शनिवार, 5 मई 2018

व्यक्ति की स्वाधीनता -

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कुछ दिन पहले 104 साल के बॉटनी और इकोलॉजी के प्रख्यात वैज्ञानिक डेविड गुडऑल ने ऑस्ट्रेलिया में अपने घर से विदा ली और अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने के लिए दुनिया के दूसरे छोर के लिए रवाना हो गए.
उन्हें कोई बड़ी बीमारी नहीं है लेकिन वे अपने जीवन का सम्मानजनक अंत चाहते हैं. उनका कहना हैं कि उनकी आज़ादी छिन रही है और इसीलिए उन्होंने ये फ़ैसला लिया .
(लंबे वक्त तक चले विवाद के बाद, गत वर्ष ऑस्ट्रेलिया के एक राज्य ने 'असिस्टेड डाइंग' को कानूनी मान्यता दे दी है. लेकिन इसके लिए किसी व्यक्ति को गंभीर रूप से बीमार होना चाहिए.)
गुडऑल ने अपनी ज़िंदगी को ख़त्म करने का फ़ैसला एक घटना के बाद लिया. एक दिन वे अपने घर पर गिर गए और दो दिन तक किसी को नहीं दिखे. इसके बाद डॉक्टरों ने फ़ैसला किया कि उन्हें 24 घंटे की देखभाल की ज़रूरत है और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना होगा.डॉ गुडऑल कहते हैं, "मेरे जैसे एक बूढ़े व्यक्ति को पूरे नागरिक अधिकार होने चाहिए जिसमें 'असिस्टेड डेथ' भी शामिल हो."
उन्होंने एबीसी को बताया, "अगर कोई व्यक्ति अपनी जान लेना चाहता है तो किसी दूसरी व्यक्ति को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए."
उनके इस निर्णय पर विभिन्न मत हो सकते हैं लेकिन
औरों पर पूरी तरह निर्भर होकर एक लाचार शरीर के साथ जीना - अपनी अस्मिता का क्षरण होते देखते रहना - एक सचेत प्रबुद्ध व्यक्ति के लिये इससे से बड़ी त्रासदी नहीं हो सकती.
और सच्चे अर्थों में वह जीवंत कहाँ रहा - 'औरों के सहारे तो ज़नाज़े उठा करते हैं.'
मैं, तुम्हारे लिये शान्ति की कामना करती हूँ ,डॉ. गुडऑल, तुम्हारी इच्छानुसार तुम्हारा ऊर्जस्वित जीव , संपूर्ण मानवी गरिमा सहित अपने विश्रामगृह में निवास करे !
फिर पुनर्नवीन हो ,नवोर्जा और नये उत्साह के साथ लौट आना अपनी कर्मभूमि में, जहाँ मानव-जीवन की निरंतरता और उत्तरोत्तर पूर्णता, फलीभूत हो सके !
तुम्हें मेरा नत-मस्तक प्रणाम !
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शनिवार, 17 मार्च 2018

मैं अश्वत्थामा बोल रहा हूँ --

मैं, अश्वत्थामा बोल रहा हूँ - 
शप्त मानवता के  विषम व्रण माथे पर लिये मैं,अश्वत्थामा ,युगान्तरों से  भटक रहा हूँ .चिर-संगिनी है  वह अहर्निश वेदना जिसकी यंत्रणा से विकल ,मैं वहाँ से भागा था .कितना लंबा विरामहीन जीवन जी आया! अनगिनती पीढ़ियों को  बनते-बिगड़ते देखा .कितने युगों का साक्षी  मेरा मौन अभी तक नहीं भंग हुआ. 
समर  बीता कहां है ? सत-असत् का युद्ध हर जगह चल रहा है- व्योम में ,जल में ,थल में .
दृष्टा नहीं बन पाता ,भोक्ता रहा हूँ जिसका ,जिसके बहते घाव लिये, चिरकाल यही सब देखने को अभिशप्त हूँ उससे निर्लिप्त रहना कहाँ संभव? वह दारुण युग जाते-जाते गहरे अवसाद की छायायें छोड़ गया - हर जगह विषाद के घेरे ,कहीं प्रसन्नता नहीं - बहुत समय लगा मुझे संयत होने में . 
 बीतती शताब्दियों के बीच एकदम चुप , बहुत  कुछ है कहने को मेरे पास ,पर कैसे , किससे कहूँ.  किसे अवकाश है ,और कहाँ धीरज ?
 मेरे जीवन में विसंगतियों का अंत कहाँ ,जीवन भर का उपेक्षित मैं.हँसी आती है सोच कर कि जब गोकुल में दूध-दही की नदियाँ बह रहीं थीं एक गुण संपन्न सद्विप्र का पुत्र दूध के धोखे आटे का घोल पिला कर बहलाया जाता रहा था.  
  जनोंमें,निर्जनोंमें ,देश-विदेश के पहचाने-अजाने लोगों के बीच चलता-फिरता हूँ .हाँ ,पहचाने लोग भी  हैं ,सामान्य जन नहीं जानते तो क्या,मैं चीन्हता हूं जिनके साथ रहा हूँ.काल के दीर्घ अंतराल के बीच जनमते हैं ,एक दूसरे से अनजान -पर मैं पहचान लेता हूं,अश्वत्थामा हूँ न .जी चुका हूँ कृष्ण के साथ उन्हीं के युग में,भीष्म,कर्ण,दुर्योधन,युधिष्ठिर, पार्थ,द्रौपदी ,कुन्ती, जो आज सब से अतीत हैं ,मेरे समकालीन थे.  युग-युग की पीर भरी यात्रा करते युग पर युग बीतते चले गये पर मेरा जीवन नहीं बीता, मेरा मौन नहीं टूटा .ॆ
विस्तृत काल खण्डों में बिखरे ,अधिकांश लोग जन्म लेते हैं ,परस्पर मिलते भी हैं- अपना देन-लेन पूरा करना है अभी .पर हिसाब की बही में नये अध्याय जुड़ने लगते हैं .फिर छुटकारा कहाँ?सांसारिकता में ,अपने राग द्वेष में ऐसे डूब जाते हैं कि भान नहीं रहता किधर बहे जा रहे हैं .पहचानते नहीं एक-दूसरे को  लेकिन पिछले संस्कारों से प्रेरित परस्पर जुड़ते - टूटते रहते हैं..इसी जग-बीती का एक भाग मैं भी .

ओह...आज कह रहा हूँ, उत्तेजित मन अपने अस्थिर आवेश में उतावला हो  सारा सोच-विचार खो बैठा था ,तब मैंने भी यही किया था.
(क्रमशः)



सोमवार, 25 दिसंबर 2017

सप्ता धाये का फल पावै --


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हिन्दी भाषा में परम्परा से चले आते कुछ ऐसे शब्द हैं जिनका ,समय के प्रवाह और परिस्थितियों के फेर में , अपने पूर्व अर्थ से बहुत अपकर्ष हो चुका है.सामाजिक परिवर्तनों और सांस्कृतिक अवमूल्यन के कारण शब्द भी अपनी व्यञ्जना शक्ति और प्रभावशीलता खो कर सामान्य और रूढ़ हो जाते हैं.
ऐसा ही एक प्रचलित शब्द है - सुहाग ,जिसका तात्पर्य अहिवात या विधवा न होना,  अर्थात् पति का जीवित होना, यही सुहाग के लिये पर्याप्त है.फिर एक नई व्यंजना सामने आई  -जिसको पिया चाहे वही सुहागिन .
मूल रूप में  -सुहाग एक शब्द -मात्र नहीं यह व्यापक अर्थ से परिपूर्ण एक व्यंजक पद है. एक सांस्कृतिक अवधारणा है जिसमें नारी के सर्वांग-संपूर्ण जीवन की परिकल्र्पना -समाई है.सफल-सुखी नारी-जीवन का बोधक है यह छोटा-सा शब्द, 
सुहाग की परिभाषा कर उसे किसी सीमा में बाँधना संभव नहीं, पीढ़ियों की मान्यताओँ और आचार-व्यवहार  से पोषित धारणाएँ  लोकमन पर गहरी पकड़ रखती हैं और सदियों के संस्कार-संचित ऐसे शब्दों की अनूभूति-प्रवणता मंद नहीं होती (फ़ालतू की बौद्धिक  कसरतों से उसमें अर्थ -अनर्थ की संभावना कर ले ,कोई तो बात दूसरी है.)इस प्रकार के शब्दों का किसी दूसरी  भाषा में उचित अनुवाद संभव नही होता , क्योंकि किसी भाषा के शब्द ,जिन  मूल्य-मानों को वहन करते हैं वह उसकी समाजिक-सांस्कृतिक धरोहर है जिसे  दूसरी भाषाएँ स्वाभाविक रूप में ग्रहण और व्यक्त नहीं कर पाती .
इस शब्द का सही अर्थ समझने के लिये एक लोक-प्रचलित पद्यमय कथन 'आरी-बारी' दृष्टव्य है,जो स्त्रियाँ अपनी व्रत-पूजाओं में अक्षत-पुष्प हाथ में ले कर श्रद्धापूर्वक कहती- सुनती हैं . सुहाग की कामना करती कुमारी कन्या ,अपने भावी जीवन की परिकल्पना में देवी से कृपा-याचना करती है -
आरी-बारी -
' आरी-बारी ,सोने की दिवारी ,
तहाँ बैठी बिटिया कान-कुँवारी .
का धावै ,का मनावै ?
'सप्ता धावै,सप्ता मनावै .
सप्ता धाये का फल पावै ?
पलका पूत ,सेज भतार ,
अमिया तर मइको ,महुआ तर ससुरो .
डुलियन आवैं पलकियन जायँ .
भइया सँग आवें ,सइयाँ सँग जायँ .
चटका चौरो ,माँग बिजौरो ,
गौरा ईश्वर खेलैं सार .
बहुयें-बिटियाँ माँगें सुहाग-
सात देउर दौरानी ,सात भैया भौजाई,
पाँव भर बिछिया ,माँग भर सिंदुरा ,
पलना पूत, सेज भतार ,
कजरौटा सी बिटियां सिंधौरा सी बहुरियाँ ,
फल से पूत, नरियर से दमाद.
गइयन  की राँभन,घोड़न की हिनहिन .
देहरी भरी पनहियाँ ,कोने भर लठियाँ ,
अरगनी लँगुटियाँ
चेरी को चरकन ,
बहू को ठनगन
बाँदी की बरबराट,काँसे की झरझराट,
टारो डेली,बाढ़ो बेली,
वासदेव की बड़ी महतारी .
जनम-जनम जनि करो अकेली .'
मैं जानी बिटिया बारी-भोरी ,
चन मँगिहै ,चबेना मँगिहै ,
बेटी माँगो कुल को राज .
पायो भाग,
सप्ता# दियो सुहाग !
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(#सप्तमातृका) 
  सांसारिक जीवन में अपनी बहुमुखी भूमिका  निबाहती ,सुखी समृद्ध  गार्हस्थ्य  की धुरी के रूप में कल्याणमयी नारी का स्वरूप ही सुहाग की मूल अवधारणा है.
 - प्रतिभा सक्सेना.

शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2017

श्रीकृष्ण चरित्र का यथार्थ : एक दृष्टि .


पुरोवाक् -
भारतीय जन-मानस में श्रीकृष्ण की छवि, ईश्वर का पूर्णावतार होने के साथ परम रसिक नायक एवं प्रेम तथा करुणा के आगार के रूप में विद्यमान है .अपनी रुचि के अनुसार उसे इन दोनों के अलग-अलग अनुपातों में ढाल लिया जाता है.इन्हीं दोनों का गहरा आवरण उनके कठोर चुनौतियों भरे जीवन की वास्तविकताओं को गौण बना देता है .लेकिन गीता के गायक का व्यक्तित्व ,ठोस वास्तविकता से परिपूर्ण रहा है. 
      श्रीकृष्ण ने जिस धर्म की अनुशंसा की वह किसी परलोक के लिये नहीं , इसी लोक-जीवन के लिये ,शान्ति आनन्द और कल्याण का विधान है,जो समाज और व्यक्ति के जीवन को सुन्दर संतुलित और सरस बनाने का संदेश दे कर संगति ,समता एवं सहिष्णुतामय  जीवन की अपेक्षा करता है. वे सच्चे कर्मयोगी थे, जिन्होंने जो स्वयं जिया उसी का उपदेश दिया.जन्म से लेकर परमधाम प्रस्थान तक उनका जीवन संघर्षो में बीता. जनहित के लिये विषम स्थितियों से निरंतर जूझे, सब के प्रति जवाबदेह बन कर स्वयं में नितान्त निस्पृह,निर्लिप्त और निस्संग बने रहे.
       लोक कल्याण के लिये जो अपना ही अतिक्रमण कर गया वह व्यक्ति श्रीकृष्ण हैं . अनीति और अन्याय के विरोध में ,अपना मनोरथ सिद्ध करने को , किसी के या स्वयं के वचन का बहाना नहीं लिया .विषम स्थितियों को किसी भी तरह सम बनाना, समाज और व्यक्ति के लिये जो संगत और हितकारी हो वही करने को प्रेरित करते रहे . आगे का सारा भविष्य जिससे प्रदूषित हो जाये, जिसका निराकरण कभी न हो सके  उस स्थिति को टालने के लिये वे हर मूल्य पर तत्पर रहे.ऊपरी आदर्शों का आडंबर उन्होंने कभी नहीं पाला .उनका धर्म लोक-जीवन को सहज-स्वाभाविक एवं सुखमय बनाने की परिकल्पना लेकर चला था, नृत्य-गान आदि कलाओं से जीवन  में सरस ता का संचार होता रहे  वैयक्तिक विकृतियों का शमन और  मन का प्रसादन हो , जीवन आनन्द और कृतार्थता का अनुभव कर सके
       मानसिकता के उच्चतम स्तर पर प्रतिष्ठित उनका अदम्य व्यक्तित्व मानव-मात्र की मुक्ति का विधान कर गया . कंस के आतंक और षड्यंत्रों के बीच पल कर मानवता की रक्षा के लिये , प्रचलित मान्यताओं से विद्रोह की सीमा तक जा कर ,वे अन्याय एवं रूढ़ परिपाटियों का प्रतिकार करते रहे.
नारी को खाँचों की घुटन से निकाल कर ,उसकी मनुजोचित निजता और गरिमा को प्रतिष्ठित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी . पशुबल से पराभूत की गई स्त्री को कलंकित मान कर त्याग देने की समाज-प्रचलित मानसिकता के निराकरण हेतु भौमासुर द्वारा अपहृता सोलह हज़ार नारियों को बंदी जीवन से मुक्त ही नहीं कराया उन्हें ,तिरस्कार से बचाने के लिये उनसे स्वयं विवाह करने का साहसिक कदम उठा कर , सामाजिक स्वीकृति और सम्मान प्रदान किया. नारी-पुरुष संबंधों का चिर-विवादित समाधान उनके संतुलित एवं उन्नयनकारी मैत्री-भाव में प्रतिफलित हुआ .
        मेरे मन में एक बात बार-बार आती है - अर्द्धांगिनी सहित छत्र-छँवर धारे, सिंहासनासीन ,बंधु-बाँधवों से सेवित प्रभुतासंपन्न भूपति के रूप में श्रीकृष्ण का चित्र मैंने कहीं नहीं देखा .देखा तो चक्र लेकर दौड़ते हुये ,रथ संचालित करते , गीता का उपदेश देते और देखा है ग्रामों के सहज-सरल परिवेश के बीच, गोप-परिवार के चपल बालक की कौतुक-क्रीड़ाओं वाली चर्या की झाँकियों में . श्रीकृष्ण का लोक-रंजक किन्तु अदम्य  कभी रूढ़ प्रतिमानों में नहीं बँधा - जूठन खाई,पीतांबर में पाञ्चाली के पदत्राण समेटे , युद्ध छोड़ भागे , स्वयं अपनी प्रतिज्ञा भंग करने में संकोच नहीं किया,मित्र से भगिनी का अपहरण करा दिया, हँसकर वंशनाश का शाप सिर धर लिया, अपने हित-साधन हेतु नहीं ,अनर्थों के निवारण के लिये अनिष्टों के निस्तारण के लिये . सबके कल्याण के लिये जो अपने ,यश-अपयश,सुख-दुख , हानि-लाभ से निस्पृह रहा हो , वही उच्चाशयी , श्रीकृष्ण के समान स्वयं अपना अतिक्रमण करने में समर्थ एवं सिद्ध-मति हो सकता है .
          अब थोड़ी चर्चा उनकी सखी ,मनस्विनी पाञ्चाली के संदर्भ में - इस नारी की प्रखरता और विदग्धता से हत पुरुष-वर्ग कितने रूपों में उस के विखंडन का, उसके गौरव को क्षीण करने का प्रयास करता है ,उसे अपमानित करने और नीचा दिखाने से कभी चूकता नहीं और विषम समय में सिद्धान्तों की आड़ ले कर स्वजन और गुरुजन भी किनारा कर जाते हैं .तब पग-पग पर विशृंखलमना होती है पाञ्चाली ,पर समेटती है अपने आप को  .कैसा कड़वा सच है कि अपने कर्तव्य पूर्ण करने के लिये , अपने दायित्व -निर्वहन के लिये नारी को स्वयं के प्रति कितना निर्मम होना पड़ता है , इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है- द्रौपदी .
               लेकिन कृष्ण जैसा सखा है उसके साथ - क्षीण होता मनोबल साधने को ,विश्वास दिलाने को कि तुम मन-वचन-कर्म से अपने कर्तव्य-पथ पर डटी रहो तो कोई बाधा सामने नहीं टिकेगी .तुम उन सबसे बीस ही रहोगी क्योंकि तुम्हारी बुद्धि, बँधी नहीं है ,विवेक जाग्रत है, निस्स्वार्थ भावनायें और निर्द्वंद्व मन है . पाञ्चाली के विषम जीवन की सांत्वना बने कृष्ण, उसे प्रेरित करते हुए आश्वस्त करते हैं कि दुख और मनस्ताप कितना ही झेलना पड़े , अंततः गरिमा और यश की भागिनी तुम होगी.और कृष्ण-सखी के जीवन में कृष्ण के महार्घ शब्द अपनी संपूर्ण अर्थवत्ता के साथ चरितार्थ होते हैं.
              मित्र के रूप में एक जीवन्त प्रेरणा बराबर  पाञ्चाली के साथ रही, जो प्रत्यक्ष कर गई कि विरोधी परिस्थितियों की निरंतरता में भी, असंपृक्त रह कर किस प्रकार व्यक्ति अपने निजत्व को अक्षुण्ण रख सकता है .
जाने कितने जन्मों के पुण्य जागते हैं तब ऐसे व्यक्ति का सान्निध्य मिल पाता है, जिससे जीवन कृतार्थ हो जाये. विपदाओँ से उबारने में सदा सहयोगी, सामाजिक विषमताओं को अपने नीति-कौशल से सम की ओर ले जाने वाला निष्काम कर्म-योगी कृष्ण और बिडंबनाओं से निरंतर जूझती तेजस्विनी पाञ्चाली की मित्रता एक उदाहरण है आज के देहधर्मी नर-नारियों के लिये कि संसार में बहुत-कुछ ऐसा है जिसकी अवधारणा, मानसिकता को उच्चतर स्तरों पर प्रतिष्ठित कर, जीवन को श्रेष्ठतर बना कर ,सांसारिक व्यवहारों का संचालन करती रहे . गिरावट और आक्रामक होती कामनाओँ से ग्रस्त आज की मनुष्यता को उबारने के लिये इससे बड़ा अवदान और क्या हो सकता है!
 नर-नारी के संबंध सदा से विविध रूपों में सामने आते रहे हैं .पारस्परिक संबंधों का जो  उज्ज्वल  रूप यहाँ चित्रित है वह बिंब-प्रतिबिंबवत् एक दूसरे की मनोभावनाओं को निरूपित करते हुये पारस्परिक प्रेरणा का स्रोत बनता है .देह के आकर्षण से परे दोनों की आत्मीयता जिस विश्वास पर आधारित है वह  सारे संबंधों को पीछे छोड़, मानव-जीवन के उच्चतर मान स्थापित करती है.  यह उपन्यास - कृष्ण-सखी .पूर्णावतार श्रीकृष्ण और याज्ञसेनी पाञ्चाली की मैत्री को आधार बना कर ऐसे ही घटनाक्रम की  मर्मकथा है. पूर्ण  आश्वस्ति और गहन निष्ठा से पूर्ण यह मैत्री जिसे मिल सके  उसका जीवन सचमुच धन्य हो जाता है . 
- प्रतिभा सक्सेना.






सोमवार, 2 अक्टूबर 2017

कृष्ण सखी - एक प्रतिक्रया

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डॉ. प्रतिभा सक्सेना एक ऐसा नाम है जिनके नाम से जुड़े हैं उत्कृष्ट खण्ड-काव्य, लोक गीत, हास्य-व्यंग्य, निबंध, नाटक और जुड़ी हैं कहानियाँ, कविताएँ तथा बहुत सारी ब्लॉग रचनाएँ. विदेश में रहते हुए भी हिन्दी साहित्य की सेवा वर्षों से कर रही हैं. बल्कि यह कहना उचित होगा कि चुपचाप सेवा कर रही हैं. सीमित पाठकवर्ग के मध्य उनकी रचनाएँ अपना एक विशिष्ट स्थान रखती हैं. इनकी प्रत्येक रचना उत्कृष्टता का एक दुर्लभ उदाहरण है और भाषा वर्त्तमान में लुप्त हो चुकी है. “कृष्ण-सखी” डॉ. प्रतिभा सक्सेना का नवीनतम उपन्यास है, जिसकी प्रतीक्षा कई वर्षों से थी.
विगत कुछ वर्षों से यह देखने में आया है कि पौराणिक उपन्यासों के प्रकाशन की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है. इनमें से कुछ उपन्यास/ ग्रंथ पौराणिक पात्रों और घटनाओं को लेकर काल्पनिक कथाओं के आधार पर लिखे गये हैं तथा कुछ उन घटनाओं की अन्य दृष्टिकोण से व्याख्या करते हैं. यह सभी उपन्यास अत्यंत लोकप्रिय हुए. किंतु ध्यान देने की बात यह है कि सभी उपन्यास मूलत: अंग्रेज़ी में लिखे गये तथा उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उनका हिन्दी में अनुवाद प्रकाशित किया गया, जो अंग्रेज़ी पाठक-वर्ग से इतर अपना स्थान बनाने में सफल हुआ.
कथानक
“कृष्ण सखी”, जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है, कृष्ण और उनकी सखी मनस्विनी द्रौपदी के कई अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डालता है. उपन्यास की कथा मूलत: महर्षि वेदव्यास रचित ग्रंथ “महाभारत” की कथा है. किंतु इसमें महाभारत की उन्हीं घटनाओं को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया है जहाँ कृष्ण अथवा द्रौपदी की उपस्थिति है. अन्य घटनाओं का विवरण सन्दर्भ के रूप में अथवा उस रूप में उल्लिखित है, जिस रूप में वह घटना इनकी चारित्रिक विशेषताओं को रेखांकित करती है. मत्स्य-बेध, पाँच पतियों के मध्य विभाजन, वन गमन, सपत्नियों व उनकी संतानों का उल्लेख, कर्ण के प्रति मन में उठते विचार व द्विधाएँ, चीर हरण, कुरुक्षेत्र का महासमर, भीष्म से प्रश्न, पुत्रों की हत्या और अंतत: हिमाच्छादित पर्वत शृंखलाओं के मध्य हिम समाधि... यह समस्त घटनाक्रम पांचाली के सन्दर्भ में तथा कारागार में जन्म, मातुल द्वारा वध किये जाने की आशंका में भगिनी के जीवन के दाँव पर जीवन दान पाना, राधा तथा अन्य गोपियों के साथ रास रचाना, फिर उन्हें छोड़कर द्वारका प्रस्थान करना, सखा अर्जुन को प्रेरित कर निज बहिन का अपहरण करवाना, युद्ध में सारथि तथा एक कुशल रणनीतिज्ञ की भूमिका निभाना, गान्धारी का शाप स्वीकार करना, अश्वत्थामा को शापित करना तथा एक वधिक के वाण द्वारा मृत्यु को प्राप्त होना जैसी घटनाएँ कृष्ण के सन्दर्भ में प्रस्तुत की गयी हैं.
भाषा:
उपन्यास की भाषा पाठकों को संस्कृतनिष्ठ प्रतीत हो सकती है, किंतु मेरी दृष्टि में यह हिन्दी साहित्य की एक सुग्राह्य भाषा है. उपन्यासकार स्वयं एक प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं.  उनकी समस्त रचनाओं में हिन्दी साहित्य की एक सुगन्ध पाई जाती है और जिन्होंने उन्हें नियमित पढा है, उनके लिये इस भाषा की मिठास कदापि नवीन नहीं हो सकती. व्यक्तिगत रूप से मेरा यह मानना है कि जिन उपन्यासों का उल्लेख मैंने इस आलेख के प्रारम्भ में किया है, उनके हिन्दी में अनूदित संस्करण के समक्ष “कृष्ण सखी” कैलाश के शिखर सा प्रतीत होता है. मौलिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक मूल्यों के आधार पर उपन्यास की भाषा एक गहरा प्रभाव छोड़ती है.
डॉ. प्रतिभा सक्सेना एक कथाकार, कवयित्री, नाटककार, गीतकार और उपन्यासकार हैं. इसलिये यह उपन्यास पढते हुए पाठक को इन सभी विधाओं की यात्रा का अनुभव प्राप्त होता है. जहाँ भाषा की सरसता और बोधगम्यता इसे एक काव्य का प्रवाह प्रदान करती है, वहीं दृश्यांकन एवं सम्वादों की सुन्दरता एक नाटकीय चमत्कार से कम नहीं है.

शैली:
प्लेटो की महान रचना “रिपब्लिक” में जिस प्रकार प्लेटो ने अपने गुरु सुकरात के साथ हुये सम्वादों के माध्यम से एक दार्शनिक एवं राजनैतिक विचारधारा का प्रतिपादन किया है, ठीक उसी प्रकार इस उपन्यास में भी कृष्ण और पांचाली के सम्वादों के माध्यम से उन दोनों के कुछ अप्रकाशित चारित्रिक पहलुओं को प्रकाश में लाने की चेष्टा की गयी है. कई अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर तथा कुछ नयी व्याख्याएँ भी इन सम्वादों के माध्यम से मुखर होती हैं. ऐसा प्रतीत होता है मानो कृष्ण और पांचाली मूल ग्रंथकार एवं वर्त्तमान उपन्यासकार के प्रभाव से मुक्त होकर अपने मन की बात एक दूसरे से व्यक्त रहे हैं और एक दूसरे के प्रश्नों का उत्तर दे रहे हों. रचनाकार का प्रवेश मात्र उन परिस्थितियों में है जहाँ पाठकों के समक्ष पात्रों से विलग होकर कोई बात कहानी हो. द्रौपदी और कृष्ण के प्रश्नों के माध्यम से प्रतिभा जी ने उन सभी प्रश्नों के उत्तर और भ्रांतियों के स्पष्टीकरण प्रस्तुत किये हैं जो भिन्न भिन्न कालखण्ड में हम सबके मस्तिष्क में जन्म लेते रहे हैं.
उपन्यास एक रोमांचक चलचित्र का प्रभाव उत्पन्न करता है और दृश्यों का समायोजन इतना उत्कृष्ट है कि घटनाएं शब्दों के नहीं, चित्रों के माध्यम से मस्तिष्क में स्थान बनाती जाती हैं.

केन्द्रीय भाव:
उपन्यास का मुख्य उद्देश्य योगेश्वर कृष्ण और मनस्विनी द्रौपदी के विषय में जन साधारण में प्रचारित भ्रांतियों का उन्मूलन करना है. सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी ने अपने एक प्रवचन में कहा है कि भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम इस कारण नहीं कहा जाता कि उन्होंने पिता की आज्ञा मानी, युवराज होते भी राज्याभिषेक से वंचित रहे, वन के दुःख सहे, पत्नी का त्याग किया, संतान का वियोग सहा, अपितु इस कारण कहा जाता है कि जीवन में इतनी प्रतिकूल परिस्थितियों को सहकर भी उन्होंने कभी दुःख का भाव अपने मुख पर नहीं आने दिया.
“कृष्ण सखी” में भी कृष्ण की प्रचलित छवि को खंडित किया गया है. प्रतिभा जी ने बताया है कि गोपियों के वस्त्र छिपा लेने के पीछे यह कारण था कि वे उन्हें उनके शील की रक्षा और उनकी तबिक भी त्रुटि से सम्पूर्ण समाज अभिशप्त न हो जाए (जैसा कि कंस के जन्म से हुआ) का पाठ पढ़ाना चाहते थे, सोलह हज़ार राजकुमारियों को मुक्त करवाकर उनसे विवाह कर समाज में उन्हें सम्मान दिलाया. यही नहीं वह कृष्ण जिनको कारागार में जन्म के साथ ही माता से विलग कर दिया गया और गोकुल में लालन पालन मिला, उसके जीवन के लिये भगिनी का जीवन बलिदान किया गया, निज बहिन सुभद्रा का अपहरण उसे योग्य वर दिलाने के लिये और दुराचारी से बचाने के लिये किया, युद्ध में शस्त्र न उठाने का प्रण भी भंग करना पड़ा. स्वयं लेखिका के शब्दों मे – उनका जीवन संघर्षों में बीता. सबके प्रति जवाबदेह बनकर भी नितांत निस्पृह, निर्लिप्त और निस्संग बने रहे.
दूसरी ओर मनस्विनी द्रौपदी एक आदर्श नारी का प्रतिनिधित्व करती है. प्रश्न करती है, उत्तर मांगती है और भीष्म तथा धर्मराज से अपने प्रति हुए व्यवहार का न्याय चाहती है. और इन सबके लिये वो भिक्षा नहीं मांगती, बल्कि अधिकार चाहती है. मनस्विनी द्रौपदी के चित्रण में लेखिका ने कहीं भी आक्रामक नारीवादी अभिव्यक्ति का प्रयोग नहीं किया है, अपितु स्वाभाविक एवं न्यायसंगत प्रश्नों और तर्कों का सहारा लिया है. “कृष्ण जैसा मित्र है उसका टूटता मनोबल साधने को, विश्वास दिलाने को कि तुम मन-वचन-कर्म से अपने कर्त्तव्य पथ पर डटी रहो तो कोई बाधा सामने नहीं टिकेगी.” पांचाली का चरित्र एक गौरवमयी ,यशस्विनी और समर्थ नारी को रूप में कृष्ण सखी के अर्थ को चरितार्थ करता है.
भाषा:
उपन्यास की भाषा पाठकों को संस्कृतनिष्ठ प्रतीत हो सकती है, किंतु मेरी दृष्टि में यह हिन्दी साहित्य की एक सुग्राह्य भाषा है. उपन्यासकार स्वयं एक प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं.  उनकी समस्त रचनाओं में हिन्दी साहित्य की एक सुगन्ध पाई जाती है और जिन्होंने उन्हें नियमित पढा है, उनके लिये इस भाषा की मिठास कदापि नवीन नहीं हो सकती. व्यक्तिगत रूप से मेरा यह मानना है कि जिन उपन्यासों का उल्लेख मैंने इस आलेख के प्रारम्भ में किया है, उनके हिन्दी में अनूदित संस्करण के समक्ष “कृष्ण सखी” कैलाश के शिखर सा प्रतीत होता है. मौलिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक मूल्यों के आधार पर उपन्यास की भाषा एक गहरा प्रभाव छोड़ती है.
डॉ. प्रतिभा सक्सेना एक कथाकार, कवयित्री, नाटककार, गीतकार और उपन्यासकार हैं. इसलिये यह उपन्यास पढते हुए पाठक को इन सभी विधाओं की यात्रा का अनुभव प्राप्त होता है. जहाँ भाषा की सरसता और बोधगम्यता इसे एक काव्य का प्रवाह प्रदान करती है, वहीं दृश्यांकन एवं सम्वादों की सुन्दरता एक नाटकीय चमत्कार से कम नहीं है.

शैली:
प्लेटो की महान रचना “रिपब्लिक” में जिस प्रकार प्लेटो ने अपने गुरु सुकरात के साथ हुये सम्वादों के माध्यम से एक दार्शनिक एवं राजनैतिक विचारधारा का प्रतिपादन किया है, ठीक उसी प्रकार इस उपन्यास में भी कृष्ण और पांचाली के सम्वादों के माध्यम से उन दोनों के कुछ अप्रकाशित चारित्रिक पहलुओं को प्रकाश में लाने की चेष्टा की गयी है. कई अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर तथा कुछ नयी व्याख्याएँ भी इन सम्वादों के माध्यम से मुखर होती हैं. ऐसा प्रतीत होता है मानो कृष्ण और पांचाली मूल ग्रंथकार एवं वर्त्तमान उपन्यासकार के प्रभाव से मुक्त होकर अपने मन की बात एक दूसरे से व्यक्त रहे हैं और एक दूसरे के प्रश्नों का उत्तर दे रहे हों. रचनाकार का प्रवेश मात्र उन परिस्थितियों में है जहाँ पाठकों के समक्ष पात्रों से विलग होकर कोई बात कहानी हो. द्रौपदी और कृष्ण के प्रश्नों के माध्यम से प्रतिभा जी ने उन सभी प्रश्नों के उत्तर और भ्रांतियों के स्पष्टीकरण प्रस्तुत किये हैं जो भिन्न भिन्न कालखण्ड में हम सबके मस्तिष्क में जन्म लेते रहे हैं.
उपन्यास एक रोमांचक चलचित्र का प्रभाव उत्पन्न करता है और दृश्यों का समायोजन इतना उत्कृष्ट है कि घटनाएं शब्दों के नहीं, चित्रों के माध्यम से मस्तिष्क में स्थान बनाती जाती हैं.

केन्द्रीय भाव:
उपन्यास का मुख्य उद्देश्य योगेश्वर कृष्ण और मनस्विनी द्रौपदी के विषय में जन साधारण में प्रचारित भ्रांतियों का उन्मूलन करना है. सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी ने अपने एक प्रवचन में कहा है कि भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम इस कारण नहीं कहा जाता कि उन्होंने पिता की आज्ञा मानी, युवराज होते भी राज्याभिषेक से वंचित रहे, वन के दुःख सहे, पत्नी का त्याग किया, संतान का वियोग सहा, अपितु इस कारण कहा जाता है कि जीवन में इतनी प्रतिकूल परिस्थितियों को सहकर भी उन्होंने कभी दुःख का भाव अपने मुख पर नहीं आने दिया.
“कृष्ण सखी” में भी कृष्ण की प्रचलित छवि को खंडित किया गया है. प्रतिभा जी ने बताया है कि गोपियों के वस्त्र छिपा लेने के पीछे यह कारण था कि वे उन्हें उनके शील की रक्षा और उनकी तबिक भी त्रुटि से सम्पूर्ण समाज अभिशप्त न हो जाए (जैसा कि कंस के जन्म से हुआ) का पाठ पढ़ाना चाहते थे, सोलह हज़ार राजकुमारियों को मुक्त करवाकर उनसे विवाह कर समाज में उन्हें सम्मान दिलाया. यही नहीं वह कृष्ण जिनको कारागार में जन्म के साथ ही माता से विलग कर दिया गया और गोकुल में लालन पालन मिला, उसके जीवन के लिये भगिनी का जीवन बलिदान किया गया, निज बहिन सुभद्रा का अपहरण उसे योग्य वर दिलाने के लिये और दुराचारी से बचाने के लिये किया, युद्ध में शस्त्र न उठाने का प्रण भी भंग करना पड़ा. स्वयं लेखिका के शब्दों मे – उनका जीवन संघर्षों में बीता. सबके प्रति जवाबदेह बनकर भी नितांत निस्पृह, निर्लिप्त और निस्संग बने रहे.
दूसरी ओर मनस्विनी द्रौपदी एक आदर्श नारी का प्रतिनिधित्व करती है. प्रश्न करती है, उत्तर मांगती है और भीष्म तथा धर्मराज से अपने प्रति हुए व्यवहार का न्याय चाहती है. और इन सबके लिये वो भिक्षा नहीं मांगती, बल्कि अधिकार चाहती है. मनस्विनी द्रौपदी के चित्रण में लेखिका ने कहीं भी आक्रामक नारीवादी अभिव्यक्ति का प्रयोग नहीं किया है, अपितु स्वाभाविक एवं न्यायसंगत प्रश्नों और तर्कों का सहारा लिया है. “कृष्ण जैसा मित्र है उसका टूटता मनोबल साधने को, विश्वास दिलाने को कि तुम मन-वचन-कर्म से अपने कर्त्तव्य पथ पर डटी रहो तो कोई बाधा सामने नहीं टिकेगी.” पांचाली का चरित्र एक गौरवमयी ,यशस्विनी और समर्थ नारी को रूप में कृष्ण सखी के अर्थ को चरितार्थ करता है.
भाषा:
उपन्यास की भाषा पाठकों को संस्कृतनिष्ठ प्रतीत हो सकती है, किंतु मेरी दृष्टि में यह हिन्दी साहित्य की एक सुग्राह्य भाषा है. उपन्यासकार स्वयं एक प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं.  उनकी समस्त रचनाओं में हिन्दी साहित्य की एक सुगन्ध पाई जाती है और जिन्होंने उन्हें नियमित पढा है, उनके लिये इस भाषा की मिठास कदापि नवीन नहीं हो सकती. व्यक्तिगत रूप से मेरा यह मानना है कि जिन उपन्यासों का उल्लेख मैंने इस आलेख के प्रारम्भ में किया है, उनके हिन्दी में अनूदित संस्करण के समक्ष “कृष्ण सखी” कैलाश के शिखर सा प्रतीत होता है. मौलिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक मूल्यों के आधार पर उपन्यास की भाषा एक गहरा प्रभाव छोड़ती है.
डॉ. प्रतिभा सक्सेना एक कथाकार, कवयित्री, नाटककार, गीतकार और उपन्यासकार हैं. इसलिये यह उपन्यास पढते हुए पाठक को इन सभी विधाओं की यात्रा का अनुभव प्राप्त होता है. जहाँ भाषा की सरसता और बोधगम्यता इसे एक काव्य का प्रवाह प्रदान करती है, वहीं दृश्यांकन एवं सम्वादों की सुन्दरता एक नाटकीय चमत्कार से कम नहीं है.

शैली:
प्लेटो की महान रचना “रिपब्लिक” में जिस प्रकार प्लेटो ने अपने गुरु सुकरात के साथ हुये सम्वादों के माध्यम से एक दार्शनिक एवं राजनैतिक विचारधारा का प्रतिपादन किया है, ठीक उसी प्रकार इस उपन्यास में भी कृष्ण और पांचाली के सम्वादों के माध्यम से उन दोनों के कुछ अप्रकाशित चारित्रिक पहलुओं को प्रकाश में लाने की चेष्टा की गयी है. कई अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर तथा कुछ नयी व्याख्याएँ भी इन सम्वादों के माध्यम से मुखर होती हैं. ऐसा प्रतीत होता है मानो कृष्ण और पांचाली मूल ग्रंथकार एवं वर्त्तमान उपन्यासकार के प्रभाव से मुक्त होकर अपने मन की बात एक दूसरे से व्यक्त रहे हैं और एक दूसरे के प्रश्नों का उत्तर दे रहे हों. रचनाकार का प्रवेश मात्र उन परिस्थितियों में है जहाँ पाठकों के समक्ष पात्रों से विलग होकर कोई बात कहानी हो. द्रौपदी और कृष्ण के प्रश्नों के माध्यम से प्रतिभा जी ने उन सभी प्रश्नों के उत्तर और भ्रांतियों के स्पष्टीकरण प्रस्तुत किये हैं जो भिन्न भिन्न कालखण्ड में हम सबके मस्तिष्क में जन्म लेते रहे हैं.
उपन्यास एक रोमांचक चलचित्र का प्रभाव उत्पन्न करता है और दृश्यों का समायोजन इतना उत्कृष्ट है कि घटनाएं शब्दों के नहीं, चित्रों के माध्यम से मस्तिष्क में स्थान बनाती जाती हैं.

केन्द्रीय भाव:
उपन्यास का मुख्य उद्देश्य योगेश्वर कृष्ण और मनस्विनी द्रौपदी के विषय में जन साधारण में प्रचारित भ्रांतियों का उन्मूलन करना है. सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी ने अपने एक प्रवचन में कहा है कि भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम इस कारण नहीं कहा जाता कि उन्होंने पिता की आज्ञा मानी, युवराज होते भी राज्याभिषेक से वंचित रहे, वन के दुःख सहे, पत्नी का त्याग किया, संतान का वियोग सहा, अपितु इस कारण कहा जाता है कि जीवन में इतनी प्रतिकूल परिस्थितियों को सहकर भी उन्होंने कभी दुःख का भाव अपने मुख पर नहीं आने दिया.
“कृष्ण सखी” में भी कृष्ण की प्रचलित छवि को खंडित किया गया है. प्रतिभा जी ने बताया है कि गोपियों के वस्त्र छिपा लेने के पीछे यह कारण था कि वे उन्हें उनके शील की रक्षा और उनकी तबिक भी त्रुटि से सम्पूर्ण समाज अभिशप्त न हो जाए (जैसा कि कंस के जन्म से हुआ) का पाठ पढ़ाना चाहते थे, सोलह हज़ार राजकुमारियों को मुक्त करवाकर उनसे विवाह कर समाज में उन्हें सम्मान दिलाया. यही नहीं वह कृष्ण जिनको कारागार में जन्म के साथ ही माता से विलग कर दिया गया और गोकुल में लालन पालन मिला, उसके जीवन के लिये भगिनी का जीवन बलिदान किया गया, निज बहिन सुभद्रा का अपहरण उसे योग्य वर दिलाने के लिये और दुराचारी से बचाने के लिये किया, युद्ध में शस्त्र न उठाने का प्रण भी भंग करना पड़ा. स्वयं लेखिका के शब्दों मे – उनका जीवन संघर्षों में बीता. सबके प्रति जवाबदेह बनकर भी नितांत निस्पृह, निर्लिप्त और निस्संग बने रहे.
दूसरी ओर मनस्विनी द्रौपदी एक आदर्श नारी का प्रतिनिधित्व करती है. प्रश्न करती है, उत्तर मांगती है और भीष्म तथा धर्मराज से अपने प्रति हुए व्यवहार का न्याय चाहती है. और इन सबके लिये वो भिक्षा नहीं मांगती, बल्कि अधिकार चाहती है. मनस्विनी द्रौपदी के चित्रण में लेखिका ने कहीं भी आक्रामक नारीवादी अभिव्यक्ति का प्रयोग नहीं किया है, अपितु स्वाभाविक एवं न्यायसंगत प्रश्नों और तर्कों का सहारा लिया है. “कृष्ण जैसा मित्र है उसका टूटता मनोबल साधने को, विश्वास दिलाने को कि तुम मन-वचन-कर्म से अपने कर्त्तव्य पथ पर डटी रहो तो कोई बाधा सामने नहीं टिकेगी.” पांचाली का चरित्र एक गौरवमयी ,यशस्विनी और समर्थ नारी को रूप में कृष्ण सखी के अर्थ को चरितार्थ करता है.
अंत में:
उपन्यास का कलेवर आजकल जिस प्रकार के उपन्यास बाज़ार में उपलब्ध है उसके समकक्ष रखने का प्रयास प्रकाशक “शिवना प्रकाशन” द्वारा किया गया है. आवरण चित्र मनस्विनी द्रौपदी को पारम्परिक रूप में दर्शाता है, जबकि उपन्यास की माँग उसके सर्वथा विपरीत है. चित्रकार द्रौपदी की विशेषताओं से नितान्त अनभिज्ञ है, उसकी विपुल केश-राशि के स्थान पर दो-चार लटें दिखा कर दीनता में और वृद्धि कर दी है, केशों से आच्छादित हो कर वह अधिक गरिमामयी और वास्तविक लगती . ग्राफिक्स की मदद कम ली गई है जिसके   आवरण थोड़ा फीका दिखता है.
पौने तीन सौ पृष्ठों के इस उपन्यास का मूल्य रु.३७५.०० हैं, जो बाज़ार के हिसाब से अधिक है. मैंने इस उपन्यास की मूल पांडुलिपि पढ़ी है, इसलिए दावे के साथ कह सकता हूँ की प्रकाशक ने पुस्तक “प्रकाशित” नहीं की है बल्कि “छाप दी है”. क्योंकि अनुमानतः ९०% पृष्ठों में वाक्य एक पंक्ति में बिना विराम चिह्न के समाप्त होता है तथा दूसरी पंक्ति में विराम चिह्न से आरम्भ होता है. टंकण की त्रुटियाँ जैसी पांडुलिपि में थीं हू-ब-हू उपन्यास में भी देखी जा सकती हैं. संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि प्रूफ-रीडिंग की ही नहीं गई है.
उपन्यास में सबसे निराश करने वाली बात यह है कि रचनाकार की ओर से कोई वक्तव्य नहीं है – यथा उपन्यास की रचना प्रक्रिया, रचना के सृजन का मुख्य उद्देश्य, पाठकों के नाम सन्देश, आभार आदि. लेखिका की ओर से यह पुस्तक कृष्ण भगवान को समर्पित है. पुस्तक के प्रारम्भ में उपन्यासकार का परिचय या भूमिका या किसी अन्य साहित्यकार, मित्र अथवा सहयोगी द्वारा नहीं दिया गया है.
आजकल जितने भी उपन्यास “बेस्ट सेलर” की श्रेणी में आते हैं, उनसे यह उपन्यास कहीं भी उन्नीस नहीं है, लेकिन अप्रवासी लेखक के लिये एक प्रबंधन टीम द्वारा पुस्तक का विज्ञापन अथवा मार्केटिंग करना संभव नहीं, इसलिए यह उपन्यास, उपन्यास न होकर एक शृंखलाबद्ध ब्लॉग पोस्ट का पुस्तक संस्करण भर होकर न रह जाए इसका दुःख होगा मुझे व्यक्तिगत रूप से.
- सलिल वर्मा.
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मंगलवार, 26 सितंबर 2017

श्री सलिल वर्मा द्वारा कृष्ण-सखी - एक प्रतिक्रिया ,पर मैं जो कहना चाहती हूँ -

श्री सलिल वर्मा द्वारा कृष्ण-सखी - एक प्रतिक्रिया ,पर मैं जो कहना चाहती हूँ -
कृष्ण -सखी का यह मूल्यांकन ऐसा लगा जैसे पूरी तरह रचना के गहन में प्रविष्ट होकर सम्यक् दृष्टि को साक्षी बना कर क्रम-बद्ध आकलन किया गया हो .
रचनाकार के साथ जुड़ कर अंतरंग का ,और सजग-सचेत मस्तिष्क से बाह्य पक्षों का संतुलन जहाँ संभव हो जाये वहाँ रचना का होना अर्थपूर्ण हो जाता है ..सलिल ,तुमने यह संभव कर दिया.
यह बौद्धिक-श्रम-साध्य कार्य तुमने जिस निपुणता से किया मैं विस्मित हूँ ,तुम्हारे विश्लेषण ,विवेचन और निर्धारण की कुशलता से प्रभावित हूँ ,साहित्य की तुम्हारी परख पर गर्वित भी हूँ .
हाँ,मैं तुमसे सहमत हूँ कि कवर-पेज के चित्र के साथ उपन्यास के घटनाक्रम और चरित्र की संगति नहीं बैठती. बस ,होता यह है कि श्रीकृष्ण और द्रौपदी का नाम सुनते ही साधारणतया लोगों का मन चीरहरण और द्रौपदी की पुकार पर पहुँच जाता है .मुखृपृष्ठ के अंकन में यही हुआ है. उपन्यास के कथा-क्रम में न चीरहरण का दृष्य है न पाँचाली के दैन्य का चित्रण,वह अनन्य रूपसी विपुल केश राशि की धारणकर्त्री थी यह भी उस चरित्र का सत्य है- तुम्हारी सूक्ष्म दृष्टि धन्य है . तुमने हर तथ्य पर ध्यान दिया और दिलाया.
एक और बात- प्रूफ़ पढ़ने को मैं तैयार थी ,उनसे कहा भी था पर वे अपने यहां ही वह काम करना चाहते थे. भूमिका भी मेरी मान्यताओं को स्वर देती , तैयार थी -उसे भी सामने आने का अवसर नहीं मिला . उपन्यास में प्रकाशन के लिये उसकी आवश्यकता नहीं समझी गई इस आधार पर कि कथाक्रम स्वयं अपनी बात कह लेगा .
यहाँ एक बात स्पष्ट कर देना आवश्यक समझती हूँ
उन दिनों मेरे पति को स्ट्रोक पड़ा था. मैं प्रकाशन से भी नितान्त उदासीन थी. मेरी मित्र शकुन्तला जी प्रारंभ से ही इस उपन्यास को प्रकाशित करवाने को उत्सुक थीं ,अपने प्रयासों से उन्होंने सारी व्यवस्था की -उनके मन में अपार लगन और मेरे लिये शुभाशंसा ही उन्हें प्रेरित कर रही थी .इस बड़े काम का सारा श्रेय शकुन्तला जी को ही है कि उन्होंने आगे रह कर सब-कुछ कराया. मैं तो सोच भी नहीं सकती थी कि इतनी शीघ्रता से उपन्यास छप जायेगा ('छप गया' प्रकाशन की ओर से यह सूचना पाकर मैं सचमुच विस्मित हो गई थी).मैं उन की आभारी हूँ कि आज मेरी एक पांडुलिपि पुस्तकाकार रूप में सामने है और हमलोग उस पर संवाद कर सके हैं .और भी बताऊ -उन्हीं ने बहुत उत्साहपूर्वक ,अपनी विशेष पहुँच और प्रयत्नों से उसका विमोचन भी,सैन- फ्रान्सिसको स्थित भारत के कांउसल जनरल द्वारा सुप्रसिद्ध बर्कले वि.वि. में संपन्न होना संभव कििया. उपन्यास मेरे हाथ में भी नहीं आया था - तब तक मैने देख भी नहीं पाया था..और पहले ही शकुन्तला जी ने किसी प्रकार एक्सप्रेस मेल से प्रतियां मँगा कर विमोचन कार्य भी संभव करा दिया - मैं उनकी चिर-ऋणी हूँ.
इन दिनों भी मैं अपनी समस्याओँ से मुक्त नहीं हूँ ,सलिल का यह आलेख पढ़ उसी दिन लिया था ,लिख आज पाई हूँ .बहुत शान्ति से नहीं बैठ पा रही हूँ अभी भी , जब तक श्री मान जी घर नहीं आ जाते .जो लिख पाई उससे ही मेरी बात समझ लेना ,जो छूट गया उसके लिये क्षमा माँगती हूँ
तुम सलिल ,उसका मूल्यांकन कर मुझे गौरवान्वित कर रहे हो .साथ में और भी कितने सहृदयजन अपने उद्गार दे कर मेरा मान बढ़ा रहे हैं.
मैं सबकी आभारी हुई .
- प्रतिभा सक्सेना.

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

जहँ-जँह चरण पड़ें ....

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              इंसानी कारस्तानियों से तो अब सारी दुनिया पनाह माँगने लगी है .एक छोटा सा उदाहरण अभी हाल ही में सामने आया है.अमेरिका का, अपनी विविधता के लिये विख्यात येलोस्टोन नेशनल पार्क , जो इतना विशाल है कि  तीन राज्यों में - मोंटाना,व्योमिंग और आइडाहो -फैला है . इसे  धरती मां की जीवंत प्रयोगशाला कह सकते हैं जिस में विकास और विनाश के रहस्य अध्ययन करने का पूरा पूरा अवसर है.पृथ्वी के निर्माण और संचालन प्रक्रिया को समझने के लिए यह क्षेत्र आदर्श है , यही नहीं यहाँ ११,००० वर्षों से मानवीय गतिविधियां निर्बाध रूप से चल रही हैं इस लिए जैाविक और भूतलीय विविधताओं का सिलसिलेवार लेखा मौजूद है.  
                    ये मनुष्य नामक जीव हर जगह अपनी टाँग अड़ाने पहुँच जाता है .प्रकृति के सारे  सुनियोजित कार्यों और सार्थक व्यवहारों को अपने नियंत्रण में रखना चाहता है -बिना जाने कि परिणाम क्या होगा .नेशनल पार्क सर्विस की स्थापना के बाद से १९१६ में इसे उसके अधीन कर दिया गया. और  जंगल के प्राकृत नियमों की जगह इंसानी व्यवस्था के प्रभाव में आने लगा.उसे सिर्फ़ अपनी पड़ी है.प्रकृति को सब का सब-कुछ
आगे भविष्य तक का सोच कर आगे बढ़ना होता है. होता है .एक पूरी शृंखला पड़ी है उसके लिये - जड़ से लेकर चेतना के उच्चस्तरों तक .जिन्हें हम जड़ समझते हैं ,भू-तल,नदी पर्वत से लेकर  उद्भिज अंडज,योनिज सब अपने संपूर्ण भाग-अनुभागों  विभागों सहित .और सब में  ताल-मेल बैठाने का दायित्व सँभालती है .सारे एक दूसरे को प्रभावित करते हुये और होते हुये.पशु-पक्षियों से लेकर वनस्पतियाँ ,नदियाँ मिट्टी तक आपसी तालमेल से जुड़े रहते हैं ,एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं और करते हैं.सब में ऐसी   घनिष्ठता कि एक कड़ी में व्यवधान पड़ेतो सारी शृंखला हिल जाये.सच में तो यही उसका कारॆॆॆ कार्यक्षेत्र है, उसकी प्रयोगशाला है जहाँ अनगिनती प्रयोग लगातार चलते  हैं -न समय की कोई सीमा  न सामग्री की .अतुल भंडार है उसका ,जब जो चाहती है उगा लेती है.एक पेड़ के लिये सैकड़ों बीज एक फल के लिये अऩगिन फूल . और  मूर्ख आदमी समझे बैठा है उसके सुख  के लिये हैं ये सब.यह आयोजना बड़ी लंबी-चौड़ी है.लयबद्धता के साथ ऋतु-क्रम में सारे संतुलन बैठाने की सामर्थ्य प्रकृति के मदरबोर्ड की जीवन्त प्रोग्रामिंग से ही हो सकती  है ..
                 प्राकृतिक जीवन के सामान्य कार्य संपादन तक की अक्ल या  तो है नहीं चल पड़ता है  अपना फ़ितूर लेकर .यहाँ भी सुनियोजित  शृंखला की घनिष्ठ कड़ियों में तोड़-मोड़ करने लगा .जंगल का सारा संतुलन बिगाड़ कर  रख  दिया. सब गड़बड़ होने लगा - नदियाँ विध्वंस पर उतारू हो गई ,भूमि कटने  लगी जंगल  तरुहीन होने लगे,पक्षी पलायन कर गये. हरा-भरा प्रदेश  उजाड़ होने लगा.प्रकृति की योजना में सेंध लगा  सारी व्यवस्था भंग हो गई .
               उसने किया ये  कि बेकार की आफ़त समझ कर जंगल से भेड़ियों का  सफ़ाया कर दिया -70 साल तक भेड़िया रहित बनाये रखा रहा  जंगल को . परिणामतः  हिरणों की भरमार हो गई ,दुर्लभ और उपयोगी वनस्पतियाँ उनके चराव से नष्ट होने लगीं.छोटे पौधे पत्रहीन हो सूख गये ,नये वृक्ष उगना बंद ,पुराने जर्जर.  पक्षी आश्रयहीन हो पलायन कर गये.बीवर जो नदियों में बाँध  बना कर उन्हें संयमित करते थे पलायन कर गये.नदियों का प्रवाह अनियंत्रित हो मनमानी करने लगा.पशु-पक्षियों के बिना बीजों का बिखराव कैसे हो  ,ऊपर से बढ़ता जाता हिरणों की चराव ,हरा-भरा वन उजड़ कर मरुथल बनने लगा
                यह सब  था आदमी के दिमाग़ी फ़ितूर का नतीजा. खिड़कियाँ कुछ खुलीं तो 1995 में फिर से  भेड़ियों का झुंड  जंगल में भेजा गया .जीवन व्यवस्थित होने लगा  नवागतों के  शिकार से हिरणों की संख्या घटी ,धरती पर वनस्पतियाँ पनपने लगीं .पौधे पनपने बड़े होने से पक्षियों की चहक फिर गूँजने लगी . उन्होंने फल कुतर-कुतर कर दूर-दूर तक बीज बिखेरे, नई वृक्षावियाँ सज गईँ . छः-सात वर्षों में जंगल लहलहा उठा.
बीवर लौट आये नदियों पर बाँध बनाने लगे ,नदियाँ संयत हुईं.जलपक्षी बिहार करने लगे.सियारों को भी मारा भेड़ियों ने ,परिणामतः  खरगोशों और चूहों की संख्या बढ़ी ,लोमड़ियाँ ललचाईं ,फिर उनके खाने से बचे अवशेषों पर बाज़-गिद्धों को आमंत्रण मिला.फलदार पेड़ों ने भालुओँ को दावत दी, जिनके आने से हिरण और भेड़ियों पर नियंत्रण हुआ.बीवरों के बाँधों से नदियों की मनमानी नहीं चली ,मिट्टी का कटान रुक गया.सारा क्रम व्यवस्थित हो गया.भेड़ियों की आवक क्या हुई  जंगल का जीवन फिर गुलज़ार हो गया .
               यहाँ कहीं कुछ भी व्यर्थ या असंबद्ध नहीं.यों देखा जाय तो मनुष्य भी उसी शृंखला की एक कड़ी है ,उसका भी शेष सबसे घनिष्ठ संबंध है .एक ही ऋत सबका संचालक - पर कैसा दुर्मति  है , इंसान प्रकृति के तारतम्यमय जीवन में दखलंदाज़ी कर  सारी समरसता विकृत कर डालता है. 
   आदमी नाम का ये प्राणी कब क्या करेगा कोई ठिकाना नहीं , दिमाग़ हमेशा किसी खुराफ़ात के चक्कर में रहता -रातों में नकली  रोशनी में काम करता है , दिन में रोशनी के रास्ते बंदकर आराम करता है.न समय पर जागता है न समय से सोता है .खाने को जाने क्या अल्लम-गल्लम ,पीने को कुछ विचित्र मिश्रण ,पहनने को अजीब ढंग के चिपके ,ढीले,बेतुके ,बनावटी कपड़े . हवा-पानी ,ज़मीन-आसमान हर जगह कुछ न कुछ लफड़े. अपनी सारी  सहजवृत्तियाँ कुंठित कर ली ,लगता है कुछ समय में ये भी भूल जायेगा कि जीवों में किस जाति का प्राणी है .किताबें खोल कर पता करना पड़ेगा कि सृष्टि के विकास क्रम में कहाँ खड़ा है.
यही सब देख कर अब तो  विश्वास हो चला है   -
                'जहँ जहँ चरण पड़ें मनुजन के तहँ-तहँ बंटाढार '.
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