सोमवार, 8 मार्च 2021

राग-विराग - 7.

(रतन समुझि जिन विलग मोहि ,जेहि सुमिरत रघुनाथ.' 

*

जब से रत्ना ने प्रिय देवर के हाथों तुलसी का पठाया सन्देश पाया है,मनस्थिति बदल गई है.कागज़ पर सुन्दर हस्तलिपि में अंकित वे गहरे नीले अक्षर जितनी बार देखती है. हर बार नये से लगते हैं .'रतन समुझि जिन विलग मोहि ..'  -,नन्हा-सा सन्देश  रत्ना के मानस में उछाह भर देता है, मन ही मन दोहराती है.  फिर-फिर पढ़ती है. 

- कितना विरल संयोग कि  समान बौद्धिक स्तर के, एक ही आस्था से संचालित समान विचारधारा के दो प्राणी पति-पत्नी बने .एक सूत्र से संयोजित  दोनों ,गार्हस्थ धर्म का अनुसरण कर एक नया क्षितिज खोजते जीवन अधिक समृद्ध होता. अंतर से  पुकार उठती है. ‘चल, मिल कर समाधान कर ले, सारे  भ्रम दूर हो जायें.’

उनका तो विद्वानों से वर्तलाप होता होगा ,संत-समागम चलता होगा, अपने कुछ अनुभव मुझसे भी  साझा कर लेते. मैं उनकी सहधर्मिणी हो कर, यहाँ सबसे  अलग-थलग निरुद्देश्य पड़ी हूँ 

मन में तर्क-वितर्क चलते हैं राम की भक्ति, संसार से विमुख नहीं करती, लौकिक जीवन के लिये एक कसौटी बन जाती है. सांसारिकता से कोई अंतर्विरोध नहीं. गृहस्थ के लिये तो राम-भक्ति ही ग्रहणीय है संयम और संतुलन रखते हुए आदर्शों के निर्वाह का संकल्प. राम की भक्ति सदाचार और निस्पृहता का सन्देश देती है. सांसारिक संबंधों रमणीयता ,नैतिकता का उत्कर्ष भावों की उज्ज्वलता, परस्पर निष्ठा और विश्वास और भी कितनी कोमल संवेदनाएँ  समाई है ..

एक बार उनसे भेंट हो जाय. मन को समाधान मिल जाय. 

सियाराममय जग को असार कैसे माना जा सकता है! वह तो विस्तृत कर्मक्षेत्र है. 

पति से पूछना चाहती है रत्नावली कि राम-भक्ति संसार से विरत करने के लिये,या उसमें रह कर उसे अधिक संगत ,संतुलित और सुनियोजित की आयोजना हेतु ?

रत्ना का प्रबुद्ध मन तुलसी से विमर्श करना चाहता है .लेकिन समय व्यर्थ बीतता चला जाता . क्या ऐसे ही जनम बीत जाएगा ? नारी को कैसा बनाया प्रभो,एक ओर बहुत समर्थ और दूसरी ओर एकदम बेबस. बाहरी संसार में कोई पैठ नहीं औरों पर निर्भर रहना ही नियति बन गया है. .

  नन्हा-सा सन्देश रत्ना के मानस में फिर-फिर उछाह भर देता है .''रतन समुझि जिन विलग मोहि ..' एक सूत्र दोनों को निरंतर जोड़े है. मगन मन गा उठता है -

 'राम जासु हिरदे बसत, सो प्रिय मम उर धाम।

एक बसत दोऊ बसै, रतन भाग अभिराम।।'

मनोबल बढ़ चला है. अपनी बात किससे कहे!! तुलसी से संवाद करना चाहती है. पर कहाँ मिलेंगे वह!

निरन्तर उठते हुये अनेक प्रश्न रत्ना के मन में हैं पर ऐसा कोई नहीं जिससे पूछ सके. अकेले समझ नहीं पाती, कहाँ सही हूँ कहाँ गलत. कौन बताए! काश,एक दूसरे के पूरक बन बन सके होते. दोनों की एक ही लगन -फिर यह अंतराल क्यों? वह भी खुल कर अपने मन की कहें, खाई भर जाये. उनकी उपलब्धियों का कुछ अंश मुझे भी मिले. 

बार-बार रत्ना के मानस में गूँजता है ''रतन समुझि जिन विलग..'

और कुछ देर को मन सघन आश्वस्ति से भर उठता है. नन्ददास के प्रति कृतज्ञ है वह.

उन्हीं से कभी-कभी समाचार मिल जाते हैं .पर उनका आना ही कितना होता है .

चंदहास से प्रायः ही मिलना हो जाता है.

विदित हुआ तुलसी का डेरा इन दिनों काशी में है,

मिलने की लालसा तीव्र होती जा रही है. एक बार मिल कर अपना समाधान करना चाहती है. मन की शंकाएँ दूर करना चाहती है.

रत्ना ने नन्ददास से पूछा था -

‘मेरे लिये पूछते हैं कभी?’

‘उन्हें चिन्ता रहती है ,तुम्हारी कुशलता बताता हूँ तो उनके मुख पर कैसा भाव छा जाता है भौजी, मैं बता नहीं सकता.’  

नन्ददास और चन्दहास जानते हैं उसके मन की इच्छा. पूरी सहानुभूति भी है उन्हें.लेकिन द्विधा में पड़ जाते हैं 

नन्ददास सोचते हैं इस विषय में दद्दा से बात करें . लेकिन डरते हैं कहीं मना कर दिया तो..!

  उन्हें याद है एक बार तुलसी ने कहा था,' नन्दू यह मन ऐसा ही है ,कस कर रखना पड़ता है नहीं तो जरा ढील पाते ही अपने लिये कहीँ कोई सँध खोज लेता है.

‘जिस जीवन को  पीछे छोड़ आय़ा हूँ अब उस जीवन के विषय में सोचना  नहीं चाहता....

'राम की लौ में वह सब छोड़ आया हूँ ,नन्दू ,अभिमानवश या सुख की -आनन्द की खोज में नहीं.'

दद्दा का मन वे नहीं समझ पाते,.सोच में पड़ जाते .हैं

.रत्नावली एकदम चुप है.

नन्ददास ने बताया था -

‘मैंने उनसे पूछा था दद्दा, कुछ दिन शान्तिपूर्वक एक स्थान पर निवास क्यों नहीं करते? 

कहने लगे जहाँ जहाँ राम के चरण पड़े वहाँ की धूल सिर धर  राम के चरित को गुन रहा हूँ.’ 

अपने ही कहे बोल रत्ना के कानों में बज उठे.अन्तर चीत्कार कर उठा, हाँ, हाँ,तूने ही  कहा था उनके चरण अनुसरे बिना, चरित गुने बिना कैसे राम की थाह मिले ! 

आशा-निराशा में दिन बीतते जाते हैं.

एकान्त उदासी के प्रहरों में निराशा घिर आती है. मन में गहरा पछतावा उठता है, और स्त्रियों को पति के अपने प्रति प्रेम का ,अभिमान होता है कि मेरे प्रेम में किस सीमा तक जा सकते हैं ? उन्हीं बातों से मैं अनखाने लगती हूँ .

मैं ऐसी क्यों हूँ ? .

.और फिर अजानी शंकाएँ उठने लगती हैं.

अपने को समझाती है - रतन समुझि जिन विलग मोंहि.

 मैं उनसे अलग नहीं हूँ 

सूचनाएं मिल रही हैं रत्ना को. लगा अनुकूल अवसर आ गया .

भौजी का आग्रह और चंदहास का सहयोग ,नन्ददास की अनुकूलता भी उन्हें प्राप्त है.

रत्नावली के काशी पहुँचने का डौल बन गया. 

*

उस दिन तुलसी ने जब खीझ कर कह दिया  -

'तो अब तुम्हीं जानो.' 

एकदम नन्ददास का .चेहरा उतर गया था.

फिर मन ने समझाया - 

ये मुझे हड़का रहे हैं ,ऐसा कैसे कर सकते हैं भौजी के साथ ? 

 इतना कठोर हिया नहीं हो सकता!

हो लें मुझ पर गुस्सा ,पहले पूछा नहीं न! इसीलिए...

मन में खटका फिर भी बना रहा.

सुबह-सुवह चक्कर लगाया. डेरे में सन्नाटा पड़ा था.

ओह , चले गये ! 

रत्नावली के यहाँ आने में अप्रत्यक्ष रूप से उनकी भूमिका रही थी. पर क्या सोचा था और क्या हो गया!

 उलझन में पड़े वहीं चक्कर काट रहे हैं...

इतने में देखा हाथ में थैली लिये भौजी चली आ रही हैं.उन्हें देख समीप चली आईँ 

पालागन कर नन्दू बोले,’ रास्ता ठीक रहा?’ .

‘हाँ ,यहाँ सब ठीक है ?’

चारों ओर देख रही हैं.

नन्ददास समझ गये ,कहने लगे,

‘वैसे भौजी ,यह स्थान आपके लिये ठीक नहीं .कहने को साधु संत हैं लेकिन इनके कुण्ठित मनों में दुनिया की कुत्सायें भरी हैं.’ 

‘कौन मुझे यहाँ रहना है!’

क्या कहें .कुछ तो भी बोले जा रहे हैं,

‘दद्दा कहते हैं  जितना समझ में आता है उतना ही समझने को को रह जाता है. आत्म-शुद्धि हेतु तीर्थों का सेवन करता हूँ  साधु-संगति का लाभ पाने का प्रयास करता हूँ.

कैसे एक जगह टिक सकता हूँ?’ 

रत्नावली मौन सुन रही है.

असहाय से खड़े रहे कुछ देर 

‘भौजी, दद्दा को जाना था.’

हत्बुद्ध-सी बोल उठी,' क्या ?वे यहाँ नहीं है?’

‘वे चले गये.’

वैसी की वैसी खड़ी रह गई, एकदम सन्न!

फिर बोल फूटे,

‘देवर जी सच्ची बताओ तुमने उन्हें कब  बताया था ?’

कबूल दिया – ‘कल.’

‘और वे चले गय!. मुझे अपने मार्ग की बाधा समझ कर?.....

क्या बोले थे वे?’ 

‘वे ऐसी जगह नहीं मिलना चाहते थे जहाँ लोगों की कुत्सा भरी निगाहें हर पल देखती रहें .तुम्हारे लिये दस तरह की बातें उठें .

‘इतनी बड़ी नगरी में छोटी-सी भेंट के लिए कहीं निरापद  स्थान  नहीं रहा?’

‘यहाँ के अधिकतर साधु-सन्न्यासी , जानती हो –दद्दा अच्छी  तरह  समझ गये हैं.'नारि मुई गृह संपति नासी, मूड़ मुड़ाए भए सन्न्यासी'. मानसिकता वही है.’

‘जिसकी जैसी वृत्ति होगी उसी राह जायेगा -उन सब के लिये पत्नी के न होने से कोई रास्ता बंद नहीं होता ,और भी राहें खुल जाती हैं पर अकेली स्त्री के लिए सारे रास्ते बन्द  हो जाते हैं , वहीं पड़े-पड़े दिन काट दो.उनके लिये सब विहित,  उसके लिये सब वर्जित .. 

‘हमारा संबंध ऐसा कच्चा  तो नहीं था कि सामने  आ कर 

 मन की बात सीधे  कह क्यों  नहीं सके.

‘मेरे लिये यहाँ तक आ पाना कितना कठिन था और वे जान कर एकदम चले गये!

 कुछ तो होगा उनके मन में  मुझसे कह जाते.

एक ही मार्ग के राही -सहयोगिनी बनना संभव नहीं  हो सका,तो ,उनकी दुर्बलता नहीं बनूँगी.’ ,नन्ददास असहाय से हो उठे. मुख से निकला ,’अरे हाँ, कहीं और मिल लेते.’

‘नहीं, नहीं उन्हें दोष मत दो ,मानव स्वभाव बड़ा विचित्र होता  है.’

‘अपनी गृहस्थी के सपने देखना तो कब का छोड़ दिया था,थोड़ा मानसिक संबल ..मिल जाता ,.

उनके सत्संग की, ज्ञान की ऊँचाइयों की थोड़ी छाँह मिल जाती.मेरा जीवन सफल होता

पर....मुझे तो वहीं का वहीं पड़े रहना है.’

‘अरे भौजी,मैने तुम्हें अब तक पानी को भी नहीं पूछा.’

‘नहीं , मेरा व्रत है आज.’

‘ऐसा कैसे? माँ अन्नपूर्णा के द्वारे से कोई रीता नहीं जाता. प्रसादी तो ग्रहण करनी ही पड़ेगी .

यहाँ तक आई हो तो तो माँ अन्नपूर्णा, और बाबा विश्वनाथ के दर्शन बिना चली जाओगी?

चलो भौजी, माँ के दरबार में हाज़िरी दिला कर ,तुम्हें घर पहुँचा आता हूँ.’. 

**

(क्रमशः)

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

राग - विराग : 6.

6.

.नन्ददास तुलसी से काशी में प्रायः ही भेंट करते रहते थे.

'कुछ दिन टिक  कर एक स्थान पर रहो दद्दू, आराम रहेगा और लिखने-पढ़ने में भी सुविधा रहेगी.'

'समाज की वास्तविक दशा को जाने बिना लिखना उद्देश्यपूर्ण कैसे हो सकता है नन्दू? तीर्थयात्रा करता ही इसलिये  हूँ कि देश के सुदूर स्थानों तक पहुँचूँ,लोक-जीवन को पास से देखूँ, वास्तविकता समझूँ. और पुनीत स्थानों में जा कर मन का कलुष धो सकूँ.'

नन्ददास को चुप देख फिर बोले,' उन्होने सारा जीवन लोक-कल्याण में लगा दिया उनका भक्त अपना सुख ही देखेगा क्याचरण-चिह्न छोड़ गये हैं, अनुसरण करना हमारा धर्म.' 

'महान् हो दद्दा, मैं तो तुम्हारी छाया भी नहीं.'

'कुछ नहीं हूँ मैं, बस रामकाज में लगा हूँ. '

एक  दिन नन्ददास ने पूछा था,' दद्दूभौजी से नाराज हो?सच्ची बताना.... ,उस दिन .. तुम्हें झटका लगा था?'

तुलसी सिर झुकाए कुछ क्षण सोचते रहे ,फिर बोले,' झटका नहीं लगा, यह कैसे कहूँ ? लगा और बड़े जोर का लगा.लेकिन उस झटके से हिय के नयन खुल गये. जो मेरे भाग्य में नहीं वो कैसे मिलेगा! उसने तो मुझे चेता दिया.सच में नन्दू जो-जो मुझसे जुड़े सब असमय छोड़ गये. अब तुम्हीं विचारो जिसके बिना एक दिन में इतना व्याकुल हो गया, वह देह भी भंगुर है, मेरा जनम का अभुक्त दोष, उसे भी ले बैठे तो....

अपने ऊपर बड़ा पछतावा हुआ उस दिन. अब उसी से संबंध जोड़ूँगा जिससे कभी नहीं  टूटे.'

 'लेकिन भौजी बहुत पछताती हैं, उन्हें लगता है कि उन्हें संयम रखना चहिये था.'.

'रतन ने वही किया जो उचित था. हृदय में जो उमड़ती हुई बात परस्पर भी न बता सकें तो काहे का दाम्पत्य! अंतर्मन से जो कुछ राम जी की प्रेरणा से उमड़ा वह नहीं कहती तो मन निरन्तर कचोटता, अपराध-बोध सालता.'

 उनके मुख का भाव गहन हो उठा था

'बाल्यवस्था में जिनने भटकने से त्राण दिलाया, मैंने विवाह कर उन्हें बिसरा दिया.

नन्दू, मुझे भान हो गया है, संसार के सुख मेरे लिए नहीं है.'

कुछ क्षण सोचते रहे फिर तुलसी ने पूछा,

'तुम उनसे मिलते हो?'

'हाँ क्यों नहीं ?और चन्दू पर तो उनका अनूठा वात्सल्य है.'

चन्दू?नन्दास का छोटा भाई, नाम है- चंदहास.

'इस परिवार की बड़ी बहू हैं हमारी माननीया हैं. खोज-खबर रखना हमारा धरम.'

 और चन्दू, वह भी उधर गये पर मिले बिना नहीं रह सकता. भौजी के लिये सबसे लड़ जाता है.'

दोनों देवरों को रत्ना से बहुत सहानुभूति है. बड़ाई करते नहीं अघाते. उनकी निष्ठा और त्यागपूर्ण जीवन ने उनके वैदुष्यपूर्ण, संयत जीवन को और दीप्त कर दिया है.

पीहर और ससुराल के संबंधियो में रत्नावली का बहुत सम्मान है.

अचानक नन्ददास ने पूछा,'दद्दा, भौजी यहाँ आयें तो ...?'

तुलसी चौंके.

'कैसी बात करते हो?!

'नहीं सच में .उनकी बड़ी इच्छा है एक बेर तुम्हारे दरसन करें .'

'यह कैसे हो सकता है?'

काहे नहीं हो सकता ? आखिर को तुम्हारी पत्नी हैं . भइया, तुम भी तो कभी उन्हें सोचते होगे.'

'हाँ, बस यही मनाता हूँ कि वह सकुशल रहे ,कोई कष्ट न हो.' ..

' पर, वे तो यहाँ आ रही हैं '

वे चौंके ,' कब?'

'बस एक-दो दिन में यहाँ पहुँच जायेंगी.'

'यहाँ कहाँ रहेगी ?.मेरे पास कुछ भी तो नहीं उसके लिये.यह जगह उसके रहने जोग है ?जानते हो इन लोगों को ?कैसे कैसे साधु हैं यहाँ एक से एक गँजेड़ी ,भँगेड़ी. नारि मुई गृह संपति नासी ,मूँड़ मुँड़ाये भए सन्न्यासी. और कैसी-कैसी विकृत मानसिकता! .

नन्ददास क्या बोलें !

तुलसी कहते रहे ,'जैसी कुत्सा मनों में भरी  है, वैसी ही बातें करेंगे. रतन यहाँ आई तो कैसे देखेंगे उसेक्या कहने से छोड़ देंगे? जीभ पर लगाम देना तो जानते नहीं.

फिर एक चुप्पी.

' नन्दू ,तुम्हीं ने यह किया होगा .ऊँच-नीच कुछ नहीं सोचा.अरे, एक बार मुझसे ही पूछ लेते.'

मन में आया इनसे पूछना इतना आसान है क्या.

पर नन्ददास बोले कुछ नहीं.

तुलसी ने पूछा -' बताया किसने कि मैं यहाँ हूँ ?'

'तुम्हारी खबर रखती हैं वे , पिछली बार तुम्हार सँदेसा पा मगन हो गईं थीं भौजी,आनन्दाश्रु

 छलक आये थे. बोली थीं ,तुम्हारे दद्दा मुझे अपने से अलग नहीं मानते.'

झूठ नहीं बोलूँगा तुम्हारे आगे. उछाह केआवेश में मैं ही बता आया था .भौजी के मुख को देख कर मैं अपने को रोक न सका, '

सिर झुका कर बोले ,' पर हमने आने को नहीं कहा  था. वे तो कब से चाह रहीं थीं बस मौका नहीं मिला था.'

'और इस बार मिल गया?'

'हम तो वहाँ जाते ही कितना है! चंदहास से बात-चीत होती रहती है उनकी . चंदू वहीं रहता है न ..

हमें तो उसी से पता चला .'

'वह आयेगी यहाँ मिलने ?इस खुले डेरे में ,चारों ओर विकृत चर्चाओं की हवा में ...

ऐसे लोगों के बीच न आये रतन, लोग तो भद्दीबातें फैलाने को उधार खाये बैठे होते हैं .'

नन्ददास स्तब्ध .

'रतन यहाँ आयेगी, कहाँ टिकेगी ?'

तुलसी आवेश में बोले जा रहे हैं , 'मैं सब प्रकार से साधन हीन. भिक्षा माँग कर पेट भरता हूँ .मंदिर में उनने मस्जिद बना डाली. मैं राम का नाम लेकर वहीं कहीं सो जाता हूँ कि कपटी साधुओँ की चर्चा में न पड़ूँ. किसी से लेना एक न देना दो. लेकिन लोगों की कुत्सित दृष्टियाँ उस तक पहुँचेंगी.  कौन रोक लेगा?

'मुझे ही धूर्त,जुलाहा ,रजपूत जाने क्या-क्या कहते फिरते हैं .मुझे तो कोई अंतर नहीं पड़ता,  पर उसका क्या कोई मान-सम्मान नहीं?  कैसे-केसे विकृत आरोपण करते हैं लोग ,सोचा है कभी? अपनी कुत्सा के आरोपण में चूकेंगे नहीं. रतन के लिये ये स्थान नहीं .सब की कौतुकी दृष्टियों का केन्द्र होगी वह,यहाँ सब कैसे-कैसे सन्यासी हैं जानता हूँ मैं, पराई स्त्रियों को  लोग  कैसी निगाहों से दखते हैं .यहाँ तो सब ओर यही लोग हैं.  कौन साधु हैं ,कौन असाधु, कौन जाने !

'अपने मन की कुत्साएँ निकालने का एक मार्ग मिल जायेगा उन सबको . रसभरी चर्चा के लिये एक मसाला मिल जायेगा.रतन के साथ ऐसा हो, नहीं  नन्दू ,वह नौबत न आये .उसे मान न दे सका पर  दूषणों  से तो बचा ही सकता हूँ .'

 

तुलसी को इतना उत्तेजित पहली बार देख रहे थे.लगता है उनका अंतर्मन तक दहल गया हो जैसे.

क्या केवल उत्तेजना थी, आँखो में जो छलकन  उतर आई वह भी तो एक सच है.....

'तुमने बताया कि आजकल  यहाँ हूँ ?'

'  बातों  बातों में मैं ही कह बैठा था,तुम्हारे बारे में बहुत बातें पूछती हैं .'

मन ही मन पछता रहे थे नन्ददासरत्ना के प्रति सहानुभूति भरे मन ने बिना सोचे-विचारे ,चंदहास की बातों में आ, भावुकता में यह क्या कर डाला ?

लेकिन अब ... नन्द दास का चेहरा उतर गया.

' अब? वे तो आ रही हैं ,कल ....' नन्ददास घबरा कर कह उठे

'अब बता रहे हो जब  पानी बिलकुल सिर से ऊपर आ गया.'

'तो अब तुम्ही जानो!'

*

'तुम्हीं जानो' कहने भर से क्या मन शान्त रहता है!

ओह,रतन यहाँ ! आँखों के सामने !मैं सोच भी नहीं सकता!

 जीवन में बहुत तरसा हूँ , वहाँ से विरत हो कर चला आया .अब बस मन  पर संयम रहे  ,नारद जैसा मुनि ,विचलित हो सकता है फिर मेरी क्या विसात! 

प्रभु, अब परीक्षा न लो.रक्षा करो ! अपने आश्रय में पड़ा रहने दो. बुद्धि चेताती है किन्तु  मन के उत्पातों  से भय खाता हूँ . किसी दुर्बल क्षण में  सारे भान खो कर ,संयत न रह पाऊँ  ....

नाथ, तुम तो अंतर्यामी हो!

नहीं होगा, नहीं होगा मुझसे, फिर मिलना और फिर दूर हो जाना.

मुझे साहस दो प्रभु!

मानव बन कर अवतार लिया तुमने ,मानवी संवेदनाओं को भोगा, निभाया,

अब तुम्हीं मेरा मार्ग दर्शन करो! 

मैं आज जान पा  रहा हूँ वह कारण कि  माँ जानकी को,भवन से निर्वासित कर  वन पहुँचाने का, निर्मम दायित्व अनुज को सौंप दिया , क्यों स्वयं सम्मुख  नहीं आ सके थे !

और कोई मार्ग नहीं सूझ रहा प्रभु. इस समय की विचारणा जो  कहे वही स्वीकारता हूँ , उचित-अनुचित जो समझो -  मुझे क्षमा कर देना!

और अगली भोर, तुलसी बिना किसी को  बताए वहाँ से  प्रस्थान .कर गये.

*

(क्रमशः)

*


 

 

 

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

छोटे मियाँ सुभानअल्लाह!

 छोटे मियाँ सुभान अल्लाह. 

बचपन  में मेरा बेटा कुछ ज़्यादा ही अक्लमन्द था..बाल की खाल निकाल देता था. एक बार उसकी एक चप्पल कहीं इधर-उधर हो गई ,वह एक ही चपप्ल पहने खड़ा था.मैने देखा तो कहा अच्छा एक ही पहने हो दूसरी खो गई ? और हमलोग इधऱ-उधर डूंढने लगे.

उसके पापा ने आवाज़ लगाई , 'आओ जल्दी..'

मैने उत्तर दिया,'उसकी एक चप्पल नहीं मिल रही है ,देख रही हूँ ..'

वह सतर्क हुआ बोला,' मम्मी एक तो है दूसरी नहीं मिल रही है.'

मैं खोजने में लगी रही ध्यान नहीं दिया .

देर होती देख उसके पापा चले आए.

'क्या हुआ ?' 

'इसकी एक चप्पल नहीं मिल रही .'

वह फिर बोला, ' एक तो पहने हूँ, दूसरी नहीं मिल रही.'

मेरे मुँह से निकला, 'अच्छा..'

नीचे से माली की आवाज़ आई - 

'ये एक चप्पल किसकी नीचे गिरी पड़ी है ?'

इन्होंने कहा, ' देखो एक नीचे गिरा दी है .'

उसने  फिर स्पष्ट किया,' एक नहीं वह दूसरी है .'

ताज्जुब से उसे देख कर बोले , 'हाँ,हाँ एक नीचे पड़ी है.' 

उसने ज़ोर से प्रतिवाद किया, ' एक नहीं  दूसरी नीचे पड़ी है '

'हाँ ,हाँ एक तुम्हारे पाँव में और एक नीचे' -मैंने समझाया .

वह क्यों समझता ,खीझता हुआ बोला दूसरीवाली नीचे है ,एक तो ये हैं.

हमलोगों ने आश्चर्य से एक-दूसरे को देखा .

मैंने फिर समझाने की कोशिश की 

'हाँ ,हाँ एक तुम पहने हो और एक नीचे '.

वह जोर से बोला -

'एकवाली तो मैं पहने हूँ नीचे  दूसरीवाली है .' .

हम दोनों निरुत्तर.

हम समझा रहे हैं,वह हमारी बात कब समझेगा आखिर!

कोई एक बार की बात थोड़े ही .आये दिन कुछ-न-कुछ

दशहरे पर रामलीला के बाद इन लोगों को रावण -दहन दिखाले ले चले.

रावण का पुतला देख कर मुझसे पूछा ,मम्मी ये सच्ची का रावण है 

'नहीं.'

'तो इसे जलाते क्यों हैं ?'

मैं चुप रही .

 'इसे जलाते क्यों हैं, मम्मी ?'

मैं कहूँ तो क्या कहूँ .

फिर वही, 'क्यों मम्मी?'

अच्छा अभी तो चलो .

लेकिन वह पूछे जायेगा जब तक समाधान नहीं हो जाये,पूछता रहेगा .

हार कर कह दिया, 'अभी चलो बाद में बताऊँगी .'

और कुछ भी सुन लीजिये- बिजली का बिल जमा कराना था. कहीं रख दिया था और मिल नहीं रहा था.

ढूँढ पड़ी थी - बिजली का बिल कहाँ है ?

 

वह बोला यहाँ है बिजली का बिल .

खुश हो कर हम लोग दौड़े ,'कहाँ ?' 

वह ले गया ,मिक्सी चलाने के लिये जहाँ से प्लग को कनेक्ट करते हैं उन सूराखों को दिखा कर बोला,ये है बिजली का बिल.'

बिजली का बिल? 

हम दोनों एक-दूसरे का मुँह देख रहे हैं. 

अब तक चूहे का बिल देखा होगा ,अब बिजली का भी देख लीजिये - यहाँ रहती है बिजली.

वाह रे भगवान, इन छोटी खोपड़ियों में दूसरों का दिमाग़ चाटने की अक्ल  भरने में तुम खूब एक्सपर्ट हो!

*



मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

राग-विराग -5.

 *

हिमाचल-पुत्री गंगा, शिखरों से उतर उमँगती हुई सागर से मिलने चल पड़ती है. लंबी यात्रा के बीच मायके की याद आती है तो मानस लहरियाँ उस ओर घूम जाती हैं.  इस स्थान पर आकर उन्होंने दक्षिण से उत्तर की ओर  प्राय: चार मील का घुमाव लिया है. परम पुनीता, उत्तरमुखी सुसरिता के इसी उमड़ते स्नेहाँचल के, आग्नेय कोण में स्थित है अनादि नगरी-  काशीपुरी! काशी शब्द का अर्थ ही है, प्रकाश देने वाली - जहाँ ब्रह्म प्रकाशित हो. समय-समय पर महान् चिन्तकों और आध्यात्मिक विभूतियों ने इसकी चैतन्यता को उद्दीप्त रखा है 

बालपन की दारुण दशा के बाद, भूख से बिलबिलाते,परित्यक्त बालक ने माँ अन्नपूर्णा  की छाँह में शरण पाई थी. तुलसी की सारस्वत-साधना की केन्द्र भी यही नगरी रही. गुरु नरहर्यानन्द जी के सान्निध्य और शेषसनातन जी के पास रहकर तुलसीदास ने पन्द्रह वर्ष तक वेद-वेदांग का अध्ययन किया था, यहीं रह कर  भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं से परिचित हुये थे. दोनों सद्पुरुषों की परिष्कृत, उदात्त मानसिकता और सजग चेतना का प्रभाव तुलसी का कायाकल्प कर, उनके व्यक्तित्व में दीप्ति भर गया. शेष जीवन काशी से उन्हें विशेष लगाव रहा था.

उनके चचेरे भाई नन्ददास (जीवाराम के पुत्र)  भी युवा होने पर  काशी में  विद्याध्ययन करने आये. दोनों की परस्पर भेंट होती रहती थी. यहाँ रह कर परस्पर आत्मीयता विकसित हुई. नन्ददास, अग्रज  तुलसी के प्रति सम्मान और श्रद्धा का भाव रखते थे,और उनसे प्रायः सलाह-मशविरा करते रहते थे. कालान्तर में नन्ददास कृष्ण-भक्ति में दीक्षित हो, अष्टछाप के कवियों में गण्य हुये. 

एक बार वैष्णव भक्तों का एक दल द्वारका प्रस्थान करनेवाला था, नन्ददास भी जाने को उत्सुक थे.उन्होंने अग्रज से पूछा,बड़ा सुन्दर अवसर मिला है .हम भी उसके साथ जाना चाहते हैं.

काहे वहाँ क्या है ?

भगवान रणछोड़ के दर्शन का लाभ मिलेगा .उस पुनीत पुरी के वास का सौभाग्य मिलेगा. 

दल  के साथ जाओगे ? 

अपने समाज के साथ आनन्द ही आनन्द रहेगा. मस्ती में नाचते-गाते पहुँच जायेंगे.सब साथ होंगे ,किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं.

कुछ क्षण चुप रहे तुलसी.फिर बोले ,उसमें कुछ जोखिम भी है.

जोखिम ?

'तियछवि छाया ग्राहिनी' बीच में ही गह ले, तो...?

तुलसी  उनके  मस्तमौला, रसिक स्वभाव से भलीभाँति परिचित थे.

नन्ददास संकेत समझ गये . एक रूपवती खत्रानी पर रीझ कर कैसे सारी लोक-लाज छोड़ उसके घर के चक्कर लगाने लगे थे, परेशान होकर उसके परिवार जन गोकुल चले गये, तो वहाँ भी जा पहुँचे थे.

बात तुलसी तक पहुँची, उनकी धिक्कार और  गोसाईं विट्ठलनाथ जी के सदुपदेश से मोह-भंग हुआ. उन्हें कृष्णभक्ति रास आ गई ,कालान्तर में वे अष्टछाप के कवियों में मान्य हो गए.

कुछ खिसियाते-से नन्ददास बोले,अब वे बातें काहे बीच में लाते हो दद्दा, तु्म्हारी बात सुनी नहीं क्या हमने ? हमने विट्ठलस्वामी से दीक्षा ले ली है.अब तो ब्रजराज श्याम ही हमारे सर्वस्व हैं. 

नन्दू,अकेले भ्रमण में व्यक्ति अपनी खुली आँखों के चतुर्दिक् देखता-समझता चलता है. और साधु तो सबका कल्याण चाहता है. हमने तो तुम्हें चेता दिया है.

नन्ददास चुप सुनते रहे.

तुमने कबीर जी की वह उक्ति सुनी है 'लालन की नहिं बोरियां...'..?

हाँ,हाँ यों है - 

'सिंहन के नहीं लेहड़े ,हंसन की नहिं पाँत,

लालन की नहिं बोरियाँ साधु न चले जमात.'

कैसा गूढ़ अर्थ छिपा है इसमें .

समझ रहे हैं , लेकिन हम तो कृष्ण प्रेम के मार्गी हैं. निचिंत रहे दद्दू,सप्ताह -दस दिन में हम लौट आयेंगे.

तुलसी दास ,लघु भ्राता को प्रोत्साहित करने में कभी पीछे नहीं रहे

 उन्होंने कहा था नन्दू ,तुम भी कुछ कम विद्वान नहीं हो .अपने अनुभवों का पाठ भावसंपदा  भी बढ़ाएगा ,तुम कुशल हो.जहाँ अन्य कवि  कवित्त गढ़ते हैं तुम उक्ति को ऐसे जड़ देते हो जैसे स्वर्ण में रत्न. और अभी तो निखर रहे हो .

अपने भ्रमण-क्रम में तुलसीदास जी ,वृन्दावन पहुँचे. तब तक वे राम-भक्त के रूपमें पर्याप्त ख्याति पा चुके थे. वृन्दावन श्रीकृष्ण की लीलाभूमि रहा है तुलसी ने अनुभव किया कि  यहाँ के आम, ढाक, खैर भी राधा-राधा का जाप करते हैं.

जब वे ज्ञान गुदरी में श्री मदन मोहन के परिसर में पहुँचे  तब भक्तमाल के रचयिता नाभादास तथा कुछ अन्य जन भी वहाँ उपस्थित थे.रामभक्त, तुलसी के आगमन की सूचना सबको हो गई थी.

मन्दिर के पुजारियों में परशुराम नाम का एक पुजारी बोला ये तो मदन-गोपाल की लीलाभूमि है, यहाँ रामभक्त कैसे पधार गये?

और तुलसी को देख हँस कर बोला, आपके इष्ट तो राम जी हैं !

 'बिना आपुने इष्ट के नवै सो मूरख होय.'

तुलसी दास जी ने सुना ,शान्तिपूवर्क विग्रह के हाथ जोड़े, विनत हो कर बोले- 

'कहा कहौं छवि आज की, भले बने हो नाथ,

तुलसी मस्तक तब नवै, जब धनुष बान ल्यो हाथ.'

.अचानक श्याममूर्ति में मुद्रा-परिवर्तन का आभास हुआ सबके विस्मित नयनों में धनुर्धारी की ओजपूर्ण मुद्रा झलकी, 

और गद्गद् तुलसी ने भूमिष्ठ हो दण्डवत् प्रणाम किया.

घटना की स्मृति-स्वरूप यह दोहा प्रचलित हो गया -

 ‘मुरली मुकुट दुराय कै, धर्यो धनुष सर नाथ। तुलसी लखि रुचि दास की, कृष्ण भए रघुनाथ।.’  

इतिहास साक्षी दे या न दे , लोक-श्रुति साक्षी है कि भक्त की मान-रक्ष हेतु, कृष्ण की मूर्ति राम की मूर्ति में परिणत हो  गई थी.

(क्रमशः)

*


शनिवार, 30 जनवरी 2021

चित्रगुप्त जी की बेरुख़ी -

*

 एक विशेष घटना जिसके फल स्वरूप सृष्टि में अव्यवस्था फैल गई थी 

,कायस्थ लोग दीपावली की भाई दूज पर चित्रगुप्त जी की पूजा के  क्रम में लेखनी और मसि पूजन के पश्चात्  अगले दिन तक के लिये लेखन कार्य स्थगित कर ,कलम रख देते हैं.
इसके पीछे एक बड़ा कारण है .एक ऐसी महत्वपूर्ण धारियों को न्याय मिलना असंभव हो गया था.

इसके पीछे एक बड़ा कारण है .एक ऐसी महत्वपूर्ण धारियों को न्याय मिलना असंभव हो गया था.
हुआ यह था 
 जब श्रीराम लंका विजय कर अयोध्या लौट रहे थे, उनके प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रहे, भरत जी ने सोचा कि उनका राज्य उन्हें अर्पण कर अब यथाशीघ्र भार-मुक्त हो जाऊं. गुरु वशिष्ठ की सहमति से , वे राम जी के राज्याभिषेक की व्यवस्था में लग गए.भरत जी ने गुरु से उस अवसर पर सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित करने का निवेदन किया. प्रसन्न मन गुरु वशिष्ठ ,आमंत्रण भेजने का काम शिष्यों को सौंप  अन्य कार्यों में व्यस्त हो गये.
राजतिलक के समय जब श्रीराम ने आगत देवी देवताओं में श्री चित्रगुप्त जी नहीं पधारे थे, श्री राम ने भरतजी से पूछा कि उनका आगमन क्यों नहीं हुआ.. खोज-बीन करने पर पता चला की गुरु वशिष्ठ के शिष्यों द्वारा उन तक निमंत्रण पहुंचाया ही नहीं गया.
 पल-पल की ख़बर रखनेवाले  चित्रगुप्तजी सब-कुछ जान चुके थे उन्होंने इस भूल को अक्षम्य मानते हुए सभी प्राणियों का लेखा-जोखा बही सामने से खिसका दी और लेखनी परे रख दी .
जब सारे देवी-देवता राजतिलक से लौटे तो देखा बहुत अव्यवस्था मची हुई है. प्राणियों के कर्म का लेखा-जोखा हुआ ही नहीं.और यह निश्चित करना संभव नहीं कि किसकी कौन-सी गति हो. फलस्वरूप  स्वर्ग-नरक के सारे काम रुक गये हैं. 
 सारा मामला श्री राम की समझ में आ गया. इस भारी चूक के परिमार्जन के लिए श्रीराम  गुरु वशिष्ठ के साथ  अयोध्या में श्री चित्रगुप्त जी के स्थान श्री धर्म-हरि मंदिर गये और उनकी स्तुति की.तत्पश्चात चूक के लिये क्षमा-याचना करते हुए उनसे सृष्टि-संचालन में सहयोग देने की प्रार्थना की.
श्री चित्रगुप्त जी ने राम का आग्रह स्वीकार कर लिया. उन्होंने  प्रातःकाल   विधिपूर्वक मसि-पात्र सहित लेखनी की पूजा कर उसे ग्रहण किया प्राणियों के कर्मों का विवरण सूची-बद्ध करने के लिए बही उठा ली और लेखन-कार्य पुनः आरम्भ कर दिया. सृष्टि का कार्य विधिवत् चलने लगा.
लेकिन इस बीच चौबीस घण्टे उनकी लेखनी निष्क्रिय रही थी. कायस्थ समाज ने इसका संज्ञान लिया और तभी से पूरी दुनिया में कायस्थ-जन  दीपावली पर 24 घंटों के लिए क़लम रख देते है और अगले दिन क़लम- दावात के पूजन के बाद ही उसका प्रयोग करते हैं.
(अयोध्यापुरी में भगवान् विष्णु द्वारा स्थापित श्री चित्रगुप्त मन्दिर को 'श्री धर्म हरि मंदिर' कहा गया है. धार्मिक मान्यता है कि अयोध्या आने वाले सभी तीर्थयात्रियों को अनिवार्यत: श्री धर्म-हरि जी के दर्शन करना चाहिये, अन्यथा उन्हें तीर्थ यात्रा का पुण्यफल प्राप्त नहीं होगा. भी यह उल्लेख अयोध्या माहात्म्य में  मिलता है).

स्वामी विवेकानन्द ने अपनी जाति की व्याख्या कुछ इस प्रकार की है:
मैं उन महापुरुषों का वंशधर हूँ, जिनके चरण कमलों पर प्रत्येक ब्राह्मण ''यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नमः'' का उच्चारण करते हुए पुष्पांजलि प्रदान करता है और जिनके वंशज विशुद्ध रूप से क्षत्रिय हैं। यदि अपने पुराणों पर विश्वास हो तो, इन समाज सुधारकों को जान लेना चाहिए कि मेरी जाति ने पुराने जमाने में अन्य सेवाओं के अतिरिक्त कई शताब्दियों तक आधे भारत पर शासन किया था। यदि मेरी जाति की गणना छोड़ दी जाये, तो भारत की वर्तमान सभ्यता शेष क्या रहेगा? अकेले बंगाल में ही मेरी जाति में सबसे बड़े कवि, इतिहासवेत्ता, दार्शनिक, लेखक और धर्म प्रचारक हुए हैं। मेरी ही जाति ने वर्तमान समय के सबसे बड़े वैज्ञानिक (जगदीश चन्द्र बसु) से भारतवर्ष को विभूषित किया है। स्मरण करो एक समय था जब आधे से अधिक भारत पर कायस्थों का शासन था। कश्मीर में दुर्लभ बर्धन कायस्थ वंश, काबुल और पंजाब में जयपाल कायस्थ वंश, गुजरात में बल्लभी कायस्थ राजवंश, दक्षिण में चालुक्य कायस्थ राजवंश, उत्तर भारत में देवपाल गौड़ कायस्थ राजवंश तथा मध्य भारत में सातवाहन और परिहार कायस्थ राजवंश सत्ता में रहे हैं। अतः हम सब उन राजवंशों की संतानें हैं। हम केवल बाबू बनने के लिये नहीं, अपितु हिन्दुस्तान पर प्रेम, ज्ञान और शौर्य से परिपूर्ण उस हिन्दू संस्कृति की स्थापना के लिये पैदा हुए हैं।
—स्वामी विवेकानन्द.


शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

राग-विराग - 4.



['मोइ दीनों संदेस पिय, अनुज नंद के हाथ।

रतन समुझि जनि पृथक मोहि, जो सुमिरत रघुनाथ।।'

                              - रत्नावली]

*      *     *      *     *     *     *

'कैसी अद्भुत जोड़ी!'

विवाह समय सब ने कहा था कैसी अद्भुत जोड़ी- जैसे वर-कन्या के वेष में स्वयं सीता-राम विराज रहे हों!

लोगों की नज़र लग गई उस युगल पर. 

 'जड़ चेतन गुन-दोसमय बिस्व कीन्ह करतार..'

  विधाता गुण-दोषमयी सृष्टि रचकर अपने प्रयोग करता है. मानव के लिए विज्ञान और आनन्द का विधान तो किया पर सबसे पहले अन्न-प्राणमय देह ज़रूरी कर मनोमय को बीच में डाल दिया.आदमी बेचारा करे तो क्या करे?

 मन के उत्पात झेले बिना निस्तार कहाँ! 

दो प्रखर व्यक्तित्व संपन्न प्राणी मिलें तो जीवन सामान्य कैसे रह पाये.नियति पहले ही असामान्यता उनके हिस्से में लिख देती है. क्योंकि यहाँ सर्वथा दोषहीन कोई नहीं होता. 

और बुद्धि के हंस ने तुरंत विकार परख लिया. रत्नावली की बात तुलसीदास के मन को लग गई. कोई साधारण स्त्री होती तो पति पर उसके कहने का यह प्रभाव न पड़ता, गृहस्थी की गाड़ी ढचर-ढचर करती आगे बढ़ती रहती. जीवन का प्रवाह टकराता-बिछलता बहता रहता. पर यह रत्नावली थी और पति थे  तुलसीदास. दोनों  एक दूसरे की टक्कर के.कोई किसी से घट कर नहीं - न विचार-व्यवहार में न बुद्धि-विवेक न काव्य-कौशल में .दीनबन्धु पाठक की संस्कारशीला, सुशिक्षित परम रूपवती कन्या.जिसके लिये पिता को तुलसी के सिवा कोई उपयुक्त वर जँचा ही नहीं था.

तुलसीदास लौ़ट आए. पर अब घर, घर कहाँ था.

अचानक कैसा विपर्यय -.एकदम सब कुछ बदल गया.


 राजापुर में तुलसी के पिता पं० आत्माराम शुक्ल और पं० जीवाराम शुक्ल दो भाई थे पं.जीवाराम ,के पुत्र थे परम कृष्ण भक्त, अष्टछाप के कवि नंददास.

वहाँ जाकर जब यह पता चला कि उनकी अनुपस्थिति में उनके पिता भी नहीं रहे, मनका संताप तीव्र हो उठा. श्राद्ध कर्म संपन्न कर, विरक्त मन से काशी चले आये.

तुलसी के मानस में बार-बार वही शब्द कौंध जाते हैं.

रत्ना ने कहा था राम की कथा कहते हो,मर्यादापुरुष की कथा कहने के लिये, निर्मल प्रेम की महत्ता निरूपित करनेवाले राम के चरित को गुनना आवश्यक है. उसके बिना उन्हें वर्णित करना संभव नहीं. 

उन दिनों प्रयाग में माघ मेला चल रहा था। अपने यात्रा-पथ में वे वहाँ कुछ दिन के लिये ठहर गये।साधु-संतों का जमावड़ा लगा था.श्रद्धालु जन कथा-वार्ता ,व्रत-पूजा में समय बिता कर तीर्थराज का पुण्य-लाभ ले रहे थे 

गंगा तट पर दिन व्यतीत करते गोस्वामी जी के कानों में एक दिन कहीं से आते हुए राम कथा के स्वर गूंजे.उसी कथा के जो सूकरक्षेत्र में अपने गुरु से सुनी थी, पर बालपन की अबोधता में गुनने से रह गये थे .चकित हो कर उन्होंने चारों ओर देखा.

आभास हुआ वटवृक्ष के नीचे भारद्वाज और याज्ञवल्क्य मुनि  विराजे हैं, रामकथा का अनुश्रवण चल रहा है. यंत्र-चालित से नयन मूँद आवेष्टित  तुलसी सुनते रहे,राम की लीलाओं का साक्षात्कार करते रहे. 

 फिर अपने आराध्य की जन्म-स्थली जाये बिना तुलसी कैसे रह सकते थे, वे अयोध्या के लिये निकल पड़े.

जीवन की तीर्थयात्रा अनवरत चलती रही .तुलसी अधिकाधिक निर्लिप्त होते गये. आराध्य के चरणांकित किसी स्थान को छोड़ा नहीं उन्होंने .

*

इतना उत्कट प्रेम वहन करने के बाद मन का कागज़ कोरा रह कैसे रह सकता है! जीवन-पुस्तक के आगे के पृष्ठ लिखे जाने से पिछले अध्याय रिक्त नहीं होते. आधार से हट कर ऊपरी संरचना कहाँ जमेगी, कहाँ आगे का संभार टिकेगा! तार कहीं न कहीं जुड़ते चलते हैं.

कभी-कभी हृदय में आवेग सा उमड़ता है जो भीतर तक हिला जाता है. कुछ चुभता है, रह-रह कर दंश देता है.

तुलसी रत्ना को कब भूले! बस,रूपान्तरण हो गया. दीनबन्धु-पुत्री की   सुरञ्जित साड़ी आवेष्टित काया, हाड़-मांस की नाशवान देह न रह कर जनक-सुता के दिव्य रूप में परिणति पा गई. और उसी के साथ सारा परिवेश सिया-राम मय हो कर दिव्यता से आवरित हो गया.

 नवल तन पर सुन्दर साड़ी धारण किये('सोह नवल तन सुन्दर सारी' - राम चरितमानस) जनक-सुता के रूप में उस अवतरण की कान्ति से संपूर्ण मानस दीप्तिमान हो उठा. वन-वन भटकते, वर्षाकाल में 'प्रियाहीन' अकेले मन की व्यथा झेलते राम और उनके विरही मन को अभिव्यक्त करते भुक्तभोगी भक्त तुलसी के मानस के तार जुड़ गये. जीवन-व्यापी वियोग, भक्ति के आवरण में,सिया-राम की अमर कथा का एक मार्मिक अध्याय बन गया.


'जासु कृपा निर्मल मति पावौं,'

यह निर्मल मति उसी अनुकम्पा का प्रतिफल है, जो सारे जग को सिया-राम मय कर तुलसी की वर्णना में विकीरित हो रही है.

 

क्षणिक मोहावेश में सारी मर्यादायें भूले, तुलसी को धिक्कार कर रत्ना वन्दनीया हो गई.

नहीं, वह कोरी आसक्ति नहीं थी!

चित्त चेत गया और तुलसी ने जीवन के परम उद्देश्य का बोध पा लिया था.

 'हम तो पावा प्रेम रस पतनी के उपदेस.'

सचेत मन, दृढ़ निश्चय ले नयी दिशा में प्रवृत्त हो गया -

'रतन, तुम्हें इस बंधन से मुक्त करता हूँ, और मै भी निर्बाध हो प्रस्थान करता हूँ. 

सहधर्मिणी, तू भी तप जीवन के कठिन ताप में, कि तन की माटी कंचन हो जाये!'

(क्रमशः)

*


.

बुधवार, 9 दिसंबर 2020

राग-विराग - 3.

 विराग

जिस राह को उतावली में पार कर तुलसी रत्नावली से मिलने उसके पीहर जा पहुँचे थे, उसी पर ग्लानि-ग्रस्त, यंत्र-चलित से पग बढ़ाते  लौटे जा रहे हैं.

अपने आप से पूछते हैं-  कोरी आसक्ति थी ?

   एक दिन उसे नहीं देखा तो बिना सोचे -विचारे अधीर-आकुल सा  दौड़ा चला गया. क्या कहते होंगे रत्ना के परिवारजन .मेरा तो कोई अपना था ही नहीं जिसकी मर्यादा का सवाल उठता. लोक-व्यवहार का ध्यान नहीं आया जिसे निभाने का अवसर स्थितियों ने कभी दिया नहीं था 

विवेकहीन,पापी, कुमति मैं. कैसा अनर्थ कर डाला, हे राम जी !

सिर झुकाए पग बढ़ाये चले जा रहे हैं,धोती का छोर फरफराता हवा में उड़ता बार-बार चेहरे पर आ जाता है अपने ही सोच में लीन , हाथ से समेटते हैं और वैसा ही छोड़ देते हैं.

मन का  मंथन  पल भर को थमता नहीं -

जनम का अभागा मैं! दुर्भाग्य साथ-साथ चलता रहा.सारे संबंध टूटते गये पिता माता ,पालनकर्त्री धायमाई  पुनिया ,सब काल के ग्रास बन गये.ऐसा दुर्भाग्य साथ लेकर जन्मा कि संसार में प्रवेश करते ही त्याग दिया गया .संबंधों की डोर आगे बढ़ने के बजाय हर बार कटती रही .

बीते हुए दिन ,उस विपन्न बचपन को कैसे भूला जा सकता है जब, न खाने का ठिकाना ,न रहने का ठौर.दूसरों की दया पर निर्भर दिन किसी तरह कटते थे,भूख से बिलबिलाते बालक को चार चने भी चार फल सम लगते थे.जरा सी छाछ मिल जाय तो अहो भाग्य, जैसे अमृत पा लिया हो .उस त्रस्त मनस्थिति की स्मृति आज भी सिहरा देती है.पता नहीं पूर्व जन्म के किन पातकों का फल मिलता रहा. कैसी कैसी मानसिक यातना में समय बीत रहा था .

और फिर -

एक दिन माथे पर छाप दिये एक तेजस्वी संत गाँव में आए . गली में घूमते उन्हें अचानक सामने पा मैं चकित रह गया था , अभिभूत-सा देखे जा रहा था.

दिपदिपा रहा था चेहरा ,माथे पर तिलक काँधे पर उत्तरीय .

वे सामने आकर खड़े थे .ध्यान से देख रहे थे .बालक सकुचा गया .

तू कौन है रे ?

मैं, रम्बोला.

क्या, रम्बोला ?

हाँ ,सब रम्बोला कहते हैं.

 रामबोला है तू?

मैंने सिर हिलाया.मेरी दृष्टि जैसे बंध गई हो .

तेरे-माता-पिता?

कोई नहीं मेरा .

जिसका कोई नहीं उसके राम जी होते हैं.

मेरे मन में शंख-ध्वनि सी गूँज उठी.

किसी राह चलते ने सन्त को सारी सूचनाएँ दे डालीं- दीन अनाथ  है, अभुक्त मूल में जन्मा ,अमंगलकारी बालक ...

वे सुनते रहे, निहारते रहे. फिर बोले -

मेरे साथ चलेगा?

 उन्होंने, मुझसे पूछा था.

कानों ने पहली बार ऐसे आश्वस्तिपूर्ण शब्द सुने . हाँ ,मुझी से पूछ रहे थे वे -

मेरे साथ चलेगा ?

अँधा क्या चाहे -दो आँखें !

अभिभूत मैं , मुख से बोल न फूटा, हृदय उमड़ आया. झुक कर उनके चरण परस लिये.

.अनाथ को शरण मिल गई.

 गुरु ने कहा था जिसका कोई नहीं वह राम का है, उसके सब-कुछ राम जी हैं

कोई संचित पुण्य जागा होगा जो गुरु का संरक्षण पाया. हाथ बढ़ाकर अपना लिया था उन्होंने,चरणों में शरण मिली. जो कुछ भी आज हूँ, उन्हीं की कृपा से. उन्हीं की अनुकम्पा से शास्त्र-ज्ञान पा धन्य हुआ , जीवन  का परिष्करण और शुभ संस्कार उनके सान्निध्य में विकसे. उबार लिया उस दीन-हीन भिखमंगे बालक को ,अनगढ़ मृदा-पिंड को सँवार कर सुचारु रूप दे दिया . पेट भरने को घर-घर भीख माँगता, रिरियाता रम्बोला, तुलसीदास में परिणति पा कर  श्री राम की कथा वाचन का अधिकार पा गया. 

रामकथा से फिर रत्ना की याद आई.

उस ने कहा था राम कथा सुनाना क्या सहज है?राम के चरित में पैठ कर साक्षात्कार किये बिना कैसे कोई राम को जानेगा. जानेगा नहीं तो गायेगा कैसे?

कहाँ धीर-मति राम और कहाँ उद्धत-उतावला तुलसी!

बार-बार पछताते हैं. मन ही मन स्वयं को धिक्कारते हैं .

सब कुछ भली प्रकार चल रहा था. जीवन में संतोष की बयार बहने लगी थी. हाँ,अच्छाइयां भी आईं थीं हिस्से में, सामने आने लगीं थीं. 

श्रेष्ठ कुल मिला था पूर्वजों का दुर्लभ दाय, सुगठित काया माता-पिता की देन। गुरु के सान्निध्य में विकसित संस्कारशीलता एवं संयत व्यवहार जिस पर मनोयोग से अर्जित ज्ञान ने सान चढ़ा दी थी। कथावाचन के समय लोगों को प्रभावित कर सके ऐसा व्यक्तित्व विकसित हो चला था..

भाग्य ने साथ दिया तो दीनबंधु पाठक ने अपनी विदुषी पुत्री के लिये उचित पात्र समझ गृहस्थ जीवन में प्रवेश करा दिया.

जिसे कहीं से अपनत्व न मिला हो उसे सु्न्दर-सुघर पत्नी पा कर जैसे स्वर्ग मिल गया .सोचा था दारुण काल बीत गया ,अब चैन के दिन आये हैं जीवन की सुविधाएँ भोगने का अवसर पाकर अपने आपको धन्य अनुभव कर रहा था।

 रही-सही कसर  सुघर,विदुषी पत्नी के सान्निध्य ने पूरी कर दी. पति के रहन-सहन, वेष-भूषा का पूरा ध्यान रखती थी वह. कथावाचन के समय लोगों को प्रभावित कर सके तुलसी का ऐसा व्यक्तित्व विकसित हो चला था.

समय अपनी गति से बीत रहा था ,सब कुछ सहज सुखपूर्वक जैसे कहीं कोई व्यवधान नहीं हो. सांसारिक जीवन रास आने लगा था.

विधि के लेख के आगे किसकी चली है. अचानक ही विघ्न पड़ गया. 

अछोर पछतावा उनके हिस्से में लिख गया.

जनम का अभुक्त दोषी हो जो, किसी से  नाता कैसे निभता. भटकन ही जिसका जीवन होपरिवार का शील-संयम वह क्या जाने 

सहज-सन्तुष्ट जीवन मेरे जैसों के लिये कहाँघोर अशान्त मन में स्वयं के लिये धिक्कार उठने लगी-मेरी ही मति फिर गई थी.

किसेी को कैसे दोषी कहूँ - जैसी करनी रही, वैसी ही भरनी मिलेगी .

एक लंबी साँस अनायास निकल गई.

 संसार मेरे लिए वर्जित है.जो भी जुड़ा कोई संबंध नहीं टिका. मेरा दुर्भाग्य कहीं उसे भी न ले डूबे. वह संकट में पड़े उससे पहले ही मैं चला जाऊं .

 दूर चला जाऊँगा. अब नहीं आऊंगा उसके जीवन में. अपना अधिकर छोड़ता हूँ, रत्नावली जिये, दमके.    

मार्ग में पड़े पत्थर से पाँव टकराया गिरते-गिरते बचे

सिर उठा कर सामने देखा

 हरहराती हुई नदी बह रही थी ,काले बादल अभी भी आकाश में छाये थे. पर पानी का वेग थम-सा गया था .

जिस घाट से उतरे थे उसी पर आ कर खड़े हो गये .

किनारे कोई नाव नहीं थी. इतनी तूफ़ानी रात में नाव लाएगा भी कौन ?

जिस तख़्ते के सहारे नदी पार की थी ,उसे किनारे की एक शिला से टिका दिया था. वहीं पड़ा था.

चलो यही सही,तुलसी आगे बढ़े, पकड़ कर अपनी ओर घसीटना चाहा .

 अरे, यह क्या?

दृष्टि सचेत हो गई. काहे का लट्ठा? हाथों में थमी थी अकड़ी हुई मृत देह !

एकदम हड़बड़ा गये तुलसी पकड़ ढीली हुई, शव छूट कर नीचे ढह गया.

विस्फारित नयन, स्तंभित से खड़े रह गये .

मुख से निकला - राम,राम !

हे, राम जी! 

 *

(क्रमशः)