मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

राग-विराग - 2.


मनस्विनी रत्ना ,जिस सुहाग पर मायके में इठलाती थी,उसकी विलक्षण विद्वत्ता-वाग्मिता का दम भरती थी उसके कथा-वाचन के अर्थ-गांभीर्य पर गर्व करती थी, आदर्शवाद पर फूलती थी,जिसे मान्य-पुरुष मान कर निश्चिंत थी आज वही  सारी मर्यादायें तार-तार कर तूफ़ानी रात की इस इस कुबेला, अनाहूत, विचित्र वेष धरे परिवारजनों के विस्मय का केन्द्र बना, सिर झुकाए खड़ा है .

वह चकित-अवाक् जैसे समझ न पा रही हो- यह क्या हो रहा है.

मर्यादाशील बाला पीहर आए पति से किसी के सामने कुछ बात करने, पूछने का तो सोच भी नहीं सकती.

 उसे लगा सब की दृष्टियाँ उस पर आ टिकी हैं ,जैसे घड़ों पानी पड़ गया हो . कहाँ जाकर  मुँह छिपा ले! 

कैसे  सामना करूँगी अब ? इस घर ने पाँव पूज कर  मान्य का पद दिया जिसे, मान मर्यादा के साथ मुख्य द्वार से प्रवेश कर, अगवानी पा उच्च  आसन  का अधिकारी था वह इस प्रकार अशोभन वेष में अचानक ,खिड़की से घुस आया है.

प्रारंभिक प्रश्नोत्तरों के बाद ,सबको लगा मार्ग की बाधाओं से त्रस्त ,थकित है पाहुन,थोड़ा एकान्त, थोड़ी विश्रान्ति, थोड़ा सहज होने का समय पा ले.  


रत्ना की खिसियाहट भरी भंगिमा देख तुलसी की सारी उत्कंठा हिरन हो चुकी थी .

कुछ देर चुप रह कर बोले - तुम वहाँ नहीं थीं ,इसलिए...

ओह मैं! इस विभ्रमित मानसिकता का कारण मैं! दोष अंततः मेरा ही. पीछे-पीछे दौड़े चले आये. लाज नहीं आई ?कुछ तो विचारते,..क्या सोचेंगे घर के लोग ?

खीझे हुए स्वर एकदम फूट पड़े -  

लाज न आई आपको, पीछे दौड़े  चले आये , धिक्कार है ऐसे प्रेम को , 

तुलसी सन्न रह गये. उफनते दूध पर जैसे अञ्जलि भर पानी पड़  गया हो, उद्वेग से भर गये  अंतर्मन धिक्कार उठा - क्यों चले आए?

हताश भंगिमा लिये वह हतप्रभ मुख रत्ना के अंतर में चुभने लगा,उसने बात को सँभालने का यत्न किया -  

इस अस्थि चर्ममय भंगुर देह में जैसी प्रीत है ,यदि श्री राम में होती तो भव-भीतियाँ ही मिट जातीं .

तुलसी का सिर झुका ही रहा. मनस्ताप जाग उठा.

सारी मर्यादायें तोड़ कर धर दीं. क्या कर रहा हूँ - इसका भी भान नहीं रहा. अंतर्मन से धिक्कार उठी .कैसा आवेश कि बिना सोचे-समझे निकल पड़ा.उचित-अनुचित कुछ न विचारा.

जैसे कोई आवेश चढ़ा हो, रत्ना से मिलना है जुनून सा सवार था -रत्ना,रत्ना. बस रत्ना. अविराम रट रत्ना-रत्ना ,न भूख न प्यास .बस तुल गये ,रत्ना के पास चलना है ,कैसे हरहराती जमुना पार की ,कैसे घर में प्रवेश किया आवेग में सब करते गए!

उत्कण्ठा भरे मन से रत्ना के शब्द टकराए-  धिक्कार है ऐसे प्रेम को!

एकदम वेग  पलट गया .

 सोते से जाग उठे. अरे,मैं क्या कर बैठा ,अंतर पश्चाताप से भर गया-

एक ही आघात और आसक्ति विरक्ति बन गई.

 और उस एक पल में जनमों के सुप्त संस्कार जाग उठे. एक झटके ने समय की धुन्ध झाड़ दी. स्मृतियों के पट खुल गये. 

मन पर वराह मन्दिर का वातावरण छा गया. कर्ण-कुहरों में राम-कथा के बोल समाने लगे.लगा सूकरखेत में गुरु से सुनी रामकथा  उच्चरित हो रही है .

नया बोध उदित हुआ .

 तब उस बचपन के अचेत मन में जो नहीं जागा था आज अनायास सजग हो गया.


गुरु ने कहा था , जन्म लेते ही जिसके मुख से रुदन का नहीं राम-नाम का स्वर फूटा ,वह राम से दूर कहाँ तक रहेगा! 

उस एक पल में गृहस्थ जीवन त्याग, तुलसी वैरागी हो गये.

 एक पल ठहरना भी असह्य हो उठा. किसी की ओर देखा नहीं ,चुपचाप घूम कर लौट पड़े.

द्वार खोल निकल गये .

बाहर आ कर चारों ओर देखा. वर्षा थम-सी गई थी ,हवाएं शान्त हो चली थीं .

मोखे की टेक से मृत सर्प की देह नीचे तक लटक आई थी .

मुख से निकला 'हे राम' और वे आगे बढ़ गये.

*

(क्रमशः)

बुधवार, 14 अक्टूबर 2020

तृप्ति की क्वालिटी

 *

पहले एक पहेली बूझिये फिर आगे की बात -

'कोठे से उतरीं, बरोठे में फूली खड़ीं.'

इन फूलनेवाली महोदया का तो कहना ही क्या!(इन पर एक पूरा पैराग्राफ़ लिखना अभी बाकी है).  

बीत गए वे दिन जब घरों में भोजन बनाने की नित्य की प्रक्रिया भी, जैसे कोई  आयोजन हो रहा हो.किसी विशेष अवसर पर तो अनुष्ठान जैसा. सुरुचि -सावधानी के साथ विधि-विधान से यत्नपूर्वक बनाना और चाव-भाव से  खिलाकर तृप्त कर देने का उछाह . न कोई शार्ट-कट , न रेडी मेड साधन,और न कोई जल्दी-पल्दी.पूरे विधान के साथ ,सधी हुई आँच पर पूरे इत्मीनान से पकाना ,कोई हबड़-तबड़ नहीं. कोई कहीं  भागा नहीं जा रहा है.न पकानेवाले  न खानेवाले.  

पूरे मनोयोग से तैय्यारी और पूरी रुचि से आस्वादन. 

संतोष .और प्रशंसा के दो बोल सुनने को मिल जाएँ तो लगता सारा श्रम सार्थक हो गया. वे दिन कब के बीत गये .

परिवार में 6-7 लोग होते ही थे ,आए-गए भी  बने रहते थे. और खुराक,आज से कहीं अधिक .अपने से ही देख लें, कितना खा और पचा लेते थे औऱ अब जैसे डर-डर कर खाते हैं ,

हाँ, तो जैसे रुचिपूर्वक भोजन पकाया जाता था और उतने ही चाव से परोसा-खिलाया जाता था .खाना अब भी घरों में पकता है पर उन दिनों के साथ ही वह भाव, चाव और स्वाद ग़ायब हो गए है.

न वह आयोजन,न वह व्यवस्था ,वह सामग्री ,वे साधन और वे प्रयास भी अब उसके पासंग भर भी नहीं .अब कहाँ चूल्हा, और धुएँ की  सोंधी महक ,अब तो गैस की कसैली गंध,नॉब को खोलते -बंद करते प्रायः ही हवा में तैर आती है.सिल-बट्टा कही दिखाई नहीं देता और न जम कर पीसने वाले. पत्थर की सिल पर पिसे उस ताज़े पिसे मसाले की बात ही और थी,जो मौसमी तरकारियों में सिझ कर जो अनुपम स्वाद  देता,ये पनीर ,न्यूट्री नगेट और खुम्भी,जैसी माडर्न चीजों की उसके आगे क्या बिसात! पिसे मसाले कहाँ? महरी या नाइन ,हल्दी भी सिल पर पीस कर नारियल की नट्टी में रख देती ,कि दाल में पड़ जाय.बाकी तो खड़े मसालों के साथ सिल पर पिसेगे ही.

 अरहर की आम पड़ी  चूल्हेवाली दाल जिसमें देसी घी में लहसुन-मिर्च का करारा छौंक लगा हो ,उसके आगे  म़ॉडर्न करियाँ फीकी  लगती हैं.हमारे घर लौकी के बड़े-बड़े टुकड़े दाल चढ़ाने के साथ ही डाल कर घुला दिये जाते थे ,जिससे दाल में विलक्षण स्वाद का आ जाता थ. सिल पर पिसी चटनी की तो बात ही क्या !

आज पिसे मसालों के डिब्बे और दुनिया भर के पैकेट अल्मारी में भऱे हैं, पर उन गिने-चुने मसालोंवाला स्वाद खो गया है.हर चीज़ में टमाटर डालने की रीत नहीं थी,सब  अपना एक निराला  स्वाद लिये थीं  तरकारी का रसा कृत्रिम रूप से गाढ़ा न हो कर मसालों की असली गंध में बसी तरावट वाली तरलता सँजोये रहती थी. ,और बटलोईवाली दाल के क्या कहने ,जिसे चूल्हे पर चढाने बाद पहला उबाल उतार फेंकना जरूरी होता था. और लोहे के बड़े चमचे में अंगारों पर रख कर बनाया हुआ,दूर तक गमक फैलाता ,देशी घी का तीखी मिर्चोंवाला करारा छौंक बटलोई मैं छनाक से बंद होता देर तक छुनछुनाता,स्वाद की घोषणा करता रहता था.

 काँसे की थालियाँ, फूल की कटोरे कटोरियों के साथ चम्मच घर में गिनती के रहते थे .वे लंबे गिलास विस्थापित हो गए. भारी पेंदी की पतीलियाँ और लोहे की कड़ाहियाँ जाने कहाँ खो गईं . कुकर और पैन उपस्थित हैं.नानस्टिक में दो बूँद तेल से काम चल जायेगा.और देशी घी भी लोगों को नुक्सान करने लगा है, रिफ़ाइण्ड आयल ,रिफ़ाइण़्ड प्रकृति के अनुकूल पड़ता है.

खाना चलते-फिरते, फटाफट बनता है ,प्लेटों में परस कर पेट  भरने का पूरा इन्तज़ाम होता है.चम्मचों की कमी नहीं .डिज़ाइनदार ,श्वेत ,झमकती फ़ुल,हाफ़ ,क्वार्टर प्लेटों से टेबल सजा है ,छुरी चम्मच,नैपकिन सब उपस्थित फिर भी जाने क्यों मन वैसा नहीं भरता. 

लगता है तृप्ति की क्वालिटी अब बदल गई है.

*

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

राग-विराग - 1.

*

       तमसाकार रात्रि . घनघोर मेघों से घिरा आकाश, दिशाएँ धूसर, रह रह कर मेघों की  गड़गड़ाहट और गर्जना के साथ,बिजलियों की चमकार. वर्षा की झड़ियाँ बार-बार छूटी पड़ रही हैं. जल-सिक्त तीव्र हवाएँ लौट-लौटकर कुटिया का द्वार भड़भडा देती हैं.

   अचानक बिजली चमकी और घोर गर्जना के साथ निकट ही कहीं वज्रपात हुआ.

कुटिया में अकेले  चुपचाप बैठे तुलसी सिहर गए . 

मन बहुत अकुला रहा है?

वह भी तो ऐसी ही घनघोर रात्रि थी जब सारी बाधाएँ पार कर ,रत्ना की खिडकी से जा चढ़े थे.

उस दिन तो न बाढ़ भरी नदी से डरे थे ,न लटकते सर्प का विचार किया. 

कैसा मोह का पट चढ़ा  था आँखों पर.

मोह का पट?

मोह था केवल? आसक्ति मात्र थी ?

मैंने तो उसी में सारा संसार सीमित कर दिया था. मैं, जो जन्म  से ही त्यक्त रहा - सबके संकट का कारण , अभुक्त मूल में जन्मा अभागा. .पिता ने त्यागा, जननी भी सिधार गयीं. जिसे यत्नपूर्वक सौंप गईं थीं ,थोड़ा भान पाते ही वह चुनिया दाई भी अनाथ छोड़ राम को प्यारी हो गई.रह गया मैं, सर्वनाशी मैं  .जो-जो मुझसे.मुझसे जुड़ा , काल  का ग्रास बनता गया..मैं ही सबके संकट का कारण था.एक रत्ना  थी ,जिसने मुझे स्वीकार किया था ,जीवन का साथ निभाने को आश्वस्त किया था.और मैं जीवन के सारे अभाव उसी से भरने का यत्न करने लगा.

बस वही थी जिसे अपना कह सकूँ .मात्र कहने की बात नहीं ,संपूर्ण मन से चाहा था उसे .मेरी हर अपेक्षा पर खरी थी वह.रूप के साथ गुण और उच्च विचारों का संयोग वह बुद्धि-संपन्ना सचेत नारी थी ,.संस्कारी और आचारवान तो होना ही था - दीनबंधु पाठक की पुत्री जो थी. स्वयं को परम भाग्यशाली समझा था मैंने.  मेरी सहचरी,प्रिय पत्नी ,जिसमें मैंने अपना संसार पा लिया था.सारे नाते -रिश्तेों की पूरक बन गई थी .

स्वयं को बहुत धिक्कारते हैं तुलसी .क्यों अचानक जा पहुँचे थे रत्ना के पीहर.न सोचा न विचारा ,जो मन में उठा कर डाला. ...

कैसी कुबेला घऱ में जा घुसे. अनामंत्रित जामाता का विचित्र वेष ,घर के लोग  विस्मित -से देखते रह गये थे, और रत्ना   विमूढ़ सी खड़ी की खड़ी रह गई थी.

 किसी भाति स्पष्ट किया तुलसी ने कि कैसी-कैसी बाधाएँ पार करने में यह गत हो गई .वह तो गनीमत हुई कि खिड़की से बँधी रस्सी का सहारा मिल गया .

खिड़की से बँधी रस्सी - चकित हो गए थे वे लोग. 

मेरा विचार था- रत्ना ने लटकाई होगी .

ना, मैंने तो नहीं...

खिड़की खोल देखा गया, कहीं कोई रस्सी नहीं.

अरे,खिड़की के इधरवाले मोखे की टेक पर एक मरा सर्प लटक है.

'ओह' तुलसी ने दोनो हाथों हथेलियाँ खोलीं -रक्त के चिह्न!

सब विस्मित, अवाक्.

 एक भयभीत सी चुप्पी  - कहीं कुछ हो जाता तो...?

कोई बोला था - और चाहे जो हो, रत्ना की कुणडली में वैधव्य-योग नहीं है.

दृष्टियाँ रत्ना की ओर घूम गईं - एकदम स्तब्ध थी, मुख विवर्ण !

न रत्ना के मुख से कोई शब्द फूटा ,न तुलसी कुछ बोल सके .

(क्रमशः)

*

मंगलवार, 29 सितंबर 2020

कोरोना काव्य और क्रोचे

              इन कोरोनाकुल दिनों में, में मुझे क्रोचे की बड़ी याद आ रही है. कितने हल्के-फुल्के लिया था हमने इस महान् आत्मवादी दार्शनिक को! पर अब पग-पग पर इसके अभिव्यंजनावाद की महिमा देख रही हूँ.यों भी इस कोरोना-काल जब व्यक्ति अपने आप में सिमट-सा गया है, उसकी आत्मानुभूति प्रखर होती जा रही है परिणामतः उसके भीतर कलात्मक विस्फोट होने लगे हैं.कविता हर आत्मा में कौंधने लगी है.यों भी कहा जा सकता है अनुकूल अवसर पाकर आत्मा की सहजानुभूति ,हर आत्मावान के भीतर उमँगने लगी है जिसे शब्दों में अभिव्यक्त करना (अभिव्यंजना) कविता कर्म कहलाता है. यह बात मैंने नहीं कही इटली के प्रखर विचारक, बेनेदितो क्रोचे, डेढ़ शताब्दी पूर्व अपने ग्रंथ 'इस्थेटिक' में कह गए हैं.सबकी अपनी मानसिकता ,व्यक्ति की अपनी अनुभूति,अपनी अभिव्यंजना औ प्रकशित करने का अपना अधिकार कौन छीन सकता है भला!
                क्रोचे और उसके ग्रुप के लोग होते तो करोनाकुल कविवृंद, जिनमें उसके बताई सारी ख़ूबियाँ पाई जाती हैं,उनके साथ प्रतिष्ठित होता.संशय में क्यों रहें, मिला लीजिये सारे लक्षण, जो अंतर्जाल के विकिपीडिया में इस प्रकार वर्णित हैं - 
              'अभिव्यंजनावादी बेजान चीजों को जिंदा बनाकर बुलवाते हैं। यथा- "गंगा के घाट यदि बोलें" या "बुर्जियों ने कहा" या "गली के मोड़ पर लेटर बक्स, दीवार या म्युनिसिपल लालटेन की बातचीत" आदि। उन्हें जीवन के वर्तमान के बेहद असंतोष होता है, जीवन को वे मृत मानकर चलते हैं, मृत को जीवित बनाने का यत्न करते हैं। अभिव्यंजनावादियों में भी कई प्रकार हैं; कुछ केवल अंध आवेग या चालनाशक्ति पर EL LOBOS SE LA COME! जोर देते हैं, कुछ बौद्धिकता पर, कुछ लेखकों ने मनुष्य और प्रकृति को समस्या को प्रधानता दी, कुछ ने मनुष्य और परमेश्वर की समस्या को।'
               सब वही ख़ूबियाँ इस काव्य में भी - है न! इन बातों पर पर जितना,जो कुछ, कहा जाय कभी समाप्त नहीं होनेवाला. एक बात यह भी कि 'खाली दिमाग़ में'खुराफ़ातों का डेरा जमने लगता है,सो अच्छा है कि वह कहीं व्यस्त रहे.सबसे बढ़िया उपाय है अपनी किसी जोड़-तोड़ में मगन रहना,और कविताई ऐसी कला है जो बैठे-ठाले गुमनामी से उठा कर नाम-धन्य बना देती है.ऐसी विद्या जो बात की बात में बात बना देती है. 
                हमारे यहाँ तो क्रोचे के जन्म से भी बहुत पहले सुभाषितों में घोषित कर दिया गया था - 'काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् । व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा ॥
 बुद्धिमान लोगों का समय काव्य और शास्त्र का विनोद करने में व्यतीत होता है, जब कि मूर्खों का समय व्यसन, नींद व कलह में व्यतीत होता है. 
               बुद्धिमान और मूर्ख का जहाँ तक सवाल है,तो उसकी व्याख्या सबकी अपनी-अपनी. किसी वर्ग में लोगों की कमी नहीं है.जहाँ तक कविता की बात है बैठे-ठाले सिद्ध हो जानेवाली विद्या,जिसमें हर्रा लगे न फिटकरी और रंग आए चोखा! 
 (यह पोस्ट अचानक मुझसे डिलीट हो गई थी,यहाँ पुनः प्रकाशित की है,मुझे खेद है कि जो बहुमूल्य टिप्पणियाँ इस पर मिलीं थीं वे भी साथ में डिलीट हो गईं(मैं क्षमा प्रार्थी हूँ.)

बुधवार, 1 जुलाई 2020

कृतार्थता के क्षण -

*


 खुले आकाश की झरती रोशनी में नहाए, ये कृतार्थता  के क्षण और मेरा कृतज्ञ मन - लगता है नारी-जीवन का प्रसाद पा लिया मैंने!

कितनी नई फ़सलें फूली-फलीं मेरे आगे ,पुत्री में  पहली बार अपना अक्स  पाया था.आज, वही मातामही बन गई - और  नवांकुर को दुलराने का सुख तन्मय मानस में समो लिया.अपनी निजता की यह व्याप्ति उसकी गोद में प्रतिरूपित होते देखना रोम-रोम को  पुलक  से भर रहा है.
 बीतते जाते समय के तार कैसे परस्पर जुड़ जाते हैं, पता ही नहीं चलता कौन  तन्तु एक नई बुनावट को रूप देता किस दिशा में बढ़ चलेगा.  एक मैं, कितने रूपों में विस्तार पाती जा रही हूँ.  
वर्षों के अंतराल को जोड़ते ये संबंधों के तार - कितने व्यवधान पार कर नित-नवीन रूप धरते कहाँ से कहाँ पहुँच रहे हैं. यह है ,मेरी निजता की व्याप्ति ,यहाँ से वहाँ तक ,व्यवधानहीन अटूट यात्रा.
नवजीवन के सुकुमार अंकुर में प्रतिफलन पायी यह नई सृष्टि,मेरा ही तो अंशागमन, मेरा पुनरागमन ,मेरे चित् का नव-नव प्रस्फुटन, हर बार परंपरा को आगे तक ले जाने की आश्वस्ति प्रदान करता मन-प्राङ्गण उद्भासित कर रहा है  .
 अपने बोये बीजों की फ़सल हर बार नये रूप में अँकुआते देख, अंतर्मन गहन संतृप्ति से आपूर्ण हो उठा है 
मैं विद्यमान हूँ अभी , और मेरे कितने प्रतिरूप ,कितने-कितने आकार लिये ,भिन्न नामों में, भिन्न देहों में साकार हो उठे हैं. यहाँ से वहाँ तक मेरा ही स्वत्व नये रूपों में अस्तित्ववान हो प्रकट हो रहा है.मेरे निजत्व कोअमित विस्तार मिल गया. 

नतशीश तुम्हें शत-शत प्रणाम करती हूँ, 
हे सृष्टि के नियन्ता, 
तुम्हारा अनुपम आदान शिरोधार्य कर धन्य हो गई हूँ मैं !
*

मंगलवार, 12 मई 2020

का चुपि साध रहेउ बलवाना...'

*
राम कथा के अंतर्गत सुन्दरकाण्ड,  परम सात्विक वृत्तिधारी पवनपुत्र हनुमान के बल,बुद्धि एवं  कौशल की कीर्ति-कथा है, उन्नतचेता भक्त की निष्ठामयी सामर्थ्य का गान है.
इस काण्ड का प्रारम्भ होता है जामवन्त के वचनों के उल्लेख से, जो मूलकथा से घटनाक्रम को जोड़ते हैं ,जिन पर सुन्दरकाण्ड का सम्भार खड़ा है.
रामत्व पर आपदा के चरम क्षणों में,आगे बढ़ कर चुनौती को स्वीकार करने का प्रश्न सामने खड़ा और परम समर्थ पवन-पुत्र मौन हैं.
'का चुपि साध रहे बलवाना...,,,,,,,,,पवन तनय बल पवन समाना'
जामवन्त की चुनौती भरी ललकार ने वज्राङ्ग को झकझोर दिया. शक्ति-सामर्थ्य का बोध जागा, अपार ऊर्जा तन में लहरा गई.तत्क्षण उन्होंने ठान लिया ,और दृढ़ निश्चय के बोल फूट पड़े -
'तब लगि मोहि परिखहु भाई.....
...........
जब लगि आवहुँ सीतहि देखी.'
इसी शक्ति-जागरण का प्रतिफल है सुन्दरकाण्ड,  सीता को खोजते हुए हनुमान सागर पार कर लङ्कापुरी पहुँचे ,जो तीन शिखरोंवाले(सुबेल,नील और सुन्दर )त्रिकूट पर्वत पर स्थित थी. सुन्दर शिखऱ स्थित अशोक वाटिका में, रावण ने सीता को बन्दिनी बना कर रखा था ,पवन-पुत्र के क्रिया-कलापों का केन्द्र वही रहा इसलिए इस काण्ड का नाम सुन्दरकाण्ड उचित ही है.
शक्ति का यह उन्मेष किसी अहं की तुष्टि के लिए नहीं अन्याय के प्रतिकार के लिए, नीति ओर मनुज-धर्म की रक्षा के लिये है, स्वयं के मान-अपमान का विचार छोड़,निस्पृह भावेन अनीति के प्रतिकार एवं  शुभकार्यों के प्रति तत्परता के लिए है, इसी निर्वाह के कारण  राम-कथा का यह अंश अमर गाथा की परिणति पा गया है.
अञ्जनी कुमार की भक्ति कोई साधारण भक्ति नहीं थी, उन राम को पूर्णरूपेण समर्पित थी,जो आजीवन अपने सुख अथवा हित-साधना का विचार न कर,कर्तव्य के प्रति सतत तत्पर रहे. .विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने आदर्शों का निर्वाह किया. राम के परम उपासक हनुमान का बल,विवेक ,विज्ञान, रामकाज को ही अर्पित रहा.
रामत्व की विजय-यात्रा के लिये ऐसा ही समर्थ योगदान चाहिये, यही हनुमत् प्रयास,रामत्व को काँधे चढ़ाकर, उसके निर्वहन में सतत संरक्षक बन ,कई-कई आयामों में विस्तार पाता है.
हनुमनत्व की साधना के बिना रामत्व की सिद्धि नहीं होती.
अशोकवाटिका की वानरी कूद-फाँद,मारुतिनन्दन की वर्जना का घोष है कि अनीति से विरत हो, सन्मार्ग ग्रहण करो.
इस वज्राङ्गी क्षमता और शक्ति का उपयोग रामत्व अर्थात् सर्व-कल्याण की सिद्धि के लिये है.निस्वार्थ-निस्पृह भाव से ,उस के फलीभूत होने की साधना है और यही सुन्दरकाण्ड का प्रतिपाद्य है.
हनुमान की भक्ति निष्क्रिय हो कर बैठ जाने के लिए नहीं,अपनी क्षमताओं का समुचित उपयोग कर,अनर्थों के निवारण हेतु सतत प्रयत्नशील रहने की  साधना है, विश्व-कल्याण की प्रयोजना है, अनीति और अन्याय के निवारण का सङ्कल्प है. लोक-कल्याण राम का जीवनादर्श रहा ,और हनुमान,सम्पूर्ण निष्ठा के साथ, आजीवन उनकी कार्य-सिद्धि हेतु तत्पर रहे .
'कौन सो काज कठिन जग माँहीं', का उद्घोष कर जामवन्त ने सोई ऊर्जा को जगा कर ,जो संदेश दिया वह साधक के लिेए  अनुकरणीय है ,अन्यथा  हनुमान भक्ति का ढिंढोरा पीटना दिखावा मात्र है, बुद्धि, विवेक, ज्ञान का होना व्यर्थ है.
हनुमनत्व का सञ्चार ,तभी होगा जब उसका उपयोग अपने स्वार्थ ,के लिए न हो कर अनर्थों के निवारण, नीति और धर्म की रक्षा और सत् के सम्पादन एवं पोषण हेतु हो.जन साधारण सब सुनते समझते भी मौन रह जाय,इससे बड़ी विडंबना क्या होगी? हनुमान-भक्ति निष्क्रियता की ओर नहीं ले जाती ,रामत्व के धारण एवं पोषण के लिए प्रेरित करती है.
दृष्टा कवि सचेत करता है कि सामर्थ्यवान का निष्क्रिय रहना समाज के लिए हताशाजनक होता है,सङ्कट के समय काम न आ सके उस बल,बुद्धि ,विवेक का होना, न होना बराबर  है.
सुन्दरकाण्ड,राम-कथा का अङ्ग होते हुए,अपना महत्व रखता है,उसका पाठ प्रियकर है क्योंकि उससे आस्थाओँ को बल मिलता है.
अंतर्निहित क्षमताओँ का भान भूले व्यक्ति को चेताने की,उसके सुप्त बोध जगाने की कथा है सुन्दरकाण्ड. और इसका प्रेरक उद्घोष कि तुम तुल जाओ तो 'कौन सो काज कठिन जग माहीं?'  चेतना को उदीप्त  करता है. अपने सीमित स्पेस में कथा-गायक का आशान्वित करता स्वर, भ्रमित मानव-जीवन को उद्देश्यपूर्ण बनाने को प्रयासरत है.
सुन्दरकाण्ड का पाठ, साधक की सुप्त ऊर्जा को जगाने का साधन बने और  विश्व-मङ्गल के निर्वहन एवं संरक्षण हेतु तत्पर रहने का विवेक जगा सके तभी सार्थक और कल्याणकारी है महत् उद्देश्य की सिद्धि के लिये,संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए  हनुमनत्व की साधना,निष्ठापूर्वक अपना दायित्व निभाने में है, और यही सच्ची वज्राङ्ग-भक्ति है, जिसके होते रामत्व पर आँच आना सम्भव नहीं. साधक का मनोबल उसे निरन्तर आश्वस्त करता, है कि असम्भव का सेतु पाटने को उसका योगदान, चाहे  नन्हीं गिलहरी के परम लघु प्रयास जैसा हो ,स्पृहणीय है.
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सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

कुछ पुराने पन्ने -

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विवाह के बाद,  प्रारंभिक वर्षों में दीवाली हर साल अम्माँ-बाबूजी के साथ (ससुराल में)होती थी. सबको बड़ी प्रतीक्षा रहती थी.
हमारे यहाँ दीवाली पर दो दिन डट कर बाज़ी जमती थी .कई संबंधी आ जाते थे.  
बराम्दे में गद्दों पर चादरें बिछा कर बीच मे एक बड़ा सफ़ेद मेज़पोश फैला , चारों ओर महफ़िल जम जाती. ताश की एक गड्डी से कहाँ काम चलता दो मिलानी पड़ती थीं .
लड़के -बहुएं देवर-जेठ सब को बाबूजी बैठा लेते थे .
मेरी पहली दीवाली थी .मुझे खेलना नहीं आता था.
अरे, तुम्हें फ़्लश नहीं आता...कोई बात नहीं ..चलो, हम सिखाए देते हैं.
ससुर जी ने कहा था.
उन्होंने एक गड्डी ताश की उठा ली. हुकुम, पान, ईँट, चिड़ी बता कर तीन इक्के निकाले. वैसे पत्तों की थोड़ी-बहुत  जानकारी मुझे थी.     
अब आगे  देखो दुल्हन ,
यह सबसे बड़ी ट्रेल,फिर रन बताए फिर सीक्वेंस ,कलर .
तीन-चार बाज़ी खेल कर बाबूजी उठ गये  
खेलने के लिये रुपये दिये थे उन्होंने ,कहा अब खेलो -पैसा सब सिखाय देगा.'
 उठते-उठते कह गये ,दिन्ने ,इनको बताते रहना ..
हाँ हाँ बाबूजी ,आप निश्चिंत रहिये,हम सब बता देंगे.
फिर भी वे मुझसे कह गये समझ में न आए तो अपने पत्ते दिखा कर दूसरे से मिल लेना. .
अब सब खेलने बैठ जाएँगे तो चाय कौन बनाए ?
नहीं ,इन दो दिन बहुएँ उधर नहीं लगेंगी .ताईजी और अम्माँ हैं न,वे बनाएँगी चाय.
विधवा ताई जी सबसे विरक्त-सी रहती हैं,अम्माँजी .चूल्हे पर भगोने में चाय का पानी चढ़ा देती हैं. 
कुछ देर बाद आवाज़ लगती है ,अरे मनुआ की दुलहिन ,कित्ती पत्ती पड़ेगी ,अंदाज बताय जाओ .
जिठानी उठती हैं 
वे कहती हैं सक्कर तो डाल दी .बस चाय कित्ती पड़ेगी? .
कित्ती डाली शक्कर ?
दुई लोटा पानी धरा था,सो कटोरी भर डाल दी.उसकी चिन्ता मत करो ,हमने पानी चख कर देख लिया .
उन्होंले चीनी घुलने के बाद ,चमचे निकालकर ,मिठास चख ली है.
कटोरे में चाय की पत्ती जिज्जी ने निकाल दी.
दूध की कोई चिन्ता नहीं .डालते जाओ ,रंग आ जाए तब तक .(वाह ,क्या चाय बनाई है अम्माँजी ने ,खूब औटी हुई गाढ़ी चाय उसमें दूध की बहार -चीनी भी खूब मन से डाली है ). 
हम लोग उठे पानी निकालनेवाली डोई से निकाल-निकाल,  चाय कपों मे छानी और ट्रे मे रख कर ले आए.
अम्माँ जी कप या शीशे बरतन में कुछ खाती पीती नहीं ,उनका काँसे का गिलास चलता है,जिसमें दूध और चीनी उनके हिसाब से, ढंग से पड़ी हो .
चार प्लेटों में दीवाली की पापड़ियाँ -अजवाइन हींग-मिर्च की बेसनवाली ,मैदा की नमक-ज़ीरे वाली और गुड़वाली मीठी पहले से चल रहीं थीं .
खेल जारी था.
हाँ, तो उसमें क्या हुआ?
 मैंने कई बार चाल चली .
इनने टोका , ए क्या कर रही हो ?
मैं हँस कर रह गई .
और एक चाल चल दी.
 अपने पत्ते फेंककर ये मेरे पास चले आए 
अरे वाह, कमाल करती हो तुम..
तीन इक्कों ने खूब जिताया मुझे उस दिन .
मैं सबके सामनेअधिक बोलती नहीं .घर में सबसे छोटे हैं मेरे पति ,छोटे जेठजी से नौ साल छोटे .अम्माँ कहती हैं , जौ तो हमारो पेट-पुँछना है .

मैं भी कौन सा राग छेड़ कर बैठ गई. बड़ी लंबी गाथा है उन दिनों की जो आज के लिये अजनबी हो गए है .
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