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दिन भर भागम-भाग मचाती हवाएँ कुछ शान्त हुई हैं.पेड़ों की लंबी परछाइयाँ खिड़की पर धीरे-धीरे हिल रही हैं .व्यस्त दिन के बाद अपार्टमेंट का ताला खोल कर चुपचाप बैठ गया हूँ. अब तक छुट्टी होते ही माँ के पास दौड़ जाता था.अब कहीं जाना नहीं होता .
तनय हमेशा कहता है - ' भइया,हम भी आपके अपने हैं , हमारे पास आ जाया कीजिए.'
अम्माँ जी ने भी समझाया ,' छोटी बहन के घर न रहें ,ये पुराने ढकोसले हैं ,कौन मानता है, अब यह सब ?'
पर मुझे वहाँ उलझन होती है.मैं स्वाभाविक नहीं रह पाता
यहाँ मेरी अधिक लोगों से पहचान नहीं, किसी से खास दोस्ती नहीं. एक शेखर है ,ट्रेनिंग में साथ ही था .वसु की शादी में भी बहुत सहायता की थी . तब उसकी ससुराल में भी आना-जाना हुआ था .वही अक्सर अपने घर बुला लेता है .
पिछले रविवार को तनय अपने साथ खींच ले गया कि आपकी बहिन बहुत याद कर रही है .
वहीं चर्चाएँ होने लगीं -
सुमति को दो बार आना पड़ा था.यहाँ साल भर नौकरी की है उसने ,इधर का कुछ लेन-देन, लिखा-पढ़ी का काम बाकी था .पारमिता से मित्रता रही थी, परस्पर सूचनाओं का लेन-देन,चिट्ठी-पत्री अब भी चल रही है.
पिछली बार उस के पिता साथ आये थे.उन्हें लग रहा था पता नहीं आगे कैसे क्या होगा .सीधे मिलकर लड़के से बात करने की हिम्मत नहीं पड़ी . चाह रहे थे यहाँ से कुछ कोशिश हो जाय . उनकी चिन्ता थी पता नहीं कब तक ये लोग अटकाए रखेंगे.मन में शंका भी कि समय बीतने के साथ कब किसी का मन बदल जाय - क्या ठिकाना .
वे बार-बार सुमति से भी ,वही सब कहने लगते था.उसने कहा भी - दो महीने को भीतर जिसे माता-पिता दोनों का अंतिम संस्कार करना पड़ा हो उसके मन पर क्या बीतती होगी .उससे ऐसी बात करना ठीक है क्या ..?ज़रा तो सोचिए.
उसने तो यह भी कहा था -मैंने तो सुना है मौत के बाद एक साल कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता . इतने अविचारी कैसे हो सकते हैं आप लोग ! आवेग में यह भी कह गई - सिर्फ मुझसे छुटकारा चाहते हैं या कि मेरा सुख ?
फिर उससे कुछ कहना उन्होंने बंद कर दिया .
'सब अपनी-अपनी सोचते हैं,' विनय बोले ,' अभी विनीता के लिए भी लड़का मिला कहाँ है?'
जानता हूँ परोक्ष में मुझसे जानने की कोशिश हो रही है कि मेरा इस विषय में क्या विचार है .
मुझे सुन-सुन कर ऊब लगती है.
रहा नहीं जाता बोल बैठता हूँ -
' सब तुम्हारा किया धरा है पारमिता,मुझे, दुविधा में डाल दिया तुमने .'
'अरे ,मुझे तो पता भी नहीं था ,वो तो माँ बीमार थीं . उनका प्रबंध किया था .लेकिन तुम कैसे पहुँच गए वहाँ.. ?'
' रहा नहीं गया,' विनय ने खींचा, 'बेकार सफ़ाई दे रहे हो दोस्त, उम्र का तकाज़ा ठहरा,'. .
ऊपर से और ,
'लड़की देख कर मन मचल गया तुम्हारा और दोष बेचारी मेरी बीवी को .'
तनय हँसता हुआ बढ़ आया,' अरे भाभी ,मुझसे पूछो .हाथ पकड़ कर खींचा था भैया ने उन्हें, ऊपर से चुपके से..-रुपए पकड़ा रहे थे .देख लो सारी झलकियाँ हैं मेरे पास !'
सब मज़ा ले रहे हैं .
मौका चूकती नहीं पारमिता भी,
'क्यों ,तुमने किस मुहूर्त में ब्रजेश की शादी की बात कही कि कैंडीडेट चट् हाज़िर हो गया ?'
' इसे कहते हैं वाक्-सिद्धि ?" विनय ने चटका लगाया
वे लोग तो हँसेंगे ही पर मुझे खिसियाहट लग रही है.
'बीमार माँ का ख़याल न होता तो रुकता भी नहीं वहाँ ,फिर वह इतना कर रही थी मेरी माँ के लिए .एहसान का बोझ मेरे ही सिर पर तो...'
' अच्छा तो है यार .लड़की की परख हो गई. हिल्ले से लग जाओगे .'
मेज़ पर चाय लगाती वसु के मुख पर मुस्कराहट छाई है.
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नहीं ,मुझसे नहीं होगा !
इतना उचाट मन ले कर शादी करना बहुत मुश्किल है.सब के साथ होकर भी सबसे अलग रह जाता हूँ .किसी को क्या दे पाऊँगा.अन्याय नहीं करना चाहता,माँ का जीवन देखा है .पहले अपने मन को साध लूँ. समय चाहिये मुझे ..
मेरी उदासीनता भाँप ली पारमिता ने -
'बस..बस ज्यादा वैरागी मत बनो ईश्वर ने जो दिया ग्रहण करते चलो ब्रजेश !'
'अरे ,तो उनने मना थोड़े ही किया है .'
मेरे लिए और चारा ही क्या है, अपना बस कहाँ है !
ओशो का कथन पढ़ा था कहीं -
'जीवन में कुछ भी छोड़ने जैसा नहीं है। छोड़ने जैसा होता तो परमात्मा उसे बनाता ही नहीं.'
और भी -
“तुम कुछ भी ठीक से नहीं देख पाते, क्योंकि हर चीज़ के बीच में तुम्हारी धारणाएँ खड़ी हो जाती हैं।”
मन में प्रश्न उठता है तो क्या इंसान की धारणाएँ बिलकुल व्यर्थ हैं ,ये भी समय के पाठ हैं .जीवन के अनुभव और क्या हैं ? सीखना - समझना सहज प्रक्रिया है . कुछ बातों पर उलझन में पड़ जाता हूँ .पूछूँगा विनय से उन्होंने ओशो को काफ़ी पढ़ा है.
हाँ, विचारों की खिड़कियाँ खुली रहना तो ठीक..पर मेरी तो समस्या ही दूसरी है .दिमाग़ चकराने लगता है .
कहाँ तक सोचूँ ,नहीं सोचना चाहता यह सब !
कुछ समय के लिए इस सबसे दूर जाना चाहता हूँ .सच में थक गया हूँ ,....अवकाश चाहिए मुझे !
पर इससे बचत कहाँ ?रहना तो इसी दुनिया में है .
एक वक्ष जिसकी आड़ में संसार के तापों से छाँह पा लेता था ,एक और साहचर्य मन को गहन शान्ति प्रदान करता हुआ - एक झटके में सबसे वंचित हो गया.बस, इतना ही हिस्सा था मेरा?
स्म़तियों के भँवर में डूबता चक्कर खा रहा हूँ.
माँ ,तुमने मुझे उस अनिश्चित जीवन की भटकन से निकाल कर सही मार्ग पर लगाने को अपना जीवन होम दिया,मैं तुम्हारे लिए कुछ भी न कर सका. निरुद्देश्य जीवन को दिशा दे कर कोई एक जन्म नहीं सुधारा तुमने,कुछ संस्कार ऐसे, जो कितने आगत जन्मों की पूँजी बन जाते हैं .आधार-शिला रख दी तुमने, आगत की भी पीठिका रच दी . किस तल से उबार कर नई मानसिकता दी ,कि अब उन सतहों का विचार ही मन में विरक्ति जगा देता है.तुम्हारा दिया मनोबल विषम प्रहरों में मुझे साधे रहता है ,ओ माँ !
सोचता था समय के साथ यह भटकन शमित हो जाएगी .अब लगने लगा है बढ़ती आयु की पकन के साथ एकाकीपन का बोध और तीक्ष्ण हो जाता है.
आज मैं जो हूँ उसकी रचयित्री एक नारी रही है ,मैं डंके की चोट पर कह सकता हूँ : उस नारी का एकान्त सृजन हूँ मैं -तन से, मन से आचार-विचार और संस्कार से भी.उसी ने रचा और सँवारा, विकसने की सुविधाएँ दीं . मुझे गढ़ने में कोई पुरुष भागीदार नहीं रहा था. जो पाया है उसी की महती साधना का फल है . जहाँ वंचित रहा उसका कारण पुरुष रहा ,जिसने केवल अपना अहं पोसने को मेरा जीवन स्वाभाविकता से रहित कर डाला .एक मनोग्रंथि का बीज रोप दिया मुझ में और वहीं मैं निरुत्तर हो कर रह जाता हूँ .वे प्रश्न ,यत्न से सुलाई हुई अशान्ति को जगा देते हैं ,वहाँ मैं कमज़ोर रह गया हूँ. एक और पुरुष जिसने एक अंकुराते जीवन को वांछित छाँह से वंचित कर दिया .दुनिया की तीखी धूप ने उसकी सहज स्निग्धता सोख ली .पारमिता के पिता के साथ मैं सहज नहीं रह पाता .मन का तीतापन ऊपरी सतह तक उमड़ने लगता है .
सोचता था वे दिन बीत गए,अब आगे का जीवन अपने हिसाब से जीने को मिलेगा . वह भी नहीं हो सका , नींव खिसक गई . उस दूसरे ने कर्मक्षेत्र में उतरने से पहले ही मनोरथ विरथ कर दिये .
और अब ,जब सब सँभलता लग रहा था तभी दो महीनों के भीतर माँ और पिता दोनों की अंत्येष्टि .कैसे -कैसे विषम अनुभव .दूर-दूर तक कोई नहीं ,कि ज़रा-सा सहारा मिल जाय. मेरा मन अब कहीं नहीं लगता .कुछ नया करने की इच्छा नहीं रह गई .
कुछ शब्द याद आते हैं-
हर कार्य का क्रम निश्चित है.अपनी सुविधा के लिये बचा कर कहाँ रखोगे ब्रजेश ?.जीवन के हवन-कुंड में अपने हिस्से की समिधा डाले बिना छुटकारा कहाँ ?
डाल ही तो रहा हूँ समिधाएँ !
औरों को द्विधा में नहीं रखना चाहता.
बस ,कुछ दिनों को इस सबसे दूर चला जाना चाहता हूँ .
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.चुपचाप बैठा देख उस दिन उसने पूछा था ,' इतनी कम अवधि में बहुत-कुछ घट गया ,तुम पर क्या बीती होगी ? तुम्हें कैसा लगा होगा?'
' बस एक खालीपन,अंदर से बिलकुल रीत गया होऊं जैसे ! कभी-कभी समझ नहीं पाता क्या करना है मुझे .....'
वहाँ से चलत समय वसु मठरी का एक पैकेट पकड़ा गई थी ,'दीदी ने और मैंने तुम्हारे लिए बनाईं हैं, भइया ...'
थोड़ी-सी निकाल कर प्लेट में रख लाया और गिलास में पानी भी.
मेरी वही डायरी मेज़ पर पड़ी है - पंखे की हवा में पन्ने फड़फड़ा रहे हैं.बढ़ कर उठा लिया .
पेन उठा कर बिना लाग-लपेट अपनी उद्विग्नता शब्दों में उँडेलने लगा -
सच में बहुत थक गया हूँ ,अवकाश चाहिए .अलग रहूँ कहीं
इस धरातल से दूर ,जहाँ रोज़मर्रा की खींच-तान न हो .कोई दूसरा तल हो जहाँ ये सारे प्रश्न न खड़े हों,जहाँ मन को चैन मिले , ,यहाँ का कुछ भी जहाँ मेरा पीछा न करे .
पर कहाँ ?
ओह ,कहाँ जाऊँ !
रुक कर सोचने लगता हूँ -दुनिया बहुत बड़ी है .एक स्थिति किसी दूसरे छोर तक पीछा नहीं करती होगी .यहाँ से भिन्न ,सब कुछ बदला हुआ जहाँ मिले!
पर कहाँ ?
.. माँ की इच्छा नर्मदा-परिक्रमा की थी .वे भी ऊबी होंगी , मन का विश्राम चाहती होंगी ,जो मृत्यु से पहले उन्हें कभी नसीब नहीं हुआ!
मेरे लिए है कोई जगह .. कुछ दिन ..रह सकूँ !
ट्रेनिंग पीरियड् के एक टूर का ध्यान आया - ट्रैकिंग के लिए हम हिमालयी क्षेत्र में गए थे.वनों-पर्वतों की वह छाप स्मृतियों में अंकित हो गई है .बहुत सुना था ,प्रत्यक्ष देख लिया. पर्वतराज कुछ न कुछ देता ही है ,मन को शान्ति ,चेत को विश्राम और सांसारिक तापों से छूट ..सघन वन, नीरव-निर्जन घाटियाँ ,निरंतर ऊपर उठती गिरि-शृंखलायें. अवर्णनीय भव्यता और दिव्यता की साकार कल्पना , अधिभौतिक जगत की विलक्षण व्यवस्था , जैसे जगत की संकुलता से परे कोई भिन्न लोक हो.
अंतर्मन से कोई पुकार उठा -चलो, वहीं चलो !
यहाँ से दूर चलो. इस तल से ऊपर किसी दूसरी शीतल हवाओंवाली उन ऊँचाइयों पर चलो ... .मन का बौरायापन वहीं शान्ति पायेगा !
बस, तय कर लिया यहाँ से जाना है .. हाँ,जाना है मुझे !
फिर बता दिया मैंने उन सब को - छुट्टी ले कर जाना है . अभी कुछ मत पूछो ,व्यवस्थाओँ में थोड़ा समय लगेगा .
बाकी सारे प्रश्न बाद में !
*
(क्रमशः)