रविवार, 16 जनवरी 2011

शुभस्यशीघ्रम्

*.

जीवन में संतुलन का बड़ा महत्व है .बिना इसके के न सौंदर्य की सृष्टि हो सकती है. न पूर्णता का समावेश.लेकिन लोग हैं कि हमेशा संतुलन बिगाड़ने पर उतारू रहते हैं .जो अच्छा लगे स्वीकार, जो न भाए त्याग दो .मीठा-मीठा गप् और कड़वा-कड़वा थू - ये भी कोई बात हुई !मीठे के साथ कड़वा झेलने की भी क्षमता होनी चाहिये . पर लोगों को क्या कहें ,ज़रा से में हाय-हाय ,आह-आह चिल्लाते उछल-कूद शुरू . ज़रा सी कड़वाहट जो लोग नहीं झेल सकते ,ज़िन्दगी में क्या करेंगे?

दुनिया  में आए हैं तो तीखापन झेलने का अभ्यास करना पड़ेगा  .इसलिए  मिर्ची की झाल सहने की  आदत डाल लेनी चाहिये .इससे दूर भागने वाले बड़े आदर्शवादी बनते हैं -मतलब अपने को ऐसा दिखाते हैं .और सच तो यह कि उनकी सहन-शक्ति बहुत कम होती है .ज़रा सी कड़ुआहट मिली -आँसू बहाने लगे .मुँह लाल किए सी-सी की धुन लगाए ,पानी पर पानी माँगे चले जाते हैं .मुझे तो समझ में नहीं आता इन पर हँसूँ कि रोऊँ - ज़रा सहनशीलता नहीं. संयम का नाम नहीं.

हाँ ,हमारे यहां यही . ज़रा सी मिर्ची तेज़ हो जाय किसी चीज़ में, फिर देखो तमाशा. जैसे बम फट पड़ा हो .सावधानी के संदेश ,उपदेश पर उपदेश - 'इससे ये नुक्सान होता है वो नुक्सान होता है'. अक्षम्य अपराधकर डाला हो जैसे .अरे, भगवान की बनाई चीज़ें हैं. हरेक में कुछ भलाई कुछ बुराई - दुनिया ही दुरंगी ठहरी .पर इन्हें कौन समझाये, पहले से प्रिज्यूडिस्ड हैं . और भी कुछ लोग हैं -हरी मिर्ची खा लेंगे पर लाल से जैसे दुश्मनी हो. गुड़ खायेंगे गुलगुले से परहेज़ !चीज़ एक ही है .चाहे जैसे खाओ -क्या कच्ची क्या पक्की .वैसे भी कच्चे फल डाली से तोड़ना कोई अच्छी बात है! .ऊपर से निराले नखरे -हरी मिर्ची तोड़ लाओ और वह भी उतनी कड़वी न हो .जैसे पेड़ की फ़ितरत पर इनकी हुकूमत चलती हो . कोई पूछे - खा रहे हो मिर्ची और कड़वी न हो? डेढ़ टांग की मुर्गी चाहिये इन्हें .अरे, मत खाओ .क्यों शौक चर्राया है बहादुरी दिखाने का !

मैं तो कड़ुआहट से नहीं घबराती . झेलने में विश्वास करती हूँ .जिसने उज्जैन की रतलामी या ,बलवट भेरू के सेव का स्वाद लिया है वह कडुआहट से नहीं डरेगा. न पलायन करेगा ,डट कर मुकाबला करने को तैयार .दृष्टिकोण व्यापक - जीवन की झार झेलने को प्रस्तुत .खाने में चटपटापन न हो तो क्या स्वाद रहा ! बस फीकापन ही फीकापन ! हँसता बोलता उत्साहपूर्ण जीवन
हो--थोड़ा तीखा-तुर्श, नमक-मिर्च- मसालेदार . मरीज़ोंवाला पथ्य-सेवन करने का कोई शौक नहीं अपने को .न साधु-संत बनने का चाव है .

मैंने देखा है मिर्ची खानेवाले अधिक प्रसन्नचित्त, चैतन्य और फ़ुर्तीले होते हैं .इसीलिये प्रवृत्तिमार्गी होते हैं. परहेज़ करने वाले उदासीन ,आराम की मुद्रा धारे ,निवृत्ति की ओर भागते हैं .गौतम बुद्ध ,कबीर वगैरा मिर्च की कड़ुवाहट नहीं झेल पाते होंगे.  तभी जीवन के संघर्षों से घबरा गए .जाग गई गृह-त्याग कर  भाग चलो वाली भावना . सच्ची में गृहस्थ-धर्म निभाना बड़ा कठिन होता है. सारी जिम्मेदारी ,पत्नी पर छोड़,अपना किया-धरा उसके मत्थे मढ़ महापुरुष बनने निकल गए . बुद्ध को कहाँ स्वयं कुछ झेलना पड़ा ! औरों देख-देख कर ही घबरा गए. तभी न सब छोड़-छाड़ धीरे से निकल लिए .मुक्ति के उपाय खोजने लगे.निवृत्ति की ओर मुड़ गए - दुख- दाघ से बच निकलने के रास्ते ढूँढते .

लाख कोशिश करो दुनिया तो दुनिया रहेगी.थोड़े दिन बाद फिर जैसी की तैसी !अच्छा है ख़ुद को सम्हालो ,जो आ पड़े झेलो ! निवृत्ति कोई छुटकारा नहीं जीवन से पलायन है. घबरा कर भागो मत .श्री कृष्ण ने कहा है -ये संसार एक कर्म-क्षेत्र ,जो सामने है उससे डट कर जूझो!प्रवृत्ति-मार्गी थे कृष्ण . जन्म से अवसान तक कहां कभी चैन कहाँ मिला . सबका रोना -गाना चलता रहा सारा-कुछ सुनते ,झेलते रहे, शान्त भाव से .सारे सूत्र धारे रहे.

मुझे तो लगता है,इतना विषम जीवन किसी का नहीं रहा होगा .और लोग भ्रम पाले रहे - कैसे आनन्दी हैं कृष्ण ! उन्हें कैसा लगता होगा कभी किसी ने जानने की कोशिश की ?इतना वीतराग होकर कैसे जीता है कोई ?दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगत स्पृहः - अपमान ,कटु-वचन ,उलाहने और शाप - सब शिरोधार्य ! आरोप लगाते रहे लोग ,शिकायतें करते रहे और उनका सहज भाव देखो, अपनी सफ़ाई तक नहीं दी .परिस्थितियों में सम बैठाते, सारी कटुताएँ फूँक में उड़ाते, पहाड़ सा बोझ खुद उठाये औरों का जीवन सह्य बनाने के यत्न करते रहे.सबको आश्वस्ति देते सारी कड़वाहट शान्त-भाव से पीते रहे - अकेले !जैसे वही उनका प्राप्य हो .यह है प्रवृत्ति-पथ !निवृत्ति से ठीक विपरीत- सब के हित में जूझो ,अपना सुख,अपना दुख कुछ नहीं ,जो आ पड़े शान्त भावेन स्वीकार !

तो भगवान ने मिर्च बनाई है खाने के लिए .उसकी रची वस्तु का अनादर मत करिये. ज़रा सोचिये,दुनिया से छुट्टी पाकर आप स्वर्ग पहुँचे और उसने प्रश्न उठाया,' मैंने जीवन के जो स्वाद प्रदान किए थे ग्रहण किये ?'

आप जवाब देंगे, 'हें हें, मिर्च नहीं खाई .'

क्यों ?'

'कड़वी थी .'

'अच्छा !'वह कहेगा. 'जाओ भागो. बचे हुए भोग पूरे कर के आओ .'

और ठेल दिए जाएँगे फिर से यहीं.

जानते हैं तब क्या होगा ? बाकी स्वादों का कोटा तो पहले ही पूरा कर चुके हैं . वही एक शेष बचा होगा . इसलिए समझिये !संतुलन रखिये जीवन में ,'कड़ुआ-कड़ुआ थू' मत करिये . स्वाद लेकर मिर्च खाना सीखिये.

और भी सुन लीजिये -

इधर केलिफ़ोर्निया वि.वि. में वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि मिर्ची खाने से फ़ैट कम होता है .तो मिर्च खानेवालों मोटापन भूल जाइये .

ऑस्ट्रेलिया की तस्मानिया यूनिवर्सिटी की डॉ.किरण आहूजा के नेतृत्व में एक अंतरराष्ट्रीय शोध टीम की शोध के मुताबिक मिर्च में डायबिटीज और हृदयरोगों को रोकने की क्षमता होती है। मिर्ची में मौजूद कैप्साइसिन व डीहाइड्रोकैप्साइसिन नामक तत्वों में रक्त शर्करा (ब्लड शुगर या ग्लूकोज) को कम करने, इंसुलिन का स्तर सामान्य रखने, धमनियों की दीवारों पर जमने वाला वसा को घटाने व रक्त के थक्के-(ब्लड क्लॉट्स) को रोकने की क्षमता होती है।
*
अगर मीठा-मीठावाले अपना कल्याण चाहते हैं तो जीवन में कड़ुआहटों का भी स्वाद लेना सीख लें .

मिर्ची की आदत डाल लें - शुभस्यशीघ्रम् !

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

कृष्ण-सखी -1 & 2.


पाँचाली.
1.
ग्रीष्म की उत्तप्त दुपहरी. इस सघन वन में पाँडव अपना वनवास बिता रहे हैं.
वृक्ष की छाया में द्रौपदी अलसाई लेटी है.थोडी दूर उसके पाँचो पति बैठे हैं.मन ही मन उसे हँसी आ रही है -किसी पुरुष की पाँच पत्नियाँ भी ऐसे हिलमिल कर नहीं रह सकती होंगी जैसे मेरे पाँच पति.विनोद से भर उठी है वह. एक से एक भिन्न स्वभाव के,माँ कुन्ती ने एक सूत्र में बाँध रखा है.शायद इसीलिये उन्होने सब के लिये एक पत्नी की व्यवस्था की,जो सब को  समेट कर एक साथ  रख सके.
क्या बातें करते हैं ये लोग आपस में ! कौतूहल हो रहा है द्रौपदी को -कोई भी तो समानता नहीं .सबका अपना ढर्रा!दो बड़े ,दो छोटे ,बीच में हैं अर्जुन .सबसे संतुलित भी वही .
सबसे बड़े युठिष्ठिर! धर्म और नीति के ठेकेदार - परम धैर्यवान ,हमेशा शान्त .सुख -दुख ,हानि-लाभ ,यश-अपयश से परे !कभी उत्तेजित होते उन्हें नहीं देखा द्रौपदी ने. प्रेम में भी अति शान्त, उत्तेजना विहीन .उनकी मान्यतायें लोक से निराली हैं .माँ के कहने पर भाई की प्राप्ति में तो बँटा लिया,पर जुये दाँव पर सबका हिस्सा लगा दिया !
अपने हिस्से के दिन दाँव पर लगाते . तब तो बड़े बन कर सबके हिस्सों को हार दिया. माँ से पूछने की जरूरत भी नहीं समझी,भइयों से मशविरा करते भी क्यों !द्रौपदी तो भीख में मिला उनका हिस्सा है ,अपने को प्रमाणित करने की क्या आवश्यकता !जो मिला, भोग्य है उनका !
भीम - भोजन भट्ट !वायु प्रधान व्यक्तित्व है. वैसा ही वेग से भर उठनेवाला. सोचने- समझने का धीरज नहीं.आवेग और आवेश उसके स्वभाव में हैं.द्रौपदी के मुँह से जो निकले पूरा करने को सदा प्रस्तुत !डकारें बहुत आती है उसे .प्रथम मिलन की रात्रि में द्रौपदी के सामने मुँह किये एकदम डकार छोड़ दी ,खाने पीने में वैसे ही असंयमी ।द्रौपदी के मुँह पर वह गंध भरा भभका !मुख तिरछा कर लिया था उसने कुछ कहा नहीं .बैठे बैठे डकार छोड़ देना उसकी आदत है ,उसे पता ही नहीं चलता !न भोजन पर नियंत्रण है न वायु पर! ,पेट की सारी गड़बड़ी मुँह से निकलती है.
और अर्जुन ! द्रौपदी ने तो उसी की कामना की थी .बाकी सब तो साथ बाँध दिए गए गए .सधा हुआ व्यक्तित्व,धीर गंभीर और परम पराक्रमी. इन्द्र के अंश हैं,रूप और कान्ति अनुपम ,नृत्य-,गान निपुण , विद्याओं , कलाओँ के प्रेमी  . अर्जुन के प्रति मन में आकुलता निरंतर बनी रहती है.
उन्हीं को चाहा था ,पर कितना कम मिलन होता है .वह भी  पाँचाली को पा कर भी पूरी तरह नहीं पा सका .असीम प्रेम है उसके हृदय में .लेकिन कैसा संताप, कि कहीं टिक कर नहीं रहने देता  ! भटकता फिरता है धरती-गगन में -अधूरी प्राप्ति की टीस से विचलित .
नकुल को अपने सुदर्शन होने का अभिमान है सहदेव सबसे छोटे उन्हें कोई  अपने जैसा विद्वान और बुद्धिमान नहीं लगता .पर दोनों का व्यक्तित्व कभी खुल कर सामने नहीं आता ,बड़ों के सामने दबा-ढँका सा रह जाता है .माद्री-पुत्र हैं रूपवान ,विद्वान. पर पाँचाली को प्रभावित नहीं कर पाते ,उसकी तेजस्विता के आगे मन्द पड़ जाते हैं ।दोनों को अलग-अलग समझ नहीं पाती वह .समझ तो इन सब को नहीं पाती,एक पार्थ को छोड़ कर !
और द्रौपदी पर नियंत्रण है कि सबसे बराबरी से निभाए .सबको समान प्रेम करो- पत्नीत्व के हिस्से सबको बराबर मिलने चाहियें .सारे टुकड़े बराबर हों ,कोई छोटा बड़ा नहीं. क्या नारी के मन-आत्मा कुछ नहीं होती! स्वयं को इतना  साध रखा है माँ कुन्ती ने ?
उनके भी पाँच होते -पाण्डु तो विधिवत् थे ,धर्मराज ,पवन और इन्द्र तीनों पुत्रों के पिता पति ही तो हुये .एक और हो सकता था ,होता तो भी क्या फर्क पडता ,पर नकुल,सहदेव माद्री- माँ के हैं ,एक नाते से वे भी कुन्ती माँ के ही हुये ,सौत का पति ,सो अपना पति .उनके चार पति हुये क्या इसीलिये मेरे लिये पाँच पतियों का विधान किया (यह तो पांचाली को  बाद में पता लगा कि एक पुत्र के पिता  सूर्य भी थे) सब ने सिर झुका कर स्वीकार लिया .
मेरे साथ होने पर सबका व्यक्तत्व भिन्न होता है .पर एक साथ होने पर पाँचो अलग नहीं लगते- बिल्कुल एक . एक सूत्र से संचालित होनेवाले ,जैसे पाँच अश्व एक रथ के वाहक हों.इसी एकता में इनकी निजता निहित हो जाती है .लेकिन इससे अलग उनके जो भिन्न व्यक्तित्व हैं उनसे केवल द्रौपदी परिचित है.
नहीं, अब वह सब अटपटा नहीं लगता.उसने सहज रूप से स्वीकार कर लिया है.एक के साथ होती है तो दूसरे की याद नहीं करना चाहती.बहुविवाह में पति भी अपनी पत्नियों के साथ यही करते होंगे. हरेक के साथ बारी बँधी है,जब तक जिसके साथ हैं तब तक उसके ।पर द्रौपदी  मन से अर्जुन के साथ बँधी रही ।देह का धर्म सबके साथ निभाती है पर सिर्फ उन्हीं तक सीमित कहाँ रह पाती है .सोचने-समझने करने को और भी बहुत कुछ है .मन क्या सबके साथ बँधता है ,जानता सबको है ,मानता सबको नहीं .प्रेम क्या कहे-सुने किया जाता है ?
जिन्हें प्रेम करती हूँ उनके साथ भी भावना एक सी नहीं होती, हरेक के लिये भाव कुछ भिन्न होता है-प्रत्येक से एक भिन्न संबंध.
कृष्ण मित्र हैं.नारी- नर का एक विलक्षण संबंध .निस्वार्थ ,दैहिकता से परे,अति घनिष्ठ.उनसे कुछ भी कहने में संकोच नहीं होता ,मन खोल कर कह लेती है  और हल्की हो लेती है .अब मन शान्त रहने लगा है .सब कुछ जैसे ऊपर ऊपर से निकल जाता है ,बिना प्रभाव डाले ,बिना स्पर्श किए .कृष्ण का साथ होता है तो एक अखण्ड शान्ति,गहन नीरवता साथ रहती है .सब कुछ सौंप देती हूँ उन्हें और वह निस्पृह भाव से स्वीकार कर लेते हैं.
मेरा अपना बचा ही क्या है ?लगता है मन का विचलन रुक गया, मंथन थम गया .तब निजत्व आड़े नहीं आता.तटस्थ होकर विचार कर सकती हूँ.अपना आपा जब केन्द्र में हो तो विवेक सो जाता है ,अशान्ति ही पल्ले पडती है .द्रौपदी शान्त और सुस्थिर रहना चाहती है ,लेकिन चारों ओर उठती हुई आँधियाँ ,झकझोरती हवायें,निरंतर चलती उठा-पटक, मन को बार- बार विलोड़ित कर देती हैं ।
रात विचित्र स्वप्न देखा - इधर उधर लुढ़कते रुण्ड-मुण्ड,रक्त की बहती धारायें जिनमें बहे जा रहे परिचित और प्रिय चेहरे .मन विकल हो उठा.नींद खुल गई-आँखें खोले अँधेरे में ताकती रही .
भीतर ही भीतर अविराम मंथन चलता है .यह कौन सा धर्म है कि पत्नी का वस्त्र-हरण होता रहे और पति निरीह बना बैठा रहे !एक नहीं पाँच-पाँच पति।तब माँ की आज्ञा मानी थी,बाद में भी माँ से सलाह कर लेते!युधिष्ठिर की धर्म और मर्यादा की बातों पर कभी हँसी आती है कभी क्रोध .सारे भाई उनका मुँह ताकते बैठे रहते हैं .किसी पराई नारी का भी वस्त्र -हरण हो रहा हो और अपने को वीर और नीतिज्ञ माननेवाला पुरुष दर्शक बना देखता रहे -उसे मर्यादाशील कहा जायेगा ?
2.
पाँचाली हँस रही है , 'क्यों छछिया भर छाछ के लिये तुम्हें नचाती थीं, ब्रज की गोपियाँ ? ऐसे भोले तो तुम लगते नहीं !'
'मैं नाचता था?'
तिरछी सी मुसकान में कृष्ण के होंठ टेढ़े हो गये,
' उनकी विचित्र भाव-भंगी देखने के लिये सारे खेल करता था सखी ,तुम कभी देखतीं वे सहज ग्राम-बालायें मनो -ग्रंथियों की अस्वाभाविकता से मुक्त हो ,अपने  भाव  कैसे व्यक्त करती हैं.कुल,शील ,मर्यादा ,लाज सारे प्रतिबंध तोड़ मेरे साथ कैसे सहज हो जाती हैं .मैं नहीं नाचता था,नाचती तो मेरे आगे-पीछे वे थीं .मैं भी आनन्दित होता था ,वे भी .'
'बड़े कौतुकी हो तुम! वास्तव में नटवर .लोगों को लगता है तुम नाचे पर तुम तो सबको नचानेवाले हो . स्वयं चैन की बांसुरी बजाते होगे कहीं जमुना किनारे ,राधा के साथ .'
'क्या कह रही हो मैं राधा के साथ ,और चैन की बाँसुरी !बाँसुरी हाथ में लेने का अवसर फिर कहाँ मिला ?हर काम के लिये एक वातावरण होता है .अपने में डूब कर बाँसुरी बजाने का भी !
'वह यमुना का तट ,ज्योत्स्ना भरी रात्रि वे भोले-भाले गोप-जन, और सबसे बढ़ कर वह मन कहाँ से लाऊँ ? यहाँ न शान्ति है, न विश्वास, न वैसा  प्रेम .राग कैसे बजेगा यहाँ ?राधा तो तब के बाद ऐसी छूटी  कि देखने को तरस गया .  बस,एक बार मिली थी.'
द्रौपदी ध्यान से देखती रही,'कृ्ष्ण ,तुम सुखी हो या दुखी मैं  समझ नहीं पाती.'
'क्यों सुखी होना या दुखी होना ज़रूरी है ,जीवन में चैन से बैठने को कब मिला जो अनुभव कर सकूँ ?'
' सच्ची मीत,कभी -कभी तो  मैं घबरा जाती हूँ .समझ नहीं पाती कहाँ जाऊँ ,क्या करूँ.कहीं छुटकारा नहीं दिखाई देता .उन विषम क्षणों में तुम्हारे जीवन के अध्याय याद आते हैं .तब लगता है  ,इतना सब झेलते हुए भी तुम कितने सहज रह लेते हो -कितने निरुद्विग्न ,प्रसन्न-चित्त.'
कुछ रुकी द्रौपदी ,फिर बोली ,'जो बीत गया उससे मुझे क्या ,सोच कर शान्त रहना चाहती हूँ  पर  जो बार-बार घिर आता है ,निकाल नहीं पाती मन से. और भविष्य ?  ..आगे क्या करना है यही उधेड़-बुन लगातार चलती है .....एक तुमसे मुझे जीने की शक्ति मिलती है .'
'जो सोच कर दुख होता है उसे सोचो ही मत सखी .आगे जो करना है उसी का ताना-बाना बुनो.'
 क्या यह संभव है- प्रश्न उठा द्रौपदी के मन में ,उसने कहा,'जीवन तो  चलेगा ही ,क्या  होना है ,कहाँ ,कैसे होना है यह निर्णय मेरा कहाँ .आगे कब क्या होगा कुछ नहीं मालूम .एक से एक विचित्र परिस्थितियाँ  आ खड़ी होती हैं .पहले से  कुछ सोचना-समझना कैसे ?'
चुप हो गए कुछ क्षण दोनों.
अचानक ही पूछा द्रौपदी ने ,'तुम राधा के विषय में सोचते हो?'
कृष्ण के मन में वृंदावन घूमने लगा .लगा यमुना की शीतल लहरें खनक रही हैं ,वन की मुक्त हवा का झकोरा जैसे तन को परस गया हो .
दूर गाएँ रँभा रही हैं , हरित-श्यामल धरती का विस्तार ,फूल खिले हैं .अचानक ही राधा सामने आ कर खड़ी हो गई -नैन तरेरती मुद्रा में.
कानों में स्वर आया -'सखा कृष्ण'
कृष्ण जैसे जाग उठे .
'कहाँ खो जाते हो बार-बार.'
राधा चली गई .कृष्ण चेते.
'तुम कह रही थीं राधा के विषय में सोचना? उसका आभास निरंतर मुझे होता है ,वह मौजूद है .विद्यमान है .कहाँ-कहाँ तक ,मैं स्वयं नही समझ पाता . पाँचाली,तुमसे नहीं छिपाऊंगा.
राधा ने एक बार पूछा था- मैं प्रसन्न होऊँ जो मुझे तुम्हारा प्यार मिला ,या तुम नहीं मिले इसका पश्चाताप करूँ? सुख और दुख दोनों समरूप स्थित हो गये हों जहाँ उसे क्या नाम दें ?इस अंतरंगता को द्योतित कर सके ऐसा कोई शब्द नहीं.'
वह चुप सुन रही है - -
'और जब मैं अकेला होता हूँ वह अचानक चली आती है ,मेरा विचार-प्रवाह रोक कर खड़ी हो जाती है .बिना कहे-सुने समझ जाते हैं हम एक दूसरे की बात .'
'पराकाष्ठा है .'
'काहे की?'
'प्रेम की .'
*
(क्रमशः)

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

एक जानकारी

"...न ही इस बात की कोई जानकारी है कि लड़कपन के उस दौर के बाद फिर कभी राधा से उनकी मुलाकात भी हुई या नहीं।"


चंद्रभूषण जी (पहलू)की 26 नवंबर की पोस्ट में उपरोक्त पंक्ति पढ़ी और अपना कमेंट देना चाहा ,पर इतना बड़ा हो गया कि वहाँ देना उचित नहीं लगा .अपने ही ब्लाग पर लिखे ले रही हूँ -

भारतीय- मानस इतना भी अनुदार नहीं ,कि लंबी तपन के बाद कुछ शीतल छींटे भी वर्जित कर दे .सूर ने कई पदों में यह आभास दिया है - सूर्यग्रहण के अवसर पर ,प्रभास तीर्थ आई, ब्रज की टोली को देख रुक्मिणी पूछती हैं - 'तुम्हरे बालापन की जोरी?' और कृष्ण दिखाते है ,'वह युवति-वृन्द मँह नील वसन तन गोरी ,.'

फिर राधा-रुकमिनि कैसे भेंटीं - 'बहुत दिनन की बिछुरी जैसे एक बाप की बेटी '.

कथाओं में यह भी कि रुक्मिणी राधा को आमंत्रित करती हैं . रुक्मिणी स्वयं शयन- पूर्व उनके लिए दूध लेकर जाती है- गर्म दूध ,राधा चुपचाप पी लेती है किन्तु छाले कृष्ण के चरणों में उभऱ आते हैं .

इसी को पल्लवित करते हुए मैंने उस भेंट की झाँकी  प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया था -

तुम्हरे बालापन की जोरी.

रुकमिन बूझति सिरी कृष्ण सों कहाँ गोप की छोरी ?'

'उत देखो उत सागर तीरे नील वसन तन गोरी ,

सो बृसभान किसोरी !'

सूरज ग्रहन न्हाय आए तीरथ प्रभास ब्रिजवासी ,

देखत पुरी स्याम सुन्दर की विस्मित भरि भरि आँखी!

'इहै अहीरन करत रही पिय, तोर खिलौना चोरी ?'

हँसे कृष्ण ,'हौं झूठ लगावत रह्यो मातु सों खोरी !

एही मिस घर आय राधिका मोसों रार मचावे ।

मैया मोको बरजै ओहि का हथ पकरि बैठावे ।'

उतरि भवन सों चली रुकमिनी ,राधा सों मिलि भेंटी ,

करि मनुहार न्योति आई अपुनो अभिमान समेटी !

महलन की संपदा देखि चकराय जायगी ग्वारी

मणि पाटंबर रानिन के लखि सहमि जाइ ब्रजबारी !

**

ऐते आकुल व्यस्त न देख्यो पुर अरु पौर सँवारन ,

पल-पल नव परबंध करत माधव राधा के कारन ! !

'मणि के दीप जनि धर्यो ,चाँदनी रात ओहि अति भावै ,

तुलसीगंध ,तमाल कदंब दिखे बिन नींद न आवै !

बिदा भेंट ओहिका न समर्पयो मणि,मुकता ,पाटंबर ,

नील-पीत वसनन वनमाला दीज्यो बिना अडंबर !

राधा को गोरस भावत है काँसे केर, कटोरा ,

सोवन की बेला पठवाय दीजियो भरको थोरा !'

**

अंतर में अभिमान, विकलता कहि न सकै मन खोली

निसि पति के पग निरखि रुकमिनी कछु तीखी हुइ बोली ,

'पुरी घुमावत रहे पयादे पाँय ,बिना पग-त्रानन ,

हाय, हाय झुलसाय गये पग ऐते गहरे छालन ?'

'काहे को रुकमिनी ,अरे ,तुम कस अइसो करि पायो ?

ऐत्तो तातो दूध तुहै राधा को जाय पियायो ?

दासी-दास रतन वैभव पटरानी सबै तुम्हारो ,

उहि के अपुनो बच्यो कौन बस एक बाँसुरी वारो !

एही रकत भरे पाँयन ते करिहौं दौरा -दौरी

रनिवासन की जरन कबहूँ जिन जाने भानुकिसोरी !'

**

खिन्न स्याम बरसन भूली बाँसुरिया जाय निकारी,

उपवन में तमाल तरु तर जा बैठेन कुंज-बिहारी /!

बरसन बाद बजी मुरली राधिका चैन सों सोई

आपुन रंग महल में वाही धुन सुनि रुकमिनि रोई !

*

रह-रह सारी रात वेनु-धुन ,रस बरसत स्रवनन में ,

कोउ न जान्यो जगत स्याम निसि काटी कुंज-भवन में !

**
जन-मानस कृष्ण को राधा के साथ ही देखना चाहता है .राज-भवनों के ऐश्वर्य में उनके साथ पटरानियाँ रहती होंगी .पर मंदिरों में माधव के साथ सदा राधा विराजती हैं .
- प्रतिभा .

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

द्वाभाओँ के पार

*
अभी मेरे कमरे को डूबते सूरज की किरणें आलोकित किये हैं .सांध्य-भ्रमण के लिए तैयार होकर नीचे उतरी हूँ ..

' देखो सूरज डूब गया, शाम होने लगी है' ,पति कहते हैं.वे अपने पाँवों की परेशानी कारण साथ नहीं जा पाते .

नीचे रोशनी काफ़ी कम है .छायायें घिर आई हैं.

'अब सूरज पाँच बजे से पहले डूब जाय तो मैं क्या कर सकती हूँ.'(वैसे मुझे पता है कि यहाँ घड़ी एक घंटा पीछे कर दी गई है-डे लाइट सेविंग).जानती हूँ न, वे कुछ कहेंगे नहीं इसलिए बोल देती हूँ.

उनका कहना है जल्दी निकलो और रोशनी रहते घूम कर लौट आया .मेरा प्रयत्न यह रहता है कि घर से निकलने में देर कर दूँ.और साक्षात् देखूँ कि किस विधि प्रकृति का मुक्त एकान्त सजाती द्वाभाएं अपना ताफ़्ता रंगोंवाला झीना आंचल सारे परिवेश को उढ़ाती हैं .जब कहीं कोई नहीं होता सड़कों पर भी ,भ्रमणकर्ता अधिकतर लौट चुके होते हैं कभी एकाध मिल जाता है तो एक 'हाइ' फेंककर अपनी राह बढ़ जाता है. अब जब,यौवन को कोसों पीछे छोड़ आई हूँ मुझसे किसी को या किसी से मुझे ऐसा-वैसा कोई खतरा नहीं -निश्चिन्त हो कर मनचाहा घूम सकती हूँ ,

निविड़ एकान्त का , इस गहन शान्त बेला का कितनी व्यग्रता से इंतज़ार करती हूँ.यह एक घंटा सिर्फ़ मेरा . अगर कोई बाधा आ जाए,तो कहीं व्यस्त रहते हुए भी हुए मन घर की खिड़कियों से बाहर निकल भागता है ,जहाँ रंग-डूबी वनस्पतियों में मुक्त विहार करती द्वाभाएँ आकाश से धरती तक जादुई रंग उँडेलती रहती हैं .नवंबर का मध्य और दिसंबर का अधिकांश- यहाँ सुन्दरता चारों ओर बिखरी पड़ती है है.फ़ॉल- कलर्स की कारीगरी -सारी प्रकृति सजी-धजी . बिदाई - समारोह का आयोजन हो रहा है ,निसर्ग में रंगों के फव्वारे फूट पड़े हों जैसे .सिन्दूरी ,पीले लाल ,सुनहरे, बैंगनी कत्थई ,वसंती नारंगी ,कितने रंगों के उतार-चढ़ाव सब ओर उत्सव का उल्लास ,सारी वनस्पतियाँ मगन. जीवन के चरम पर अपने-अपने रंगों में विभोर.पूरी हो गई है अवधि, आ रही है प्रस्थान की बेला ,खेल लो जी भर रंग . वर्ष बीतते सब झर जायेगा ,सन्नाटा रह जाएगा .कबीर ने जिसे कहा था -दिवस चार का पेखना'

ये चार दिवस का पेखना ही तो जीवन है - चित्प्रकृति का मुक्त क्रीड़ा कौतुक ! निसर्ग के इस महाराग पर अपनी कुंठाएँ लादना शुरू करोगे तो शिकायतें ही करते रह जाओगे .ये जो हमारे बनाये खाँचे हैं -आत्म को बहुत सीमित कर देते हैं . कभी इससे बाहर भी निकलो . और कबीर तुम सोचते कभी कि अनगिनत युगों से ये सरिता-जल कहाँ से बहता चला आ रहा है?न कोई आदि न अंत - एक अनंत क्रम .जीवन भी तो अनवरत प्रक्रिया है - अनंत क्रम .कौन बच सका इस आवर्तन से !इसी क्रम में कहीं हम भी समाए हैं . अगर आगमन समारोहमय है तो प्रस्थान भी उत्सवमय क्यों न हो !

नवंबर का महीना! इन सुरंजित संध्याओँ में साक्षात् हो रहा है निसर्ग की गहन रमणीयता से . सारे पश्चिमी तट को विशाल बाहुओं में समेटे रॉकी पर्वतांचल की किसी सलवट में सिमटा छोटा -सा नगर .केलिफ़ोर्निया की राजधानी का एक उपनगर .अभी अपने में प्रकृति के सहज उपादान समेटे है. कोलाहल-हलचल से दूर ,मुक्त परिवेश ,पर्वतीय तल पर समकोण बनाते ऊँचे-ऊँचे वृक्ष, धरती पर दूर-दूर तक फैला वनस्पतियों का साम्राज्य.कभी ओझल हो जाता कभी साथ चल देता क्रीक जो आगे ताल में परिणत हो गया है !

उदय और अस्त बेलाएँ अपने संपूर्ण वैभव के साथ प्रकट होती है .अभिचार रत द्वाभायें अभिमंत्रित जल छिड़कती -टोना कर रही हैं .

संध्या की धुँधलाती बेला ,न चाँद न सूरज -केवल एकान्त का विस्तार !ऐसा अकेला पन जब अपनी परछाँईं भी साथ नहीं होती ,लगता है मैं भी इस अपरिमित एकान्त का अंग बन इसी में समाती  जा रही हूँ .चारों ओर पतझर का पीलापन छाया है .वृक्षों के विरल पातों से डूबते दिन की रोशनी झलक कर चली गई है . .हवाएं चलती हैं धुँधलाती रोशनी में रंग प्रतिक्षण बदल रहे हैं है ,साँझ ने चतुर्दिक अपनी माया फैला दी है . पतझर की अबाध हवाएं पत्तों को उछालती खड़खड़ाती भागी जा रही हैं. साँझ का रंगीन आकाश ताल में उतर आया है .इस पानी में झाँकते बादल लहराते हैं ,किनारे के पेड़ झूम-झूम कर झाँकते हैं.

हर रात्रि अभिमंत्रित सा निरालापन लिए आसमान से उतरती है . क्षण-क्षण नवीनता, पल-पल पुलक शाम का ढलना ,रात का आँचल पसार -धीमे-धीमे उतरना , सारी दिशाओँ को आच्छन्न कर लेना ..धुँधलाते आसमान में बगुलों की पाँतें बीच-बीच में कुछ पुकार भरती इस छोर से उस छोर तक उड़ती चली जाती हैं ,उनकी आवाज़ें मुझे लगता है कहीं दूर रेंहट चल रहा है. पर यह मन का कोरा भ्रम -यहाँ अमेरिका में रेंहट कहाँ .

गहन एकान्त के ये प्रहर .इस साइडवाक से ज़रा हट कर चलती सड़क के वाहनों से भागते प्रकाश से आलोकित ..नहीं तो वही सांध्य-बेला .आकाश में रंगीन बादलों के बदलते रंग धीरे-धीरे गहरी श्यामता में डूबने लगते हैं. ,जिसमें जल-पक्षियों की का कलरव-क्रेंकार रह रह कर गूँज जाती है .साइडवाक और सड़क के मध्य वृक्षावलियाँ ,और घनी झाड़ियाँ ,-रोज़मेरी और अनाम सुगंधित फूलों से वातावरण गमकता है .बीच-बीच में सड़कों पर गाड़ियों का आना-जाना,रोशनी और परछाइयां बिखेरते गुज़र जाना .उन दौड़ती रोशनियों में पेड़ चमक उठते हैं .अपनी ही परछाईँ प्रकट हो मेरे आगे-पीछे दौड़ लगा कर ग़ायब हो जाती है .

जब चांद की रातें होती हैं तो पीला सा चाँद उगता है ,हर दिन नया रूप लिए ,धीरे -धीरे साँझ रात में गहराती है ,आकाश की धवलिमा धूसर होने लगती है ,.अभी कुछ दिनों से पानी बरसने लगा है ,वातावरण में ठंडक आ गई है .झील के जल में किनारे एक भी पक्षी नहीं दिख रहा .क्वेक-क्वेक की आवाज़ें आ रही है ,कहीं दुबके बैठे होंगे .उधर झील के बीच में कुछ आकृतियां हैं .किनारे झाड़ियाँ और बीच-बीच में श्वेत ऊंची-ऊंची काँसों के झुर्मुट .आकाथ श्यामल जल में प्रतिबिंबित हो रहा है .ताल कैसे अँधेरे में अपने को छिपा कर बाहर के सारे प्रतिबिंब अपने में धार लेता है . रात को सारे चाँद-तारे जल में उतर आते हैं

ये हल्के अँधेरे मुझे बहुत अच्छे लगते हैं देर हो जाती है तो और अच्छा ,अँधेरे और चाँदनी की मोहक माया .जैसे दूर-दूर तक इन्द्रजाल फैला हो .धरती पर झरे हुए पीले पत्ते ,ऊँचे-ऊँचे श्वेत काँस झुण्ड बनाए सिर हिलाते बतियाते रहते हैं .,,
विशाल वृक्षों की टहनियाँ धरती तक और ऊपर आकाश तक श्यामता को और गहरा देती हैं

आकाश के छोर पर एक तारा झाँकता है पहला तारा ,यही तो है ,साँझ को संध्यातारा (ईवनिंग स्टार) और प्रातः मार्निंग स्टार.रोज़ इस चमकते तारे को देखती हूं ,दृष्टि घुमाती हूँ चतुर्दिक व्याप्त सूना आकाश , कहीं कोई सितारा नहीं .
याद आता है माँ का कथन -

एक तरैया पापी देखे दो देखे चंडाल

और मैं पूरे आकाश में उगा यह अकेला तारा रोज़ देखती हूँ .

झील में डूबती.साँझ बेला और सूने आकाश का पहला तारा. यह दोष भी कितना लोभ-मोह भरा है . झील का रंग गहरा जाता है लहरें चमकती रहती हैं .इस अँधेरे ताल में नक्षत्रयुत आकाश सारी रात झाँकेगा .,किनारे पर ऊंची-ऊँची सुनहरी घास .बीच में लंबे-लंबे धवल काँस समेटे हवा में लहराती रहेगी .आती-जाती रोशनियाँ ताल पर बिखरती है थाह लेती परछाइयाँ अपरंपार हो उठती हैं .ये साँझ भी अब ताल में समाई जा रही है चारों ओर गहरे श्यामल आकार,रात की परछाइयाँ थाहता ताल खूब गहन होता जा रहा है.

.इन फ़ुटपाथों पर हवाओं ने जगह-जगह रंगीन पत्ते बिखेर दिये हैं- लाल-पीले पत्ते -बीच-बीच में और रंग भी जैसे राँगोली रची हो ,कोनों और मोड़ों पर ढेर के ढेर .उन्हीं पर पाँव रखते चलते कभी कभी सब-कुछ ,बिलकुल अजाना- सा लगने लगता है. चलते-चलते रुक जाती हूँ जैसे सारा परिवेश अजाना हो. कहाँ जा रही हूँ किन राहों पर चलने आ गई कैसे आ गई , ,ठिठकी-सी खड़ी ,कैसे कदम बढ़ें आगे ,किस तरफ़ मुड़ूँ! .उस परिवेश में डूबी ,अपने से विच्छिन्न ,विमूढ़ .लगता है इन्द्रियातीत हो गई हूँ. अनगिनती बार चली राहें ,अनजानी हो उठती हैं छलना बन बहकने लगते हैं अपने भान ,सब कुछ  अवास्तविक-सा . देह में  कैसा हल्कापन कि धरती पर न टिक पांव उड़ाये लिये जा रहे हों .बिना प्रयास चलते जाना .कहीं का कहीं लिये जाते हैं स्वचालित हो पग,एक बार तो... नहीं , छोडें उस चर्चा को .

विराट् प्रकृति में छाया और प्रकाश की क्रीड़ा . द्वाभाओं के आर-पार दिवस-रात्रि का मौन गाढ़ालिंगन घटित होता और अनायास गहनता के आवरण में विलीन . मेरा निजत्व डूब जाता है ,सब से -अपने से भी विच्छिन्न हो इस महाराग में डूबे रहना -यही हैं - मेरे तन्मय आनन्द के क्षण जिन्हे किसी कीमत पर खोना नहीं चाहती , अंश मात्र भी गँवाये बिना ,पूरा का पूरा आत्मसात् कर लेना चाहती हूँ .उस तन्मयता में और कोई बोध नहीं रहता , .इस अपरिसीम का एकान्त का अंग बन सबसे अतीत हुई सी .अवकाश उन सबसे, अन्यथा ,जो मुझ पर छाये रहते हैं हर तरफ़ से घेरे रहते हैं . उनके न होने से मुझे कोई अंतर नहीं पड़ता ,काम्य हैं यही मुक्ति के क्षण, जब मन विश्राम पा सृष्टि के अणु-परमाणुओं में गुंजित अनहद में विलीन हो जाए ..
**

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

ट्राई कर देखिये ...

बाज़ार घूमते हमने एक दुकान पर नाम देखा - "रणजीत चप्पल्स' .

बड़ा ताज्जुब हुआ !चप्पल का रण जीतने से क्या संबंध ?
कुछ ग़लत पढ़ गये क्या -चरणजीत चप्पल्स होना चाहिये था .हो सकता है चरण का 'च' मिट गया हो किसी तरह. फिर से देखा- नहीं कोई निशान नहीं 'च' का .साफ़ रणजीत लिखा है .
चक्कर में पड़ गए हम! अरे, चप्पल की दुकान है नाम रखना था "चरणजीत चप्पल्स" जो चरण की सेवा कर उसे जीत लें. और ये हैं कि युद्ध जीतने के लिए उकसा रहे हैं .
रणजीत चप्पल्स ?
लेकिन ये ठहरे व्यवसायी लोग . बेमतलब तो नाम देंगे नहीं .
फिर सोचते रहे . एकदम ध्यान आया - रण का एक प्रकार चप्पलबाज़ी या जूतम-पैजार भी तो है- जो आजकल काफ़ी कॉमन है .और अक्सर ही जूता फेंकने की घटनाएं सामने आ रही है . जूता फेंका तो आसानी से जा सकता है पर उससे मारा-मारी नहीं की जा सकती .गया तो गया .ऊपर से,बनावट ऐसी कि कस पकड़ पाना मुश्किल -ग्रिप नहीं बनता(ट्राई कर देखिये) ,उतारने में समय लगे सो अलग. ताव आते ही फ़ौरन दे मारें, ये संभव नहीं. ज़्यादा से ज़्यादा दो बार फेंक लो ,और जूते कहां से लाओगे .पर चप्पल कितनी भी बार चला लो ,हाथ से कहीं नहीं जाएगी!
मतलब खरीदने के पीछे का उद्देश्य पहनना नहीं लड़ कर जीतना है. चप्पल चट् से उतारो और दे तड़ातड़! पकड़ने में छूट जाने का कोई डर नहीं. चाहे जितने वार करो . रण में आसने-सामने वार चलते हैं ,नहीं ,जूता वहां नहीं चलेगा .
रणजीत चप्पलें खरीदी हैं .पहन कर उसे टेस्ट करने की इच्छा बहुत स्वाभाविक है .अब तो मौका ढूँढेंगे कि डट कर प्रयोग हो .तो यह नाम दुकानदार ने सोच-समझ कर रखा है .लड़ाई में डट कर चप्पलें चलेंगी टूटेंगी ,जीत का सेहरा बँधेगा तो वो फिर यहीं से खरीदेगा .हो सकता है चप्पलों में कुछ ऐसा प्रयोग हो. जो प्रतिद्वंद्वी को चित्त करके ही छोड़े. तभी तो जीत की गारंटी दी है.
अच्छा है, दुकान की बिक्री हमेशा होती रहेगी .
सही नाम रखा है, अच्छी तरह ठोंक-बजा कर - रणजीत चप्पल्स .
देखना खूब चलेंगी चप्पलें !

शनिवार, 27 नवंबर 2010

वाह रे लड़के !

आगे बढ़ने के क्रम में जीवन-धारा क्या मज़ेदार वाक़ये पीछे छोड़ती चलती है !ऐसे छींटे उछालती है कि यत्न से जोड़ी हुई कथाएं उसके आगे फीकी पड़ जाएं. वैसे मानी हुई बात है- फ़ैक्ट्स आर स्ट्रेंजर दैन फ़िक्शन .लोग ईमानदारी से अपने सच्चे किस्से बयान करने लगें तो कहानियाँ रचने की ज़रूरत ही नहीं  .असली चटक माल अपने आप मिल जाए, संभावनाओं में भटकने की मजबूरी ख़त्म. पर क्या किया जाय बेलाग सच को कुबूलता कौन है !
खैर,छोड़िये. क्या फ़ायदा फिलासफ़ी छाँटने से ,सीधे अपनी बात पर बात पर आयें .

बात है 25-30 साल पहले की- शायद इससे भी पहले की .तब फ़ाउंटेन- पेन बच्चों के हाथमें नहीं आए थे - छोटे तीसरी-पाँचवीं के बच्चों के लिए तो एकदम अलभ्य . परीक्षाएं देने अपनी-अपनी दावातें ले कर जाया करते थे .स्वाभाविक है कभी किसी की स्याही फैल जाये या खत्म हो जाए तो उसे दूसरे से माँगनी पड़ती थी .दूसरा उसकी दावात में अपनी में से थोड़ी-सी स्याही उँडेल देता ,उधार के रूप में .अब बच्चों की बात ठहरी.लेन-देन ,उधार चुकाना सब अपने ढंग से
हमारी बहिन जी उन दिनों टूँडला में थीं ,उनका बेटा आठ-नौ साल का रहा होगा. दाहिने हाथ की उँगलियों की पोरें हमेशा स्याही से रँगी मिलती थीं -वो तो सभी बच्चों की .एक बार स्कूल से घर आया तो निकर स्याही से रँगा पैरों पर स्याही के दाग़ जैसे किसी ने धार बाँध कर डाली हो. बड़ा खीजा हुआ सा घर में घुसा .बहिन जी ने पूछा ,"ये क्या कर लाए,आलोक ?"आलोक फट पड़ा ,"ये उसी शालिनी ने किया है ..हम उसे मना करते रहे ,नहीं चाहिये ,नहीं चाहिये पर वह कभी किसी की नहीं सुनती ."
"पर हुआ क्या ,ये नेकर पर कैसे फैली स्याही ?"
"परसों उसकी दवात में स्याही खतम हो गई थी तो हमने दे दी थी . कल वो आई नहीं. आज आई ,तो हमसे कहने लगी अपनी स्याही ले लो ."
हमने कहा," रहने दो .हमें नहीं चाहिये."
"हाँ ,हाँ ,ज़रा सी स्याही .वापस लेने की क्या ज़रूरत", बहिन जी ने पुष्टि की .
"पर वो मानी नहीं .कहने लगी हम किसी की चीज़ नहीं रखते .तुमने दी थी ,अब तुम लो."
''हमने मना कर दिया .वो तो लड़ने लगी ,कहे- हम क्या बेईमान हैं ! तुम्हें अपनी स्याही लेनी पड़ेगी .''
"फिर कभी ले लेंगे .हम आज दवात नहीं लाए,"
"तो तुम हमारी दवात ले जाओ .हमारे पास और भी है ".
"हम तुम्हारी दवात क्यों लें ?"
''लेओगे कैसे नहीं जब हमने तुमसे ली, !"
''हमें नहीं लेना,'' कह कर हम चल दिये ,
वो तो पीछे दौड़ी,
''देखो,हम बेकार किसी से कुछ नहीं लेते ,तुम्हें लेनी पड़ेगी ".
"हमने कह दिया नहीं चाहिये. "
''तुम्हारे कहने से क्या होता .हमें तो देना है . हम तुम्हारी जेब में रख देंगे."
और स्याही की दावात हमारी जेब में रखने लगी .
हम रोकते रहे पर उसने जबर्दस्ती हमारी जेब में डाल दी.
खींचा-तानी में स्याही जेब में ही फैल गई .
जब उससे कहा ," ये क्या किया तुमने?"
उलटे हमी पे चिल्लाने लगी '',तुम्हारी स्याही ,हमने दे दी ,तुम्हारी जेब में फैली ,तुम्हारी वजह से ..हम क्या करें और भाग गई .
वो कभी किसी की नहीं ,सुनती ."
आलोक ने जेब से दावात निकाल कर दिखा दी उलटी कर के कि खाली है
"तो दावात तो जेब से निकाल देते !"
"कहीं वो देख लेती तो.. .इधर ही तो रहती है ."वह रुबांसा हो आया था
"..गलती उस की है ,हम क्या करते! " .
बहिन जी का और मेरा हँसी के मारे बुरा हाल .
वाह रे लड़के !
*