मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

ट्राई कर देखिये ...

बाज़ार घूमते हमने एक दुकान पर नाम देखा - "रणजीत चप्पल्स' .

बड़ा ताज्जुब हुआ !चप्पल का रण जीतने से क्या संबंध ?
कुछ ग़लत पढ़ गये क्या -चरणजीत चप्पल्स होना चाहिये था .हो सकता है चरण का 'च' मिट गया हो किसी तरह. फिर से देखा- नहीं कोई निशान नहीं 'च' का .साफ़ रणजीत लिखा है .
चक्कर में पड़ गए हम! अरे, चप्पल की दुकान है नाम रखना था "चरणजीत चप्पल्स" जो चरण की सेवा कर उसे जीत लें. और ये हैं कि युद्ध जीतने के लिए उकसा रहे हैं .
रणजीत चप्पल्स ?
लेकिन ये ठहरे व्यवसायी लोग . बेमतलब तो नाम देंगे नहीं .
फिर सोचते रहे . एकदम ध्यान आया - रण का एक प्रकार चप्पलबाज़ी या जूतम-पैजार भी तो है- जो आजकल काफ़ी कॉमन है .और अक्सर ही जूता फेंकने की घटनाएं सामने आ रही है . जूता फेंका तो आसानी से जा सकता है पर उससे मारा-मारी नहीं की जा सकती .गया तो गया .ऊपर से,बनावट ऐसी कि कस पकड़ पाना मुश्किल -ग्रिप नहीं बनता(ट्राई कर देखिये) ,उतारने में समय लगे सो अलग. ताव आते ही फ़ौरन दे मारें, ये संभव नहीं. ज़्यादा से ज़्यादा दो बार फेंक लो ,और जूते कहां से लाओगे .पर चप्पल कितनी भी बार चला लो ,हाथ से कहीं नहीं जाएगी!
मतलब खरीदने के पीछे का उद्देश्य पहनना नहीं लड़ कर जीतना है. चप्पल चट् से उतारो और दे तड़ातड़! पकड़ने में छूट जाने का कोई डर नहीं. चाहे जितने वार करो . रण में आसने-सामने वार चलते हैं ,नहीं ,जूता वहां नहीं चलेगा .
रणजीत चप्पलें खरीदी हैं .पहन कर उसे टेस्ट करने की इच्छा बहुत स्वाभाविक है .अब तो मौका ढूँढेंगे कि डट कर प्रयोग हो .तो यह नाम दुकानदार ने सोच-समझ कर रखा है .लड़ाई में डट कर चप्पलें चलेंगी टूटेंगी ,जीत का सेहरा बँधेगा तो वो फिर यहीं से खरीदेगा .हो सकता है चप्पलों में कुछ ऐसा प्रयोग हो. जो प्रतिद्वंद्वी को चित्त करके ही छोड़े. तभी तो जीत की गारंटी दी है.
अच्छा है, दुकान की बिक्री हमेशा होती रहेगी .
सही नाम रखा है, अच्छी तरह ठोंक-बजा कर - रणजीत चप्पल्स .
देखना खूब चलेंगी चप्पलें !

17 टिप्‍पणियां:

  1. हा हा हा। मज़ा आ गया।
    अच्छा चप्पल विमर्श है।

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  2. बहुत मजेदार ...रणजीत या चरणजीत पर विमर्श ...बहुत अच्छा लगा आपका यह विचार मंथन

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  3. ज़्यादा पढ़े लिखे होने का एक और भी फायदा (या नुकसान जो भी कहिये) है...कोई भी चीज़ वैसी क्यूँ है......उसके पीछे दिमाग पूरी शक्ति लगा के दौड़ जाता है..बिना जतन के...और मैं तो और भी महान हूँ...गलत समय पर गलत चीज़ें याद आने के कारण गलत प्रतिक्रया दे देती हूँ अक्सर....

    ये पोस्ट आपकी पढ़ी थी मैंने...तब समझ नहीं आया था क्या कहूं सो कुछ लिखा नहीं.....वो तो हुआ ये कि कल एक मरीज़ महाशय चले आये..उनका नाम सौभाग्य से ''चरणजीत'' निकल आया....एकदम से इतने तेज़ हंसी आई मुझे कि मुझे उनको २ मिनिट इंतज़ार करवाना पड़ा....दरअसल मुझे ये रणजीत चप्पल वाला आलेख और इसकी कुछ पंच lines याद आ गयीं थीं.....:)


    बहुत मजेदार थी पोस्ट....मगर इस पोस्ट को पढने के बाद हर बार वो शेक्सपियर की बात याद आती है ''नाम में क्या रखा है..''....हालाँकि ये उक्ति भी सब जगह फिट नहीं ही होती...


    बहरहाल..
    आभार इस प्यारी सी पोस्ट के लिए !!

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  4. हा हा हा, मज़ा आ गया पढके ! :D
    सादर,
    मधुरेश

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  5. हा हा हा....................
    :-)


    बहुत बढ़िया प्रतिभा जी...
    ठीक वैसे ही जैसे करोडीमल कबाडी......
    :-)

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  6. srathak post jisane naye tarike se shoping karna sikhaya .bdhai.

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  7. हा हा हा ..आजकल ऐसे ही रण जीते जाते हैं.मजा आ गया सुबह सुबह हलकी फुलकी पोस्ट.

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  8. बहुत खूब
    चप्पल भी तो रणगामी होते हैं

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  9. शकुन्तला बहादुर3 मई 2012 को 12:18 pm

    विश्लेषण अच्छा लगा। इस दूकान वाले ने अगर अपने पोस्टर संसद और विधानसभाओं के सामने लगा दिये तो बिक्री में बहुत बढ़ोतरी हो जाएगी।
    आजकल तो ऐसी लड़ाई इन स्थानों पर भी लड़ी जाने लगी है। हमारे शालीनता-विहीन वीर सांसदों और पार्षदों को रण जीतने का यश सरलता से मिल जाएगा। मज़ा आया पढ़कर।

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  10. यह चप्पलें पसंद आयीं ...साथ में आपकी रचना भी :))

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  11. बढ़िया लगा इस चप्पल विमर्श को फिर से पढना :)

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