शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

प्रस्थान से पहले -


लंबे प्रवास पर जाने के पहले  जितना हो सके अपनों मिल लेना ठीक रहता है -फिर पता नहीं  फिर कब संभव हो ! जा रही हूँ मैं भी,तीन दिन के लिये ही सही . महाशिव-रात्रि से अधिक श्रेष्ठ और कौन सा दिन होगा, हरिद्वार जाने के लिये !
प्रकृति  उमा-शंभु विवाह की तैयारियाँ पूरी कर चुकी होगी .हिमालय के वनों में  वसंतोत्सव चल रहा होगा.  जहाँ नव-विकसित दुर्लभ पर्वतीय पुष्पों की सुगंध दिशा-दिशा में व्याप्त हो  मन-इन्द्रियों को आविष्ट कर लेती है . एक बेभान करता सा नशा चढ़ा आता है कि एक अतीन्द्रिय-सा चैतन्य शेष और सारा  आत्म-बोध विलय .ऊंचाइयों पर आरोहण करते हुये उन श्रेणियोंकी परिक्रमा देती  बस में हो कर भी  लगता है  ,उन्मुक्त विचर रही हूँ .एक जगह न रह कर संपूर्ण  परिवेश में व्याप्त हो कर उस  एकान्त रमणीयता का एक अंश मैं !
हिमगिरि की छाया में प्रवाहित सुरसरि का नेह-जल दृष्टिमात्र से ही अंतरतम तक शीतल कर देता है.जीवन के उत्तर-काल में वह सान्निध्य पाने का हिसाब-किताब बैठा लेने भर से कहाँ काम चलता है - सांसारिक बाध्यताओं के आगे  मन-चाही आज तक किसकी चल सकी ?
तो फिर जितना मिले उतना ही सही ! फिर से केलिफ़ोर्निया जाने के पहले एक बार और उस उस अनुभूति को पाने का लोभ  - और अंतर्जाल  से कुछ दिन  छुट्टी !
*

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

कृष्ण-सखी - 25. & 26.


*
  25 .
जुए में हारने के बाद पांडवों ने  काम्यक-वन के लिये प्रस्थान किया. .
भविष्य का आभास सबको होने लगा था. कौरवों की  शक्ति  बहुत बढ़ गई थी .अब अपनी सामर्थ्य बढ़ाये बिना निस्तार नहीं .अर्जुन  अपनी यात्रा पर निकल गये  ! अवसर का उपयोग कर रहे थे - इन्द्रकील पर्वत पर तप  में रत थे -दिव्यास्त्रों की प्राप्ति हेतु .
समय कब रुका है किसी के लिये  .
जीवन बीत रहा है .पांचाली का  सब मान करते हैं ,सुख-सुविधाओं का यथाशक्ति ध्यान भी रखते हैं - अपने -अपने ढंग से. सबसे मधुर संबंध हैं. पर द्रौपदी  के मन के साझीदार नहीं हो सके वे कोई. मन की एक शून्यता किसी प्रकार भरती नहीं. मंथन थमता नहीं .
 अर्जुन के साथ आती थी वैसी तृप्त निद्रा तब से नहीं आई  .दुश्चिंता में निद्रा भंग हो जाती है .पता नहीं उद्विग्न मन लिये कहाँ - कहाँ भटक रहे होंगे !
दैनिक जीवन के अनुबंध निभाते दिन बीतता है . वनवास के प्रारंभिक दिनों में , सब कुछ अव्यवस्थित था ,जीवन बड़ा असुविधा भरा था .धीरे-धीरे गृहस्थी जमने लगी.
गृहस्थी कहेंगे उसे ?   .
आदत नहीं थी ..पर आवश्यकता सब करा लेती है.
सब का भोजन बनाने में पांचाली अति श्रमित हो जाती थी .आवश्यक सुविधाओँ का अभाव और भीम जैसे भोजन-भट्ट !
सहायक सब थे ,जितना जिसका वश था .
एक दिन भीम बोले ,'आज मेरे लिये उतना भोजन मत धरना पांचाली ,मैं नहीं खा पाऊँगा .'
'क्यों?विस्मय से पूछा ' भीम और भोजन के लिये मना कर दें .
'हिडिंबा ने शूकर माँस स्वादिष्ट बनाया था .सब ने आग्रह से खिलाया  मैं अधिक खा गया अब एक समय निराहार रहूँगा  ..'
सब हँस पड़े ,' इतने योजन चलने में सब पच गया होगा .भीम .तुम निडर हो कर भोजन करो .'
'मैं जानती हूँ , मेरा श्रम देख कर कह रहे हो तुम .पर तुम यथेष्ट आहार न लोगे तो मुझे कैसे संतोष मिलेगा  ?ना, , फिर मैं भी उपासी रहूँगी .'
आग्रह पूर्वक जिमाती है  .कोई थोड़ा भी  भूखा रह जाय  ,सहन नहीं कर पाती  वह .
 प्रायः ही भीम-पुत्र आ जाता है .
कितना सरल स्वभावी  है घटोत्कच  ! किशोरावस्था पार कर चुका है -भीम जैसा ऊँचा-पूरा .बल्कि उनसे भी बढ़ कर .स्वस्थ ,परिश्रमी .
पांचाली ने ध्यान से देखा था -हिडिंबा-सुत में भीम की कितनी झलक है !
 वही नेत्र ,वही  स्नेहमय दृष्टि .किसी को सुख देने हेतु कुछ भी करने को तत्पर ,और मुख की भंगिमा बार-बार भीम की झलक मारती हुई .
देखती रह गई थी वह .
उसने बढ़ कर पांचाली से पूछा था ,'तुम मेरी भी माँ हो न ?'
मन कसक उठा - आज को मेरे पुत्र भी मेरे पास होते ...यदि.....!
तुरंत आगे बढ़ अंक में समेटती द्रौपदी बोली थी ,'पुत्र ,यह भी कोई पूछने की बात है .'फिर हँसते हुये  ,'देखो न, मेरा यह पुत्र अब  गोद में नहीं समाता .'
और उसने झट आगे बढ़ पांचाली को गोद में उठा लिया ,'इससे क्या .अब मैं तुम्हें उठा सकता हूँ .'
बिलकुल भीम की तरह -द्रौपदी को लगा .
उसने पूछा था ' कमल-सरोवर में स्नान कर आई हो माँ? नील-कमल की सुगंध छाई है जब से आया हूँ ..'
सब चुप ,भीम चकित - कोई कैसे बताये यौवन- प्राप्त पुत्र को पत्नी के  देह-परिमल की बात !
नटखट बने-से सहदेव बोल उठे,'ये जहाँ रहती हैं योजन भर तक अपनी उपस्थिति ऐसे ही जता देती हैं .'
सब मुस्करा रहे हैं.
' कितनी सुन्दर  है माँ  .' शब्द जैसे अनायास. मुख से निकल पड़े हों ,फिर कुछ सोच कर  'मेरे और भाई कहाँ हैं  ?'
'वत्स ,तुम्हारे पाँचो  भाई अपने मामा और मातामह के पास रह कर उचित शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं ?'
घटोत्कच के आवागमन से वन-जीवन  में विविधता का संचार होने लगा .
इस क्षेत्र में  उसके  अनुभव बहुत व्यापक हैं . अपने   प्रयासों ले  सब कुछ कितना सहज कर देता है .द्रौपदी की अनेक कठिनाइयाँ चुटकी बजाते हल हो जाती हैं .
 पहली बार अपने लोग मिले  हैं भीम के पुत्र को .
दोनों छोटे पितृव्यों के  साथ खूब पटरी बैठ गई है .अब तक सबसे छोटे रहे उन दोनों को भ्रातृ-पुत्र अब मिला है . अपनी विद्याओँ का प्रशिक्षण देने से पीछे क्यों हटें भला !
पुत्र के हाथों हिडिंबा भेंटे भेजती रहती है . 'पहिल-बियाही ' है वह, छोटी भगिनी- समान समझती है  पांचाली को !
*
26.
एक व्यक्ति चला गया है सबके हित के लिये - शक्ति और साधन-संधान हेतु .
शेष सब हैं .हाँ , शेष चार !
 एक बड़ा धीर-गंभीर ,शान्त मौन रहकर  अपनी-सी ही करने वाला .सदा नीति और धर्म का पल्ला थामे .
भीम  संवेदनशील हैं ,सहानुभति है पांचाली से .सदा प्रयत्न करते हैं उसे प्रसन्न करने का .पर उनका स्वभाव -अलग है स्थिर हो कर बैठनेवाले नहीं. चंचल मन ,और फिर आँख ओट तो पहाड़ ओट .दिन में घर पर टिकते ही कितना हैं .पर्वतों-घाटियों  को लाँघते घूमते भटकते हैं वनों में.और हिडिंबा भी तो है न .वहाँ जाना-आना लगा रहता है .
मानसिक स्तर सबका भिन्न है.
पाँच भाई पर परस्पर कितने भिन्न .बस दोनों छोटेवालों में कुछ साम्य लगता है.
जन्म के विषय में कथायें सुनी हैं - उत्सुकता जागती है मन में .पर पूछ नहीं सकती .किसी से ऐसी बात करे - प्रश्न ही नहीं उठता .
जो किसी से नहीं पूछ सकती सखा से पूछ लेती है .और वह बहुत सहजता से सारी उलझन दूर कर देता है.
'तुम्हारी तो बुआ लगती हैं मेरी सासु-माँ .सब जानते होगे तुम .एक बात मेरी समझ में आज तक नहीं आई .बहुत-कुछ  सुनती रहती हूँ पर अनबूझा रह जाता है .'
'ऐसा क्या है ?
 ' सुनती आई हूँ दोनों सासुओं के पुत्र देवावाहन से प्राप्त हैं  .समझ नहीं पाती कैसे.पतियों से कैसे पूछूँ उनके जन्म का विषय में ? और इस प्रकार की बातें परिजनों -परिचारिकाओं से करना शोभनीय नहीं .बस एक तुम से निश्शंक हो कर पूछ सकती हूँ .'
कृष्ण ने बताई सारी बात -
एक बार शिकार खेलते समय झाड़ियों के अंतराल से दिखाई देते हरिण पर महाराज पाण्डु ने शर-संधान कर दिया .
शराघात होते ही मानव-चीत्कार गूँज  गया.
हरिणेों का एक जोड़ा मानव रूप में परिणत होता देख राजा चकित !
 लक्ष्य  पशु को बनाया था  बन गया मनुष्य !
वे किंदम ऋषि थे जो अनायास उभर आई वासना की तृप्ति कर रहे थे - दिन होने के कारण पत्नी सहित पशु रूप धारण कर .
विस्मित सुन रही थी पांचाली अनेक प्रश्न मन में कौंधने लगे थे.
 कृष्ण बता रहे थे -
बहुत विनती की पांडु ने  यह भी कहा कि जोड़ा बनाये पशुओं  पर वे  कभी शर-संधान नहीं करते. वृक्षों के अंतराल से  कुछ स्पष्ट समझ नहीं पाया इसलिये.अपराध हुआ  .
पर मृत्यु से पूर्व उन्होंने शाप दे दिया - वासनापूर्ति के क्रम में,  तुम्हारी भी, तृप्ति - क्षण से पूर्व ही , मृत्यु हो जायेगी! '
चकित-विस्मित सुन रही है .मन में शंकायें जाग उठीं असंतोष  मुखर हो उठा .
'ये ऋषि-मुनि तपस्वी होते हैं ,सांसारिकता से दूर ,फिर इतना अहं क्यों होता है इन में ? दूसरे का दोष देखे बिना शाप दे देते हैं .यह तो अपनी सामर्थ्य का दुरुपयोग हुआ .शकुन्तला ,नल-दमयंती ...और भी जाने कितने निरपराध दुख पाते हैं अकारण ही ,अपनी मानवीय  संवेदनाओँ  कारण ही .'
' जीवन है यह ...चलता है ऐसे ही ..हाँ तो ..अपने दुर्भाग्य से दुखी महाराज पाण्डु ने वन में रहने का निश्चय किया .कुन्ती-माद्री दोनों पत्नियाँ भी साथ चली आईं.
उसके बाद पांडु को जब विदित हुआ कि निपूता होने के कारण उन्हें सद्गति नहीं प्राप्त हो सकती .तो चिन्तित रहने लगे.
बहुत विचार करने के बाद उन्होंने पत्नियों से कहा कि नियोग से ही वे पुत्र उत्पन्न करें .
 'यहाँ बन में कौन ?ये वन के असंस्कृत वासी ?नहीं ,नहीं. सोच कर ही वितृष्णा होती है ,' कुन्ती बुआ चुप न रह सकीं.
'तो तुम्हीं कोई उपाय करो .'
 कुन्ती बुआ ने उचित अवसर जान कर दुर्वासा के वरदान की बात बता दी - ऋषि के दिये मंत्र से 'जिस देवता का आवाहन करोगी मनोकामना पूरी करेंगे .'
'इससे अच्छा और क्या हो सकता है .कुन्ती, मुझे पुत्र चाहिये .'
'.दोनों की सहमति बनी - धर्म का पुत्र चाहिये .
 माद्री को पांडु के साथ छोड़ कुन्ती  देव- आवाहन करने चली गई  '.
द्रौपदी के मन में प्रश्न उठते रहे - आवाहित देवता मनोकामना पूर्ण करेंगे, और  धर्म राज  की संतान पाने का  निश्चय कर लिया ?कैसे ?
वह उलझन में पड़ गई
वे वर देंगे ,या स्वयं ही..  ? मंत्र का प्रयोग किये बिना यह कैसे जाना कि वे स्वयं ..स्वयं ही . . गर्भाधान हेतु उपस्थित होंगे  ...कि   संतान उन्हीं से  ग्रहण करना है. पर  माधव के सामने शंका प्रकट करना  द्रौपदी को शालीनता के अनुकूल नहीं लगा .  वह चुप सुनती रही .
छ समय पश्चात् वे लौटीं .
माद्री ने देखा परम तृप्ति के  संतोष से दीप्त उनका मुख ! जीवन की स्वाभाविक इच्छाओं के दमन से उत्पन्न रुक्षता नहीं ,वन के कठोर जीवन की तिक्षता भी नहीं - नारीत्व की सार्थकता से परितृप्त  वह प्रफुल्ल मुख !जैसे विरस होती  वल्लरी सरस फुहार पाकर लहलहा उठे ,
वे सफला हुईँ .अनोखी आभा से जगमग. जैसे ताल के थिर हो गये जल में तरंगें झलमलाने लगें  .जड़ीभूत हुए जीवन में नये चैतन्य की ऊर्जा  संचरित होने लगे!.
.कुन्ती परिपूर्ण हो कर आई थी .
माद्री चकित देखती रह गई .
*
पांडु ने अनुभव कर लिया कुन्ती तुष्ट है ,प्रफुल्लित है .नारीत्व की सफलता पा ली है उसने .
जो वे न दे पाये , पत्नी ने वह किसी और से पा लिया है .
लाचार थे वे ,पुत्र चाहिये ही था .
युधिष्ठिर जन्मे .
'एक पुत्र पर्याप्त नही ' उन्हें लगा था .
दूसरी बार भीम भैया .
फिर कुन्ती ने कहा था ,'जिठानी जी को सौ पुत्रों का वरदान है .'
सुप्त कामना जाग कर लहरें ले उठी थी , उस चाव भरे मुख-मंडल को देखते रह गये असमर्थ पाण्डु.
कैसे मना कर सकते थे वे .
,'हाँ ,हाँ , संतान प्राप्ति से क्या किसी का जी भरता है !'
और फिर इन्द्र के आवाहन से अर्जुन की प्राप्ति .
माद्री ने हर बार तृप्ति और  संतोष से परिपूर्ण,  नारीत्व की  सफलता से दीपित सपत्नी को देखा था, वह अधिक कुंठित होने लगी थी .
सहानुभूतिवश  कुन्ती बुआ ने उन्हें भी मंत्र -प्रदान किया ,और संतान पाकर वे भी पुत्रवती हुईँ - दो पुत्र  नकुल और सहदेव ..दोनों अश्विनीकुमारों से  .'
'और  श्वसुर जी  वे ..वे कैसे ..?
' दोनों पत्नियाँ मातृत्व की दीप्ति से .दैदीप्यमान ,अपने पुत्रों के साथ प्रसन्न -मगन !
छोटे भाई धृतराष्ट्र के गृह में सौ पुत्रों और एक कन्या का जन्म हो चुका था .
घोर मनस्ताप में डूबे पाण्डु ,ऊपर से संतोष प्रदर्शित करते रहे .लेकिन पुरुष-मन ऐसी विषम स्थितियों  कहीं शान्ति  से रह सकता है?
 विचार उठते रहे  ,इस प्रकार निष्क्रिय पौरुष ले कर जीने से क्या लाभ !अपना बीज वपन कर दूँ किसी प्रकार ,मृत्यु अवश्यंभावी है ,हो जाये तो क्या !संभव है अपना अंश  छोड़ जाऊँ .
कुन्ती बुद्धिमती थी ,माद्री अपेक्षाकृत भोली ,वयस में भी कम .एक दिन कुछ निश्चय कर वे माद्री के साथ वन-भ्रमण के लिये गये .
किंदम ऋषि का शाप फल गया .अकेली माद्री विलाप करती लौट आई .
घोर अपराध -बोध से ग्रस्त थी वह .दोनों पुत्र कुन्ती को सौंप पति के साथ चिता पर चढ़ गई .
सब कुछ जान लिया .पर   पांचाली के मन में कुछ अनुत्तरित प्रश्न रह गये !
**
(क्रमशः)

शनिवार, 21 जनवरी 2012

कृष्ण-सखी - 23 & 24.


23.
कैसे भूल सकती है उन घटनाओं को जिनने जीवन की धारा को एकदम मोड़ दिया
उस गर्हित कांड के बाद सब कुछ अतीत कर जब वे इन्द्रप्रस्थ के लिये प्रस्थान करने लगे तभी महाराज धृतराष्ट्र के भेजे दूत उपस्थित हुये .
'आपके ताऊ-श्री ने बड़े नेह से आग्रह किया है जो पिछले दिनों हुआ .बहुत अनुचित हुआ  ,उनका मन खिन्न है .चाहते हैं कुछ समय शान्ति -स्नेह पूर्वक साथ में बीते .अनुज का ध्यान आता है तो अंध-नेत्रों से अश्रु-पात होने लगता है .उनका चित्त बड़ा अशान्त है ,बहुत व्याकुल हैं. उनकी हार्दिक इच्छा है कि आप लोग ,अच्छे वातावरण में ,प्रसन्न मन से कुछ दिन उनका आतिथ्य स्वीकार कर उन्हें सुख दें .'
'कृपया रथ लौटा लें . ऐसी विषण्ण मनस्थिति में उन्हें  छोड़ कर न जायँ .'
'वे युवराज दुर्योधन से विशेष असंतुष्ट हैं .'
'हमारा आग्रह नहीं मानेंगे तो स्वयं महाराज आपसे विनती करने पधारेंगे, श्रीमन् !'
पाँचो भाई एक दूसरे का मुँह देख रहे हैं .यह कैसा विचित्र व्यवहार !
युधिष्ठिर सोच-मग्न थे -उन चारों  को फिर से  रुकने की बात अरुचिकर लग रही थी .वे अनेक प्रकार से परस्पर अपने मत व्यक्त कर रहे थे .
और पांचाली स्तब्ध .इतना सब-कुछ हो गया और फिर वही प्रस्ताव !
वह तो पल भर नहीं रुकना चाहती .जाना चाहती है अपने पुर में .बहुत कुछ बीत चुका है उसके ऊपर से  .अपने निवास में रहना चाहती है  जहाँ केवल उसका परिवार हो .चुपचाप शान्ति से बैठकर कुछ विचार करना चाहती है .बार-बार अकुलाते मन को स्थिर करना चाहती है .आतिथ्य ग्रहण करने की मनस्थिति नहीं है उसकी .
अर्जुन ने कहा था ,''फिर वही आमंत्रण ! उनके छल-कपट से कौन अनजान है . कितनी बार उनकी चाल में आ चुके हम लोग .वो तो ये कहो सावधान करने वाले थे तो हम जीवित हैं आज .वे हमें अपने रास्ते हटा कर अपना अधिकार पूरी तरह  निष्कंटक करना चाहते हैं .''
' हर प्रकार से हमें वंचित कर अपना वर्चस्व स्थापित करने की उनकी योजना  है .'
चारों भाई विविध प्रकार से अपनी अनिच्छा-आपत्ति व्यक्त करते रहे ,
युठिष्ठिर सबकी सुनते  रहे .
'कुछ लोग हैं ऐसे ,पर सब नहीं .हमारे प्रति सद्भाव भी तो है लोगों में ,विदुर चाचा तो कभी उनकी ओर नहीं झुके .ताऊ-श्री के हृदय में हमारे लिये नेह ने ही हमें इन्द्रप्रस्थ जैसे समृद्ध राज्य का अधिकार दिया  .और पितामह ,उनके लिये तो मैं ऐसा सोच भी नहीं सकता.. '
सबको लग रहा था ,जी नहीं भरा  अभी तक बड़े भैया का .इतना देख-सह कर भी सावधान नहीं हुये .
पांचाली सोच रही है जो ग़लत है ग़लत ही रहेगा .जब बोलेंगे ही नहीं तो चलती रहेगी उनकी मनमानी .
वे लोग इनकी दुर्बलता को जानते हैं - ये उनका विरोध नहीं करेंगे .
उसे  लग रहा था  पता नहीं आगे क्या खेल रचेंगे वे लोग ,और ये धर्मराज बड़े आज्ञाकारी बने ,उन की चाल में आ जायेंगे .
उन लोगों से, जिनने सदा बैर साधा ,चालें खेलीं ,नीचा दिखाया उन्हीं से घिरे रहेंगे वहाँ .हमें क्या करना है ,सब मिल कर निर्णय क्यों नहीं लेते .सहधर्मिणी से,नहीं तो भाइयों से ही  बात कर लें उनका मत ,उनके विचार भी जान लें .
*
24.
सहधर्मिणी ? अचानक ही कुछ चुभ उठा अंतर में .
जब दाँव पर लगा कर हारे  तभी पति होने का अधिकार छोड़ दूसरों को सौंप दिया था  .
धर्मराज बताओगे .दाँव जीतनेवालों से जब  स्वतंत्र कर दिया गया मुझे,  तब  क्या दुबारा  .,अब मैं तुम्हारी क्या लगती हूँ ?
कभी पूछ सकेगी क्या  ?
वे चारों तो  इस प्रश्न के घेरे में आते ही नहीं.
किससे कहे अपनी बात ? बस एक है जिसके सामने मन की द्विधा व्यक्त कर सकती है .
 कृष्ण की बहुत याद आ रही है .
भीम के स्वर कानों में पड़े  ,''सद्भावना पूर्ण मन-रंजन नहीं, खेल नहीं , कुचालें है उन सब की ,दुर्भावनाओं का खुला खेल ,और हमें वंचित करने का पूरा षड्यंत्र . और सब जान कर भी वहाँ हमारे गुरु-जन चुप रहते हैं  .'
अर्जुन भी चुप न रह सके ,' पितामह की तेजस्विता पर ग्रहण-सा लग जाता है .मुद्रा से आभास होता है पर उनका असंतोष कभी मुखर नहीं होता .ताऊ-श्री को अपने श्यालक,शकुनि के आगे कभी मुँह खोलते नहीं देखा ,और दुर्योधन की चौकड़ी के प्रमुख तो उनके मामा-श्री हैं ही  .'  '
'ताऊ -श्री धृतराष्ट्र पुत्र-मोह में किसी की सुनते लहीं ,न तात विदुर की न पितामह की ,खेल खेल नहीं ,चाल है उन सब की .जान कर भी चुप  .'
'कपट-बुद्धि कार्य कर रही हो.फिर भी प्रतिरोध न करें .नीति यह तो नहीं कहती .'
हाँ ,यही हुआ था - आशंका होते हुये उससे विरत होने का प्रयास नहीं किया गया .शान्तिपूर्वक रीति-.नीति-धर्म का पल्ला पकड़े सब कुछ घटने का माध्यम बने रहे .धर्म में बुद्धि का प्रयोग वर्जित है क्या  .रीति-नीति क्या लीक पर चलते जाने से निर्वहित होती हैं ? पांचाली सोच रही थी ,बोलने का अवसर ढूँढती-सी .
अंत में बोल ही दी ,' अगर चुपचाप अनर्थ घटते देखना समर्थ पुरुष का धर्म है तो पाप क्या है ?'
'पाप-पुण्य की गूढ़ व्याख्यायें करने का यह अवसर नहीं ,अभी दूतों की बात पर निर्णय करना है .'
  और कुशल दूत कहते रहे -
'महाराज का कहना है ,आपके साथ जो व्यवहार हुआ कदापि उचित नहीं था ,उसी का निराकरण करना चाहते हैं .'
वे चारों वयोवृद्ध व्यक्ति दूत बने बहुत विनय दिखाते हुएवाग्पटुता से युठिष्ठिर को मना रहे हैं .
एक ओर भाइयों की आपत्तियाँ ,दूसरी ओर दूतों के विनम्र निवेदन ,तात-श्री के आग्रह -अनुरोध का बखान .
 इन्द्रप्रस्थ के महाराज युठिष्ठिर दोनों पक्षों को तोलते परम शान्त .
'हम चरणों में विनत हो कर निवेदन करते हैं .महारानी आप तो साक्षात् करुणा की अवतार हैं .आप ही महाराज युठिष्ठिर को समझाइये .क्या अपने तात-श्री का यहाँ आ कर आपको मनायें आप चाहेंगी? हम बूढ़ों की विनती की लाज रख लीजिये .'
'हम बहुत श्रान्त हो गये हैं ,अपनी नगरी छोड़े कितना समय हो गया .ताऊ-श्री हमारी विवशता समझेंगे .अभी प्रस्थित होने की अनुमति दें ,निकट भविष्य में पुनः दर्शन करेंगे .''.
पति की ओर देखती द्रौपदी का उत्तर था
वाचाल दूत कहाँ माननेवाले ,' अभी महलों में चल कर पूर्ण विश्राम कीजियेगा महारानी ,और उधर ,आपकी नगरी के  समाचार भी पहुँचते रहेंगे . सब सुव्यवस्थित .और महाराज के प्रताप से हर ओर शान्ति सुख छाया है .
 भीम ने आगे बढ़ फिर चेताना चाहा ,'उनके लोभ का कोई छोर नहीं .वे हमें सहन नहीं कर सकते .'
युठिष्ठिर उलझन में,  'पर ये तो ताऊ -श्री ने कहलवाया है .उनसे तो हमारा बैर नहीं .हमारे पूज्य हैं वे .'
,इतना सब हो गया ,क्या रोक सके वे .अब हम क्यों जायें?.'
फिर यह उनकी चाल है -भीम का कहना था .
'जो ग़लत है ग़लत ही रहेगा ..जब बोलेंगे ही नहीं तो चलती रहेगा सबकी मनमानी .'
 क्या अभी भी नहीं भरा जी ?नीतिज्ञ वही -जो समयानुकूल नीति निर्धारित करे .आखिर ये चाहते क्या हैं?
पांचाली प्रतीक्षा में थी कि वे मत जानने को  जब उससे उन्मुख होंगे और  वह स्पष्ट कह देगी ,मेरा मन यहाँ से बिलकुल उचट .गया मुझे विश्राम चाहिये- पूर्ण विश्राम. बहुत थक गई हूँ .अपने घर जाना चाहती हूँ .शान्ति   चाहती हूँ .
पर उन्होंने उधर देखा भी नहीं .
अर्जुन हत्बुद्ध ,भीम नकुल -सहदेव ,बड़े भाई का मुख देखते रह गये थे जब उन्होंने महाराज धृतराष्ट्र का आमंत्रण स्वीकार कर,   हस्तिनापुर में रुकने का  आश्वासन ,दूतों को दे दिया .
 ओह, कैसी  दुराशा !
ये नहीं समझना चाहेंगे .अपने आगे किसी की कभी नहीं सुनेंगे.
 जानते हैं न ,इनका क्या कर सकता है कोई ?
जब अपना ही माल खोटा ,तो परखैया का क्या दोष ?
 एकदम विवश विमूढ़ पांचाली !
और फिर एक दिन क्रीड़ा के नाम पर जुए की फड़ जमी.
  सब देखते रह गये शकुनि के पाँसे पड़ते रहे और बड़े पांडव  वनवास और अज्ञातवास जीत लाये .
इन्द्रप्रस्थ जाने के बजाय पाँडव वन के लिये प्रस्थान कर गये .
राज्य का प्रबंध देखने को कौरव बंधु हैं ही .
द्यूत के पासों पर नचाया जा रहा है पांडवों को .
तभी से बीत रहा है इसी ढर्रे पर सबका जीवन .
सोच कर अस्थिर हो उठती है पांचाली .
 कुछ याद नहीं करना चाहती , सारा कुछ विस्मृति के अतल में डुबो देना  चाहती है .
*
(क्रमशः)



मंगलवार, 10 जनवरी 2012

कृष्ण-सखी .- 21. & 22 .



*21
खांडव वन की परिणति अति रम्य और सुनियोजित, सुस्थापित वैभवपूर्ण नगरी में हो चुकी थी , नाम करण किया गया- इन्द्रप्रस्थ !
सब कुछ सुचारु रूप से संपादित होता रहा.
कृष्ण के साथ विचार-विमर्ष में निश्चय किया गया कि  लोक में प्रतिष्ठा-पूर्वक स्थापित होने के लिये राजसूय यज्ञ का आयोजन हो ,इस भूमि पर गुरुजनों के चरण पड़ें .अपनी  सामर्थ्य से अर्जित इस वैभवपूर्ण नगरी को सब देखें .मान-सम्मान में वृद्धि हो .
समारोहपूर्वक आयोजन किया गया .
देश-देश  के नरेश, महार्घ उपहार ले-ले कर उपस्थित हुये .धन-संपदा का कोई ओर-छोर नहीं कौरवों को सपरिवार-परिजन आना ही था वे तो  घर के ही लोग थे .
बड़ा भव्य आयोजन था !
 वासुदेव कृष्ण को देवपूजा का परम-सम्मान देने के धर्मराज के मत को अधिकांश का समर्थन मिला . दुर्योधन आदि परम असंतुष्ट .पर जब पितामह ने सहर्ष स्वीकार कर लिया ,वे विरोध कैसे करें !
द्वारकाधीश कृष्ण पट्टमहिषी रुक्मिणी के साथ पधारे थे .श्यामल जनार्दन  के संग, नाम के अनुरूप हिरण्यवर्णी आभा से दीप्त रुक्मिणी .सबके नयन उस दिव्य जोड़ी पर टिक गये  .
शिशुपाल ने देखा ,उसके नेत्र रुक्मिणी की ओर से से हट नहीं रहे थे   -मेरी वाग्दत्ता थी यह ,आज मेरे संग होती !मेरी वस्तु को .यह चोर ग्वाला हर ले गया .कैसी अनीति ! कृष्ण का वहाँ होना सहन नहीं कर पा रहा था वह.ऊपर से अग्रपूजा का सम्मान भी उन्हीं को अर्पित.
पितामह भीष्म ,और अन्य पूज्य गुरुजन जहाँ विद्यमान हों, वहाँ एक प्रपंची अहीर का छोरा ,उच्चतम सम्मान का भागी बने ,आक्रोश से भर उठा वह . यह पाखंडी राजा बन गया तो क्या !रहेगा तो वही पशु चरानेवाला ग्वाला , पराई स्त्रियों को बहकाने से कभी चूका है !
  चेदिराज शिशुपाल का संचित आक्रोश फूट पड़ा .यहाँ दुर्योधन की मंडली को  अपने अनुकूल पा उसका साहस बढ़ा .विरोध करने पर उतारू हो गया . खुल कर अपशब्द और गालियों  का कोश खोल दिया .
जनार्दन वचन-वद्ध थे .शान्त रह  मन ही मन सौ तक अपराध गिन -गिन कर क्षमा करते रहे .और हर दुर्वचन के बाद शिशुपाल का साहस बढ़ता गया .सारी सीमायें लाँघ लीं उसने .
कृष्ण ने चेतावनी दी ,';बस ,अब आगे नहीं .'
मद में चूर था शिशुपाल .और उत्तेजित होकर चीखने लगा .
बस ,एक सौ एकवीं गाली उसके मुख से बाहर आई और वासुदेव ने सुदर्शन चला दिया .
इतने कुवचन  सुनते-गिनते ,उद्विग्न-मना जनार्दन से ,चक्र के संधान में  पूरी एकाग्रता नहीं रही .चक्र की तीखी धार  उन की अँगुली से रगड़ती, घायल करती चली  गई .
कृष्ण हाथ उठाये रह गये . फिर सामने ला कर देखा - रक्त रिसने लगा था
 युठिष्ठिर त्वरा से बढ़े कहीं वे बूँदें धरती पर न गिरें ,अनर्थ हो जायेगा !
 भैया का हाथ पकड़ ,अँगुली मुट्ठी में दबाली .
महारानी द्रौपदी विचलित.
आसन छोड़ उठ आईं .'आह, मेरा बांधव !'
युठिष्ठिर हतबुद्ध - कैसे रुके उन बूँदों का प्रवाह?
महारानी ने क्षण भर भी विलंब किये बिना ,चर्रर् से  अपने चीनांशुक का आँचल फाड़ा .
 सारी सभा स्तब्ध !
शिशुपाल का शीश तो उड़ गया पर उसे देखने का अवकाश किसे !
वस्त्र की चीर, फाड़ कर याज्ञसेनी ने बंधु की अँगुली को वस्त्रावृत्त करने लगी .
कृष्ण की आपत्ति को स्वर भी न मिल पाया , कृष्णा ने हाथ पकड़ा और सँभाल कर घाव को  लपेट दिया ..'
'कैसा ऋण चढ़ा दिया, शुभे ' वे  बुदबुदाये किसी ने सुन नहीं पाया.
पाँचाली को लगा पीड़ा के उद्गार हैं .
'बहुत पिराता है, मीत ?'
'नहीं ,परम शान्ति पड़ गई- तुम्हारा नेह !.....पर तुम्हारा मंगल-वस्त्र ? यज्ञ में व्यवधान पड़ गया न !'
'खल-जन कहीं बाधा डलने से नहीं चूकते .पर जहाँ तुम हो कुशल-मंगल में काहे की बाधा !'
कृष्णा भावुक हो उठी .
कहीं नयन न छलक उठें  मुरारी ने सिर हिला कर बरजा उसे .
दृष्टि फिरी सबकी तो देखा ,सुभद्रा  नये परिधान लिये  खड़ी हैं .चित्रांगदा,उलूपी आदि राज-रमणियाँ व्यग्र-सी उसके साथ .
'देवी ,चलिये ' वे तत्परता से पांचाली को लिवा ले गईं- सुपरिधानित करने हेतु .
पुत्रों की मंडली सचेत हो गई थी ,
इरावान ,वभ्रुवाहन ,घटोत्कच ,अभिमन्यु द्रौपदी के पाँचो पुत्र, उन के सहयोगी मित्र आदि सचेत हो गये थे .सबकी दृष्टि इधर ही लगी थी .
राज-महिषी के चीनांशुक की पट्टी- बँधा, दाहिना हाथ उठा कर लहराया कृष्ण ने ,सबको आश्वस्त करने कि सब ठीक है.
  कार्यक्रम फिर चल पड़ा था, जैसे कुछ हुआ ही न हो .

*

22.
 यह तेरह वर्ष का वनवास, एक वर्ष अज्ञातवास सहित -  उत्तरदायी कौन ?.
उधर पार्थ गिरि-वनों की धूल मँझाते  लोक-परलोक एक करते एकाकी  भटक रहे हैं . तपस्या ? दंड ?प्रायश्चित ? या इन अवांछित ,असह्य स्थितियों से दूर चले जाने का बहाना ?
   पूरा परिदृष्य चल-चित्रों सा पांचाली की स्मृतियों में घूम गया -     .
राजसूय-यज्ञ का  समारोह विसर्जित . पितामह ,महाराज, दुर्योधन आदि  ,कर्ण , सभी का  लौट जाना .
अगले क्रम में आतिथ्य ग्रहण करने की बारी पांडवों की  .
हस्तिनापुर से निमंत्रण आया - बहुत दिन हो गये हम सभी भाई एकत्र हो कर आनन्द नहीं मना पाये .,अब कुछ दिन हस्तिनापुर आ कर महाराज धृतराष्ट्र को अपने सामीप्य का सुख दीजिये .
कुछ समय चैन से बीता और एक दिन शकुनि और दुर्योधन ने  द्यूत का प्रबंध कर डाला .धर्मराज कुशल खिलाड़ी थे और द्यूत के व्यसनी भी .राजाओं के लिये द्यूत के निमंत्रण को अस्वीकार करना शिष्टचार के विरुद्ध है .
फड़ जम गई और खेल ही खेल में दाँव चलते रहे. शकुनि के पाँसे  निर्णय करते रहे  जिसकी चरम सीमा थी पांचाली का  चीर-हरण .
पूरा घटना-क्रम पांचाली की स्मृति में घूम गया .
उस चरम निराशा और और घोर अपमान की दारुण स्थिति में भी याज्ञसेनी की विचार-शक्ति कुंठित नहीं हुई थी ,प्रखर बुद्धि , तेज-हत नहीं हुई थी,अनीति और औचित्य पर प्रश्न उठाती  रही थी वह .
धृतराष्ट्र हतप्रभ थे - भीम और  पांचाली की प्रतिज्ञाओं से विचलित. तेजस्विनी कुल-वधू कहीं शाप न दे दे इसका भय और अपनी भी तो साख बचानी थी उनको .उदारता का प्रदर्शन करने लगे .
  नारी ने अपनी लज्जा बचा ली थी , पुत्रों का भविष्य दाँव पर लगा दिया गया था .  कैसे छोड़ देती जीवन भर अपमान सहने के लिये !उन्हें कोई दासी-पुत्र ,या दासों की संतान न कह सके - वस्त्रभूषण रहित, दैन्य ओढ़े ,  बेबस पतियों को दासत्व से मुक्त दिलायी ,उनका राज-पाट वसूला  और अंत में अपने लिये कुछ  माँगने की बात पर  स्पष्ट मना कर ,क्षत्राणी के उपयुक्त स्वाभिमान को हत नहीं होने दिया.
दुर्योधन का कुचक्र कुंठित होगया, सबके शीश झुक गये .
सब-कुछ पुनःपूर्ववत् हो जाये इसका प्रबंध कर लिया था पांचाली ने अपनी प्रपन्नमति , साहस और नीतिमत्ता से ,फिर कैसा व्यवधान आ खड़ा हुआ कि उसका किया-धरा सब बेकार हो गया .और आज वनवास में जीवन बिताना पड़ रहा है .
सब का अग्रज , सबसे अधिक उत्तरदायी था जो व्यक्ति ,निर्णय फिर उसी ने लिया था .
वह समझ नहीं पाती कि उनके मन में क्या है ,या सबसे ही - उदासीन हैं.जो होता है उसे वैसा ही होने दो .
क्या यही धर्म है ?
अनीति होते ,अत्याचार होते देखते रहना नीति है या धर्म ?धर्म अत्यंत  गूढ़ वस्तु है या सहज-स्वाभाविक !.
अगर गूढ़ है सब उसे समझ नहीं सकते तो वह सबके लिये साध्य नहीं हो सकता ! इतना सहज हो कि सर्व-सुलभ, सर्वसाध्य-सर्वमान्य हो सके .सबके कल्याण का सबके सुख का मार्ग प्रशस्त कर सके .सहज प्रस्फुटित हो अनायास अंतर में जागे, सुन्दर संकल्प के समान.
याज्ञसेनी को लगता है वासुदेव धर्मराज के परम मान्य हैं , वे ,उन्हें धर्म की मर्यादा का स्थापक मानते हैं . फिर उनकी तरह विचार क्यों नहीं कर पाते !इन्हीं के  उस बंधु ने कितनी रूढ़ियाँ निश्शंक हो कर तोड़ दीं .नई मर्यादायें रच दीं .एक सहज मानवी दृष्टि लेकर जो उचित लगा उससे विरत नहीं हुआ किसी का कुछ कहना कभी उसके आड़े नहीं आया .
उसने पति से कहा था  ,' नीति की आड़ ले कर जो विकृत खेल खेला जा रहा है उससे विरत तो रह ही सकते हैं .आप की इच्छा-शक्ति को कोई कैसे विवश कर सकता है?'
'बात इच्छा-शक्ति की नहीं ,अगर सद्भाव-पूर्वक सब ठीक हो जाये ,सारा मनोमालिन्य धुल जाय तो सबसे अच्छा .प्रयत्न से क्यों विरत हों हम !'
पांचाली को लगता है कृष्ण ने कितने विरोध झेल कर अनीति पूर्ण मान्यताओं को जड़ से उखाड़ फेंका .और बहुत सहज रहते हुये नये मान स्थापित कर दिये .पर उसने पति से  कहा नहीं - कहीं यह न समझ लें  कि   तुलना की जा रही है या हीनता-बोध कराना चाहती है .
पूरे परिवार को ऐसी विषम स्थितियों और कुत्सित षड्यंत्रों से घिरा देख वे कैसे शान्त रह लेते हैं ,उसे विस्मय होता है .
*


(क्रमशः)

रविवार, 1 जनवरी 2012

कृष्ण-सखी -19 .& 20.

*

19
*
'दुर्योधन तो जैसा है सब जानते हैं ,पर वे धूर्त शकुनि मामा ! सदा आग में घी डालते रहते  हैं .योजना-बद्ध नई-नई चालें ,सबमें उन्हीं का हाथ है.'
बड़ा असंतोष है भाइयों के मन में.कृष्ण के सामने मुखर हो ही जाता है .
'यहाँ आकर यही तो कर रहे हैं. राज-वंश की जड़ें खोदने का काम. बहिन ब्याही है, उसका हित भी नहीं देख पा रहे ,' सहदेव ने अपना संशय प्रकट कर दिया .
'बहिन ब्याही है तभी तो ..,'
 कृष्ण ने दीर्घ श्वास छोड़ा ,'वही बहिन जिसने आते ही आँखों पर पट्टी बाँध ली ..जिसने न पुत्रों का मुख देखा न पति का .'
'विचित्र कथा है .कैसे सारा जीवन बिताया होगा एक पत्नी और माँ ने पति की आँखों में झाँके बिना ,उसकी मुखमुद्रा का अवलोकन किये बिना. और सबसे बड़ी बात -पुत्रों पर वात्सल्य-दृष्टि डाले बिना .उनकी बाल-लीलाओं का ,उनके क्रम-क्रम से बड़ी होती अवस्थाओँ का ,क्रीड़ा-कलोल का आनन्द नहीं लिया .कैसा पत्नीत्व और कैसा मातृत्व !'
'यही तो दुख है गांधार नरेश, शकुनि का .'
माधव कुछ देर चुप रह इन लोगों के मुख देखते रहे .
'अपनी रूप-गुण संपन्न भगिनी के सुखी जीवन के विषय में क्या-क्या कल्पनायें की होंगी ,और जब लाचार एक अंधे से व्याहना पड़ा तो लाड़-प्यार में पली ,एक राजकुमारी जिसने भावी जीवन के कितने सपने सँजोये होंगे  उस पर पर जो बीत रही थी  क्या भाई उदासीन रह पाया होगा ?'
'फिर अपनी सोचता हूँ मैंने क्या किया .अपनी लाड़ली बहिन के  लिये .मैंने ,उसका हरण करवा दिया था.इसीलिये कि  अनचाहा दाम्पत्य न भोगना पड़े.'
'हाँ ,मुरारी .'  द्रौपदी ने हुंकारा दिया .
सब चुप हैं .
' क्यों पांचाली ,धृष्टद्युम्न ,तुम्हारा भाई .वह भी तो चुपके-चुपके आया था तुम्हारे पीछे ,पता करने  कि मेरी बहिन को ले कर यह ब्राह्मणपुत्र कहाँ जाता है .क्या तुम्हें तुम्हारे भाग्य पर छोड़ कर निश्चिंत हो सका था वह.कहे चाहे कुछ नहीं बहिन के दुख में भाई का मन तड़पता है.'
'तो क्या गांधार-राज की स्वीकृति नहीं रही थी इस विवाह के पीछे ?'
'स्वीकृति ?'गोपेश ने दुहराया ,'उसकी भी एक कहानी है ,'
 भीम उत्सुक थे ,'क्या हुआ था ,भइया  ?'
'काशिराज-कन्याओँ की गाथा तो जग विदित है .उनके नियोग की बात भी कोई दबी-छुपी नहीं .तात भीष्म के संरक्षण में वे पुत्र युवा हुये तो उनके विवाह की चिन्ता हुई .पितामह ने पात्रियों की खोज शुरू की . इधर तो सबको विदित था कि बड़े कुमार जन्मजात दृष्टिहीन हैं .किसी राजवंश को संदेशा न भेज सके . सुदूर गांधार देश की सर्वगुण-संपन्ना ,परम सुन्दरी ,राजकन्या .की ख्याति उन्होंने सुनी थी और यह भी कि अपनी तपस्या के बल से उसने सौ पुत्रों की माता होने का वर पाया था .उनकी महत्वाकाँक्षा जाग उठी .ज्येष्ठ कुमार के विवाह हेतु तुरंत प्रस्ताव भेज दिया .'
सब सुन रहे हैं .
'इनके अंधत्व से अनजान गांधार नरेश सुबल ने कुरु- वंश से जुड़ना तुरंत स्वीकार लिया.बाद में ...  विवाह के समय देखा..वर अंधा . .
वज्रपात हो गया था सारे परिवार पर  ! हैरान - परेशान पुर-जन  .हर जगह वही चर्चा...'
'हाँ, मैने सुना था -
 गांधार से आई एक दासी बता रही थी वे विवश थे ,पितामह के आदेश की अवहेलना करते तो  सर्वनाश को आमंत्रण देते .राज्य और प्रजा के संकट का निवारण करने को बेटी की बलि चढ़ा दी .
उधर उत्सव की तैयारियाँ हो रहीं थीं, आँसू भरे नयनों से नारियाँ मंगल गीत गा रहीं थी. उनके मन पर क्या बीत रही थी- कौन जानता है ,कन्यादान के समय माता-पिता के मुख पर छाई व्यथा को केवल उन्हीं के लोग समझ रहे थे . वर-पक्ष तो आनन्द मगन था .ऐसी कन्या जिसकी कामना कोई भी श्रेष्ठ समर्थ नरेश करे , ब्याह दी गई एक जन्मान्ध को ,जिसका व्यक्तित्व ही पराङ्-मुख था.'
' और तभी से शकुनि के मन में गाँठ पड़ गई .अपनी बहिन के लिये ,उसका साथ देने ,राज-पाट छोड़ कर यहाँ पड़ा रहता है .देख रहा है अपनी भगिनी और भागिनेयों का सुख ,इस परिवार के प्रति उसके मन में जो वितृष्णा भरी है वही करवा रही है यह सब .'
'गांधार कन्या तो बोलती कुछ..?'
स्तबध थी राजकुमारी . चिन्ता और दुख से हत  माता-पिता को देखा.अपनों के सर्वनाश का कारण नहीं बनना चाहती थी  उसी ने कहा ,'तात अब जो हो रहा है होने दीजिये ,मेरे लिये विधि ने यही लिखा होगा .एक मेरे कारण सब पर संकट न आये .'
भाई शकुनि बहुत उग्र हो उठा..
विनती -चिरौरी कर , प्रजा परिजन, माता-पिता का वास्ता दे कर उसे शान्त किया किसी तरह.
बहिन ने अपनी शपथ दिला दी ,'.मुझे स्वीकार है ,शान्ति से होने दो सारे कार्य.'
भाई ने सोच लिया आज कर लें मनमानी ,मैं भी देख लूँगा .कैसे चैन से रहते हैं .
'आग जल रही है मेरे भीतर. ऐसे शान्त नहीं होने की ..'
'भइया, मेरे घर का चैन नष्ट करोगे ?'
''पगली बहिन ,तेरे लिये और तेरी संतान के सुख के लिये कुछ भी करूँगा ,आज से यही मेरा व्रत .'
उद्विग्न राजकुमार कु-समय देख चुप रह गया
अंधे के साथ वधू-वेष में अपनी प्यारी बहिन को देख उसका हृदय विदीर्ण हो गया ..उसी दिन उस ने ठान लिया कि बहिन के हितों की रक्षा उसका दायित्व .और वहाँ  वह एक-एक को देख लेगा . निपट लेगा जो भी उसकी राह में आयेगा .काँटा निकालने को हर दाँव खेल जायेगा वह .'
'हाँ ,मित्र,समझ रहा हूँ ,' अर्जुन जो अब तक मौन थे .
पहली चोट तो यह कि अंधत्व के कारण ताऊ-श्री सिंहासनासीन न हो सके ..यहाँ भी गांधारी हार गई .'
'लेकिन इसमें हम-लोग कहाँ आते हैं ,हमारा क्या दोष ?'
'दोष किसका - पूरा वंश उस अन्याय का भागी है बंधु .उन राजकन्याओँ  का क्या दोष था ,जिन्हें हर अधिकार से वंचित रखा गया ?
  मनमानी की यह लंबी गाथा चली आ रही है -गांधारी भी अपवाद नहीं .'
काल-चक्र रुका है कभी!
*
 बाद में ब्याह कर आई  कुन्ती बुआ ने पुत्र-लाभ किया, गांधारी वहाँ भी मात खा गई .उसके पुत्रों के लिये युवराज का पद भी अलभ्य हो गया !
अपने भागिनेयों का वही एक  सगा बना रहा. माता-पिता की स्नेह- दृष्टि तो दूर,  कभी उनका लाड़-दुलार भी नहीं मिला उन्हें ,स्वाभाविक परिवार कहाँ मिला ! दास-दासियों से वह सब नहीं मिल सकता जो माता-पिता के सान्निध्य में मिलता  .'
मामा से अपनत्व मिला था ,उन्हीं ने जो संस्कार डाल दिये.प्रारंभ से द्वेष के बीज रोप दिये .'
'अंधे को और क्या सूझता ,सौ पुत्र पैदा करने में लगे रहे.'
'और एक पुत्री भी तो..'
पालन-पोषण का दायित्व दास-दासियों का . .
शकुनि के लिये सब-कुछ असहनीय हो उठा था.
'और उसके लिये हम सब अपने थे ही कब ?किसी भी कीमत पर भागिनेयों के हित-संपादन के लिये ही आया था.उसी ने दुर्योधन की महत्वाकांक्षाओं को जगा कर सदा उसे उकसाया है .'
वातावरण भारी हो उठा था.
'बचपन से खिलाता आया है .अब भी वही खिला रहा है उन सब को .'
*
20.
पांडवों को अपने मार्ग से हटाने का पूरा प्रयत्न किया गया पर विधि का विधान कुछ और ही था.तात विदुर की बुद्धि सब भाँपती और निराकरण करती रही .पितामह सब जानते - देखते  विवश रहे..
लाक्षागृह की घटना भी इसी योजना का अंग थी.
स्वयंवर में पांचाली को जीत कर आये पांडवों का भारी स्वागत किया गया, लेकिन मनों में जो मालिन्य घुला था वह कहाँ धुलता .ऊपरी दिखावा चलता रहा .
दुर्योधन को युवराज पद दिया जा चुका था  .
अब बीहड़ खांडव वन का आधिपत्य पांडवों को दे कर चलता करो .
सब के पीछे शकुनि की चाल काम कर रही थी .
मामा-भांजे की सलाह पर स्वीकृति की मोहर भर लगवाना शेष रह जाता  ,जिसके लिये राजा धृतराष्ट्र का पुत्र-मोह पर्याप्त था .
और पितामह भीष्म ? उनका  सिंहासन के प्रति निष्ठा का व्रत .सिंहासन पर धृतराष्ट्र विराजे हैं ,और उनके साथ युवराज  दुर्योधन .मतान्तर का प्रश्न ही नहीं उठता !
 कर्ण, दुर्योधन के उपकारों के बोझ तले ,उसका मित्र बना सदा उसके अनुकूल रहने को बाध्य .अर्जुन की प्रतिद्वंद्विता में जानबूझ कर उसे  नीचा दिखाया जाता रहा .द्रौपदी के अपमान का दंश अंतर में समेटे ,कौरवों के अनुकूल रहना उसकी विवशता थी.  दुर्योधन साथ न देता तो इस मंच पर कहाँ होता वह ?
एक बार युवराज बनने के बाद उन लोगों ने निश्चय कर लिया कि अब किसी भी प्रकार राज छोड़ना नहीं है.
इन पांडवों को क्या अधिकार कि कुरुवंश के राजसिंहासन पर बैठें ?अधिकार तुम्हारे पिता का था ,चलो किसी कारणवश छोटे भाई को दे दिया ,लेकिन वे तो विरक्त हो वन को चले गये वहीं मर-खप गये .फिर तो सिंहासन तुम्हारा था .
वे पाँचो ?कोई अपने पिता का पुत्र  नहीं ,किस-किस की संतान .किसी एक की भी नहीं . कहाँ रहे वे कुरु कुल के वंशज?तुम ,सुयोधन अपने पिता के पुत्र हो .राजा के अंश हो उन्हीं के वंशज !
और हमारे पितामह ?वे उन्हीं की ओर झुके रहते हैं .रहा वह अहीर छोरा कृष्ण ,कहीं टिक कर रहने का ठिकाना नहीं .कौन सा गुण है उसमें ,जनम का कपटी .पता नहीं लोग क्यों सिर चढ़ाये रहते हैं ?'
' भाई दिन-रात बहिन को देखता है.  कैसे स्वाभाविक रह सकता है ?'कृष्ण का कहना था,'अपने ढंग से उनका हित- संपादन कर रहा है .'
 दुर्योधन-मंडली की योजना क्रियन्वित होनी ही थी .
खांडव वन --बीहड़ प्रदेश .किसी के रहने योग्य स्थान था क्या ?
पर धृतराष्ट्र ने बड़े प्रेमपूर्वक ,बहुत सद्भावना जताते हुये .पांडवों को वह स्थान प्रदान कर दिया .
युधिष्ठिर ने सदा के समान नत शीश ताऊ-श्री का आदेश शिरोधार्य किया .
पर कृष्ण जैसा बांधव जिसके साथ हो उसके काम रुके हैं कभी !
*
(क्रमशः)


बुधवार, 14 दिसंबर 2011

रट के आई हैं !



मौसम बदल रहा था ।ऐसे दिनों में प्रायः ही ज़ुकाम की शिकायत हो जाती है ।
जब क्लास   में खड़े होकर बोलना पड़ता है तो गले में एकदम सुरसुरी और अटकाव के मारे बोल निकलना मुश्किल .
'कुछ लेते क्यों नहीं' कहने की विज्ञापनी परंपरा है सो
एक मित्र ने कहा ने कहा ,' बढ़ा क्यों रही हो ?ऐसे ये ठीक होनेवाला नहीं ।अपनी तो रोज़ गले  की कवायद होती है ।  दवा ले लो ।'
 मैंने कहा ,'एलोपैथी की दवा से एकदम खुश्क हो जाता है , लगता है सब अन्दर भर गया ।'
'एलोपैथी क्यों ?इधर कॉलेज के पीछे इधर वाली गली में डॉ. रमेश बैठते हैं ।होमियोपैथी के हैंं ।
भई ,हमें तो उनकी दवा खूब सूट करती है।'

बात तुक की लगी. अगला  विषय काव्य-शास्त्र ,एकदम ठोस और भारी ! गला बीच में अड़ जाए, तो पढ़नेवालों का ध्यान  इधर- उधर भागेगा,  कानाफूसी शुरू हो जाएगी  , मुझे और ज़ोर से बोलना पड़ेगा .
और सबसे बुरी बात पिछले सारे रिफ़रेन्सेज़ उनके दिमाग़ से गोल - आगे पाठ ,पीठे सपाट !
अभी-अभी पत्रकारिता  की क्लास ले कर आई , गले -गले तक चोक हो गई.
इन्टरवल के बाद एक पीरियड फ़्री था .
चलो, ले ही ली जाय दवा .
डॉक्टर के पास कई मरीज़ बैठे थे ,कुछ  तो  अपनी छात्रायें ही ,पास पड़ता है न !
एक महिला अपनी 4-5 साल की बच्ची को लाईं थीं -नाम मेघना ,पेट साफ़ न होने की शिकायत.
बोलीं,' थोड़ी-थोड़ी सी होती है और सख़्त भी .'
 चट् से डाक्टर  बोले ,'आपने नाम भी तो  ऐसा ही रखा है .' लक्ष्य  वही  प्यारी-सी बच्ची   मेघना नामवाली -
(समझ गये होंगे आप .जैसे गाय का गोबर ,घोड़े की लीद ,  बकरी की मेंगनी)!
महिला  बेचारी चुप !पर्चा लेकर चुपचाप उठ गईं .
लड़कियाँ लिहाज़ के मारे पीछे हो गईं ,मुझे आगे कर दिया .
डॉ. के पास बैठ कर फटाफट् हाल कह सुनाया ।उन्होंने ध्यान से हमारी ओर देखा बोले ,' आप क्या रट के आई हैं ?धीरे धीरे बताइये ,फिर से ..'
मैं तो सन्न!
उफ़ , क्या करूँ इस जल्दी बोलने की आदत का !
लाख कोशिश की  कभी कंट्रोल में नहीं आई  !
हमारी छात्रायें कुछ  मुँह घुमाये थीं मुस्करा रही होंगी ,आँख उठा कर देखने की हिम्मत नहीं पड़ी .

फिर से धीरे-धीरे हाल बताया और दवा ले कर भागी .
पर वहाँ से भागने से क्या होता ,क्लास में तो वही लोग हाज़िर होंगे  अपने संगी-साथियों सहित !
बचाव कहीं नहीं - जम कर करना पड़ेगा सामना !
*

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

कृष्ण-सखी .- 17 & 18 .

*

17.
कृष्ण का चक्कर इस बार अपेक्षाकृत विलंब से लगा था.
चिंता की एक लकीर भाइयों की मुद्रा पर  स्पष्ट झलक रही थी.
'भीम भैया ,  अर्जुन अब की बार अपनी भाभी  से मिल आये .'
वृकोदर एकदम बोल उठे,'  हिडिम्बा से ?'
नकुल-सहदेव आगे खिसक आये ,'कब?कहाँ हैं वे सब, कैसे हैं ?'
'पुत्र-जन्म पर तो भीम गये थे . सब ने भेटें भेजीं थी -माता-पुत्र दोनों के लिये ,पांडवों का सबसे बड़ा पुत्र है घटोत्कच  '
'क्यों भीम ,कब मिल आते हो जा कर हम लोगों को पता ही नहीं चलता .'
'यों ही घूमता फिरता चला जाता हूँ ,बताना क्या !'
कौतुक झलक उठा कृष्णा के मुख पर ,'कैसा था तुम्हारा पुत्र ?
'सिर पर केश नहीं थे उसके ,चिकने घड़े जैसा !'
'तभी यह नाम रख दिया .'
सब  मुस्करा रहे हैं .
युधिष्ठिर से रहा नहीं गया .' युवा हो गया है घटोत्कच तो ,उसका विवाह ..'
'विवाह ?अरे वो तो एक किशोर पुत्र का पिता है बर्बरीक का. भीम तुम्हारे पोते का नाम यही न ?'
'सब पता है .बस इधऱ कुछ समय से नहीं जा पाया .'
'अब पुत्र के पुत्र से मिेले हैं अर्जुन . घटोत्कच का पुत्र उससे भी बढ़कर .कैसा विशाल काय .मत्त गजराज को उठा कर फेंक दे ऐसा बलशाली .'
'इतने कम समय में ..दो-दो पीढि़याँ ..!'द्रौपदी विस्मित है .
'दैत्य जाति में बच्चे जल्दी  विकसित और परिपक्व हो जाते हैं .
'चाचा अर्जुन से तीरंदाज़ी के दाँव भी सीखे हैं. '
 समय पर हम सबके सहायक होंगे ,आगे जो होनेवाला है उसके लिये इन सब का सहयोग आवश्यक है .
*
फिर चलता है  ,कृष्ण-कृष्णा के वार्तालाप का क्रम .
सबसे निवृत्त होकर निश्चित स्थान पर आ जमते हैं दोनो .इसी  की अविकल  प्रतीक्षा रहती है पांचाली को .
दुनिया भर की बातें ,पर मुख्य केन्द्र-बिन्दु अर्जुन .
सखी की उदासी दूर करने का हर प्रयत्न करते हैं माधव .
 'इस साधना से लाभान्वित हो रहा है मेरा मित्र .परिपक्व होता जा रहा है ...और दुख ,मन की एक अवस्था मात्र ! बदलती रहती है वह भी .'
अभी अपरिपक्व हैं ,पार्थ?और बहुतों से तो ..'
 .''बहुतों से तुलना मत करो. उसकी बात औरों की नहीं है सखी .समझो किसमें कितना आगे जाने की सामर्थ्य है .. वैसे तो पूर्ण यहाँ है ही कौन ? नर - तन पाया  है, जितना  उपलब्ध कर सके ,'
'अभी  उनमें कुछ  रह गया है अधूरा ?'
कभी पूरी होती है शिक्षा ! इतने जन्म बेकार लिये जाते  हैं क्या ?एक में ही सब कुछ सीख ले ,समर्थ हो जाये तो नारायण ही न बन जाय !"
कुछ देर चुप रही सोचती-सी.
फिर एकदम पूछ बैठी ,'और तुम नारायण हो क्या ?
सकपका गये मुरारी ,'मैं ,नारायण ?'
फिर हँसते हुये बोले ,'तुम भी अच्छी हँसी उड़ा लेती हो .होता मैं ,तो काहे को यहाँ धरती पर भटकने चला आता?..'
'तुम्हीं जानो .कोई ठिकाना नही तुम्हारा ,सबको बहकाये रहते हो .हाँ ,तो अर्जुन को क्या अर्जित करना है ?'
'बड़ी जल्दी विचलित हो जाता है .अभी कच्चा है तुम्हारा पति .'
'सो तो है .सब मनाते रहे और वे दंड स्वीकार कर चले गये ..'फिर एक उसाँस भऱ कर  धीरे से बोली , 'दंड ले कर गये कि दे कर ..'
जनार्दन ने सुन लिया पर अपनी बात कहते रहे -
'शस्त्र में निपुण है ,पर जो अपनी साधना के बल उससे भी कुशल हो गये ,शरीर से पूर्ण है पर वहाँ भी किसी और की लब्धि उससे अधिक तो है न !
' संसार में  कुछ ऐसे  भी होते हैं जिनके अपने भी पराये रहें और  पात्रता और सामर्थ्य होते हुये भी तिरस्कृत और वंचित रह कर भी ,पार्थ के समतुल्य हो रहें .. यहाँ तो  औरों की कीमत पर अपनों को चढ़ाते हैं लोग. ऐसे में कहीं छिद्र तो रह ही जाता है  .हटा लेने दो ऊपर चढ़ी  धुंध ,उसकी अपनी  तेजस्विता निखर आये  !'
कृष्ण का संकेत समझ रही है पाँचाली,तेज में नैपुण्य में स्वार्जित उपलब्धि , केवल जन्म की बाधा, नहीं तो कहाँ होता ,कहाँ जा कर रुकता !
' जानती हूँ पक्षपात किया गया था, कितनी बार. धनुर्विद्या में प्रिय शिष्य के नाते और औरों से व्यवहार में भी... मुझे दुख है एकलव्य के लिये और ...'.
'रुक क्यों गईँ पांचाली, बात पूरी कर दो.झिझक काहे की ? कह डालो और..  कर्ण के लिये. .'
अनायास ही गहरी सांस ले उठी वह ,' हाँ ,जनार्दन ,उसके लिये भी ...'
'तप करने दो पार्थ को ,अरण्यों में घूम-घूम कर सिद्धों ,साधकों -तपस्वियों के साथ रह बहुत कुछ अर्जन  कर रहा है. '
''अभी नीति ,दर्शन अध्यात्म के कितने पाठ शेष रहे  होंगे .राज परिवार में ,जिन गुरु से  शिक्षा पाई उनके गुरुत्व में कुछ कसर रही होगी,जिन परिजनों के बीच रहा उनके संस्कार कितने समृद्ध और प्रभावी थे तुम्हें तो ज्ञात है ,उनकी दुर्बलताओं ने जो छाया डाली - व्यक्तित्व पर बहुत प्रभाव रहता है ,संस्कारों को छा लेता है कभी-कभी    .'
'पर इसमें पार्थ का क्या दोष ?'
 दोष न होते हुये भी ,अनीति का लाभ तो लिया ,परोक्ष ही सही..'
सिर झुकाये उलझन में पड़ी है वह .
कृष्ण ने कहा ,' वह नहीं जाता तो आगे कुछ होता क्या ? '
वह कुछ और ही सोच रही थी,
'..और मेरा परिष्कार  ,मैं जहाँ की तहाँ ..? '
'कहाँ , जहाँ के तहाँ ! तुमसे तो मैं भी भय खाता हूँ याज्ञसेनी , खरी हो कर निकलीं हो तुम .सब को चौंका देती हो -ईर्ष्या होती है मझे तुमसे.'
'खरी ?रहने दो .कितनी गलतियाँ हुईं . पछतावा होता है कभी-कभी .'
'कौन निर्दोष रह सका है यहाँ ?हम सभी जिस चक्र में घूम रहे हैं उसकी गति वक्र है .सीधा सोच भी घूम जाता है कभी-कभी. और फिर धरती का जीवन  धूल से कैसे बचा रहेगा  .जो दर्पण को भी धुँधला दे,'
'और तुम, तुम्हारे ऊपर ?'
 'बचा कहाँ है कोई !' हँस पड़े जनार्दन,' मैं तो सब झाड़-फटकार कर फिर जैसा का तैसा . देखो न चोरी झूठ कपट , और क्या-क्या दोष नहीं लगा ! .'
 'आगे क्यों चुप हो गये  ,आती-जाती गोप-बालाओं को छेड़ना ,छीना-झपटी. और.. और तुम जानो .'
'बस,बस . सबको आनन्द बाँटता था .ऊपर से  ऊखल से बँध कर पिटता था .'
दोनों खिलखिला कर हँस पड़े .
'तुम्हारी लीला तुम्हीं जानो गोविन्द ,औरों को फंसा कर स्वयं तमाशा देखनेवाले ...'
 'पर तुमसे कहाँ जीत पाया सखी ? अग्निसंभवा हो , दाह से निकल कर तप रही हो  लगातार    .''
'  गलतियाँ कीं मैंने भी , पर उससे उबरने का कोई रास्ता नहीं .'
'जिस निमित्त जन्मी हो  ,पूरा करना है .परिस्थितियाँ ले जा रही हों जब ,तब कोई क्या करे !अपना स्वार्थ किसी की बलि दे कर तो नहीं साधा तुमने !  उसे अपना तप पूरा कर लेने दो,  इस वनवास के बीच संत-मनीषियों के समागम से ...और यात्रा तो वैसे भी कितना कुछ दिखाती-सिखाती है जीवन के कितने पाठ पढ़ने हैं अभी ,'
'यह बारह वर्ष का दंड उसे घिस-घिस कर माँज रहा है , उसके उन्नयन के साथ भविष्य की संभावनाओं के द्वार खोल रहा है .ये सब तुम्हारे पक्ष में ,द्रौपदी .'
'उर्वशी का मोहजाल तोड़ दे जो,  उसका और कितना परिष्कार शेष रह गया ?'
कृष्ण ने दोहराया - 'उर्वशी का मोह जाल ?'
'क्यों ,उसकी प्रणय-याचना को स्वीकार कहाँ किया पार्थ ने ,उलटे शाप सिर धर लिया .'
'एक पहेली है यह भी .'
'इसमें क्या है  समझने को?उनके पूर्वजों में उर्वशी का नाम भी है .'
'फिर वही ,पूर्वजों का अभिमान ,वंश की चर्चा ..'
तो इसमें गलत क्या ?'
'तो फिर सही बात बता ही दूँ तुम्हें .लेकिन तुम्हीं तक सीमित रहे .'
' चलो यही सही .'
*
 ' जो हुआ उसे अब पूरा ही जान लो पांचाली -
 उर्वशी को सूचना मिली थी  अर्जुन अतिथि बनकर आये हैं .उसने उनसे मिलने की इच्छा प्रकट की .'
सिर हिलाया द्रौपदी ने -' मालूम है.'
इन्द्र ने कहा ,'हाँ ,हाँ जाओ ,अवश्य मिलो .'
फिर बोले ,
'लगता है तुम्हारा मन उस पर आ गया है  ?अभिसार का प्रबंध कर दूँ ?जानती हो वह  मेरा पुत्र  है ?'
 'जानती हूँ ,पर  तुम नहीं समझ पाओगे पुरंदर .अपने ही ढंग से सोचते हो न !लेकिन  अप्सरायें भी नारी होती हैं .'
साँझ पड़े इन्द्र की राज-सभा से लौटे थे अर्जुन .
परिचारिका ने निवेदन किया ,'देवी उर्वशी पधारी हैं .'
स्वागत हेतु कक्ष के द्वार तक बढ़ आये.'
चिर यौवना ,सुसज्जिता दिव्यसुन्दरी . अर्जुन विभ्रमित हो गये .
नेत्र झुका लिये बोले ,'आपने कष्ट किया ,आज्ञा देतीं मैं स्वयं उपस्थित हो जाता .'
'अतिथि हो .देखना चाहती थी . देवाधिपति के पुत्र को .,,कैसे हो पार्थ ?
'देवराज के आतिथ्य में स्वर्गोपम सुख उपलब्ध हैं .काहे की द्विधा  !'
'देवराज ? वे आपके पिता हैं ,.'
'जानता हूँ ,सौभाग्य है मेरा !आप भी मेरे वंश की पूर्वजा ,अब यहाँ हैं तो क्या हुआ
मातृ-भाव स्वीकार करें .'
वे चरण छूने झुके .
उर्वशी ने बरज दिया .
' नहीं .वे संबंध और वे आचार यहाँ के नहीं. हमारे लिये विहित नहीं कि सदा को ऐसे संबंध जोड़े रहें  .हम व्यक्ति के रूप में स्वतंत्र अस्तित्व हैं - संबंधों से बाध्य नहीं .सांसारिकता से निरपेक्ष .जन्म-मरण से परे !तुम मृत्यु-धर्मा जन हर बार नये रूप में आते हो .सारे संबंध बदल जाते हैं .और पूर्वजा मैं तुम्हारी नहीं .'
'महाराज विक्रम...'
'तुम उनके वंशज नहीं अर्जुन ,कोई रक्त-संबंध नहीं तुम्हारा उनसे ,या मुझसे .उस परंपरा में नहीं आते तुम . सर्व विदित है कि इस वंश से तुम्हारे तार नहीं जुड़ते .केवल आरोपण कर दिया गया .दो-दो पीढ़ियों के व्यतिक्रम के बाद भी .एक पीढ़ी  व्यास की संतानों की और उसके बाद तुम तो पांडु के भी नहीं ,मधवा के औरस हो .'
अर्जुन सिर झुकाये सुनते रहे .
'तुम्हारे विषय में सुना था इसलिये उत्सुक हो उठी .'
'प्रणत हूँ देवि,'
'और पार्थ ,धरती के नियम यहाँ नहीं चलते .वहाँ भी एक जन्म की माँ ,किसी और जन्म में कुछ और हो जाती है. किसी को भान भी नहीं होता .छोड़ो मैं वह सब कहने-सुनने नहीं आई .
सुना था तुमने अपनी पत्नी को भाइयों के साथ बाँट लिया .चलो वह भी सही जिसे जिसमे संतोष !'
'माता की आज्ञा हुई थी , देवि.'
'हाँ ,माता की आज्ञा !और अनेक कार्य भी माता की आज्ञा से किये थे क्या ?'
' हम विवश थे ,...'
'लेकिन भरी सभा में अपनी वीर्यशुल्का पत्नी को घसीटे जाते और विवस्त्र किये जाते कैसे सहन कर सके ?तुम्हारा शौर्य कहाँ खो गया था? '
' उस समय नीति और मर्यादा का प्रश्न था..धर्म आड़े आ गया ...'
धर्म और मर्यादा की बातें? जिस पौरुष पर ,सब कुछ निर्भर हैं उसे लज्जित कर दिया तुमने !
उर्वशी हँसी ,'अनीति का खुला खेल और तुम नीति की आड़ लिये बैठे रहो . मर्यादा के नाम पर सारी मर्यादायें भंग के साक्षी रह हाथ पर हाथ धरे रहो.   फिर उसी के प्रतिकार  की शपथ उठाओ .अच्छा नाटक है ! मैंने धरती पर रह कर बहुत कुछ देखा लेकिन पौरुष का ऐसा अधःपतन नहीं देखा था किश्रेष्ठ वीर कहलानेवाले नपुंसक बने ऐसे अत्याचार चुप देखते रहें  . .
'.तुम्हारी पत्नी ,पाँच-पाँच की पत्नी .उसके सम्मान की रक्षा नहीं कर सके .खिलौना बना कर रखा जाता है वहाँ पत्नी को .केवल, मैं नहीं अनेक अप्सरायें पौरुष से लुब्ध हो कर गईं पर मिला वही ,अधिकार हीन पत्नीत्व .वह दुख मैं भी झेल  चुकी हूँ .असहनीय हो गया तो चली आई .'
वह कहते-कहते रुक गई . अर्जुन पर प्रतिक्रिया देखती रही.
  उद्वेलित था पर,कुछ बोला नहीं .
उर्वशी अपनी बात स्पष्ट करती रही , 'उस धरती पर रही हूँ ,एक राजवंश में रानी का पद पा कर .सब देख चुकी हूँ .पत्नी पर स्वत्व की बात जहाँ आये उचित-अनुचित का कोई विचार नहीं .'
क्या कहें अर्जुन !
'क्यों पार्थ ,उस सभा में अपनी विवाहिता के प्रति ,एक अवश नारी के प्रति इतना जघन्य व्यवहार कैसे सहन कर सके तुम ?'
'पांचाली का दाँव हार गये थे  .विवश थे हम ,वह उनकी दासी हो चुकी थी .'
'अपने खेल का दाँव लगा हार गये उसे  .फिर  पत्नी कहाँ रही  वह ,औरों की अधिकृता ,उनकी संपति ,वे जो चाहे  करें  ?'
सिर झुका हुआ  कहने को कुछ नहीं ,
' सामर्थ्य दिखाने का  एक माध्यम  नारी ही बचती है ? '
'जैसे का-पुरुष बने  देखते रहे तुम उस निर्लज्ज अपमान को ,पत्नी को पराई दासी बना कर एकदम तटस्थ. अब वैसे ही क्लैव्य को भोगो . नपुंसक हो रहो तुम .जानो कि विवश होने  और समर्थ होने में कितना अंतर होता है .साक्षात् अनुभव कर देखो .'
अति विचलित ,लज्जित पार्थ !
वासुदेव की याद आई .उस गहन वाणी के कुछ शब्द मन में गूँज उठे 'जो होता है  अच्छे के लिये ही .'
शीश झुका कर स्वीकार लिया था पार्थ ने.
कृष्ण कुछ रुके ,एक दीर्घ श्वास छोड़ा पांचाली ने .
मौन में  भारी पल बीतते रहे .
18.
'इस प्रकरण में तुम्हारी स्वाकारोक्ति सुनना चाहता हूँ . कर सकोगी, सखी ?'
'हाँ ,पूछो !'
' सभा के बीच, उस विषम अवस्था में  क्या तुम्हारे मन में यह भाव आया था ?''
'कौन सा भाव  ?
'कि यह व्यवहार का-पुरुष का ,क्लैव्य का द्योतक है..और ऐसा बहुत- कुछ ?'
'मन ही मन में बहुत कुछ  उमड़ा  था . . दारुण दुःसह अपमान के समय मैं बिलकुल अकेली रह गई थी.'
द्रौपदी रुकी ,एक लंबी साँस खींची फिर बोलने लगी ,
'बसे प्रश्न करती रही .अपनी शंकाओं का निवारण चाहती थी .पर किसी के मुख से आवाज़ न निकली .'
' निकलती कैसे ,सब को अपनी नाक बचाने की पड़ी थी .तुम्हारे पति भी....छोड़ो यह सब . बताओ कि तुमने क्या सोचा ?'
'उस समय सबसे असंतोष ,शिकायतें ,क्रोध और आरोप के सिवा कुछ नहीं सूझ रहा था ,जनार्दन !..
सारी इच्छायें समेट लीं, मन पर घोर संयम कर  पाँचों में ईमानदारी से अपने आप को बाँट दिया .इनमें कोई भेद न पनपे इसलिये ,केवल इसीलिये कभी अपने मन की बात नहीं कह सकी .
एक से कहूँ कि सबसे ,बस इसी ऊहापोह में झेलती रही अकेली .और अब मुझे उछाल कर  सब चुप हैं. मन में आक्रोश जाग रहा था.'
' मस्तिष्क घूम गया था मेरा ,मन में क्या -क्या उमड़ता है -उचित-अनुचित का  कोई विचार नहीं . कोई मर्यादा नहीं . चाहे जिस ओर दौड़ जाता है .और गोविन्द, उस संकट - काल में इसकी गति  सौ-गुनी तीव्र  हो उठी थी.'
कृष्ण सुन रहे हैं .सहानुभूति से उमड़ रहा है मन .
'...बस जाने क्या-क्या मन  में आता रहा .मुख से फिर भी नहीं बोली -एक  पत्नी  भरे समाज में पतियों को कैसे लज्जित करती !
और  सबसे अधिक शिकायत अर्जुन से कि उसी के कारण मैं कहाँ से कहाँ पहुँच गई ,कैसा पुरुष कि वीर्यशुल्क देकर लाया और अब निर्वीर्य बना सिर झुकाये बैठा है .इसी के कारण मैंने इन चारों को स्वीकारा और अब यही सब एक ,और मैं केवल एक गोट ,जिसे कैसे भी उछालते् रहो .
 यह मेरा पति --  .पुरुषत्व रहित  - क्लीव .'
पार्थ की ओर बस एक बार दृष्टि डाली थी.'
उस समय तुम्हारी दृष्टि  बहुत कुछ कह गई.अब भी उसके अंतर में खटक रही  है.पश्चाताप में दग्ध हो रहा है अर्जुन .,किसी से कुछ कह नहीं सकता .  .
'हाँ, पांचाली,' तुम्हारी तीव्र मनोवेदना उर्वशी के स्वरों में प्रतिफलित हुई और  नपुंसकता उसके हिस्से लिख गई !'
पांचाली के नत- मुख पर  गहन उदासी ,
'अब मत सोचो ,सखी ,मैं हूँ न .तुम्हारा बाँधव . कह डालो जो मन में है .हल्की हो लो .'
'नहीं ,और किसी से कुछ नहीं कहना है मुझे .कोई कुछ नहीं कर सकता .बस तुम ,और कोई नहीं .किसी के कांधे सिर धर नहीं  रो पाती .सब शामिल थे उस दुरभिसंधि में.सब !मेरा किसी ने नहीं सोचा .मुझे एक अस्त्र बनाये रहे  .अपने पराए सब .   मीत, मैं बिलकुल अकेली हूँ   बस एक तुम ..'
कृष्ण चुप .
किसी के सामने नहीं कह सकी पर  ,कृष्ण के सामने स्वयं को रोक नहीं पाती ,सारा संयम बह जाता है .ढ़ता भरभरा कर बिखरने लगती है .
'और क्या-क्या देखना रह गया है ?'
 'मत कहो सखी ,ऐसे मत कहो .अभी जीवन बहुत बाकी है .जब कहती हो क्या-क्या देखना रह गया , कोई अदृष्ट व्यंग्य से हँस देता है !'
 द्रौपदी फिर कह उठी-
' यज्ञ की अग्नि से प्रकटी हूँ .जीवन भर तपन ही मेरे हिस्से  आई . क्या इसीलिये इतनी विडंबनायें मेरे पल्ले पड़ीं . सहज जीवन मैं नहीं जी सकती .असामान्य हो गई हूँ !एक पति ,परिवार ,कुछ संततियाँ स्वाभाविक नारी जीवन,क्या मेरे हिस्से में नहीं है .इतनी अशान्ति ,इतनी विभाजित होकर रहना ही क्या मेरी नियति है ? एक सामान्य नारी की तरह मुझे भी सुख- दुख व्यापते हैं ,मन में कामनाओं की तरंगें उठती हँ ,मैं भी मनुष्य हूँ , मुझमें भी दुर्बलतायें हैं.'
ओह, वह दिन !
'किसी तरह चैन नहीं पड़ता  .हर पल लगता मुझ एक- वस्त्रा को केशों से घसीट  सभा के मध्य खड़ा कर दिया गया है.'
वस्त्र खींच रहा है कोई .दोनों बाहों से देह लपेटे मैं टेर रही हूँ .उससे बचने को उस सीमित घेरे में बार-बार  इधर- उधर भाग रही हूँ . देह पर एक वस्त्र ,वह भी अस्त-व्यस्त और उसे भी  वह उद्धत खींच रहा है .कितनी दृष्टियाँ इधऱ ही लगी हैं ,विद्रूप भरी हँसी कितने चेहरों पर ... मेरी देह चीर रही है  .
उधऱ वे पाँचो,मेरे पति, सिर झुकाये बैठे हैं .
आज भी मैं नहीं समझ पाती कि कि पत्नी तो पत्नी ,सी भी नारी का वस्त्र- हरण होता रहे और पुरुष बने सब चुप बैठे देखते रहें  .यह कैसी नीति कैसी मर्यादा  ,कैसा धर्म ? जो  जघन्य बर्बरता का प्रतिरोध न कर सके  .मर्यादा एक आड़ बन जाये  .क्षत्रिय की शक्ति और सामर्थ्य क्या इसी लिये हैं ?..न्याय-नीति का निर्लज्ज उल्लंघन हो रहा है
और न्याय-नीति की आड़ ले सब चुप देख रहे हैं ...'
चुप हो गई थकी-सी .कुछ रुकी .फिर बोलने लगी ,
' ध्यान आता है तो अब  भी कितनी उद्वेलित हो जाती हूँ..   बार-बार उभर आता है वही सब .लगता है आज भी
बचने का यत्न करती, भागती  रही हूँ व्याकुल ....कोई बचा ले ! कोई रोके !
कोई नहीं बढ़ता. गुरु- जनों को नाम ले- ले कर टेर रही हूँ ,. कोई प्रत्युत्तर नहीं . सब मौन दर्शक !क्या करे अकेली लाचार ,चारों ओर से घिरी हुई !
और तब अंतरतम से  दारुण पुकार उठती है ,' हे मुरारी , कहाँ हो ,बस तुम्हीं हो मेरा अंतिम आश्रय ,
यहाँ कोई नहीं है मेरा,मेरे लिये किसी का दायित्व नहीं .मैं एक खिलौना हूँ , जीवित नारी देह नहीं . जनार्दनबस तुम हो !
अगर तुम भी  नहीं बचाते तो  वहीं सिर पटक कर प्राण देना  शेष रह गया था. '
गहरी साँस ली उसने
' पर आगे  नहीं चली किसी की ,एक वस्त्रा नारी अनंतवस्त्रा बन गई वह लघु वस्त्र अपरिसीम ,अमित-रूप  होने लगा .और वस्त्र-हरण करता हाथ निष्क्रिय संवेदना शून्य हो गया .
और  सब जिससे से खेल रहे थे, नारी की लाज आवृत्त कर सका ,सही अर्थों में पुरुष एक ही था !'
द्रौपदी चुप है .
 अब कहने को कुछ  नहीं !
*
कहे भी तो क्या कभी द्रुपद पिता की चाल, कभी कुन्ती माता की नीति ,कभी पतियों के दाँव. अपने हित साधन के लिए एक मोहरा बना लिया उन सब ने जो अपने थे ..
नहीं याद करना चाहती ..रातों की नींद, दिन का चैन  खो जाता है  .  बस, एक ने साथ दिया.  हर विषम क्षण में ,उसे ही बार-बार टेरता है अशान्त मन !
और जब पांचाली का मन कुछ स्थिर हुआ तो जनार्दन ने कहा  -
'याज्ञसेनी .आज एक और बात तुमसे नहीं छिपाऊँगा .'
कृष्ण का मुख देख रही है वह -
' मेरा मित्र पार्थ जीवन भर पश्चाताप की अग्नि में दग्ध होता रहा .तुम पर जो कुछ पड़ा उसका उत्तरदायी स्वयं को मानता रहा , .झेल लेगा यह शाप भी .
उसकी स्थिति की कठिनता तो देखो,  कह नहीं सकता . प्रतिरोध नहीं कर सकता  .
बस , भाग रहा है अधिक से अधिक . स्वयं को तपा रहा है .तुम्हारे सामने आते कैसा उद्वेग !
जो स्वयं संतप्त हो किसी को कैसे प्रसन्न करे ?'
खूब समझती है पांचाली .पति-पत्नी हैं - पर  एक दूसरे से कभी मन की बात नहीं कह पाते .
नहीं कह सकते .
निरंतर एक व्यवधान ,एक भय - उनके भाइयों और उसके  पतियों के बीच कहीं किसी संशय का बीजारोपण न हो जाये  !
इस विचित्र विधान  की दुरभिसंधियों में हम दोनों ही मोहरे बने हैं  .
ओ,पार्थ, मैं समझ रही हूँ तुम्हारा मनस्ताप !
*
(क्रमशः)