मंगलवार, 15 अगस्त 2017

जहँ-जँह चरण पड़ें ....

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              इंसानी कारस्तानियों से तो अब सारी दुनिया पनाह माँगने लगी है .एक छोटा सा उदाहरण अभी हाल ही में सामने आया है.अमेरिका का, अपनी विविधता के लिये विख्यात येलोस्टोन नेशनल पार्क , जो इतना विशाल है कि  तीन राज्यों में - मोंटाना,व्योमिंग और आइडाहो -फैला है . इसे  धरती मां की जीवंत प्रयोगशाला कह सकते हैं जिस में विकास और विनाश के रहस्य अध्ययन करने का पूरा पूरा अवसर है.पृथ्वी के निर्माण और संचालन प्रक्रिया को समझने के लिए यह क्षेत्र आदर्श है , यही नहीं यहाँ ११,००० वर्षों से मानवीय गतिविधियां निर्बाध रूप से चल रही हैं इस लिए जैाविक और भूतलीय विविधताओं का सिलसिलेवार लेखा मौजूद है.  
                    ये मनुष्य नामक जीव हर जगह अपनी टाँग अड़ाने पहुँच जाता है .प्रकृति के सारे  सुनियोजित कार्यों और सार्थक व्यवहारों को अपने नियंत्रण में रखना चाहता है -बिना जाने कि परिणाम क्या होगा .नेशनल पार्क सर्विस की स्थापना के बाद से १९१६ में इसे उसके अधीन कर दिया गया. और  जंगल के प्राकृत नियमों की जगह इंसानी व्यवस्था के प्रभाव में आने लगा.उसे सिर्फ़ अपनी पड़ी है.प्रकृति को सब का सब-कुछ
आगे भविष्य तक का सोच कर आगे बढ़ना होता है. होता है .एक पूरी शृंखला पड़ी है उसके लिये - जड़ से लेकर चेतना के उच्चस्तरों तक .जिन्हें हम जड़ समझते हैं ,भू-तल,नदी पर्वत से लेकर  उद्भिज अंडज,योनिज सब अपने संपूर्ण भाग-अनुभागों  विभागों सहित .और सब में  ताल-मेल बैठाने का दायित्व सँभालती है .सारे एक दूसरे को प्रभावित करते हुये और होते हुये.पशु-पक्षियों से लेकर वनस्पतियाँ ,नदियाँ मिट्टी तक आपसी तालमेल से जुड़े रहते हैं ,एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं और करते हैं.सब में ऐसी   घनिष्ठता कि एक कड़ी में व्यवधान पड़ेतो सारी शृंखला हिल जाये.सच में तो यही उसका कारॆॆॆ कार्यक्षेत्र है, उसकी प्रयोगशाला है जहाँ अनगिनती प्रयोग लगातार चलते  हैं -न समय की कोई सीमा  न सामग्री की .अतुल भंडार है उसका ,जब जो चाहती है उगा लेती है.एक पेड़ के लिये सैकड़ों बीज एक फल के लिये अऩगिन फूल . और  मूर्ख आदमी समझे बैठा है उसके सुख  के लिये हैं ये सब.यह आयोजना बड़ी लंबी-चौड़ी है.लयबद्धता के साथ ऋतु-क्रम में सारे संतुलन बैठाने की सामर्थ्य प्रकृति के मदरबोर्ड की जीवन्त प्रोग्रामिंग से ही हो सकती  है ..
                 प्राकृतिक जीवन के सामान्य कार्य संपादन तक की अक्ल या  तो है नहीं चल पड़ता है  अपना फ़ितूर लेकर .यहाँ भी सुनियोजित  शृंखला की घनिष्ठ कड़ियों में तोड़-मोड़ करने लगा .जंगल का सारा संतुलन बिगाड़ कर  रख  दिया. सब गड़बड़ होने लगा - नदियाँ विध्वंस पर उतारू हो गई ,भूमि कटने  लगी जंगल  तरुहीन होने लगे,पक्षी पलायन कर गये. हरा-भरा प्रदेश  उजाड़ होने लगा.प्रकृति की योजना में सेंध लगा  सारी व्यवस्था भंग हो गई .
               उसने किया ये  कि बेकार की आफ़त समझ कर जंगल से भेड़ियों का  सफ़ाया कर दिया -70 साल तक भेड़िया रहित बनाये रखा रहा  जंगल को . परिणामतः  हिरणों की भरमार हो गई ,दुर्लभ और उपयोगी वनस्पतियाँ उनके चराव से नष्ट होने लगीं.छोटे पौधे पत्रहीन हो सूख गये ,नये वृक्ष उगना बंद ,पुराने जर्जर.  पक्षी आश्रयहीन हो पलायन कर गये.बीवर जो नदियों में बाँध  बना कर उन्हें संयमित करते थे पलायन कर गये.नदियों का प्रवाह अनियंत्रित हो मनमानी करने लगा.पशु-पक्षियों के बिना बीजों का बिखराव कैसे हो  ,ऊपर से बढ़ता जाता हिरणों की चराव ,हरा-भरा वन उजड़ कर मरुथल बनने लगा
                यह सब  था आदमी के दिमाग़ी फ़ितूर का नतीजा. खिड़कियाँ कुछ खुलीं तो 1995 में फिर से  भेड़ियों का झुंड  जंगल में भेजा गया .जीवन व्यवस्थित होने लगा  नवागतों के  शिकार से हिरणों की संख्या घटी ,धरती पर वनस्पतियाँ पनपने लगीं .पौधे पनपने बड़े होने से पक्षियों की चहक फिर गूँजने लगी . उन्होंने फल कुतर-कुतर कर दूर-दूर तक बीज बिखेरे, नई वृक्षावियाँ सज गईँ . छः-सात वर्षों में जंगल लहलहा उठा.
बीवर लौट आये नदियों पर बाँध बनाने लगे ,नदियाँ संयत हुईं.जलपक्षी बिहार करने लगे.सियारों को भी मारा भेड़ियों ने ,परिणामतः  खरगोशों और चूहों की संख्या बढ़ी ,लोमड़ियाँ ललचाईं ,फिर उनके खाने से बचे अवशेषों पर बाज़-गिद्धों को आमंत्रण मिला.फलदार पेड़ों ने भालुओँ को दावत दी, जिनके आने से हिरण और भेड़ियों पर नियंत्रण हुआ.बीवरों के बाँधों से नदियों की मनमानी नहीं चली ,मिट्टी का कटान रुक गया.सारा क्रम व्यवस्थित हो गया.भेड़ियों की आवक क्या हुई  जंगल का जीवन फिर गुलज़ार हो गया .
               यहाँ कहीं कुछ भी व्यर्थ या असंबद्ध नहीं.यों देखा जाय तो मनुष्य भी उसी शृंखला की एक कड़ी है ,उसका भी शेष सबसे घनिष्ठ संबंध है .एक ही ऋत सबका संचालक - पर कैसा दुर्मति  है , इंसान प्रकृति के तारतम्यमय जीवन में दखलंदाज़ी कर  सारी समरसता विकृत कर डालता है. 
   आदमी नाम का ये प्राणी कब क्या करेगा कोई ठिकाना नहीं , दिमाग़ हमेशा किसी खुराफ़ात के चक्कर में रहता -रातों में नकली  रोशनी में काम करता है , दिन में रोशनी के रास्ते बंदकर आराम करता है.न समय पर जागता है न समय से सोता है .खाने को जाने क्या अल्लम-गल्लम ,पीने को कुछ विचित्र मिश्रण ,पहनने को अजीब ढंग के चिपके ,ढीले,बेतुके ,बनावटी कपड़े . हवा-पानी ,ज़मीन-आसमान हर जगह कुछ न कुछ लफड़े. अपनी सारी  सहजवृत्तियाँ कुंठित कर ली ,लगता है कुछ समय में ये भी भूल जायेगा कि जीवों में किस जाति का प्राणी है .किताबें खोल कर पता करना पड़ेगा कि सृष्टि के विकास क्रम में कहाँ खड़ा है.
यही सब देख कर अब तो  विश्वास हो चला है   -
                'जहँ जहँ चरण पड़ें मनुजन के तहँ-तहँ बंटाढार '.
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2 टिप्‍पणियां:

  1. विचारणीय पोस्ट.. मानव एक ओर जहाँ विकास की ऊंचाईयों को छू रहा है दूसरी ओर अपने ही विनाश के उपाय खोज रहा है..बढती हुई जनसंख्या और मानव के लोभ ने प्रकृति की सारी व्यवस्था को तोड़ दिया है, प्राकृतिक आपदाएं मानव की लापरवाही का ही नतीजा हैं.

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  2. इंसन अपने स्वार्थ के लिए प्रकृती का बेहिसाब दोहन करता हैं और उसी की किमत उसे चुकानी पड़ती हैं। सुंदर विचारणीय पोस्ट...

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