मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

राग-विराग -5.

 *

हिमाचल-पुत्री गंगा, शिखरों से उतर उमँगती हुई सागर से मिलने चल पड़ती है. लंबी यात्रा के बीच मायके की याद आती है तो मानस लहरियाँ उस ओर घूम जाती हैं.  इस स्थान पर आकर उन्होंने दक्षिण से उत्तर की ओर  प्राय: चार मील का घुमाव लिया है. परम पुनीता, उत्तरमुखी सुसरिता के इसी उमड़ते स्नेहाँचल के, आग्नेय कोण में स्थित है अनादि नगरी-  काशीपुरी! काशी शब्द का अर्थ ही है, प्रकाश देने वाली - जहाँ ब्रह्म प्रकाशित हो. समय-समय पर महान् चिन्तकों और आध्यात्मिक विभूतियों ने इसकी चैतन्यता को उद्दीप्त रखा है 

बालपन की दारुण दशा के बाद, भूख से बिलबिलाते,परित्यक्त बालक ने माँ अन्नपूर्णा  की छाँह में शरण पाई थी. तुलसी की सारस्वत-साधना की केन्द्र भी यही नगरी रही. गुरु नरहर्यानन्द जी के सान्निध्य और शेषसनातन जी के पास रहकर तुलसीदास ने पन्द्रह वर्ष तक वेद-वेदांग का अध्ययन किया था, यहीं रह कर  भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं से परिचित हुये थे. दोनों सद्पुरुषों की परिष्कृत, उदात्त मानसिकता और सजग चेतना का प्रभाव तुलसी का कायाकल्प कर, उनके व्यक्तित्व में दीप्ति भर गया. शेष जीवन काशी से उन्हें विशेष लगाव रहा था.

उनके चचेरे भाई नन्ददास (जीवाराम के पुत्र)  भी युवा होने पर  काशी में  विद्याध्ययन करने आये. दोनों की परस्पर भेंट होती रहती थी. यहाँ रह कर परस्पर आत्मीयता विकसित हुई. नन्ददास, अग्रज  तुलसी के प्रति सम्मान और श्रद्धा का भाव रखते थे,और उनसे प्रायः सलाह-मशविरा करते रहते थे. कालान्तर में नन्ददास कृष्ण-भक्ति में दीक्षित हो, अष्टछाप के कवियों में गण्य हुये. 

एक बार वैष्णव भक्तों का एक दल द्वारका प्रस्थान करनेवाला था, नन्ददास भी जाने को उत्सुक थे.उन्होंने अग्रज से पूछा,बड़ा सुन्दर अवसर मिला है .हम भी उसके साथ जाना चाहते हैं.

काहे वहाँ क्या है ?

भगवान रणछोड़ के दर्शन का लाभ मिलेगा .उस पुनीत पुरी के वास का सौभाग्य मिलेगा. 

दल  के साथ जाओगे ? 

अपने समाज के साथ आनन्द ही आनन्द रहेगा. मस्ती में नाचते-गाते पहुँच जायेंगे.सब साथ होंगे ,किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं.

कुछ क्षण चुप रहे तुलसी.फिर बोले ,उसमें कुछ जोखिम भी है.

जोखिम ?

'तियछवि छाया ग्राहिनी' बीच में ही गह ले, तो...?

तुलसी  उनके  मस्तमौला, रसिक स्वभाव से भलीभाँति परिचित थे.

नन्ददास संकेत समझ गये . एक रूपवती खत्रानी पर रीझ कर कैसे सारी लोक-लाज छोड़ उसके घर के चक्कर लगाने लगे थे, परेशान होकर उसके परिवार जन गोकुल चले गये, तो वहाँ भी जा पहुँचे थे.

बात तुलसी तक पहुँची, उनकी धिक्कार और  गोसाईं विट्ठलनाथ जी के सदुपदेश से मोह-भंग हुआ. उन्हें कृष्णभक्ति रास आ गई ,कालान्तर में वे अष्टछाप के कवियों में मान्य हो गए.

कुछ खिसियाते-से नन्ददास बोले,अब वे बातें काहे बीच में लाते हो दद्दा, तु्म्हारी बात सुनी नहीं क्या हमने ? हमने विट्ठलस्वामी से दीक्षा ले ली है.अब तो ब्रजराज श्याम ही हमारे सर्वस्व हैं. 

नन्दू,अकेले भ्रमण में व्यक्ति अपनी खुली आँखों के चतुर्दिक् देखता-समझता चलता है. और साधु तो सबका कल्याण चाहता है. हमने तो तुम्हें चेता दिया है.

नन्ददास चुप सुनते रहे.

तुमने कबीर जी की वह उक्ति सुनी है 'लालन की नहिं बोरियां...'..?

हाँ,हाँ यों है - 

'सिंहन के नहीं लेहड़े ,हंसन की नहिं पाँत,

लालन की नहिं बोरियाँ साधु न चले जमात.'

कैसा गूढ़ अर्थ छिपा है इसमें .

समझ रहे हैं , लेकिन हम तो कृष्ण प्रेम के मार्गी हैं. निचिंत रहे दद्दू,सप्ताह -दस दिन में हम लौट आयेंगे.

तुलसी दास ,लघु भ्राता को प्रोत्साहित करने में कभी पीछे नहीं रहे

 उन्होंने कहा था नन्दू ,तुम भी कुछ कम विद्वान नहीं हो .अपने अनुभवों का पाठ भावसंपदा  भी बढ़ाएगा ,तुम कुशल हो.जहाँ अन्य कवि  कवित्त गढ़ते हैं तुम उक्ति को ऐसे जड़ देते हो जैसे स्वर्ण में रत्न. और अभी तो निखर रहे हो .

अपने भ्रमण-क्रम में तुलसीदास जी ,वृन्दावन पहुँचे. तब तक वे राम-भक्त के रूपमें पर्याप्त ख्याति पा चुके थे. वृन्दावन श्रीकृष्ण की लीलाभूमि रहा है तुलसी ने अनुभव किया कि  यहाँ के आम, ढाक, खैर भी राधा-राधा का जाप करते हैं.

जब वे ज्ञान गुदरी में श्री मदन मोहन के परिसर में पहुँचे  तब भक्तमाल के रचयिता नाभादास तथा कुछ अन्य जन भी वहाँ उपस्थित थे.रामभक्त, तुलसी के आगमन की सूचना सबको हो गई थी.

मन्दिर के पुजारियों में परशुराम नाम का एक पुजारी बोला ये तो मदन-गोपाल की लीलाभूमि है, यहाँ रामभक्त कैसे पधार गये?

और तुलसी को देख हँस कर बोला, आपके इष्ट तो राम जी हैं !

 'बिना आपुने इष्ट के नवै सो मूरख होय.'

तुलसी दास जी ने सुना ,शान्तिपूवर्क विग्रह के हाथ जोड़े, विनत हो कर बोले- 

'कहा कहौं छवि आज की, भले बने हो नाथ,

तुलसी मस्तक तब नवै, जब धनुष बान ल्यो हाथ.'

.अचानक श्याममूर्ति में मुद्रा-परिवर्तन का आभास हुआ सबके विस्मित नयनों में धनुर्धारी की ओजपूर्ण मुद्रा झलकी, 

और गद्गद् तुलसी ने भूमिष्ठ हो दण्डवत् प्रणाम किया.

घटना की स्मृति-स्वरूप यह दोहा प्रचलित हो गया -

 ‘मुरली मुकुट दुराय कै, धर्यो धनुष सर नाथ। तुलसी लखि रुचि दास की, कृष्ण भए रघुनाथ।.’  

इतिहास साक्षी दे या न दे , लोक-श्रुति साक्षी है कि भक्त की मान-रक्ष हेतु, कृष्ण की मूर्ति राम की मूर्ति में परिणत हो  गई थी.

(क्रमशः)

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शनिवार, 30 जनवरी 2021

चित्रगुप्त जी की बेरुख़ी -

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 एक विशेष घटना जिसके फल स्वरूप सृष्टि में अव्यवस्था फैल गई थी 

,कायस्थ लोग दीपावली की भाई दूज पर चित्रगुप्त जी की पूजा के  क्रम में लेखनी और मसि पूजन के पश्चात्  अगले दिन तक के लिये लेखन कार्य स्थगित कर ,कलम रख देते हैं.
इसके पीछे एक बड़ा कारण है .एक ऐसी महत्वपूर्ण धारियों को न्याय मिलना असंभव हो गया था.

इसके पीछे एक बड़ा कारण है .एक ऐसी महत्वपूर्ण धारियों को न्याय मिलना असंभव हो गया था.
हुआ यह था 
 जब श्रीराम लंका विजय कर अयोध्या लौट रहे थे, उनके प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रहे, भरत जी ने सोचा कि उनका राज्य उन्हें अर्पण कर अब यथाशीघ्र भार-मुक्त हो जाऊं. गुरु वशिष्ठ की सहमति से , वे राम जी के राज्याभिषेक की व्यवस्था में लग गए.भरत जी ने गुरु से उस अवसर पर सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित करने का निवेदन किया. प्रसन्न मन गुरु वशिष्ठ ,आमंत्रण भेजने का काम शिष्यों को सौंप  अन्य कार्यों में व्यस्त हो गये.
राजतिलक के समय जब श्रीराम ने आगत देवी देवताओं में श्री चित्रगुप्त जी नहीं पधारे थे, श्री राम ने भरतजी से पूछा कि उनका आगमन क्यों नहीं हुआ.. खोज-बीन करने पर पता चला की गुरु वशिष्ठ के शिष्यों द्वारा उन तक निमंत्रण पहुंचाया ही नहीं गया.
 पल-पल की ख़बर रखनेवाले  चित्रगुप्तजी सब-कुछ जान चुके थे उन्होंने इस भूल को अक्षम्य मानते हुए सभी प्राणियों का लेखा-जोखा बही सामने से खिसका दी और लेखनी परे रख दी .
जब सारे देवी-देवता राजतिलक से लौटे तो देखा बहुत अव्यवस्था मची हुई है. प्राणियों के कर्म का लेखा-जोखा हुआ ही नहीं.और यह निश्चित करना संभव नहीं कि किसकी कौन-सी गति हो. फलस्वरूप  स्वर्ग-नरक के सारे काम रुक गये हैं. 
 सारा मामला श्री राम की समझ में आ गया. इस भारी चूक के परिमार्जन के लिए श्रीराम  गुरु वशिष्ठ के साथ  अयोध्या में श्री चित्रगुप्त जी के स्थान श्री धर्म-हरि मंदिर गये और उनकी स्तुति की.तत्पश्चात चूक के लिये क्षमा-याचना करते हुए उनसे सृष्टि-संचालन में सहयोग देने की प्रार्थना की.
श्री चित्रगुप्त जी ने राम का आग्रह स्वीकार कर लिया. उन्होंने  प्रातःकाल   विधिपूर्वक मसि-पात्र सहित लेखनी की पूजा कर उसे ग्रहण किया प्राणियों के कर्मों का विवरण सूची-बद्ध करने के लिए बही उठा ली और लेखन-कार्य पुनः आरम्भ कर दिया. सृष्टि का कार्य विधिवत् चलने लगा.
लेकिन इस बीच चौबीस घण्टे उनकी लेखनी निष्क्रिय रही थी. कायस्थ समाज ने इसका संज्ञान लिया और तभी से पूरी दुनिया में कायस्थ-जन  दीपावली पर 24 घंटों के लिए क़लम रख देते है और अगले दिन क़लम- दावात के पूजन के बाद ही उसका प्रयोग करते हैं.
(अयोध्यापुरी में भगवान् विष्णु द्वारा स्थापित श्री चित्रगुप्त मन्दिर को 'श्री धर्म हरि मंदिर' कहा गया है. धार्मिक मान्यता है कि अयोध्या आने वाले सभी तीर्थयात्रियों को अनिवार्यत: श्री धर्म-हरि जी के दर्शन करना चाहिये, अन्यथा उन्हें तीर्थ यात्रा का पुण्यफल प्राप्त नहीं होगा. भी यह उल्लेख अयोध्या माहात्म्य में  मिलता है).

स्वामी विवेकानन्द ने अपनी जाति की व्याख्या कुछ इस प्रकार की है:
मैं उन महापुरुषों का वंशधर हूँ, जिनके चरण कमलों पर प्रत्येक ब्राह्मण ''यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नमः'' का उच्चारण करते हुए पुष्पांजलि प्रदान करता है और जिनके वंशज विशुद्ध रूप से क्षत्रिय हैं। यदि अपने पुराणों पर विश्वास हो तो, इन समाज सुधारकों को जान लेना चाहिए कि मेरी जाति ने पुराने जमाने में अन्य सेवाओं के अतिरिक्त कई शताब्दियों तक आधे भारत पर शासन किया था। यदि मेरी जाति की गणना छोड़ दी जाये, तो भारत की वर्तमान सभ्यता शेष क्या रहेगा? अकेले बंगाल में ही मेरी जाति में सबसे बड़े कवि, इतिहासवेत्ता, दार्शनिक, लेखक और धर्म प्रचारक हुए हैं। मेरी ही जाति ने वर्तमान समय के सबसे बड़े वैज्ञानिक (जगदीश चन्द्र बसु) से भारतवर्ष को विभूषित किया है। स्मरण करो एक समय था जब आधे से अधिक भारत पर कायस्थों का शासन था। कश्मीर में दुर्लभ बर्धन कायस्थ वंश, काबुल और पंजाब में जयपाल कायस्थ वंश, गुजरात में बल्लभी कायस्थ राजवंश, दक्षिण में चालुक्य कायस्थ राजवंश, उत्तर भारत में देवपाल गौड़ कायस्थ राजवंश तथा मध्य भारत में सातवाहन और परिहार कायस्थ राजवंश सत्ता में रहे हैं। अतः हम सब उन राजवंशों की संतानें हैं। हम केवल बाबू बनने के लिये नहीं, अपितु हिन्दुस्तान पर प्रेम, ज्ञान और शौर्य से परिपूर्ण उस हिन्दू संस्कृति की स्थापना के लिये पैदा हुए हैं।
—स्वामी विवेकानन्द.


शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

राग-विराग - 4.



['मोइ दीनों संदेस पिय, अनुज नंद के हाथ।

रतन समुझि जनि पृथक मोहि, जो सुमिरत रघुनाथ।।'

                              - रत्नावली]

*      *     *      *     *     *     *

'कैसी अद्भुत जोड़ी!'

विवाह समय सब ने कहा था कैसी अद्भुत जोड़ी- जैसे वर-कन्या के वेष में स्वयं सीता-राम विराज रहे हों!

लोगों की नज़र लग गई उस युगल पर. 

 'जड़ चेतन गुन-दोसमय बिस्व कीन्ह करतार..'

  विधाता गुण-दोषमयी सृष्टि रचकर अपने प्रयोग करता है. मानव के लिए विज्ञान और आनन्द का विधान तो किया पर सबसे पहले अन्न-प्राणमय देह ज़रूरी कर मनोमय को बीच में डाल दिया.आदमी बेचारा करे तो क्या करे?

 मन के उत्पात झेले बिना निस्तार कहाँ! 

दो प्रखर व्यक्तित्व संपन्न प्राणी मिलें तो जीवन सामान्य कैसे रह पाये.नियति पहले ही असामान्यता उनके हिस्से में लिख देती है. क्योंकि यहाँ सर्वथा दोषहीन कोई नहीं होता. 

और बुद्धि के हंस ने तुरंत विकार परख लिया. रत्नावली की बात तुलसीदास के मन को लग गई. कोई साधारण स्त्री होती तो पति पर उसके कहने का यह प्रभाव न पड़ता, गृहस्थी की गाड़ी ढचर-ढचर करती आगे बढ़ती रहती. जीवन का प्रवाह टकराता-बिछलता बहता रहता. पर यह रत्नावली थी और पति थे  तुलसीदास. दोनों  एक दूसरे की टक्कर के.कोई किसी से घट कर नहीं - न विचार-व्यवहार में न बुद्धि-विवेक न काव्य-कौशल में .दीनबन्धु पाठक की संस्कारशीला, सुशिक्षित परम रूपवती कन्या.जिसके लिये पिता को तुलसी के सिवा कोई उपयुक्त वर जँचा ही नहीं था.

तुलसीदास लौ़ट आए. पर अब घर, घर कहाँ था.

अचानक कैसा विपर्यय -.एकदम सब कुछ बदल गया.


 राजापुर में तुलसी के पिता पं० आत्माराम शुक्ल और पं० जीवाराम शुक्ल दो भाई थे पं.जीवाराम ,के पुत्र थे परम कृष्ण भक्त, अष्टछाप के कवि नंददास.

वहाँ जाकर जब यह पता चला कि उनकी अनुपस्थिति में उनके पिता भी नहीं रहे, मनका संताप तीव्र हो उठा. श्राद्ध कर्म संपन्न कर, विरक्त मन से काशी चले आये.

तुलसी के मानस में बार-बार वही शब्द कौंध जाते हैं.

रत्ना ने कहा था राम की कथा कहते हो,मर्यादापुरुष की कथा कहने के लिये, निर्मल प्रेम की महत्ता निरूपित करनेवाले राम के चरित को गुनना आवश्यक है. उसके बिना उन्हें वर्णित करना संभव नहीं. 

उन दिनों प्रयाग में माघ मेला चल रहा था। अपने यात्रा-पथ में वे वहाँ कुछ दिन के लिये ठहर गये।साधु-संतों का जमावड़ा लगा था.श्रद्धालु जन कथा-वार्ता ,व्रत-पूजा में समय बिता कर तीर्थराज का पुण्य-लाभ ले रहे थे 

गंगा तट पर दिन व्यतीत करते गोस्वामी जी के कानों में एक दिन कहीं से आते हुए राम कथा के स्वर गूंजे.उसी कथा के जो सूकरक्षेत्र में अपने गुरु से सुनी थी, पर बालपन की अबोधता में गुनने से रह गये थे .चकित हो कर उन्होंने चारों ओर देखा.

आभास हुआ वटवृक्ष के नीचे भारद्वाज और याज्ञवल्क्य मुनि  विराजे हैं, रामकथा का अनुश्रवण चल रहा है. यंत्र-चालित से नयन मूँद आवेष्टित  तुलसी सुनते रहे,राम की लीलाओं का साक्षात्कार करते रहे. 

 फिर अपने आराध्य की जन्म-स्थली जाये बिना तुलसी कैसे रह सकते थे, वे अयोध्या के लिये निकल पड़े.

जीवन की तीर्थयात्रा अनवरत चलती रही .तुलसी अधिकाधिक निर्लिप्त होते गये. आराध्य के चरणांकित किसी स्थान को छोड़ा नहीं उन्होंने .

*

इतना उत्कट प्रेम वहन करने के बाद मन का कागज़ कोरा रह कैसे रह सकता है! जीवन-पुस्तक के आगे के पृष्ठ लिखे जाने से पिछले अध्याय रिक्त नहीं होते. आधार से हट कर ऊपरी संरचना कहाँ जमेगी, कहाँ आगे का संभार टिकेगा! तार कहीं न कहीं जुड़ते चलते हैं.

कभी-कभी हृदय में आवेग सा उमड़ता है जो भीतर तक हिला जाता है. कुछ चुभता है, रह-रह कर दंश देता है.

तुलसी रत्ना को कब भूले! बस,रूपान्तरण हो गया. दीनबन्धु-पुत्री की   सुरञ्जित साड़ी आवेष्टित काया, हाड़-मांस की नाशवान देह न रह कर जनक-सुता के दिव्य रूप में परिणति पा गई. और उसी के साथ सारा परिवेश सिया-राम मय हो कर दिव्यता से आवरित हो गया.

 नवल तन पर सुन्दर साड़ी धारण किये('सोह नवल तन सुन्दर सारी' - राम चरितमानस) जनक-सुता के रूप में उस अवतरण की कान्ति से संपूर्ण मानस दीप्तिमान हो उठा. वन-वन भटकते, वर्षाकाल में 'प्रियाहीन' अकेले मन की व्यथा झेलते राम और उनके विरही मन को अभिव्यक्त करते भुक्तभोगी भक्त तुलसी के मानस के तार जुड़ गये. जीवन-व्यापी वियोग, भक्ति के आवरण में,सिया-राम की अमर कथा का एक मार्मिक अध्याय बन गया.


'जासु कृपा निर्मल मति पावौं,'

यह निर्मल मति उसी अनुकम्पा का प्रतिफल है, जो सारे जग को सिया-राम मय कर तुलसी की वर्णना में विकीरित हो रही है.

 

क्षणिक मोहावेश में सारी मर्यादायें भूले, तुलसी को धिक्कार कर रत्ना वन्दनीया हो गई.

नहीं, वह कोरी आसक्ति नहीं थी!

चित्त चेत गया और तुलसी ने जीवन के परम उद्देश्य का बोध पा लिया था.

 'हम तो पावा प्रेम रस पतनी के उपदेस.'

सचेत मन, दृढ़ निश्चय ले नयी दिशा में प्रवृत्त हो गया -

'रतन, तुम्हें इस बंधन से मुक्त करता हूँ, और मै भी निर्बाध हो प्रस्थान करता हूँ. 

सहधर्मिणी, तू भी तप जीवन के कठिन ताप में, कि तन की माटी कंचन हो जाये!'

(क्रमशः)

*


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बुधवार, 9 दिसंबर 2020

राग-विराग - 3.

 विराग

जिस राह को उतावली में पार कर तुलसी रत्नावली से मिलने उसके पीहर जा पहुँचे थे, उसी पर ग्लानि-ग्रस्त, यंत्र-चलित से पग बढ़ाते  लौटे जा रहे हैं.

अपने आप से पूछते हैं-  कोरी आसक्ति थी ?

   एक दिन उसे नहीं देखा तो बिना सोचे -विचारे अधीर-आकुल सा  दौड़ा चला गया. क्या कहते होंगे रत्ना के परिवारजन .मेरा तो कोई अपना था ही नहीं जिसकी मर्यादा का सवाल उठता. लोक-व्यवहार का ध्यान नहीं आया जिसे निभाने का अवसर स्थितियों ने कभी दिया नहीं था 

विवेकहीन,पापी, कुमति मैं. कैसा अनर्थ कर डाला, हे राम जी !

सिर झुकाए पग बढ़ाये चले जा रहे हैं,धोती का छोर फरफराता हवा में उड़ता बार-बार चेहरे पर आ जाता है अपने ही सोच में लीन , हाथ से समेटते हैं और वैसा ही छोड़ देते हैं.

मन का  मंथन  पल भर को थमता नहीं -

जनम का अभागा मैं! दुर्भाग्य साथ-साथ चलता रहा.सारे संबंध टूटते गये पिता माता ,पालनकर्त्री धायमाई  पुनिया ,सब काल के ग्रास बन गये.ऐसा दुर्भाग्य साथ लेकर जन्मा कि संसार में प्रवेश करते ही त्याग दिया गया .संबंधों की डोर आगे बढ़ने के बजाय हर बार कटती रही .

बीते हुए दिन ,उस विपन्न बचपन को कैसे भूला जा सकता है जब, न खाने का ठिकाना ,न रहने का ठौर.दूसरों की दया पर निर्भर दिन किसी तरह कटते थे,भूख से बिलबिलाते बालक को चार चने भी चार फल सम लगते थे.जरा सी छाछ मिल जाय तो अहो भाग्य, जैसे अमृत पा लिया हो .उस त्रस्त मनस्थिति की स्मृति आज भी सिहरा देती है.पता नहीं पूर्व जन्म के किन पातकों का फल मिलता रहा. कैसी कैसी मानसिक यातना में समय बीत रहा था .

और फिर -

एक दिन माथे पर छाप दिये एक तेजस्वी संत गाँव में आए . गली में घूमते उन्हें अचानक सामने पा मैं चकित रह गया था , अभिभूत-सा देखे जा रहा था.

दिपदिपा रहा था चेहरा ,माथे पर तिलक काँधे पर उत्तरीय .

वे सामने आकर खड़े थे .ध्यान से देख रहे थे .बालक सकुचा गया .

तू कौन है रे ?

मैं, रम्बोला.

क्या, रम्बोला ?

हाँ ,सब रम्बोला कहते हैं.

 रामबोला है तू?

मैंने सिर हिलाया.मेरी दृष्टि जैसे बंध गई हो .

तेरे-माता-पिता?

कोई नहीं मेरा .

जिसका कोई नहीं उसके राम जी होते हैं.

मेरे मन में शंख-ध्वनि सी गूँज उठी.

किसी राह चलते ने सन्त को सारी सूचनाएँ दे डालीं- दीन अनाथ  है, अभुक्त मूल में जन्मा ,अमंगलकारी बालक ...

वे सुनते रहे, निहारते रहे. फिर बोले -

मेरे साथ चलेगा?

 उन्होंने, मुझसे पूछा था.

कानों ने पहली बार ऐसे आश्वस्तिपूर्ण शब्द सुने . हाँ ,मुझी से पूछ रहे थे वे -

मेरे साथ चलेगा ?

अँधा क्या चाहे -दो आँखें !

अभिभूत मैं , मुख से बोल न फूटा, हृदय उमड़ आया. झुक कर उनके चरण परस लिये.

.अनाथ को शरण मिल गई.

 गुरु ने कहा था जिसका कोई नहीं वह राम का है, उसके सब-कुछ राम जी हैं

कोई संचित पुण्य जागा होगा जो गुरु का संरक्षण पाया. हाथ बढ़ाकर अपना लिया था उन्होंने,चरणों में शरण मिली. जो कुछ भी आज हूँ, उन्हीं की कृपा से. उन्हीं की अनुकम्पा से शास्त्र-ज्ञान पा धन्य हुआ , जीवन  का परिष्करण और शुभ संस्कार उनके सान्निध्य में विकसे. उबार लिया उस दीन-हीन भिखमंगे बालक को ,अनगढ़ मृदा-पिंड को सँवार कर सुचारु रूप दे दिया . पेट भरने को घर-घर भीख माँगता, रिरियाता रम्बोला, तुलसीदास में परिणति पा कर  श्री राम की कथा वाचन का अधिकार पा गया. 

रामकथा से फिर रत्ना की याद आई.

उस ने कहा था राम कथा सुनाना क्या सहज है?राम के चरित में पैठ कर साक्षात्कार किये बिना कैसे कोई राम को जानेगा. जानेगा नहीं तो गायेगा कैसे?

कहाँ धीर-मति राम और कहाँ उद्धत-उतावला तुलसी!

बार-बार पछताते हैं. मन ही मन स्वयं को धिक्कारते हैं .

सब कुछ भली प्रकार चल रहा था. जीवन में संतोष की बयार बहने लगी थी. हाँ,अच्छाइयां भी आईं थीं हिस्से में, सामने आने लगीं थीं. 

श्रेष्ठ कुल मिला था पूर्वजों का दुर्लभ दाय, सुगठित काया माता-पिता की देन। गुरु के सान्निध्य में विकसित संस्कारशीलता एवं संयत व्यवहार जिस पर मनोयोग से अर्जित ज्ञान ने सान चढ़ा दी थी। कथावाचन के समय लोगों को प्रभावित कर सके ऐसा व्यक्तित्व विकसित हो चला था..

भाग्य ने साथ दिया तो दीनबंधु पाठक ने अपनी विदुषी पुत्री के लिये उचित पात्र समझ गृहस्थ जीवन में प्रवेश करा दिया.

जिसे कहीं से अपनत्व न मिला हो उसे सु्न्दर-सुघर पत्नी पा कर जैसे स्वर्ग मिल गया .सोचा था दारुण काल बीत गया ,अब चैन के दिन आये हैं जीवन की सुविधाएँ भोगने का अवसर पाकर अपने आपको धन्य अनुभव कर रहा था।

 रही-सही कसर  सुघर,विदुषी पत्नी के सान्निध्य ने पूरी कर दी. पति के रहन-सहन, वेष-भूषा का पूरा ध्यान रखती थी वह. कथावाचन के समय लोगों को प्रभावित कर सके तुलसी का ऐसा व्यक्तित्व विकसित हो चला था.

समय अपनी गति से बीत रहा था ,सब कुछ सहज सुखपूर्वक जैसे कहीं कोई व्यवधान नहीं हो. सांसारिक जीवन रास आने लगा था.

विधि के लेख के आगे किसकी चली है. अचानक ही विघ्न पड़ गया. 

अछोर पछतावा उनके हिस्से में लिख गया.

जनम का अभुक्त दोषी हो जो, किसी से  नाता कैसे निभता. भटकन ही जिसका जीवन होपरिवार का शील-संयम वह क्या जाने 

सहज-सन्तुष्ट जीवन मेरे जैसों के लिये कहाँघोर अशान्त मन में स्वयं के लिये धिक्कार उठने लगी-मेरी ही मति फिर गई थी.

किसेी को कैसे दोषी कहूँ - जैसी करनी रही, वैसी ही भरनी मिलेगी .

एक लंबी साँस अनायास निकल गई.

 संसार मेरे लिए वर्जित है.जो भी जुड़ा कोई संबंध नहीं टिका. मेरा दुर्भाग्य कहीं उसे भी न ले डूबे. वह संकट में पड़े उससे पहले ही मैं चला जाऊं .

 दूर चला जाऊँगा. अब नहीं आऊंगा उसके जीवन में. अपना अधिकर छोड़ता हूँ, रत्नावली जिये, दमके.    

मार्ग में पड़े पत्थर से पाँव टकराया गिरते-गिरते बचे

सिर उठा कर सामने देखा

 हरहराती हुई नदी बह रही थी ,काले बादल अभी भी आकाश में छाये थे. पर पानी का वेग थम-सा गया था .

जिस घाट से उतरे थे उसी पर आ कर खड़े हो गये .

किनारे कोई नाव नहीं थी. इतनी तूफ़ानी रात में नाव लाएगा भी कौन ?

जिस तख़्ते के सहारे नदी पार की थी ,उसे किनारे की एक शिला से टिका दिया था. वहीं पड़ा था.

चलो यही सही,तुलसी आगे बढ़े, पकड़ कर अपनी ओर घसीटना चाहा .

 अरे, यह क्या?

दृष्टि सचेत हो गई. काहे का लट्ठा? हाथों में थमी थी अकड़ी हुई मृत देह !

एकदम हड़बड़ा गये तुलसी पकड़ ढीली हुई, शव छूट कर नीचे ढह गया.

विस्फारित नयन, स्तंभित से खड़े रह गये .

मुख से निकला - राम,राम !

हे, राम जी! 

 *

(क्रमशः)




बुधवार, 18 नवंबर 2020

सफ़ाई

  हमारी नातिन बड़ी सफ़ाई पसन्द है .

 एक बार की बात है मेरा कंघा नहीं मिल रहा था.

वह बोली,'नानी मेरा ले लीजिये .' 

'ढूँढ रही हूँ.अभी मिल जायेगा,जायेगा कहाँ !'

 ' मुझे पता है आप किसी के कंघे से बाल नहीं काढतीं .मेरा बिल्कुल साफ़ रखा है .आपने उस दिन ब्रश से साफ़ किया था ,तब से वैसा ही रखा है. ' 

'क्यों तुम उससे बाल नहीं काढ़तीं ?' 

'मैं तो मम्मी के से काढ़ लेती हूँ , मेरा कंघा हमेशा बिल्कुल साफ़ रखा रहता है.' 

 सुन कर मैं तो हक्की-बक्की. आगे कुछ सूझा ही नहीं.

अब आप देख लीजिये  -

ऐसी होती है सफ़ाई ! 

*


शनिवार, 14 नवंबर 2020

क्लोनिंग

                इधर क्लोनिंग के विषय में बहुत कुछ सुनने में आ रहा है .वनस्पतियाँ तो थीं ही अब ,जीव-जन्तुओं पर भी प्रयोग हो रहे हैं और सफलता भी मिल रही है. क्लोनिंग की बात से मन में कुछ उत्सुकता और कुछ शंकायें उत्पन्न होने लगीं .

 एक कोशिका से संपूर्ण का निर्माण? शरीर या भौतिक स्वरूप निर्मित हो सकता है लेकिन उसके भीतर जो प्रवृत्तियाँ ,मानसिकता और आत्म तत्व है -उसका व्यक्तित्व और उसकी अपनी अस्मिता - वह भी उस निर्मित शरीर में अपने आप आ जायेंगे ? चेतना के विभिन्न स्तरों में मानव सबसे उच्च स्तर पर है,बुद्धि का विकास और चैतन्य के गहन स्तरों तक (कोशों के हिसाब से देखें तो मानव अन्नमय और प्राणमय कोष से आगे बढ कर मनोमय,विज्ञानमय तक पहुँच रहा है और आनन्दमय कोष भी उसके लिये अछूता नहीं है जब कि पशु जगत तक की सृष्टि निम्न स्तरों तक सीमित है . खनिज ,वनस्पति और पशु इस सीढ़ी के क्रमशः निचले पायदानो पर हैं . जब तक चेतना धुँधली पड़ी है शरीर का यांत्रिक संचालन संभव है ,ऐसे तो मुर्दों को भी संचालित कर ज़ोम्बी बना कर उनसे काम लिया जाता है पर वह उनकी अपनी चेतना नहीं है.

पौराणिक कथाओं में रक्तबीज का प्रकरण आया है -रक्त की एक बूँद से संपूर्ण काया विकसित हो जाती है. वह स्वाभाविक प्राणी नहीं है(उसे क्लोन कहना अनुचित नहीं होगा).किसी विशेष उद्देश्य के लिये उसे विकसित किया गया है ,वह उद्देश्य पूरा होने के बाद उसका कोई भविष्य नहीं .रक्तबीजों में से कोई बच गया हो तो वह मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों से संचालित होगा या नहीं ,वह प्रजनन करने में समर्थ है या नहीं , क्या अपनी अस्मिता का भान उसे है, आत्मबोध से संपन्न है,एवं आत्म-विकास का उत्प्रेरण उसमें होता है या नहीं ,ये सारे ,और भी अनेक प्रश्न अनुत्तरित रह गये हैं. 

नई सृष्टि प्रक्रिया अपनाने से पहले उत्तरों को खोज लेना -कम से कम मुझे- उचित लगता है।नई सृष्टि रचने से पहले उसकी भावी व्यवस्था पर विचार करना लेना रचयिता का दायित्व बनता है,विशेष रूप से जब बाकी दुनिया उससे प्रभावित होती हो.

शनिवार, 7 नवंबर 2020

लाचार आदमी

 एक समाचार(बात पुरानी है ) -

 'आन्ध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने परीक्षा में नकल करने के आरोप में पाँच जजों को निलम्बित कर दिया है. वारङ्गल जिला स्थित काकतीय विश्वविद्यालय के आर्ट कॉलेज में 24 अगस्त को मास्टर ऑफ लॉ [एलएलएम] की परीक्षा के दौरान अजीतसिम्हा राव, विजेन्दर रेड्डी, एम. किस्तप्पा, श्रीनिवासआचार्य और हनुमन्त राव नाम के जज नकल करते पकड़े गए.
विश्वविद्यालय के अतिरिक्त परीक्षा नियन्त्रक एन. मनोहर के अनुसार, ये जज कमरा नम्बर 102 में परीक्षा दे रहे थे तभी उनके नेतृत्व में एक दल औचक निरीक्षण पर वहाँ पहुँच गया. इन जजों में से एक ने कापी के अन्दर कानून की किताब छुपा रखी थी और उससे नकल कर रहे थे. अन्य जजों के पास से लिखी हुई पर्चियां और पाठ्य पुस्तकों के फाड़े हुए पन्ने बरामद हुए. निरीक्षकों ने इन सभी चीजों को जब्त कर लिया और जजों को आगे लिखने से रोक दिया.'

क्यों क्या जज इ्सान नहीं होते ?

परीक्षा के तो नाम से ही दम खुश्क हो जाता है .और क्योंकि  परीक्षा दे रहे थे, उस स्थिति में वे केवल परीक्षार्थी थे .न जज थे न मुवक्किल ,न वकील.अगर परीक्षा-कक्ष में जज होते तो तो जजमेंट का काम उनका होता ,वे स्वयं किसी के निरीक्षण  के अन्तर्गत नहीं होते .
परीक्षा देने की मानसिकता ही अलग होती है .और अचानक निरीक्षण !
बिना वार्निंग के तो गोली भी नहीं चलाई जाती .पहले बता देना था. अब उनका जजमेंट कौन करेगा.साधारण आदमी  जजों का न्याय करे इससे बड़ा अन्याय उन पर क्या होगा ?
तरस आ रहा है मुझे तो उन बेचारों पर .
जब राजनीति के ऊँचे-ऊँचे लोग न्याय से ऊपर होते हैं तो एक जज तो वैसे भी न्याय से ऊपर हुआ.न्याय तो एक प्रक्रिया है ,जिसे करनेवाला वह ख़ुद है.
कोई बन्द आँखोंवाला न्याय का तराजू सँभाले है ,
- और बेचारा जज - लाचार आदमी !