसे..मुझे उचित शब्द नहीं मिले इसे व्यक्त करने के लिए..आशा है आप समझ गयीं होंगी......:(

    सर्ग ७)
    ''बीती थी आधी रात चाँद नभ पर था..'' ...विनम्रता से कहना चाहूंगी..''चाँद'' शब्द बहुत खटका...काश यहाँ चाँद की जगह कोई और पर्यायवाची होता उसका...चाँद एकदम उर्दू सा स्वाद दे गया इसलिए.....

    ''यों दशमुख भी तो...परनारी से भी''...
    आहा! आनंद आया ये स्वर सुनके मंदोदरी का...ये confession....पति की गलती को स्वीकारने का स्वभाव...बहुत अच्छा लगा देखकर..

    ''हो पाप क्षमा...दर्शाने को अपना''......मम्म.....नहीं प्रतिभा जी...यहाँ बेकल होता है ह्रदय...पति की निंदा दुःख दर्शाने के लिए हो रही है. इसलिए नहीं अपितु...स्त्रियाँ कितनी छोटी छोटी (संभवत: अंतरात्मा के समक्ष ये गलती बड़ी होगी..) चीज़ों के लिए इतने भारी मन से क्षमा निवेदन करती हैं स्वयं से भी और परमपिता से भी.........ऐसा क्यूँ है???

    ''व्यव्हार तुम्हारा........शान्ति ह्रदय में भर दे''
    हम्म मनोविज्ञान भी यही कहता है...जो हमें नहीं मिला उसे जब hum परायों के paas dekhte हैं तो थोड़ी बहुत ईर्ष्या होती है...अगर वही चीज़ किसी अपने के पास हो..तो हम उसके ह्रदय और जीवन से अपने अभाव को भर लेने का प्रयास करने लगते हैं..अच्छा लगा ये पद...

    ''तो लक्ष्मण रेखाएं....माध्यम बना लिया नारी को''
    वाह!
    मन में पुष्प लताएं लहरा उठीं....कितना सटीक कहा है प्रतिभा जी....एक तो गलत किया ऊपर से दुगुनी गलती कि नारी का सहारा लिया......बहुत सही...

    ये सब शायद आपके आलेख में भी पढ़ लिया था....अच्छा हुआ आलेख पहले पढ़ा और पुस्तक बाद में...वरना इतने अच्छे से एक ही बार में किताब न पढ़ पाती...

    स्त्रोत) ''सीता व्याकुल......कुछ कहती वाणी''
    आँखें भर आयीं.......यहाँ पर...खासकर आखिरी पंक्ति में.......बहुत सुंदर ...ऐसे लगा जैसे पढ़ते पढ़ते मेरे ही अपने मन का कंठ अवरुद्ध हो उठा हो...और मैं क्षणिक विराम लेकर उसकी और टाक रही हूँ...भरे भरे नयन ले मन बस रो देने को होता है..मगर स्मरण हो आता है मस्तिष्क मुझे संभल लेता है...मन को और मुझे एकाकार कर देता है....मैं अपनी लैब में हूँ....और आते जाते कर्मचारी विस्मय से मुझे देख रहे हैं...कि मैं किस पुस्तक में गुम हो भीग उठी हूँ.....

    कलऋता नदी..?? नहीं जानती ...खैर गूगल से देख लूंगी...

    ...contd.....

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  3. सर्ग ८)
    ''कौतुक से......तिरस्कार की छाया''
    मैंने कभी चेष्टा नहीं की ये जान्ने की..कि माता जानकी के मन पर इस घटना का क्या प्रभाव हुआ होगा..या उन्होंने कैसे इसे घटित होते हुए देखा होगा....??आज विस्मित हूँ सब पढ़कर....

    ''वह आहत सी दृष्टि....टूटे कांटे सी..''
    बहुत बहुत गुस्सा आया इस भाग को पढ़कर...पहले भी आता था..मगर ऐसा नख शिख वर्णन नहीं पढ़ा था कहीं.......और ये दो पंक्तियाँ मन को आहत कर गयीं..सीता के लिए भी...कि जाने कैसे उन्होंने देखा होगा ये दृश्य.....

    सर्ग 10) ''यदि चंद्रनखा.....जीवन भर..''
    हम्म...सही है एकदम....इस पद के ऊपर वाले पदों में इंसानियत का पाठ पढ़ाते रावण पर बेहद स्नेह उम्दा.....एक एक शब्द ह्रदय में उतरता गया.....नारी की गरिमा बतलाई हो या फिर अपनी बुद्धि से कार्य करने को कहा .....मुझे सब अच्छा लगा.....

    ''टूटी लतिका सी.......धरती पर था''
    सजीव कर दिया ये दृश्य प्रतिभा जी.......मानों मेरे सामने की चीज़ें पृष्ठभूमि में चलीं गयीं हों...और बस ये पुस्तक सजीव घटित हो रही हो आँखों के सामने.....अद्भुत अनुभव है...
    मुझे बहुत कम दंपत्ति अच्छे लगते हैं......आपकी लेखनी के कारण आज रावण और मंदोंदरि ह्रदय में दूर तक जा विराजे....आभार आपकी लेखनी को...पूर्वाग्रहों से मुक्त हुआ ह्रदय कम से कम रावण और उनकी भार्या के लिए....

    सर्ग ११) ''चुपचाप स्वप्न......कितना बीता..''
    हम्म....बहुत से चेहरे सामने आ गए..जिनके भावविहीन मुख पर आँखें पथरायीं थी मगर देह सु-सज्जित...

    ''वंचित नारियां....अब सुख अपना..''
    इस उत्तर कथा को लिखने के लिए वाकई आपने हर एक ह्रदय में गहरी पैठ लगा कर सोचा होगा ना प्रतिभा जी...लंका की स्त्रियों की भी व्यथा लिख दी.....!! ऐसे ही हुआ होगा सचमुच...

    ''तुमने क्या सोचा......क्या कम थे..''
    हम्म..बढियां.....बहुत बढियां....माता सीता के लिए जितनी तारीफ़ करूं कम है....अच्छा कह दिया सब कुछ...मैं तो सोचती थी..इत्ता कहा ही नहीं होगा उन्होंने चुपचाप अग्नि में प्रवेश कर लिया होगा.......मैं कितनी गलत थी....!!
    खैर...

    सर्ग १५) ''सन्ततियाँ.....इसीलिए माता..''
    पूरी तरह सहमत हूँ......मन खिल उठा था ये पंक्तियाँ पढ़कर...

    ...contd

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  4. सर्ग २०)
    'मैं ही तो.....पहले ही हो हारा..''

    शुरूआती दोनों पंक्तियाँ तो अपने आप में जाने क्या क्या समेटे है....काश आपको बता सकती...

    वाह वाह! माता सीता के माध्यम से आपके शब्दों ने दिल फिर जीत लिया....मैं कैसे बताऊँ अपनी प्रसन्नता...न न! आप ये न समझें..मैं श्रीराम की विरोधी हूँ.....मैं महज उनकी गलत बातों के विरोध में बुलंद हो रहे माता सीता के स्वरों से अभिभूत हूँ...

    सर्ग २१)
    ''तुम राजा ये पुत्र......राम का अनायास...''
    फिर से ह्रदय आनंद से डोल उठा....सब कुछ करकर भी ऐसे ...(मुझे शब्द नहीं मिल रहे..)
    बस यूँ समझिये...अच्छा लगा देखकर श्रीराम का विस्मय माता सीता के आगे.....और माता का दम्भहीन व्यव्हार....

    सर्ग २२)
    ''राजा,फिर राजा....आपत्ति करे क्यों कोई..?''
    ज़बरदस्त कटाक्ष....

    ''ले लो सारे राजसी भोग......लौटा दो..''
    यहाँ भी आँखें फिर भर आयीं....व्याकुल लव-कुश को शब्द चित्रों में देखकर....
    चलिए..उन्हें माता का ध्यान उनकी परवाह तो है....यही भाव कहीं मन में शान्ति दे गया...

    ''झुक गयी राम की दृष्टि,श्याम से कृष्ण हो उठा मुख मंडल..''

    दोपहर से जबसे ये पंक्ति पढ़ी है...इसकी सुन्दरता में खोयी थी..कि वाह! कृष्ण और राम एक साथ आ गए.....अब लिखते लिखते थोड़ा confusion हो गया..''श्याम से कृष्ण हो उठा..''....मतलब श्याम और कृष्ण से अभिप्राय राम के वर्ण से नहीं है??? या श्याम और कृष्ण दोनों का अर्थ अलग अलग है..?? समय हो तो निवेदन रहेगा संक्षेप में बताईयेगा कृपया...

    सर्ग २३) '' मैं तो उखड़ी थी......मेरे साथ रहा''
    ये शब्द ह्रदय बेध गए.....इनके लिए कुछ कह पाऊं..ऐसे शब्द नहीं मिले...

    सर्ग २४) ''वह नीली साड़ी........घट गया उस छोटे पल में..''
    अद्भुत..अद्भुत....चित्रण उस दृश्य का...मैं देख सकती हूँ..अनुभव कर सकती हूँ..कैसे श्रीराम व्याकुल होकर नदी में विक्षिप्त से उतरते जा रहे हैं....
    (मुझे नहीं पता था श्रीराम जी ऐसे इस संसार से विदा हुए थे...पहली बार पढ़ा जाना....)

    सर्ग २५) अंतिम प्रणाम

    ''कुछ शेष रह......छोड़ गयी ऐसे''
    अंतिम प्रणाम का अंतिम पत्र आँखों में आंसू ले आया....घर पर होती तो आँखों से अविरल अश्रुपात होता...लैब में खुद को जैसे तैसे संभाला...

    ---------
    पूरी हो गयी पुस्तक आपकी....और मन में छोड़ गयी आनंद और ज्ञान के साथ साथ बहुत सी चीज़ें..प्रश्न और अंतर्द्वंद भी...
    प्रतिभा जी....
    जैसे जैसे पन्ने पलटते गयी....बस ह्रदय मथता रहा....कभी सीता कभी शूर्पनखा (इन्हें चंद्रनखा क्यूँ कहा आपने..ये नाम मुझे नहीं पता था..??) में अपने आपको रहकर उनके दुःख से विचलित होती रही......यहाँ तक कि रावण में भी खुद को देख लिया.....

    बहुत ही अच्छा आगाज़ और अंजाम उससे भी बेहतर.....चकित हूँ आपके लेखन से...सब कुछ कितना क्रमवार और कायदे से है....दिख रही है आपकी अथक मेहनत इस पुस्तक के पीछे...

    बहुत बहुत आभार इस लेखन के लिए
    सफल कृति के ढेर सारी लिए बधाई भी...

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  5. समय कम था...जल्दी जल्दी टाइपिंग के कारण हुईं भाषा की त्रुटियाँ सुधार नहीं पायी.......क्षमा कीजियेगा उनके लिए.

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  6. प्रिय तरु ,
    मैं कैसे अपना आभार और संतोष तुम्हारे प्रति व्यक्त करूँ ,जो तुमने इतना डूब कर 'उत्तर-कथा 'का अध्ययन किया और इतने विस्तार से अपने विचार दिये .मैं अविनाश की भी कृतज्ञ हूँ -बहुत -सी बातों के लिए.
    1.'चाँद' का प्रयोग वहाँ के प्रवाह और अर्थ के अनुसार ठीक बैठ रहा था -वैसे चलनेवाले उर्दू शब्दों का प्रयोग सदा होता आया है .
    2. कलऋता नदी- भूमिका में स्पष्ट कर दिया है ,अमेरिका की कोलेरेडो नदी का हिन्दीकरण है.
    3.चंद्रनखा -जैन काव्य में उसकेलिए यही नाम है .पात्र के प्रति कटुता के कारण नामों में परिवर्तन कर दिया जाता है .
    4.श्याम से कृष्ण - यहाँ कृष्ण का प्रयोग रंग द्योतित करने के लिए कि किस प्रकार राम का मुख हतप्रभ हो गया ,सुन्दर श्यामवर्ण कान्तिहीन हो उठा.पत्नी के प्रति अपने क्रूर या अविचारपूर्ण व्यवहार की स्मृति से जैसे कालिख पुत गई हो !
    इतनी रुचिपूर्वक पढ़ कर तुमने जो लिखा मुझे लग रहा है मेरा लेखन सफल हुआ .सहृदय पाठक पाना रचयिता का सौभाग्य है .
    टाइप की त्रुटियाँ कौन देखता है तरु !
    मैं सचमुच आभारी हूँ तुम्हारी .

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  7. अरे! नहीं प्रतिभा जी...इतना मान न दें... मैं असहज हो रही हूँ...बस पाठिका ही रहने दें...कोई आधारशिला न बनाएं..:(
    aur aabhar aapko...k saubhagya hua aisa kuch padhne ka jo man ko chhu gaya...
    वास्तव में यहाँ मैं पुस्तक की समीक्षा पर कुछ लिखने आई थी....वे शब्द पढ़े...अपने शब्द देखे.....न चाहते हुए भी आकुल मन ने तुलना कर डाली..ह्रदय apni bhasha par निराश सा हो गया......फिर आपका ये कमेन्ट देखा ...मन को तसल्ली हुई...अन्यथा मैं सोच रही थी...कि comments delete kar doon....आतुरतापूर्वक बहुत सतही लिख आई हूँ यद्यपि मन की गहराई ही खंगाली थी..परंतु उचित शब्द नहीं मिले थे जो मिले उनसे काम चलाया....

    ख़ैर....आपने समझा यही बहुत है...

    ''चाँद''...जी सही कहतीं हैं आप..लेकिन मैं ही इस चीज़ को जाने क्यूँ स्वीकार नहीं कर पाती..

    ''श्याम से कृष्ण'' - हम्म...सच कहूं तो इस अर्थ तक पहुँचते पहुँचते रह गयी थी...बुद्धि शब्द सौन्दर्य में गुम हो गयी थी शायद....

    ''कलऋता'' ...जी..भूमिका पढ़ी तो थी..शायद अधीर thi bahut so मैंने ध्यान केन्द्रित नहीं किया... kshamaprarthi..!

    संशयों के समाधान के लिए शुक्रिया......खासकर कृष्ण श्याम वर्ण वाली पंक्ति के लिए...बहुत बैचैनी थी उसका अर्थ जानने की......

    और अभी 'उत्तर कथा' और पढूंगी...इस पोस्ट में जो समीक्षक हैं..उनकी दृष्टि से...अच्छा हुआ पहले समीक्षा नहीं पढ़ी...वरना शायद ही अपनी बुद्धि से दिमाग से कुछ कह पाती.....समीक्षक का दृष्टिकोण ही हावी रहता मुझ पर.......

    चलिए शुभ रात्रि....:)

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