बुधवार, 30 जून 2010

स्वभाव --

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मेला देखने के दिन आ गये ! भाव-ताव और क्रय-विक्रय से निवृत्त होकर,यहाँ आ बैठे है विश्राम की मुद्रा मे ।अच्छा लगता है बाज़ार के बीच दर्शक बन कर रहना । सहयात्रियों के साथ अनुभूतियाँ बाँटने के दिन हैं ,निरुद्विग्न भाव से धारा को देखने के ।जीवन और पानी बहते हुए ही अच्छे ! तरंगों से रहित जल और भावना कल्पना से रहित जीवन क्या रह जायेगा -निरा उदासीन ,एकदम फीका और सपाट ।
बच्तों के बच्चों के साथ मुक्त- भाव से जीने के दिन !अपने बच्चों के साथ मुक्त -भाव से जीने का मौका कहाँ मिलता है । दुनिया भर की जिम्मेदारियाँ लादे भागते-दौड़ते समय चुपके से निकल जाता है।कभी इसकी चिन्ता कभी उसका सोच इस सबके बीच अपनी निजता कहीं दुबकी बैठी रहती है।मन बार-बार पुकारता है ,सुनने का अवकाश लहीं होता ।दौड़ते-दौड़ते पीछे मुड़कर देखने का भी मौका नहीं मिलता ।अभी तक अनुभवों की पुटलियाँ बाँध-बाँध कर रखते रहे ,अब अपनी गठरी खोल कर औरों से मिला-जुला कर देखने ,फिर से परखने काअवसर मिला है।
मेरी मित्र को पौत्री-लाभ हुआ।भरत से दूर अमेरिका की इस पश्चिमी तटवर्ती भूमि पर जब चाहो मिलने की सुविधा भले ही न हो, फ़ोन करना बहुत आसान है। सो हम दोनो फ़ोन पर अपने अनुभव बाँटती रहीं।सोंठ हरीरा ,बुकनू से लेकर उबटन और मालिश की चर्चाएँ कीं।इस मामले मे मेरे अनुभवों की पोटली कुछ भारी बैठी । नव जात को उठाते लिटाते शुरू-शुरू मे उसकी जननी को भी डर लगता है -इतनी सुकुमार नन्हीं सी देह कहीं कुछ ग़लत न हो जाये ! न जाने किस उमंग मे , मै कह उठी,' मेरे पास भेज दीजिये ,मै कर लूँगी ।'
'कैसे भेज दूँ ?हम लोग ही कहाँ मिल पाते हैं एक-दूसरे से ,फिर माँ से अलग कर भच्चे को इतनी दूर -- .'
एकदम झटका लगा मुझे! यह क्या कह दिया मैने !क्यों कह दिया ! यह तो सच कह रही हैं ,मुझे सोच-समझ कर बोलना चाहिये था। मैने ग़लत कहा।पर गलती क्या?मन मे जब कोई तरंग उठती है तो वह सोचती-समझती है क्या?उल्लास का राग है वह जिसकी तान मे जो कुछ संभव नहीं है वह भी कह बैठते हैं हम !अन्तर्मन की अभिव्यक्ति अनायास हो जाती है ।कभी जब मै दूर भारत मे होती हूँ और मेरी पोती अमेरिका मे,फोन पर बातों के सिलसिले मे वह पूछती है ,'बड़ी माँ ,क्या बनाया है?'
मुझसे कहे बिना रहा नहीं जाता,'दही बड़े ।आजा ,खाले !'
हाँ बड़ी-माँ खाना है ।लाइये न!'
हम दोनो हँसते हैं ,मन तरंगायित हो उठते हैं । देना और खाना नहीं हुआ तो क्या हुआ और बहुत कुछ हो गया जो आनन्दित कर गया ।
लहर विकार है,यह सच है ,तरंग मिथ्या है ।पवन केआवेग से जलराशि अस्थिर है।सच तो जल है जितना गहरा उतना स्थिर!पर जल सचमुच स्थिर है क्या? स्थिर होना लाचारी है ,विवशता है,कोईउपाय नहीं उसके सिवा! रास्ता मिलते ही बह चलेगा जल -पवन के झोंके लहरें उठाएँगे,कभी ऊँची कभी नीची ,यह जीवन है।बहना प्रकृति है ,तरंग स्वभाव है -समाज से जुड़ने का ,रंग मे रँगने का!वह सच नहीं है पर मिथ्या भी नहीं है।जैसे आकाश के प्रतिबिम्ब जल को रँग देते हैं,भाव के रँग मे मन भी रँग जाता है भले अल्पकाल के लिये ही ! भावना रंग जेती है,उल्लास हृदय मे लहरें उठाता है ,तब भीतर जो सहज अनुभूति जागती है उसका अपना अस्तित्व है ।वह मिथ्या महीं है सच भले ही न हो!
उम्र के चौथे प्रहर मे मन , अपने आप मे मगन ,देखरहा है इस मेले को!नदी किनारे बैठ बहाव को देखने का निस्पृह आनन्द ! यही तो स्वभाव है - अपना भाव !
- प्रतिभा सक्सेना

3 टिप्‍पणियां:

  1. शकुन्तला बहादुर5 जुलाई 2010 को 9:12 pm

    आनन्द की तरंग मिथ्या नहीं होती। नदी के किनारे बैठ कर मगन
    मन प्रवाह देखती रहें, आनन्द में डूब जाएँ।फिर क्या कहना?
    मनोवैज्ञानिक विचार विनिमय अच्छा लगा।

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  3. भाव के रँग मे मन भी रँग जाता है भले अल्पकाल के लिये ही ! भावना रंग जेती है,उल्लास हृदय मे लहरें उठाता है ,तब भीतर जो सहज अनुभूति जागती है उसका अपना अस्तित्व है ।वह मिथ्या महीं है सच भले ही न हो!

    ये भाव बहुत महसूस किया है.....मगर शब्दों में आपने कितना अच्छे से बाँधा है.....:) सभी समझते होंगे इन शब्दों को तो..इस अनुभूति को.....मेरी एक दोस्त कनाडा में है...अक्सर हम अपने हॉस्टल वाले दिन याद करते हैं...बातें करते करते...कोक और चाय भी पी लेते हैं.....और इडली भी खा लेते हैं ......सब तसव्वुर में.....:).....मगर आप और भी भावुक लिख सकतीं थीं इस विषय पर...आपकी कुशलता और जीवन के अनुभवों को देखते हुए कह रही हूँ.......अन्यथा न लीजियेगा..:)

    ''मनोवैज्ञानिक विचार विनिमय'' ..........:o:o..बाप रे!!...काश मैं भी ऐसे शब्द सोच सकती...एक पल मन को शर्म आ गयी...निश्चित किया कि कुछ नहीं लिखा करुँगी.....:)...मगर फिर दिल ने कहा ..ठीक है.....शब्द भारी नहीं तो क्या....:)...ज़रूरी थोड़े है...सब एक जैसे ज़हीन हों...:):) ..

    स्वभाव के लिए बधाई !!

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