गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

एक जानकारी

"...न ही इस बात की कोई जानकारी है कि लड़कपन के उस दौर के बाद फिर कभी राधा से उनकी मुलाकात भी हुई या नहीं।"


चंद्रभूषण जी (पहलू)की 26 नवंबर की पोस्ट में उपरोक्त पंक्ति पढ़ी और अपना कमेंट देना चाहा ,पर इतना बड़ा हो गया कि वहाँ देना उचित नहीं लगा .अपने ही ब्लाग पर लिखे ले रही हूँ -

भारतीय- मानस इतना भी अनुदार नहीं ,कि लंबी तपन के बाद कुछ शीतल छींटे भी वर्जित कर दे .सूर ने कई पदों में यह आभास दिया है - सूर्यग्रहण के अवसर पर ,प्रभास तीर्थ आई, ब्रज की टोली को देख रुक्मिणी पूछती हैं - 'तुम्हरे बालापन की जोरी?' और कृष्ण दिखाते है ,'वह युवति-वृन्द मँह नील वसन तन गोरी ,.'

फिर राधा-रुकमिनि कैसे भेंटीं - 'बहुत दिनन की बिछुरी जैसे एक बाप की बेटी '.

कथाओं में यह भी कि रुक्मिणी राधा को आमंत्रित करती हैं . रुक्मिणी स्वयं शयन- पूर्व उनके लिए दूध लेकर जाती है- गर्म दूध ,राधा चुपचाप पी लेती है किन्तु छाले कृष्ण के चरणों में उभऱ आते हैं .

इसी को पल्लवित करते हुए मैंने उस भेंट की झाँकी  प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया था -

तुम्हरे बालापन की जोरी.

रुकमिन बूझति सिरी कृष्ण सों कहाँ गोप की छोरी ?'

'उत देखो उत सागर तीरे नील वसन तन गोरी ,

सो बृसभान किसोरी !'

सूरज ग्रहन न्हाय आए तीरथ प्रभास ब्रिजवासी ,

देखत पुरी स्याम सुन्दर की विस्मित भरि भरि आँखी!

'इहै अहीरन करत रही पिय, तोर खिलौना चोरी ?'

हँसे कृष्ण ,'हौं झूठ लगावत रह्यो मातु सों खोरी !

एही मिस घर आय राधिका मोसों रार मचावे ।

मैया मोको बरजै ओहि का हथ पकरि बैठावे ।'

उतरि भवन सों चली रुकमिनी ,राधा सों मिलि भेंटी ,

करि मनुहार न्योति आई अपुनो अभिमान समेटी !

महलन की संपदा देखि चकराय जायगी ग्वारी

मणि पाटंबर रानिन के लखि सहमि जाइ ब्रजबारी !

**

ऐते आकुल व्यस्त न देख्यो पुर अरु पौर सँवारन ,

पल-पल नव परबंध करत माधव राधा के कारन ! !

'मणि के दीप जनि धर्यो ,चाँदनी रात ओहि अति भावै ,

तुलसीगंध ,तमाल कदंब दिखे बिन नींद न आवै !

बिदा भेंट ओहिका न समर्पयो मणि,मुकता ,पाटंबर ,

नील-पीत वसनन वनमाला दीज्यो बिना अडंबर !

राधा को गोरस भावत है काँसे केर, कटोरा ,

सोवन की बेला पठवाय दीजियो भरको थोरा !'

**

अंतर में अभिमान, विकलता कहि न सकै मन खोली

निसि पति के पग निरखि रुकमिनी कछु तीखी हुइ बोली ,

'पुरी घुमावत रहे पयादे पाँय ,बिना पग-त्रानन ,

हाय, हाय झुलसाय गये पग ऐते गहरे छालन ?'

'काहे को रुकमिनी ,अरे ,तुम कस अइसो करि पायो ?

ऐत्तो तातो दूध तुहै राधा को जाय पियायो ?

दासी-दास रतन वैभव पटरानी सबै तुम्हारो ,

उहि के अपुनो बच्यो कौन बस एक बाँसुरी वारो !

एही रकत भरे पाँयन ते करिहौं दौरा -दौरी

रनिवासन की जरन कबहूँ जिन जाने भानुकिसोरी !'

**

खिन्न स्याम बरसन भूली बाँसुरिया जाय निकारी,

उपवन में तमाल तरु तर जा बैठेन कुंज-बिहारी /!

बरसन बाद बजी मुरली राधिका चैन सों सोई

आपुन रंग महल में वाही धुन सुनि रुकमिनि रोई !

*

रह-रह सारी रात वेनु-धुन ,रस बरसत स्रवनन में ,

कोउ न जान्यो जगत स्याम निसि काटी कुंज-भवन में !

**
जन-मानस कृष्ण को राधा के साथ ही देखना चाहता है .राज-भवनों के ऐश्वर्य में उनके साथ पटरानियाँ रहती होंगी .पर मंदिरों में माधव के साथ सदा राधा विराजती हैं .
- प्रतिभा .

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

द्वाभाओँ के पार

*
अभी मेरे कमरे को डूबते सूरज की किरणें आलोकित किये हैं .सांध्य-भ्रमण के लिए तैयार होकर नीचे उतरी हूँ ..

' देखो सूरज डूब गया, शाम होने लगी है' ,पति कहते हैं.वे अपने पाँवों की परेशानी कारण साथ नहीं जा पाते .

नीचे रोशनी काफ़ी कम है .छायायें घिर आई हैं.

'अब सूरज पाँच बजे से पहले डूब जाय तो मैं क्या कर सकती हूँ.'(वैसे मुझे पता है कि यहाँ घड़ी एक घंटा पीछे कर दी गई है-डे लाइट सेविंग).जानती हूँ न, वे कुछ कहेंगे नहीं इसलिए बोल देती हूँ.

उनका कहना है जल्दी निकलो और रोशनी रहते घूम कर लौट आया .मेरा प्रयत्न यह रहता है कि घर से निकलने में देर कर दूँ.और साक्षात् देखूँ कि किस विधि प्रकृति का मुक्त एकान्त सजाती द्वाभाएं अपना ताफ़्ता रंगोंवाला झीना आंचल सारे परिवेश को उढ़ाती हैं .जब कहीं कोई नहीं होता सड़कों पर भी ,भ्रमणकर्ता अधिकतर लौट चुके होते हैं कभी एकाध मिल जाता है तो एक 'हाइ' फेंककर अपनी राह बढ़ जाता है. अब जब,यौवन को कोसों पीछे छोड़ आई हूँ मुझसे किसी को या किसी से मुझे ऐसा-वैसा कोई खतरा नहीं -निश्चिन्त हो कर मनचाहा घूम सकती हूँ ,

निविड़ एकान्त का , इस गहन शान्त बेला का कितनी व्यग्रता से इंतज़ार करती हूँ.यह एक घंटा सिर्फ़ मेरा . अगर कोई बाधा आ जाए,तो कहीं व्यस्त रहते हुए भी हुए मन घर की खिड़कियों से बाहर निकल भागता है ,जहाँ रंग-डूबी वनस्पतियों में मुक्त विहार करती द्वाभाएँ आकाश से धरती तक जादुई रंग उँडेलती रहती हैं .नवंबर का मध्य और दिसंबर का अधिकांश- यहाँ सुन्दरता चारों ओर बिखरी पड़ती है है.फ़ॉल- कलर्स की कारीगरी -सारी प्रकृति सजी-धजी . बिदाई - समारोह का आयोजन हो रहा है ,निसर्ग में रंगों के फव्वारे फूट पड़े हों जैसे .सिन्दूरी ,पीले लाल ,सुनहरे, बैंगनी कत्थई ,वसंती नारंगी ,कितने रंगों के उतार-चढ़ाव सब ओर उत्सव का उल्लास ,सारी वनस्पतियाँ मगन. जीवन के चरम पर अपने-अपने रंगों में विभोर.पूरी हो गई है अवधि, आ रही है प्रस्थान की बेला ,खेल लो जी भर रंग . वर्ष बीतते सब झर जायेगा ,सन्नाटा रह जाएगा .कबीर ने जिसे कहा था -दिवस चार का पेखना'

ये चार दिवस का पेखना ही तो जीवन है - चित्प्रकृति का मुक्त क्रीड़ा कौतुक ! निसर्ग के इस महाराग पर अपनी कुंठाएँ लादना शुरू करोगे तो शिकायतें ही करते रह जाओगे .ये जो हमारे बनाये खाँचे हैं -आत्म को बहुत सीमित कर देते हैं . कभी इससे बाहर भी निकलो . और कबीर तुम सोचते कभी कि अनगिनत युगों से ये सरिता-जल कहाँ से बहता चला आ रहा है?न कोई आदि न अंत - एक अनंत क्रम .जीवन भी तो अनवरत प्रक्रिया है - अनंत क्रम .कौन बच सका इस आवर्तन से !इसी क्रम में कहीं हम भी समाए हैं . अगर आगमन समारोहमय है तो प्रस्थान भी उत्सवमय क्यों न हो !

नवंबर का महीना! इन सुरंजित संध्याओँ में साक्षात् हो रहा है निसर्ग की गहन रमणीयता से . सारे पश्चिमी तट को विशाल बाहुओं में समेटे रॉकी पर्वतांचल की किसी सलवट में सिमटा छोटा -सा नगर .केलिफ़ोर्निया की राजधानी का एक उपनगर .अभी अपने में प्रकृति के सहज उपादान समेटे है. कोलाहल-हलचल से दूर ,मुक्त परिवेश ,पर्वतीय तल पर समकोण बनाते ऊँचे-ऊँचे वृक्ष, धरती पर दूर-दूर तक फैला वनस्पतियों का साम्राज्य.कभी ओझल हो जाता कभी साथ चल देता क्रीक जो आगे ताल में परिणत हो गया है !

उदय और अस्त बेलाएँ अपने संपूर्ण वैभव के साथ प्रकट होती है .अभिचार रत द्वाभायें अभिमंत्रित जल छिड़कती -टोना कर रही हैं .

संध्या की धुँधलाती बेला ,न चाँद न सूरज -केवल एकान्त का विस्तार !ऐसा अकेला पन जब अपनी परछाँईं भी साथ नहीं होती ,लगता है मैं भी इस अपरिमित एकान्त का अंग बन इसी में समाती  जा रही हूँ .चारों ओर पतझर का पीलापन छाया है .वृक्षों के विरल पातों से डूबते दिन की रोशनी झलक कर चली गई है . .हवाएं चलती हैं धुँधलाती रोशनी में रंग प्रतिक्षण बदल रहे हैं है ,साँझ ने चतुर्दिक अपनी माया फैला दी है . पतझर की अबाध हवाएं पत्तों को उछालती खड़खड़ाती भागी जा रही हैं. साँझ का रंगीन आकाश ताल में उतर आया है .इस पानी में झाँकते बादल लहराते हैं ,किनारे के पेड़ झूम-झूम कर झाँकते हैं.

हर रात्रि अभिमंत्रित सा निरालापन लिए आसमान से उतरती है . क्षण-क्षण नवीनता, पल-पल पुलक शाम का ढलना ,रात का आँचल पसार -धीमे-धीमे उतरना , सारी दिशाओँ को आच्छन्न कर लेना ..धुँधलाते आसमान में बगुलों की पाँतें बीच-बीच में कुछ पुकार भरती इस छोर से उस छोर तक उड़ती चली जाती हैं ,उनकी आवाज़ें मुझे लगता है कहीं दूर रेंहट चल रहा है. पर यह मन का कोरा भ्रम -यहाँ अमेरिका में रेंहट कहाँ .

गहन एकान्त के ये प्रहर .इस साइडवाक से ज़रा हट कर चलती सड़क के वाहनों से भागते प्रकाश से आलोकित ..नहीं तो वही सांध्य-बेला .आकाश में रंगीन बादलों के बदलते रंग धीरे-धीरे गहरी श्यामता में डूबने लगते हैं. ,जिसमें जल-पक्षियों की का कलरव-क्रेंकार रह रह कर गूँज जाती है .साइडवाक और सड़क के मध्य वृक्षावलियाँ ,और घनी झाड़ियाँ ,-रोज़मेरी और अनाम सुगंधित फूलों से वातावरण गमकता है .बीच-बीच में सड़कों पर गाड़ियों का आना-जाना,रोशनी और परछाइयां बिखेरते गुज़र जाना .उन दौड़ती रोशनियों में पेड़ चमक उठते हैं .अपनी ही परछाईँ प्रकट हो मेरे आगे-पीछे दौड़ लगा कर ग़ायब हो जाती है .

जब चांद की रातें होती हैं तो पीला सा चाँद उगता है ,हर दिन नया रूप लिए ,धीरे -धीरे साँझ रात में गहराती है ,आकाश की धवलिमा धूसर होने लगती है ,.अभी कुछ दिनों से पानी बरसने लगा है ,वातावरण में ठंडक आ गई है .झील के जल में किनारे एक भी पक्षी नहीं दिख रहा .क्वेक-क्वेक की आवाज़ें आ रही है ,कहीं दुबके बैठे होंगे .उधर झील के बीच में कुछ आकृतियां हैं .किनारे झाड़ियाँ और बीच-बीच में श्वेत ऊंची-ऊंची काँसों के झुर्मुट .आकाथ श्यामल जल में प्रतिबिंबित हो रहा है .ताल कैसे अँधेरे में अपने को छिपा कर बाहर के सारे प्रतिबिंब अपने में धार लेता है . रात को सारे चाँद-तारे जल में उतर आते हैं

ये हल्के अँधेरे मुझे बहुत अच्छे लगते हैं देर हो जाती है तो और अच्छा ,अँधेरे और चाँदनी की मोहक माया .जैसे दूर-दूर तक इन्द्रजाल फैला हो .धरती पर झरे हुए पीले पत्ते ,ऊँचे-ऊँचे श्वेत काँस झुण्ड बनाए सिर हिलाते बतियाते रहते हैं .,,
विशाल वृक्षों की टहनियाँ धरती तक और ऊपर आकाश तक श्यामता को और गहरा देती हैं

आकाश के छोर पर एक तारा झाँकता है पहला तारा ,यही तो है ,साँझ को संध्यातारा (ईवनिंग स्टार) और प्रातः मार्निंग स्टार.रोज़ इस चमकते तारे को देखती हूं ,दृष्टि घुमाती हूँ चतुर्दिक व्याप्त सूना आकाश , कहीं कोई सितारा नहीं .
याद आता है माँ का कथन -

एक तरैया पापी देखे दो देखे चंडाल

और मैं पूरे आकाश में उगा यह अकेला तारा रोज़ देखती हूँ .

झील में डूबती.साँझ बेला और सूने आकाश का पहला तारा. यह दोष भी कितना लोभ-मोह भरा है . झील का रंग गहरा जाता है लहरें चमकती रहती हैं .इस अँधेरे ताल में नक्षत्रयुत आकाश सारी रात झाँकेगा .,किनारे पर ऊंची-ऊँची सुनहरी घास .बीच में लंबे-लंबे धवल काँस समेटे हवा में लहराती रहेगी .आती-जाती रोशनियाँ ताल पर बिखरती है थाह लेती परछाइयाँ अपरंपार हो उठती हैं .ये साँझ भी अब ताल में समाई जा रही है चारों ओर गहरे श्यामल आकार,रात की परछाइयाँ थाहता ताल खूब गहन होता जा रहा है.

.इन फ़ुटपाथों पर हवाओं ने जगह-जगह रंगीन पत्ते बिखेर दिये हैं- लाल-पीले पत्ते -बीच-बीच में और रंग भी जैसे राँगोली रची हो ,कोनों और मोड़ों पर ढेर के ढेर .उन्हीं पर पाँव रखते चलते कभी कभी सब-कुछ ,बिलकुल अजाना- सा लगने लगता है. चलते-चलते रुक जाती हूँ जैसे सारा परिवेश अजाना हो. कहाँ जा रही हूँ किन राहों पर चलने आ गई कैसे आ गई , ,ठिठकी-सी खड़ी ,कैसे कदम बढ़ें आगे ,किस तरफ़ मुड़ूँ! .उस परिवेश में डूबी ,अपने से विच्छिन्न ,विमूढ़ .लगता है इन्द्रियातीत हो गई हूँ. अनगिनती बार चली राहें ,अनजानी हो उठती हैं छलना बन बहकने लगते हैं अपने भान ,सब कुछ  अवास्तविक-सा . देह में  कैसा हल्कापन कि धरती पर न टिक पांव उड़ाये लिये जा रहे हों .बिना प्रयास चलते जाना .कहीं का कहीं लिये जाते हैं स्वचालित हो पग,एक बार तो... नहीं , छोडें उस चर्चा को .

विराट् प्रकृति में छाया और प्रकाश की क्रीड़ा . द्वाभाओं के आर-पार दिवस-रात्रि का मौन गाढ़ालिंगन घटित होता और अनायास गहनता के आवरण में विलीन . मेरा निजत्व डूब जाता है ,सब से -अपने से भी विच्छिन्न हो इस महाराग में डूबे रहना -यही हैं - मेरे तन्मय आनन्द के क्षण जिन्हे किसी कीमत पर खोना नहीं चाहती , अंश मात्र भी गँवाये बिना ,पूरा का पूरा आत्मसात् कर लेना चाहती हूँ .उस तन्मयता में और कोई बोध नहीं रहता , .इस अपरिसीम का एकान्त का अंग बन सबसे अतीत हुई सी .अवकाश उन सबसे, अन्यथा ,जो मुझ पर छाये रहते हैं हर तरफ़ से घेरे रहते हैं . उनके न होने से मुझे कोई अंतर नहीं पड़ता ,काम्य हैं यही मुक्ति के क्षण, जब मन विश्राम पा सृष्टि के अणु-परमाणुओं में गुंजित अनहद में विलीन हो जाए ..
**

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

ट्राई कर देखिये ...

बाज़ार घूमते हमने एक दुकान पर नाम देखा - "रणजीत चप्पल्स' .

बड़ा ताज्जुब हुआ !चप्पल का रण जीतने से क्या संबंध ?
कुछ ग़लत पढ़ गये क्या -चरणजीत चप्पल्स होना चाहिये था .हो सकता है चरण का 'च' मिट गया हो किसी तरह. फिर से देखा- नहीं कोई निशान नहीं 'च' का .साफ़ रणजीत लिखा है .
चक्कर में पड़ गए हम! अरे, चप्पल की दुकान है नाम रखना था "चरणजीत चप्पल्स" जो चरण की सेवा कर उसे जीत लें. और ये हैं कि युद्ध जीतने के लिए उकसा रहे हैं .
रणजीत चप्पल्स ?
लेकिन ये ठहरे व्यवसायी लोग . बेमतलब तो नाम देंगे नहीं .
फिर सोचते रहे . एकदम ध्यान आया - रण का एक प्रकार चप्पलबाज़ी या जूतम-पैजार भी तो है- जो आजकल काफ़ी कॉमन है .और अक्सर ही जूता फेंकने की घटनाएं सामने आ रही है . जूता फेंका तो आसानी से जा सकता है पर उससे मारा-मारी नहीं की जा सकती .गया तो गया .ऊपर से,बनावट ऐसी कि कस पकड़ पाना मुश्किल -ग्रिप नहीं बनता(ट्राई कर देखिये) ,उतारने में समय लगे सो अलग. ताव आते ही फ़ौरन दे मारें, ये संभव नहीं. ज़्यादा से ज़्यादा दो बार फेंक लो ,और जूते कहां से लाओगे .पर चप्पल कितनी भी बार चला लो ,हाथ से कहीं नहीं जाएगी!
मतलब खरीदने के पीछे का उद्देश्य पहनना नहीं लड़ कर जीतना है. चप्पल चट् से उतारो और दे तड़ातड़! पकड़ने में छूट जाने का कोई डर नहीं. चाहे जितने वार करो . रण में आसने-सामने वार चलते हैं ,नहीं ,जूता वहां नहीं चलेगा .
रणजीत चप्पलें खरीदी हैं .पहन कर उसे टेस्ट करने की इच्छा बहुत स्वाभाविक है .अब तो मौका ढूँढेंगे कि डट कर प्रयोग हो .तो यह नाम दुकानदार ने सोच-समझ कर रखा है .लड़ाई में डट कर चप्पलें चलेंगी टूटेंगी ,जीत का सेहरा बँधेगा तो वो फिर यहीं से खरीदेगा .हो सकता है चप्पलों में कुछ ऐसा प्रयोग हो. जो प्रतिद्वंद्वी को चित्त करके ही छोड़े. तभी तो जीत की गारंटी दी है.
अच्छा है, दुकान की बिक्री हमेशा होती रहेगी .
सही नाम रखा है, अच्छी तरह ठोंक-बजा कर - रणजीत चप्पल्स .
देखना खूब चलेंगी चप्पलें !

शनिवार, 27 नवंबर 2010

वाह रे लड़के !

आगे बढ़ने के क्रम में जीवन-धारा क्या मज़ेदार वाक़ये पीछे छोड़ती चलती है !ऐसे छींटे उछालती है कि यत्न से जोड़ी हुई कथाएं उसके आगे फीकी पड़ जाएं. वैसे मानी हुई बात है- फ़ैक्ट्स आर स्ट्रेंजर दैन फ़िक्शन .लोग ईमानदारी से अपने सच्चे किस्से बयान करने लगें तो कहानियाँ रचने की ज़रूरत ही नहीं  .असली चटक माल अपने आप मिल जाए, संभावनाओं में भटकने की मजबूरी ख़त्म. पर क्या किया जाय बेलाग सच को कुबूलता कौन है !
खैर,छोड़िये. क्या फ़ायदा फिलासफ़ी छाँटने से ,सीधे अपनी बात पर बात पर आयें .

बात है 25-30 साल पहले की- शायद इससे भी पहले की .तब फ़ाउंटेन- पेन बच्चों के हाथमें नहीं आए थे - छोटे तीसरी-पाँचवीं के बच्चों के लिए तो एकदम अलभ्य . परीक्षाएं देने अपनी-अपनी दावातें ले कर जाया करते थे .स्वाभाविक है कभी किसी की स्याही फैल जाये या खत्म हो जाए तो उसे दूसरे से माँगनी पड़ती थी .दूसरा उसकी दावात में अपनी में से थोड़ी-सी स्याही उँडेल देता ,उधार के रूप में .अब बच्चों की बात ठहरी.लेन-देन ,उधार चुकाना सब अपने ढंग से
हमारी बहिन जी उन दिनों टूँडला में थीं ,उनका बेटा आठ-नौ साल का रहा होगा. दाहिने हाथ की उँगलियों की पोरें हमेशा स्याही से रँगी मिलती थीं -वो तो सभी बच्चों की .एक बार स्कूल से घर आया तो निकर स्याही से रँगा पैरों पर स्याही के दाग़ जैसे किसी ने धार बाँध कर डाली हो. बड़ा खीजा हुआ सा घर में घुसा .बहिन जी ने पूछा ,"ये क्या कर लाए,आलोक ?"आलोक फट पड़ा ,"ये उसी शालिनी ने किया है ..हम उसे मना करते रहे ,नहीं चाहिये ,नहीं चाहिये पर वह कभी किसी की नहीं सुनती ."
"पर हुआ क्या ,ये नेकर पर कैसे फैली स्याही ?"
"परसों उसकी दवात में स्याही खतम हो गई थी तो हमने दे दी थी . कल वो आई नहीं. आज आई ,तो हमसे कहने लगी अपनी स्याही ले लो ."
हमने कहा," रहने दो .हमें नहीं चाहिये."
"हाँ ,हाँ ,ज़रा सी स्याही .वापस लेने की क्या ज़रूरत", बहिन जी ने पुष्टि की .
"पर वो मानी नहीं .कहने लगी हम किसी की चीज़ नहीं रखते .तुमने दी थी ,अब तुम लो."
''हमने मना कर दिया .वो तो लड़ने लगी ,कहे- हम क्या बेईमान हैं ! तुम्हें अपनी स्याही लेनी पड़ेगी .''
"फिर कभी ले लेंगे .हम आज दवात नहीं लाए,"
"तो तुम हमारी दवात ले जाओ .हमारे पास और भी है ".
"हम तुम्हारी दवात क्यों लें ?"
''लेओगे कैसे नहीं जब हमने तुमसे ली, !"
''हमें नहीं लेना,'' कह कर हम चल दिये ,
वो तो पीछे दौड़ी,
''देखो,हम बेकार किसी से कुछ नहीं लेते ,तुम्हें लेनी पड़ेगी ".
"हमने कह दिया नहीं चाहिये. "
''तुम्हारे कहने से क्या होता .हमें तो देना है . हम तुम्हारी जेब में रख देंगे."
और स्याही की दावात हमारी जेब में रखने लगी .
हम रोकते रहे पर उसने जबर्दस्ती हमारी जेब में डाल दी.
खींचा-तानी में स्याही जेब में ही फैल गई .
जब उससे कहा ," ये क्या किया तुमने?"
उलटे हमी पे चिल्लाने लगी '',तुम्हारी स्याही ,हमने दे दी ,तुम्हारी जेब में फैली ,तुम्हारी वजह से ..हम क्या करें और भाग गई .
वो कभी किसी की नहीं ,सुनती ."
आलोक ने जेब से दावात निकाल कर दिखा दी उलटी कर के कि खाली है
"तो दावात तो जेब से निकाल देते !"
"कहीं वो देख लेती तो.. .इधर ही तो रहती है ."वह रुबांसा हो आया था
"..गलती उस की है ,हम क्या करते! " .
बहिन जी का और मेरा हँसी के मारे बुरा हाल .
वाह रे लड़के !
*

बुधवार, 17 नवंबर 2010

वाह टमाटर ,आह टमाटर !

*

जब हम छोटे थे तो टमाटर इतने नहीं चलते थे .हर सब्ज़ी का अपना स्वाद होता अपनी सुगंध,अपना रूप अपना रंग कहाँ ,अब तो सब टमाटर होता जा रहा है .

टमाटर की लाली बिना सब बेकार .

कोई चीज़ ऐसी नहीं दिखती जिसमें यह न हो .

कल एक पार्टी में जाना हुआ .मारे टमाटर के मुश्किल .

एक स्वाद सब में ,एक रंग टमाटर, टमाटर !

दाल में टमाटर सूप में तो चलो ठीक है ,कभी-कभी तो डर लगता है पानी में भी नीबू के कतरे की जगह टमाटर काट कर न डाल दिया हो .

छोले तो छोले ,.मसाले के साथ पेल दिए टमाटर .पर नवरात्र के प्रसादवाले छौंके हुए काले चनों मे भी घुस-पैठ .और लौकी की तरकारी पर हो गया अतिक्रमण, टमाटरों की हनक के नीचे उसका अपना स्वाद ग़ायब !

मुँगौरी की सब्ज़ी में देखो, तो टमाटर घुले ,पता ही नहीं लगता मुँगौरी है या कुछ अल्लम-गल्लम ,

कल घर पर मैंने बिल्कुल सादे मटर छौंके चाय के साथ नाश्ते के लिए, और मैं ज़रा दूसरा काम करने लगी.

वन्या ,अपनी भतीजी से कह दिया ,’ज़रा मटर चला देना, मैं अभी आ रही हूं .’

आई तो कहने लगी ,'बुआ ,मैंने सब ठीक कर दिया !आप ने मटर में टमाटर डाले ही नहीं थे मैंने डाल कर पका दिया.'

'अरे तुमने कहां से डाल दिये टमाटर तो थे नहीं .'

'वो जो प्यूरी रखी थी वह डाल दी ,नहीं तो क्या मज़ा आता खाने में !'

हे भगवान ,बह गई मटर की मिठास ,अब चाटो टमाटर का स्वाद ,

क्या कहती उससे कुछ नहीं कहा .

निगलना पड़ेगा मजबूरी में, सोंधापन डूब गया प्यूरी में ! .

मारे टमाटरों के मुश्किल हो गई है ,कभी-कभी तो लगता है चाय में नीबू की जगह टमाटर न पड़ा हो .

अरे इस बार तो गज़ब हो गया .टमाटर का पराँठा .रायते में टमाटर ,चटनी में ,अरे आलू की टिक्की  भी सनी पड़ी है.

कढ़ी में भी टमाटर. तहरी -खिचड़ी ,पुलाव कोई तो बचा रहे इसके अतिचार से .
अभी उस दिन अपनी राजस्थानी मित्र के यहां गई थी ,उन्होंने गट्टे की तरकारी बनाई थी (जो चाहे सब्ज़ी कहे ,मुझे तरकारी कहना ज़्यादा स्वादिष्ट लगता है ).

परोस कर बोलीं, ‘लो खाओ अपनी प्रिय चीज़ !’

चख कर मैंने पूछा,’ यह क्या नई तरह की कढ़ी है?’

खा जानेवाली निगाहों से देखती हुई बोलीं , 'ये गट्टे तुम्हें कढ़ी लग रहे हैं ?’

‘अच्छा गट्टे हैं ?’

मैं दंग रह गई बेसन के घोल में खटास घोल दी जाए -चाहे टमाटर की ही ,कढ़ी तो कहलाएगी !उसी में समा गए गट्टे ,क्या ताल-मेल है , और रंग ?पूछिए मत बेसन टमाटर का मिक्स्ड, दोनों का स्वाद चौपट.

और वे ऐसे देखे जा रही हैं जैसे मैं कोई अजूबा होऊँ .

अब कहाँ सुकुमार स्वर्ण-हरित भिंडियों का सलोना करारापन. वह देव दुर्लभ स्वाद  !उद्दाम टमाटरी प्रभाव सब कुछ लील गया ,उस रक्तिम शिकंजे में सब जकड़े जा रहे है .

हे भगवान, यह .सर्वग्रासी आतंक हमारे सारे स्वाद ,सारे रंग मटियामेट कर के ही छोड़ेगा क्या !

****

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

देवनगर की वर्ण-व्यवस्था.


देवनगर के वासी 
वर्णो मे पूज्य दो परम- वर्ण - एक ' ॐ' - सृष्टि का आदि स्वर ,दूसरा 'श्री- जो सारे सौन्दर्य एवम् समृद्धि को धारण कर हमें धन्य कर रही है को सादर नमन करते हुए ंमै इस देवनगर की वर्ण-व्यवस्था और वर्ण-व्यवहार की वार्ता-कथा प्रारम्भ करती हूँ ---
अपनी वर्णमाला,  देवनागरी के अक्षरों की ! कभी ध्यान दिया है आपने ?भरे-पुरे परिवारों का एक पूरा संसार बसा है । स्त्री-पुरुष -बच्चे ,देशी-विदेशी  सब मिल - जुल कर रहते हैं । सबकी अपनी आकृति ,अपनी प्रकृति है । आत्म- विस्तार करने की वृत्ति इनमे भी है - मात्राएँ लगाकर  ये लोग बड़ी स्वतंत्रता से अपने हाथ पैर फैला लेते हैं ,पर अपनी कालोनी में अपनी छतों के नीचे बड़ी सभ्यता से रहते हैं । पति-पत्नी  ,बच्चे ,बूढ़े सब तरह के लोग है एक दूसरे से निबाह कर चलने मे विश्वास करतेहैं । कभी-कभी अतिक्रमण होते हैं ,तू-तू मै-मै भी होती है फिर समझौता कर सब अपने-अपने काम से लग जाते हैं।
सबसे ऊपर महत्वपूर्ण लोगों का निवास है -फिर पाँच पंक्तियों मे ,पाँच-पाँच लोग बसे हैं ।नीचे की पंक्ति में आठ लोग लाइन से रहते -है यद्यपि उनमे आपस में परस्पर विशेष संबंध नहीं हैं । और तीन लोग संकर है ।वैसे तो कालोनी के सब लोग एक दूसरे से जुड़ने मे परहेज़ नहीं करते पर इन तीनो का रूप ही निराला है ,इसलिए इन्हे सबसे पीछे डाल दिया गया है । 
वी.आई.पी. लोगों की लाइन मे जो सोलह लोग थे अब उनमे से बारह ही दिखाई पड़ते हैं । चार  लम्बी-लम्बी दाढ़ी-मूछोंवाले वृद्ध थे ,उन्हे अधिकतर वृद्धाश्रम मे भेज दिया जाता है । कुछ का यदा-कदा आगमन होता रहता है । एक हैं ऋषि टाइप के । अक्सर आजाते हैं । पर उनके बड़े भाई  और दो जटिल दाढ़ियोंवाले आति वृद्ध लोग कभी दिखाई नहीं पड़ते - लगता है स्वर्ग सिधार गये ! ऋषि अपना प्रतीक - चिह्न यहीं छोड़े रहते हैं जिससे संसार का कल्याण हो सके। वैसे भी ये साधक टाइप के लोग इन लोगों की दुनियाँ में दखल नहीं देते। हाँ, विशेष पर्वों -अनुष्ठानो और संस्कृतमूल के शब्दों का काम उनके बिना नहीं चलता ।बाकी के बारह लोग आपस में रिश्तेदार हैं।
अ और आ सगे भाई हैं  उनकी छतें पास-पास हैं। दोनों का स्वभाव थोड़ा अलग है । इ और ई उनकी पत्नियाँ हैं ,दोनो बहुओं के एक-एक बच्चा है 'उ' और 'ऊ' । दोनो साथ खेलते हैं । शकलें तो देखिए ज़रा , लगता है छोटा बिना कपड़े पहने उठ कर चल दिया और बड़ा भी नंगा-पुतंगा उसके पीछे भागा ! नंग-धड़ंग एक दूसरेके पीछे भागे जा रहे हैं ऊं-ऊँ चिल्लाते ! बड़े रूने हैं । ज़मीन पर लुढ़कते-पुढ़कते रहते हैं ,उनकी मात्राएँ तो हमेशा ज़मीन पर पड़ी रहती हैं ।उनकी माएँ छोटी-बड़ी इ ,दोनों देवरानी-जिठानी बहुत व्यस्त रहती हैं । बच्चों को सम्हालती हैं किसी तरह , पर ज़मीन पर घिसटती , लड़कों की मात्राएं सम्हालना उनके भी बस का नहीं है । लोक-भाषावाले इन्हे बड़ा प्यार करते हैं ।बुला-बुला कर पास बिठाए रखते है ।उनका प्यारा उ हर जगह चलता है -खातु ,मातु ,सुनु ,जगु और तो और , ओ उन्हें नहीं रुचता । उसे हटाकर उ को चिपकाए रहते हैं जैसे मानो ,जानो ,चलो को -मनु,जनु,चलु बना कर। हमारी कामवाली र से तो बचती है पर उ उसका बड़ा लड़ैता है -खर्च को खच्चु कहती है।बड़ेवाले-ऊ- को भी प्यर करते हैं पर थोड़ा कम । जैसे ,मरयादू यादू  भोर को भोरू आदि .। आजकल लोग बड़ा समझ कर ऊ को अधिक मान दे देते हैं -मधु को मधू ! 
ये जो ए,ऐ है. थोड़े असभ्य टाइप के हैं। जब ये अकेले होते हैं तो और अक्खड़ हो जाते हैं तू-तुकार पर उतर आते हैं। हाँ, जब किसी के साथ आते हैं तो समुचित सत्कार पा जाते हैं । थोड़े झक्की हैं ,पर कभी बड़े सभ्य बन जाते हैं ।  जब बुलाए जाते हैं तो शान से तुर्रा लगाकर पहुँचते हैं। तब आया -गया को भी आए -गए बना कर सम्मान देने का काम करते हैं । ऐ फिर भी थोड़ा गंभीर है,इसलिए उर्दू-दाँ लोग ऐ का ज्यादा सत्कार करते हैं ,ए को धीरे से चलता कर देते हैं देखिए- 'ऐ ,मुसाफिर' मे । ओ,औ समझदार हैं ,दूसरों की इज़्ज़त करना जानते हैं ।ऊपर के कोने वाले दो घरों के लोगों में जरा नहीं पटती । अ बिन्दी लगाकर मगन हो गया है ।नक्शेबाज़ी पर उतरता है तो सिर पर चाँद -तारे लगा लेता है इसके नख़रे देखने लायक होते हैं। पीठ पर दो बिन्दियों का बोझ लादे अः से उसकी जरा नहीं पटती।अक्सर अकेला रह जाता है -अः । छोड़िये  उससे कुछ कहने का मन नहीं करता ,भगवान बचाए। दोनो बहुएँ इ,ई जब उसे देखती हैं तो मुँह दबा कर हँसने लगती हैं ।
इसके आगे काफ़ी बड़ी बस्ती फैली है -- बड़े कायदे से हरेक के वर्ग को ध्यान मे रखते हुए पँक्तियाँ बनाई गई हैं ।सुनियोजित ढंग से बसाई गई है ये देवनगरी । पाँच पंक्तियों के आगे आठ और तीन ,ग्यारह घर आखिरी छोर तक फैले हुए दिख रहे होंगे ! मिले जुले लोग है -बाद वाले तीन क्षत्रज्ञ जन्म से ही संकर हैं ,कोने मे बसा दिया गया है इन्हें । कुछ विदेशी भी घुस आए हैं उनको मकान नहीं एलाट किये गये । बड़ा इन्फ़ेक्शन फैलाये है कालोनी मे। अंग्रेज़ी शासन का फ़ायदा उठा कर एक तो वी.आई.पी. कालोनी में जा घुसा ,सिर पर टोप लगाए मुँह गोल-गोल करके बोलता है ऑफ़िस और कॉलेज में हमेशा दिखाई देगा ।
दूसरी लाइन के तीन लोगों को पहले छूत लगी ।उस समय की राज भाषा फारसी का असर इन पर आ गया । पहले क,ख,ग पर असर पड़ा - ग के गले मे बुरी तरह ख़राश होगई  वह गरगराने ।लगा,ख खाँसी से ग्रस्त हो खखारने लगा , क को कै हो जाएगी ऐसा अंदर से जी होने लगा।इसी वर्ग का घ घुघ्घू की तरह बैठा देखता रहा ,ये नहीं हुआ कि डाक्टर को बुलाये ।परिणाम स्वरूप आगे की लाइनो के दो लोगों तक छूत फैली और च- वर्ग का ज और प- वर्ग का फ भी उसकी चपेट में आगए ।इन लोगों को चिह्नित करने के लिए एक हकीम ने उन्हें नुक्ते दे दिए , जब जरूरत होती है चिपका लेते हैं। कभी तो लगता है कि उन तीनो को नुक्ते लगाए देख इन दोनो को भी शौक चर्राने लगा था ।झ झगड़ालू प्रकृति का ठहरा , ज बेचारा उससे अपनी रक्षा के लिए भी नुक्ता लगा लेता है ।इधर फ़ की लेकप्रियता नुक्ते के कारण इतनी बढ़ गई कि फ को दुनिया ने नकार ही दिया ! लोगों को लगता है फ अशुद्ध है फ़ ,शुद्ध -जबकि बात इससे ठीक उलटी है ।बिन्दी लगाने के शौकीन ड और ढ भी निकले -पर उसे लगा कर ड लड़खड़ाने लगता है,जैसे पाँव के नीचे रोडा आ गया हो । और ढ तो लुढ़क ही जाता है ।और ण के बारे में तो कुछ पूछो मत,बडा नंगा  आदमी है-एकदम बेशर्म है।श्लील -अश्लील का कोई विचार नहीं ।हो सकता है नागा साधु हो या दिगंबर जैन संप्रदाय का अनुयायी हो।कभी-कभी अपने रूप में कुछ परिवर्तन कर लेता है -र के साथ दो लंबवत् लकीरें जोड कर नई शक्ल अपना लेता है ।हो सकता है लोगों के कहे-सुने कुछ लिहाज आया हो , या सद्बुद्धि जाग गई हो ।
हाँ , उस विदेशी के आगे हमारा फ उपेक्षा का पात्र बन गया । मेरा भतीजा मेरे पति से कहता है 'फ़ूफ़ाजी' और अंग्रेज़ी मे भी एफ़ यू एफ़ ए लिखता है । मैने कहा,' फ़ूफ़ा नहीं फूफा होता है।' वह बोला ,'अशुद्ध बोल रही हैं बुआ जी ।' उसकी अम्माँ ने हिन्दी मे एम.ए. किया है और मुझसे काफ़ी बाद, उनकी नॉलेज तो मुझसे ज्यादा अप-टू- डेट होनी चाहिये! पर वह भी अपने लड़के को सही समझ रही थी। भाई भी पढ़ा-लिखा है ,मैने उसकी तरफ़ देखा , सोचा शर्म से सिर झुका लेगा । पर वह बेटे को गर्व से निहारे जा रहा था। मेरे कहने पर सिर झटक कर बोला ,'आजकल का ट्रेन्ड यही है।' नई पीढ़ी से भयभीत होगा बेचारा !
फ तो ऐसा त्याज्य हो गया है  जैसे उसमे फफूँद लग गई हो ,वैसे अब लोग फ़फूँद कहते हैं।  हमारी एक आदरणीया हैं,वे कालेज की सहायिका फूलमती को ' फ़ूलमती' कह कर आवाज़ लगाती हैं ,समझती हैं कि उनने उसे शुद्ध कर दिया , और हम कुछ लोग चुपके-चुपके हँसते कि उसे मूर्ख बना रही हैं ।   
मैं लड़कियों को पढ़ाती हूँ न! तो इस सब पर सोच-विचार करने का खूब मौका मिलता है । समाज के सभी वर्गों तक मेरी पैठ हो जाती है क्योंकि लड़कियाँ हर वर्ग की पढ़ने आती हैं।परिवेश और परिवार का प्रभाव भाषा पर पड़े बिना नहीं रहता। लड़कियों के नामो से मै उनके बारे मे बहुत सी बातों का पता लगा लेती हूँ । हर नाम कुछ सोचने-समझने का मौका देता है।एक बार क्लास में उपस्थिति लेते समय नाम आया-' वीना ' मै सोचने लगी यह क्या, न तत्सम  ,न तद्भव !'बीना' किसी तरह से शुद्द नहीं - वीणा होता या बीना होता ! कभी-कभी सोच मे लीन होकर मै मुँह से बोल जाती हूँ।
 सोचा लड़की से पूछूँ ,' वीना कहाँ है ?' वह नहीं आई थी ।
एकदम मुँह से निकल गया ,' यह तो संकर है !'
उसकी पक्की सहेली रही होगी खड़ी हो गई,' दीदी ,वह ब्राह्मण क्षात्रा है।' 
यह तो नया वर्ण निकल आया ,मुझे आश्चर्य हुआ - ब्राह्मण और क्षात्रा ?मैने कहा ,'क्षात्रा नहीं क्षत्रिया कहो।' 
मैं विचार कर रही थी पिता ब्राह्मण और माता क्षत्रिय होंगे ,मैने पूछा ,'उसके माता -पिता की इन्टरकास्ट मैरिज है ?'।
लड़की तो आई नहीं थी पर उसके घर ख़बर पहुँच गई।
दूसरे दिन उसकी माता-श्री अवतरित हुईं।
'दीदी जी, काहे बदनाम कर रही हो हमे ?'
'मैं क्यों बदनाम करूँगी ?क्या बात हो गई ?'
वह तो लड़ने पर आमादा हो गई, ' कल आपने उसे संकर कहा ?भरी किलास के सामने कहा हम ठाकुरों की बेटी हैं भाग कर बाम्हन से सादी कर ली ?--जरूर किसी ने उड़ाया होगा ,दुस्मनन की कमी है यहाँ ?असली कनौजिया बाम्हनन की बेटी हैं हम !'
'लड़कियों ने कहा था ब्राह्मण क्षात्रा है ।'
उसकी पक्की सहेली फिर खड़ी हो गई ,'आपने संकर कहा तो हमने बताया था कि ब्राह्मण है ।और इस्टूडेन्ट है तो क्षात्रा तो कहेंगे ही ।'
बड़ा बबाल हो गया उस दिन ! मैंने अपनी बात समझाने की हर तरह कोशिश की लेकिन --छोड़ो अब कहने से क्या फ़ायदा ? 
सही और शुद्ध के पीछे मेरी अक्सर ही लोगों से चख-चख हो जाती है।
दूसरे क्लास मे गई तो सोचा इन लोगों को बता दूँ क्षात्र और छात्र में क्या अन्तर है।मैंने मनोरंजक ढंग से शुरू करना चाहा,' क्यों भई, छ में क्या गन्दगी लगी है ,जो ज़बान पर लाने मे परहेज़ है ?नहाई-धोई लड़कियों को छ बोलते ही छूत लग जाती है?' बोलते-बोलते मैं सामने की ओर देख रही थी । एक लड़की को लगा मैं उससे कह रही हूँ। उसने पास बैठी वाली को कोहनी से ठहोका ,वह खड़ी होकर बोली ,' यह तो आज ही सिर धोकर आई है ।'
'अरे ,सिर धोकर क्यों आई है ?'
लड़कियाँ मुँह घुमाकर मुस्करा रही हैं ।
' मुँह घुमा लेंगी पर छ नहीं बोलेंगी,' हाँ,छूत लग जायगी न।'
' ऐसे मे उस तरफ़ बैठती हैं ' एक की आवाज़ आई ।
उसके इशारे की ओर मेरी निगाह गई -एक बेञ्च पर दो लड़कियाँ बैठी सकुचा रहीं थीं ।
वो छ बोल सकती होंगी मैंने सोचा, पर उन्हें और द्विविधा में डालना ठीक नहीं समझा।
यह छ है भी थोड़ा छिछोर टाइप का ,हर जगह जा घुसता है और क्ष को निष्कासित कर देता है। स्थानीय लोगों की तो ज़ुबान पर चढ़ा रहता है -अच्छर ,सिच्छा, राच्छस, लच्छिमी हर जगह छछूँदर सी पूँछ लिये हाजिर !अक्सर अपने साथ च को भी चिपका लेता है।च की वैसे है भी चिपकने की आदत!कुछ जरूरत से ज्यादा समझवाले असली छ से भी परहेज़ करते हैं।हमारी एक मित्र हैं ,नाम नहीं बताऊँगी वे बुरा मान जायेंगी , इच्छा को इक्षा कहती हैं। 
'ठ ' को तो देखो गठरी बाँधे है , बिल्कुल ठग जैसा।बड़ी जल्दी ठायँ-ठायँ पर उतर आता है।अपने पूर्ववर्ती को कुछ समझता ही नहीं। हरियाणा की औरतें 'उठा ले' को 'ठा ले' बोलती हैं और उनका ठ भी पहले से शुरू हो जाता है -उच्चारण निकलता है -'ठ्ठा ले !',इकट्ठा को कहेंगी 'कठ्ठा' । 'इ' की लोकप्रियता से ईर्ष्या करती होंगी ! सीधे-सादे वर्णों को तो कोई धरे नहीं गाँठता ! इन वर्णों में आपसी लाग- ड़ाँट चलती रहती है।य़ और ज मे खींच- तान मची रहती है,व और ब मे प्रतिद्वंदिता चलती है।बँगला भाषा के प्रभाव से ब बोलने का शौक बढ़ता जा रहा है-वासु को बासु विमला को बिमला वन को बन बोलना फ़ैशन में आगया है। ण और न आपस में उलझते हैं। उधर क और ख एक दूसरे की जगह हथियाने को तैयार रहते हैं । अक्सर ही ख की जगह क आ बैठता है -भूका, जिजमान  बस्तु गनेस वगैरा-वगैरा।अब तो व की भ से भी बजने लगी है लोग अमिताभ को अमिताव कहने मे ज्यादा शान समझते हैं या फिर उनके मुँह इतने कोमल होते होंगे कि भ के उच्चारण से छाले पड़ने का डर होगा।             
कुछ लोगों को स संदिग्ध लगता है श पर विश्वास है। पर अहिंसावादीलोग श की शक्ति से घबरा कर स को अपना लेते हैं। वे शंकर को संकर मानते है और शब्दों में 'सुसीला',' सुकुल', 'सायद' वग़ैरा का प्रयोग करते हैं।इधर हिंसा वृत्तिवाले संघर्ष को शंघर्ष कह कर समझते हैं कि उसकी भीषणता और बढ़ गई है।हमारी एक प्रभावशाली सीनियर, शासन को साशन कह कर परम संतुष्टि पाती हैं कि उनने शासन की सत्ता मे परिवर्तन कर दिया हैं।क और च वर्गों के कोनेवाले सदस्य ङ और ञ बुलाते ही मदद को दौड़ पड़ते थे । पर नकिया कर बोलने के कारण लोग उनसे बचने लगे ,उनकी जगह ऊपरवाले अं की बिन्दी छुटा कर लगा लेते हैं। 
अरे हाँ,ऊपरवाले दंपतियों की बात तो भूल ही गई मै !ये लोग हैं-दो भाई अ,आ और उनकी पत्नियाँ इ,ई । अ और इ दोनों पति-पत्नी बड़े परोपकारी हैं - अ ने तो जीवन ही सेवा में लगा दिया है । बिना कहे ख़ुद मदद को पहुंच जाता है।उसके बगैर तो सारे वर्णों की बोलती बन्द रहती है। उसकी पत्नी 'इ' बहुत शालीन, सुसंस्कृत महिला हैं ।जहाँ बैठती हैं सज जाती हैं। लोगों को वे इतनी अच्छी लगती है कि शौकिया उन्हे बुला कर बिठाए रखते हैं - देखिये- रहिता ,कहिता ,कैशिल्या अहिल्या इनमे  हर जगह छोटी बहू इ को बुला कर बैठा लिया गया है?आ और ई की भी राममिलाई जोड़ी है। दोनो तुनक-मिजाज़ !ई तो कुछ ज्यादा ही लम्बी है- शिरोभूषण पहनने की शौकीन! मिजाज़ ऐसा कि,हमेशा चिल्ला कर बोलती हैं । लोग इनसे बचने की कोशिश में रहते हैं।उनके पति 'आ' की भी चीख -पुकार मचाने की आदत है।दोनो हमेशा कुहराम मचाये  रहते हैं !
वैसे ऊपर वाले सारे ही लोग हमेशा औरों की मदद के लिये  दौड़ते रहते है।मजबूरी में खुद नहीं जा पाते तो अपनी मात्राओं को भेज देते है।बाहरवाले नये लोगों को मात्राओं में भ्रम हो जाता है ।इस बारे मे मेरे पति ने  अपनी एक अलग ही थ्योरी बनाई है - -
मात्रा छोटी होने पर, महत्व और आकार छोटा- जैसे चिटी ,चिंटी,च्यूँटी ,चींटी और चींटा इन पाँचों  का अंतर देखिये ,चिटी -(छोटी इ है और बिन्दी भी नहीं है)सबसे छोटी, जोआँखो को बड़ी मुश्किल से दिखाई देती हैं। चिंटी -(छोटी इ होते हुए भी इसमे बिन्दी लगी है)जरा सी बड़ीवाली जिसमे दो बिन्दु स्पष्ट दिखते हैं ,तीसरी है च्यूँटी-जैसे किसी ने चिकोटी काट ली हो ,इसी से शब्द ' च्यूँट लेना ' बना है। चींटी-(बड़ी ई के साथ बिन्दी भी है) उससे भी बड़ी जो,हर जगह लाइन बनाये  चलती दिखाई देती हैं,अन्त मे चींटा -खूब बड़ा ,ऊँचा-पूरा,उसे आप सब जानते हैं।। लघु और दीर्घ मात्राओं के प्रयोग से सब के रूप स्पष्ट हो गये।।इसी प्रकार उ और ऊ मे भी उन्होने अंतर किया है । वे रामपुर ,रुद्रपुर मे तो उ लगाते है पर सिंगापुर,को सिंगापूर लिखते है, कहते हैं ,'इतना बड़ा नगर है ,छोटी मात्रा कैसे लगेगी?' ,ऐसे ही नागपूर,कानपूर !शादी के पहले मै शाजापुर मे थी,ये पते मे हमेशा शाजापूर लिखते थे। मैंने कहा इसमे छोटा उ है,कहने लगे,'अरे वाह ! तुम रहती हो ,उस जगह को छोटी कैसे मान लूँ?' मेरा भाई जब लिफ़ाफ़े पर शाजापूर लिखा देखता तो मेरी ओर देख कर खूब हँसता।मैं क्या करूँ ?कोई मै तो इन्हे ढँढने निकली नहीं थी ,तुम लोगों ने खोज निकाला ,अब तुम्हीं निपटो !
खोज की बात पर और बताऊँ -मेरी मित्र है विशाखा ,मेरे पति उसे कहते हैं-विषाख़ा और लिखते भी ऐसे ही हैं- ख के नीचे बाकायदा नुक्ता लगाकर । कहते हैं यही शुद्ध है(उर्दू पढ़े है,शुरू से)।मै तो चुप लगा जाती हूँ इस डर से कि कहीं ये ख़ा के ऊपर भी बिन्दी न लगा दें! ख़ैर , 
 वे विभीषण को 'भिभीषणजी' कहते और मानते है. 
 मैंने बताया,' विभीषण नाम है उसका ,भिभीषण नहीं .' 
बोले,' वह राक्षसकुल का है व में नहीं भ में भयंकरता होती है।
' तब फिर बाद में जी काहे लगाये हो ?'
' बाद में वह राम के पक्ष में चला गया इसलिए शाबाशी के लिये बाद में ‘जी’ लगा दिया .'
क्या किया जाय सबकी अपनी-अपनी मति!
अपने पड़ोसी के जसोदा को मैने यशोदा करवा दिया ।अब वे जादू को यादू और जंग को यंग कहने लगे, कहते हैं -अगर जशोदा में ज का य हुआ है तो यहाँ भी होना चाहिये। ऊपर से सबसे कहते-फिरते हैं मैंने बताया है।
इधर नीचे की लाइन वाला 'र' पक्का बहुरूपिया है-कभी तुर्रा लगा लेता है कभी ,कमर मे पटके-सा बँधा ,कभी पावों मे अटका ।अरे यह तो बूढ़े बाबा ऋ की भी नकल उतारता है फिर झट् से छोटी इ की ओट ले लेता है।
सबका अपना-अपना स्वभाव !आपस में खींचातानी और अतिक्रमण होते हैं ,तू-तू मैं-मैं भी चलती है पर फिर सब शान्ति से रहने लगते है। समझ गए है न कि रहना यहीं है,इन्ही सब के साथ !
सज्जनों,वर्ण- व्यवस्था और व्यवहार की चर्चा कर इस समाज को गुमराह करने का मेरा इरादा कतई नहीं है ।मेरा विषय वर्णों से संबद्ध है इसलिये अपनी बात कहना सुझे लोकतंत्र सुलभ अधिकार लगा।आप को लगे इससे वर्णो में दुर्भावना  या भेद-भाव उत्पन्न होगा तो कृपया ',सभी वर्ण एक समान हैं जिसके मन में जैसा आये बेधड़क लिखे ' का नारा दे दें !
- प्रतिभा सक्सेना
*