शनिवार, 5 जनवरी 2013

हिमगिरि के ननिहाल में -


*
देश के दक्षिणी भागों की यात्रा का स्वभाव और प्रभाव ही कुछ और है .उत्तर के  गंगा-यमुनी समतलों को पीछे छोड़ती  विंध्य और सतपुड़ा से  आगे शिप्रा एवं नर्मदा के रम्य तटों का दर्शन करते मुंबई,गोआ, मद्रास ,महाबलेश्वर और कन्याकुमारी तक का भ्रमण कुछ निराली ही अनुभूतियाँ जगाता है.सागर-तल से 600 मीटर तक का उच्चासन धारे यह पुरातन भूमि टेर-टेर कर कहती है -देखों मैं हूँ उन सारी गिरि शृंखलाओँ की नानी .सारे उत्तरी समतलों और पर्वतों की पूर्वजा.जन्म से सहारा दिया मैंने उन्हें . चले आओ , ननिहाल है यह तो तुम्हारा . नेहांचल  फैलाये हूँ बैठी हूँ ये अमृत सरितायें- तुम्हारा अंतस्तल  सींच देंगी,इन पयोधरी उठानों में तुम्हारा तन-मन उछालें लेने लगेगा .
उन्हीं दिनो ' एक योगी की आत्म कथा पूरी हो रही थी, इस अनुपम संयोग से मेरी अनुभूतियों को आध्यात्मिकता का पुट मिला और बाह्य जगत में व्याप्त  अपार सुषमा से मानव मन का कैसा संस्कार होता हैं इसका मैं अनुभव कर सकी -वह दिव्य और गहन शान्तिमय अनुभूति भले ही थोड़ी देर रही हो पर अपनी अमिट छाप छोड़ गई। वर्ड्सवर्थ के शब्दों में यही Bliss of solitude बन गया होगा !
दक्षिण की यह यात्रा जितनी मनोरम है उतनी ही वैचारिक तोष देनेवाली भी.इतनी सुन्दर दृष्यावली और प्रकृति का रमणीय रूप अपार प्रसन्नता से भरता रहा ।जिस स्थिति को ' मन का विश्राम ' कहते हैं उसका अनुभव मैंने कर लिया ।मन में गूँज उठा - पूर्वजा ! उत्तरी भूमियों की पूर्वजा!
 हिमालय की व्यापक ऊँचाइयाँ ध्यान में आ गईँ.वह तो इस धरती से इतना विस्तृत ,इतना  ऊँचा ,विविधता संपन्न!....'
'पर मैं उनकी नानी हूँ .क्यों तुम्हारे यहाँ बच्चे दादी-नानी से ऊँचे नहीं निकलते?'
प्रान्तर के  वृक्षों ने सिर हिला हुंकारा भरा, किनारे के हरे-भरे खेतों से पक्षियों का एक झुंड चहचहाता हुआ आकाश में उड़ गया गया, जैसे प्रकृति की खिलखिलाहट बिखर गई हो. . फैली हुई धूप में हरित वनस्पतियाँ स्वर्णाभा से भर गईँ .पाँच हज़ार से अधिक प्रकारों के रंग-रंगे फूल ,अनगिनत वनस्पतियाँ और पाँच सौ से ऊपर  प्रकार के पक्षि-प्रजातियों को धारण करनेवाली पुलकिता धरा उचक कर   ट्रेन की  खिड़की से  झाँक रही है जैसे मेरा मन पढ़ लिया हो उसने .चारों ओर की इतनी हलचल और कोलाहल के बीच उसकी आवाज़ सुन रही हूँ ,
'मेरी बात कर रही हो ? हाँ, मैं उसकी नानी हूँ अपार  सागर लहरा रहा था वहाँ.हिमालय को जन्म लेते देखा है मैंने  अपने से चिपका कर  सहेजा, आधार दिया .जानती हो - भू गर्भ के संचालनों द्वारा तल के उठने से प्रकटा है 5-6 करोड़ वर्ष पहले .यह जो मेरे देखते-देखते बढ़ा है .साठ-सत्तर लाख बरसों में इतना हुआ अभी तो बढ़ रहा है और मैं आद्य महाकल्प में धरती के भू खंड़ों की प्राचीनतम पीढी में हूँ .इतनी आयु हुई अब भी  वैसी ही विद्यमान  स्थिर,भूगर्भिक हलचलों से  निरी निरपेक्ष  जस की तस बैठी हूँ .,
पुलक उठती हूँ मैं!यह हिमालय का ननिहाल मेरा मायका -अपूर्व उल्लास से उमग उठा अंतर.शिप्रा- नर्मदा के तट मेरे क्रीड़ा-थल .
' -पानी और मौसम के प्रभाव कटाव करते हैं .देह की ऊपरी क्षरण है यह.मैं वैसी ही पक्की-पौढ़ी जमी हूँ यहाँ अपना विशाल परिवार सँभाले .ये विंध्य,अरावली ,सह्याद्रि ,नीलगिरि ,पूर्वी .पश्चिमी-घाट सब मेरे कुटुंबी हैं ,मेरी पुत्रियाँ ये तरल सरितायें अपनी  नेह-धाराओं से मन-जीवन में सरसता और उर्वरता भरती हुई .मौसमों के प्रहार से रूपाकार थोड़ा बदला ज़रूर .पर ये पूर्वी और पश्चमी घाट मेरी विगत समग्रता के  प्रमाण-स्वरूप जमें बैठे हैं.'
 अपने पूर्वविचार पर लज्जित हो उठी मैं ! 
पश्चिमी घाट के साइलेंट वेली नेशनल पार्क की याद आ गई - अभी तक अगम्य रहा भारत का एक मात्र ऊष्ण-कटिबंधीय वन -जिसकी निभृत हरीतिमा  अभी तक इंसान नामक जीव के पगों से अछूती है. भारत की अति प्राचीन संस्कृति और भाषा यहाँ आज दिन तक अबाध गति से फलफूल रही है. 
जी हाँ तमिल  - जो विश्व की प्राचीनतम भाषाओँ में गिनी जाती है -और कुछ विद्वानों का मत भी कि संस्कृत और द्रविड़ भाषाएँ एक ही उद्गम से निकली हैं. तमिलनाडु में कार्य करके अगस्त्य मुनि कम्बोडिया गए।तमिल के प्रसिद्ध काव्य ग्रंथ के अनुसार कम्बोडिया को मुनि अगस्त्य ने ही बसाया । 
दोनो भाषाओँ में जो भिन्नता आती गई वह काल और देशान्तर के प्रभावों से 
 कहावत है न,'कोस-कोस पर पानी बदले पाँच कोस पर बानी.'
इतिहास के पृष्ठ मन में करवटें लेने लगे -  शासक, युद्ध और कितने उलट-फेर. अचानक याद आता है इतिहास में नामों और तारीखों के सिवा कुछ सच नहीं होता .इस शब्द का मतलब ही है वे आख्यान जो हमें परंपरा से प्राप्त हुए हैं- काल क्रमानुसार घटनाओं का वर्णन .
सब कुछ घट जाने के बाद इतिहास आता है,और बताने लगता है क्या-क्या घटित हो गया..साक्षी तो भूगोल है पहले.सारा खाका  खींच कर मंच सज्जित करता है,तब तदनुरूप क्रिया-कलापों का आयोजन प्रारंभ होता है .भूगोल झेलता है ,गाँव-नगर निवासी सब झेलते हैं. उन परिणामों को. सब कुछ निपट जाने के बाद इतिहास हाज़िर हो जाता है, किया-धरा बताने के लिये . 
सच, यह कितनी सुदृढ़ भूमि. उत्तरी मैदान के नीचे आधार बनी -सी .
कानों में वही प्रबोधता-सा स्वर -
'और यह जो अरावली को देख रही हो यह भी अब इतना है. पर पहले यह हिमालय से कम नहीं था . मध्यजीवी महाकल्प दरारों और भ्रंशों का दौर चला .अनेक भ्रंश  और उसके बाद कटाव ...'.
 मन बीच-बीच में भाग चलता है -जाने-कहाँ-कहाँ की सोचता हुआ .सब को एक ओर समेटता हुआ  भव्य मंदिरों के स्थापत्य और तत्कालीन जीवन के ध्यान में रम जाता है .विचारों और भावनाओं का ज्वार उमड़ता है.
  किसी ने कुछ कहा ध्यान बँट गया जो कुछ भीतर उमड़ा था एकदम विलीन .साबुन के बुलबुलों की तरह बिला गया .कितनी मन-भावन मनोदशा थी ,अनायास भंग हो गई .याद करने की कोशिश करती रही .पर सब एकदम ब्लैंक !
अक्सर ही ऐसा होता है ,बहुत सुन्दर- सा कुछ मन में चलता है और अचानक ग़ायब  . फिर लाख यत्न करो  कुछ पकड़ में नहीं आता .
*
(क्रमशः)

बुधवार, 2 जनवरी 2013

ब्लागर मित्रों से निवेदन ,


ब्लागर मित्रों ,
चेत जाइये !पत्रों-पत्रिकाओं में बिना रचयिता की अनुमति के जो रचनाएं ब्लागों से ले कर छाप ली जाती हैं उससे आप उपकृत नहीं ,उन्हें उपकृत होना चाहिये .
हमारा लेखन इतना सस्ता नहीं कि कोई भी अपना माल समझ कर बिना पूछे-बताये ,जैसे चाहे उसका उपयोग करता रहे.आपकी पूर्व अनुमति के बिना रचना प्रकाशित करना ,चोरी ही कहलाएगी .
 अधिकांश पत्रकार पत्रकारिता के मिशन के विपरीत आचरण करनेवाले हैं.अपने कारनामों पर लीपा-पोती करना भी उन्हें खूब आता है.हम सब मिल कर ही इस स्थिति पर काबू पा सकते हैं . 

इसके लिये हम सब सावधान हो जाएँ  

जहाँ किसी पत्र-पत्रिका में किसी ब्लागर की रचना देखें ,तुरंत उसकी सूचना दें .चाहे नाम पता दिया हो तो भी.अक्सर लेखक को पता ही नहीं चलता कि उसका माल कहाँ से कहाँ पहुँच गया .ब्लागरों  की पहुँच  का क्षेत्र बहुत व्यापक है .इस प्रकार अधिकतर ऐसे मामले सामने आ जायेंगे .

किसी को इस पर कोई भी आपत्ति हो तो कृपा कर सामने रखे ,जिससे कि बात पूरी तरह स्पष्ट हो सके .
आशा करती हूँ मेरे निवेदन पर विचार करेंगे और इस पर अपने विचार देंगे.
 सारे ब्लाग-जगत को नव-वर्ष की शुभकामनाएँ !
- प्रतिभा सक्सेना.

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

हम चाहते हैं ..



"...I have tried to keep the memory alive.I have tried to fight those who would forget because if we forget we are guilty, we are accomplices...we must take sides-- neutrality helps the opresser , never the victim. Silence encourages the tormenter, never the tormented. Sometimes we must interfere when humans lives are  endangered, when human dignity is in jeopardy, national borders and sensitiveness become irrelevant..."
- Elie Wiesel
( Winner of the Nobel Peace Prize)


त्वरित न्याय की पुकार करते हुये भी मैं नहीं समझ पा रही.कि  हमारा तंत्र  अपने नियम कानून उन जानवरों पर कैसे लागू करेगा (जब अब तक नहीं कर पाया). वह यह  भाषा समझते ही नहीं!. .
और सवाल यह कि अपराध स्वयं सिद्ध है तब औपचारिकताएँ और विलंब काहे को ?
न्याय किसे चाहिये -बर्बर पशुओं को  या  पीड़िता को ?उसे फिर-फिर अंगारों पर क्यों धकेला जाय?न्यायाधीश  की पूछ-ताछ और वकीलों की बहसबाज़ी में यही तो होगा . घृणित अपराध  किया गया खूब समझ-बूझ, कर कोई नादान नहीं थे वे लोग .पीड़िता और उसके घरवाले क्षण-क्षण जो दाह झेलते रहे हैं .उसका तुरंत उपाय होना चाहिये था. 
  जघन्य अपराध  सिद्ध है  .पहले वे पापी  सरे आम चिह्नित हों जिससे ऐसी पीड़िता की दुस्सह मनोवेदना को कुछ तो चैन पड़े . वह अंग काटकर कुत्तों को डाल दें और उसके सिर पर दाग दें कि उसने क्या किया ,उसे सबके सामने एक उदाहरण बना कर जीने दें  .यही एक कारगर. इलाज  ऐसी मनोवृत्तिवालों की समझ में आ सकता है .
सभ्यता का आचरण मानवों के लिये ही विहित हो !
-प्रतिभा सक्सेना.

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

एक क़िस्सा

*
दो मिले-मिले घर थे ,इधर ज़रा मुँह खोल कर बोलो  तो उधर सुनाई दे .
एक दूसरे के घर से आनेवाली आवाज़ों में  रुचि लेने लगे दोनों परिवार.
इधऱवालों की हँसी कभी उधरवालों को सुनाई दे गई होगी .उधर कुछ दिन सन्नाटा रहा फिर 
 बोल सुनाई देने लगे .
इतने दिन बाद ! ये लोग कान लगा कर सुनने लगे -
उधरवाला आदमी कह रहा था
, 'लो ,मैंने कपड़े धो दिये अब तुम बाहर सुखा दो ,और देखो भीगना मत बिलकुल .
अरे हाँ ,तब तक मैं चाय बना देता हूँ .'
फिर -
'महरी नहीं आई ओहो,चलो मैं पोंछा लगाये दे रहा हूँ .'
'अरे,अरे बर्तन धोने की क्या जरूरत ?आज बाहर ही  खा लेंगे' .
 चाय पी लो ,आराम से बैठ कर .बाद में तैयार हो जाना तुम .'
इसकी पत्नी ने उलाहना दिया-
'देखा ,कितना ध्यान रखता है ,और एक तुम!'
रोज़ का यही धंधा !
इसे  बड़ी खीझ लगती  ,पर  करे क्या.
दोनों ओर से  सुन-सुन कर यह परेशान .और आवाज़ें?रोज़ के रोज़, बेरोक-टोक.
उफ़,कितना बोलता है उधऱवाला!
ये वाला भी घर के काम में बहुत हाथ बँटाने लगा है, मजबूरी में ही सही  .
पर वह आदमी? हद कर दी उसने तो , बर्दाश्त करना मुश्किल है अब तो.

  उधर से रोज़ उसका बोलना और इधर मियाँ-बीबी की झाँय-झाँय.
इनकी आवाज़ें उधऱ भी जाती ही होंगी .
इसका मन करता जा कर झंझोड़ डाले पूछे ,'क्यों  गाथा गा-गा कर हमारा जीना हराम किये है.'
उधर वह कहे जा रहा था ,'रहो, रहो.मैं तुम्हारे पाँवों में  तेल मल देता हूँ ...'
ताव खा कर  दनदनाता उसके घर में जा घुसा.
घर में कोई और था ही नहीं.
वह आराम से खा़ट पर लेटा-लेटा कह  रहा था ' बस,बस. तुम लेटी रहो .मैं हूँ न ..'

इन्हें आते देख हँसता हुआ उठ बैठा,'आइये,आइये.जानता था कभी आयेंगे 
ज़रूर. महीने भर को पत्नी मायके गई है ,बोर हो जाता हूँ, क्या करूँ ..!'

्रे आइये .जब से अकेला हुआ अपने-आप से बात  कर जी बहला लेता हूँ.आप तो कभी ख़बर लेते नहीं.क्या करूँ .पर जानता था आप आएँँगे जरूर .इतने दिन लगा दिये .. खूब जमेगी ,आइये आइये  
 भकुआया खड़ा है ये बेचारा!
*

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

हिन्दी के ब्लागों की क्या यही नियति है?


*
कुछ अख़बारों द्वारा  विभिन्न ब्लागों से सामग्री लेकर नियमित रूप से प्रकाशित की जाती है .पूरे के पूरे आलेख और साहित्यिक रचनायें वे अपनी ओर से अपने अख़बार में छाप लेते हैं .
मैं जानना चाहती हूँ कि  इसके लिये लेखक से अनुमति लेने या पूछने-बताने की कोई ज़रूरत है या नहीं ? किसी भी ब्लाग से ,चाहे वह लॉक किया हुआ हो, मैटर ले कर छाप  लेना उचित है या अनुचित ?
जब मेरे लेखन के साथ यह शुरू हुआ तो मुझे औरों से सूचना मिलती रही कि मेरी फलाँ रचना फलाँ जगह प्रकाशित है .मुझे विस्मय हुआ .
मुझसे न किसी ने प्रकाशित करने के लिये स्वीकृति ली ,न बाद में सूचित किया .तब मैंने अपने ब्लाग से कॉपी कर लेने पर रोक लगा दी .उन्होंने फिर अपना कौशल दिखाया और कुछ पूछने की ज़रूरत फिर भी उन्हें नहीं हुई . मेरे दूसरे ब्लाग पर से भी एक लेख उड़ा कर (भास्कर भूमि में )छाप लिया.मुझे फिर अन्य सूत्रों से पता चला. तब मैंने अपने दोनो सक्रिय ब्लागों पर यह सूचना लगा दी -© Pratibha Saksena and शिप्रा की लहरें, 2009-2012. Unauthorized use and/or duplication of this material without express and written permission from this blog’s author and/or owner is strictly prohibited.
उन्हें यह रोक रास नहीं आई सो उन्होंने रचना पर ही कैंची चलाना शुरू कर दिया .
 मेरी एक कहानी 'टीस' लालित्यम् नामक ब्लाग से लेकर ,मनमाने ढंग से उसका शीर्षक ही बदल डाला .(किसी की कहानी का  संदेश विकृत करने का अधिकार?)मैंने 16 दिसंबर को जो कहानी ब्लाग पर डाली थी ,दो दिन बाद देखा  किसी दूसरे शीर्षक से  भास्कर भूमि में प्रकाशित है (ब्लाग का उल्लेख था पर उसमें उस नाम की कहानी कहाँ से होती ) उसमें निहित संदेश पर तो उन्होंने अपनी ही बुद्धिमानी पोत दी थी.
  हिन्दी के ब्लाग-जगत के सामने मैं यह स्थिति लाना चाहती हूँ .हो सकता है कुछ और  जन भी इससे गुज़रे हों.  
हिन्दी के ब्लागों की क्या यही नियति है कि जो चाहे उनके साथ मनमाना व्यवहार करे?
 ऐसी स्थिति में क्या किया जाय कि इस मनमाने आचरण पर रोक लगे-
मैं आप सब ब्लागर मित्रों के विचार जानना चाहती हूँ . अतः आप सबसे  विनम्र अनुरोध करती हूँ  !
वे महोदय तो लेखक से परिचित नहीं ही होना चाहते होंगे,उन्हें ज़रूरत भी क्या है, उनका काम तो चले ही जा रहा है ,स्वनियुक्त संपादक जो बन गये हैं. (आजकल दबंगई का ही ज़माना है,रोज़ की ख़बरें इसकी पुष्टि करती हैं ).पर ऐसा करनेवाले व्यक्ति का नाम और परिचय ,मैं जानना चाहती हूँ किसी को पता हो तो कृपया बताये . भविष्य के लिये उन्हें सावधान भी करना चाहती हूँ .
यह भी संभव है कि इससे मुझे या मेरे ब्लाग को ही कोई खतरा हो !और यह भी हो सकता है कि अपने ऊपर ख़तरा भाँप कर हमारा कोई हिन्दी-ब्लागर- बंधु डर कर चुप्पी साध जाये !
फिर भी मैं प्रयत्न करूँगी .
आप सब का सहयोग चाहती हूँ .
- प्रतिभा सक्सेना

रविवार, 16 दिसंबर 2012

चीख़ .

टीस -
 *
 कुछ दिनों से ,जब से यह नया लड़का ऑफ़िस में आया है, मैं स्थिर नहीं रह पाता .
 ज़रा शऊर नहीं, न कपड़े पहनने का न चार लोगों में बात करने का. मुझे तो उसकी हर बात में बेतुकापन नज़र आता है. सामने होता है तो बड़ी उलझन होने लगती है .
कल ही चाय में ब्रेड के पीस डुबो-डुबो कर खाने लगा .
मैंने इशारे से धीर को दिखाया .
'उँह ,चलता है,'.उसने कह दिया .
लंच टाइम में उँगलियाँ तक सान लेता है ,ठीक से खाना भी नहीं आता - फिर चाट लेता है बीच-बीच में . किसी से परिचय की बार बुद्धू सा खड़ा ,ताकता रहेगा या फिर झपट कर शेकहैंड को तैयार.
मैं तो गाहे-बगाहे उस पर कमेंट कर देता हूँ .
क्या करूँ. कोई एक बात हो तो कहूँ. मैनर्स  बिलकुल हैं ही नहीं .
पर आज तो मुझसे बिलकुल रहा नहीं गया  झिड़क दिया मैंने,
'बेशऊर कहीं के ,रहने का ढंग सीखो,जाओ पहले हाथ धोकर आओ .'
 प्रसन्न चेहरा फक्क पड़ गया था . उसे यों घबराया सा देख कर बड़ा मज़ा आया .
वह चुपचाप उठ कर चला गया था.
इतने दिनों से देख रहा था जब चाहे कर मुँह चियारे हँसने लगना,
जोर से जमुहाई लेना ,बीच-बीच में सिर खुजाने लगना .
 ..अरे, देख कर तो सीखे,किन लोगों में बैठा है ,कैसा व्यवहार करना है .
कोई बात कर रहा हो ,बीच में अचानक टपक पड़ता है.
बिना पूछे अपनी राय ज़ाहिर करने लगता है.
आखिर कहाँ तक बर्दाश्त करे कोई?
  अपने साथी को बताया ,'एकदम जंगली,देख कर कोफ़्त होती है !'
उधर से कोई उत्तर नहीं, पर मैं कहे चला गया ,'पेट भर खाना मयस्सर नहीं ,मैनर्स कहां से आएँ ?'
मेरे साथी ने बात खत्म कर दी ,'अरे छोड़ो भी ,कहाँ चक्कर में पड़े हो ।'

 बुझा-सा चेहरा लिये वह आकर चुपचाप बैठ गया था ,सिर झुकाये काम करता रहा.
मेरा ध्यान बार-बार उसकी ओर जा रहा था.
 बिलकुल मन नहीं लग रहा था .
अचानक बड़ी हुड़क उठी ब्रेड का पीस चाय में डुबो कर खाने की  .
ओह, वह स्वाद लिये कितने दिन हो गये!
एक बार सबको अजीब तरह से देखते नोट कर लिया .छोड़ दिया तब से .अब बटर लगा कर,चबा,चबा कर  खाता हूँ .
वैसे दाल-चावल हाथ से मिला कर खाने का मज़ा ही और है .उंगलियों से
मिला मिला कर कौर बनाने से जैसे स्वाद ही और हो जाता है !
पर अब सब कुछ चम्मच से खाता हूँ, समोसा भी . उँगलियों से छू न जाय कहीं -
बैड मैनर्स !
 इतना चाक-चौबस्त मैं !
कहीं कोई ज़रा सी कमी निकाल दे .बोल-चाल ,व्यवहार ,चाल-ढाल सब नपा-तुला. तभी तो कोई बेतुकी चीज़ एकदम खटकती है.
सुरुचि संपन्न ,संस्कारशील ,अभिजात लगता हूँ न !
वैसे .कभी -कभी अपने को खुद  लगता है ओवर-रिएक्ट कर गया हूँ .जब लोग देखने लगते हैं मेरी ओर.तब कांशस हो जाता हूँ एकदम .
समय लग जाता है प्रकृतिस्थ होने में.
*
यों तो अभी भी कभी-कभी समझ में नहीं आता कि कहाँ क्या बोलना चाहिए .पर अब मेरा रहन-सहन बदल गया है इतना तो समझने ही लगा गहूँ कि अपनी तरफ़ ध्यान हो तब अपनी बात कहूँ . बेतुकी बात मुँह से न निकल जाय ,इसलिए अधिकतर चुप रहता हूँ .क्या करूँ न शकल-सूरत ,न गुन-ढँग .पर दुनिया को काफ़ी समझने लगा हूँ .

जब लगे कोई देख रहा है तो सहज होना बड़ा कठिन हो जाता है.और मेरे साथ तो यह होता कि जित्ता सँभालने की कोशिश करूँ उतना ही बस से बाहर होता जाता.
हर समय विचलित-सा ,सामने पड़ने से कतराता .
हाँ, रॉ था ,एकदम ठेठ.कौन ,सँवारता काट - छांट करता?
वह सब याद कर एक उसाँस निकल गई .
अरे,बात तो उसकी है , मैं अपने बारे में क्यों सोचने लगा !
सिर झटक देता हूँ --क्या फ़ालतू ख़याल !
अब तो  वह सब सोच कर हँसी आती है .मैं और बिल्कुल ठेठ ?छिः...
कभी-कभी टीस उठता है अंतर .बचपन से  किशोर अवस्था बीत जाने तक लोगों की नज़रे पढ़ते-पढ़ते मेरे मन का चैन समाप्त हो गया था . निश्चिंत होकर नहीं रह पाता ....अपनी हर कमी पहाड़-सी नज़र आती. पता नहीं मेरे बारे में कोई क्या सोचता होगा -ऊपर से गरीबी की मार - न ढंग के कपड़े, न रहने की तमीज़ .

कितने अपमानों की कड़वाहट भरी है मुझ में ,कितने उपहास और व्यंगों की चुभन!  कपड़े पहनने का शऊर कहाँ था?एक तो पास में थे ही कितने ,ऊपर से कैसे ,क्या किसके साथ पहनना चाहिए,अकल ही नहीं .
कुछ भी आसान नहीं रहा था .
बदल डाला मैंने अपने आप को ,वह बिलकुल नहीं रहा जो था .
यह सब अर्जित करने में क्या-क्या पापड़ बेले हैं !
 आज कोई देख कर कह तो दे .लगता हूं पीढियों से पॉलिश्ड परिवार में जन्मा हूं .बेढंगे-बेशऊर लोगों को ऐसी हिकारत से देखता हूं जैसे उनकी मानसिकता से कभी पहचान ही न हो .
जो कुछ संभ्रांत है उस पर सहज अधिकार है मेरा .फटाफट अंग्रेज़ी ,और शिष्टाचार में कोई ज़रा-सी कमी तो निकाल दे .कहीं कोई झिझक नहीं कोई संकोच नहीं ,
.अब हूँ ऐसा -एकदम रिफ़ाइंड, सुरुचि-संपन्न!
 ये सब बातें बचपन से  सिखाई जाती हैं या अपने वातावरण से सीखता है आदमी .
सहानुभूति उमड़ती है अपने लिये. फ़ौरन उन लोगों पर ध्यान जाता है जो ऐसे हैं , पर निम्नवर्ग के वे दाग़ छुटा डाले हैं धो-धो कर .उस जीवन के अंश मिटा कर बड़ी मेहनत से ये ढंग विकसित किए हैं मैंने .

'मैनर्स सीखने की बात ?जिसे पेट भर खाने को न मिलता हो उससे ?'
अपने ही  शब्द कानों से टकराते हैं .अंदर ही अंदर कुछ उमड़ता है .
चैन नहीं पड़ रहा  किसी तरह .
कोई पुरानी चुभन सारे वर्तमान को पीछे छोड़ती  शिद्दत से उभर आई हो जैसे . जैसे उसे नही,मुझे हड़का दिया हो किसी ने .
हाँ , झिड़का गया था मैं कितनी बार !
इसी लायक था - न मौका देखता न मुहाल .जो बात मन में आई मुँह पर दे मारी .
 न किसी का लिहाज़ ,न शर्म . सुननेवाला भी भड़क उठे .
खूब बड़ों-बड़ों से लड़ जाता .उमर में कितने बड़े हों ,ज़ुबान लड़ाता रहता .वे कुछ कहें तो उन्हीं से बत्तमीज़ कह देने में संकोच नहीं .
पर कैसा सँभाला  अपने आप को. कहीं  कोई निशान बाकी नहीं .कोई दूसरा क्या पहचानेगा ,अक्सर मैं स्वयं अपने को नहीं पहचान पाता .

एक चीख-सी उठी ,'कितनी बनावट ?  कहाँ तक निभाओगे ?'
चौंक पड़ा मैं - यह कौन ?
 'तुम कहाँ से आ गये ,मैं तुम्हें बीती गहराइयों में गाड़ आया था ?'
'बीतता यहाँ कुछ नहीं ,साथ चला आता है. कैसे रह पाते हो ऐसे?'
' क्या मतलब तुमसे ?.'
'मैं  अलग कहाँ तुम्हारा एक हिस्सा हूँ ?''
'वह पीछे रह गया ,मेरे साथ नहीं .'
'स्वाभाविक कैसे रह पाओगे ऐसे ?
झुँझला कर बिफ़र पड़ा -
हाँ ,हाँ, मैं मिसफ़िट हूँ ,हर जगह ,मिसफ़िट.इन लोगों के साथ बिलकुल अकेला ,अलग - ?
उसके मुख पर छाई व्यंग्य भरी मुस्कान ,मैं कट कर रह गया .
 'क्यों आ गये तुम ?किसने बुलाया था तुम्हें ?'
'मैं  गया ही कहाँ कभी ?तुम्हीं मुझसे बचते हो ,सामने पड़ने से घबराते हो ..'
'नहीं ,तुम नहीं मेरे साथ.'
'एक सिक्के की दो सतहें हैं हम .अलग कर पाओगे ?
कुछ नहीं सूझ रहा ,बड़ा बेबस ,उदास ,कपड़े बदले उतार कर फेंक दिए काउच पर .
बुरी तरह थकान लग रही थी .
बिस्तर पर पड़ गया ,सामने ड्रेसिंग टेबल के शीशे में दिखाई दे गई अपनी ,विकृत ,खिसियाई शक्ल.
तकिया खींच कर मुँह औँधा लिया .
आँखों से बहते आँसू और कहाँ समाएँगे !

 *


रविवार, 9 दिसंबर 2012

वाह रे कंप्यूटर !

*
  कल्पना भी नहीं थी कि कंप्यूटर जैसी चीज़ का कभी प्रयोग करूँगी .लिखने-पढ़ने के मामले में अपना हाथ जगन्नाथ लगता था .लेकिन यह भी यह सच है कि नहीं सीखा होता तो बहुत-कुछ से वंचित रह जाती .जितना लिख लेती हूँ उतने का तो सोच भी नहीं सकती थी .
बेटा भारत से बाहर चला गया था .
 हम दोनों अक्सर ही उसके पास जाते थे.
 रिटायर होने पर उसने कहा,' आप कंप्यूटर सीख लीजिये.वैसे यहाँ आप बोर हो जाती हैं.'
सब को उस पर काम करते देखती थी,उत्सुकता जागी, ' अच्छा देखती हूँ '.
 फ़ुर्सत में थी ही .ज्वाइन कर ली क्लास .
पर  वे जाने क्या-क्या सिखा रहे हैं -डायरेक्ट्री- फ़ाइल्-ट्री ,इधर का इधर , आदि .
उसे बताया तो बोला ,'उससे आपको कोई मतलब नहीं .छोड़िये मैं बता दूँगा .'

पहली मुश्किल - हाथ रखते ही  फर्र्र से तीर की नोंक इधऱ से उधर पहुँच जाय,
हार कर मैने कहा ,'यह चूहा एकदम भागता है मेरे बस में नहीं आता.'
वह चिल्लाया ,'मम्मी फिर चूहा .,चूहा नहीं माउस है वह,माउस कहिये.'
'क्यों माउस मानेई तो चूहा ,और क्या कहें इसे ?'
'नहीं बस ,माउस कहिये .'
क्यों, हिन्दी में बोलना मना है?.
मैने सिखाया था माउस माने चूहा और आज ये उलटी पट्टी पढ़ा रहा है.

अगली परेशानी, देखो , ज़रा सी उँगली बहकी तो फिर एक खिड़की खुल गई .'.
फिर वही टोकना उसका - वह विंडो है, खिड़की मत कहो .
मुझे तो याद ही नहीं रहता एकदम हिन्दी हो जाती है.
वह टोकता है तो मुझे हँसी आती है .इसने मुझे कितना झिंकाया था अंग्रेजी याद करने में !
मेरे आगे तो ढेर लगा है- कैरेक्टर, एपल, बुकमार्क,बाइट,कैश मेमरी ,सर्वर, बिट,की ,मानिटर, स्पैम,कुकी और जाने क्य-क्या.जो पढ़े भी हैं उनके अर्थ सब बदले हुये!
जहाँ मैने पुराना अर्थ बोला वह चीखता है ,'आप सुनती क्यों नहीं ...'
'फिर वही कहा , कर्सर है वह तीर नहीं .'
अब मैं उसे ठीक करूँ कि ख़ुद को !

लो ,अब उसमें टेबलेट और जुड़ गया
'आपको टेबलेट चाहिये बहुत हल्की है?'
 मुझे लगा इस सब गड़बड़ के ,बीच(नॉर्मल रहने को ) गोली लेनी पड़ती होगी .
हे भगवान !
ये बात तो है- इन लोगों के दिमाग़ गुठला गए हैं ,एकदम कुंठित ! याददाश्त ज़ीरो.  
ज़रा-सा गुणा-भाग हो, दौड़ते हैं- कहाँ केलकुलेटर? कहाँ,कंप्यूर?
जो गिनती-पहाड़े ज़बान पे रखे थे, सब चौपट !

पर टेबलेट तो कुछ और ही करिश्मा निकला !
समझ में नहीं आता कहाँ अंग्रेज़ी चलेगी  ,कहाँ हिन्दी .
ख़ैर जो हुआ सो हुआ. उसने मुझे इतना कंप्यूटर  सिखा दिया कि मैं लिख पढ़ लेती हूँ और भी कई काम कर लेती हूँ !
इतना पढ़ने को मिल जाता है और लिखने को भी कि और कुछ सीखने का अवकाश ही नहीं  .बहुत आसान हो गया है अब सब कुछ.
 यह नहीं होता तो मेरी तो  बड़ी मुश्किल हो जाती .
वैसे मुझे आता-जाता कोई खास नहीं, और ऊपर से यह विचित्र ग्लासरी ! गड़बड़ कर जाती हूँ हमेशा.अपना बहुत तैयार माल उड़ा चुकी हूँ इस के चक्कर में.
चलो, जित्ता सीख लिया ,काफ़ी है मेरे लिये!
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 - प्रतिभा सक्सेना.