गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

सागर-संगम - 6

लोकमन -
 महा-समर में झोंक दिये सब रत्न, देश का यौवन,
शेष बचा अपशिष्ट और आदर्शों से च्युत जीवन.
मार्ग रुद्ध कर दिया बुद्धि का, बाधित कर चिन्तन को ,
विधि-निषेध के जटिल बंधनों में जकड़ा जीवन को !
पाप ,नरक का भय दिखला कर कुण्ठित कर डाला मन ,
सहज-सरल गति  में ला डालीं अनगिनती बाधाएँ !
सूत्र -हाँ ,मैंने पढ़ा है.नियमों के जटिल बन्धनों में समाज को जकड़ दिया गया था.जन्म से मृत्यु तक कोई न कोई संस्कार !जो ज़रा हट कर चले पापी कहलाये और प्रायश्चित के लिये तैयार रहे.
सूत्रधार. - लो देखो -
दृष्य - ब्राह्मण और ब्राह्मणी
स्त्री -काहे पंडिज्जी ,कल जो पुरोहिती करन गये रहे ,का प्राप्ती भई ?
ब्राह्मण  -दो गइयाँ दान में दी हैं जिजमान ने ,नाज और वस्त्र तो साथ ही दै दिया रहे .गउयें भी आती होयँगी .
स्त्री -कुछ दास-दासी  काहे न माँग लिये ?सबन में ऊँची जात हैं ,हम काम करेंगे का ?हमरी सेवा तो औरन को करै का चाही  .
ब्राह्मण  -अब के कहेंगे .ये जो छोरे पढ़ने आते हैं,इनसे काम लिया करो .सानी-पानी, दूध दुहना इनहिन को सौंप दो .धरमू कहाँ है ?
स्त्री -यह भी कुछ मंतर-अंतर सीख ले तो आमदनी और बढ़ जाय.हमारे सोने के कंगन कब बनेंगे ?
ब्राह्मण  -तू देखती जा क्या-क्या करता हूँ .हमारा तो धरम ही दान लेना है .हम जो कह दें लोगन को मानना पड़े. बडा होय कि छोटा .ये वैश्य-शूद्र नीची जात  हैं  किस गिनती में ?
ब्राह्मणी  - सो तो है .ब्राहमनन का कोप भला कौन लेना चाहे !
[बाहर से आवाज आती है -पंडिज्जी ,
 पंडिज्जी .]
ब्राह्मण  -लगता है इन्द्र सेन बनिया आया है .तू अन्दर जा .[जोर से ]आइये इन्द्रसेन जी ,अन्दर आ जाइये .
[वैश्य प्रवेश करता है .]
वैश्य  -महाराज ,कल हम यात्रा के लिये प्रस्थान करना चाहते हैं ,नेक मुहूर्त विचार दीजिये .
ब्राह्मण- [पोथी-पत्रा निकालता है ]कहाँ का व्योपार करने जा रहे हो ?
वैश्य -रेशमी वस्त्र और चन्दन की लकडी की गुर्जर देश में माँग है ,वहीं जाने का विचार है .
ब्राह्मण -कल बिल्कुल मत जाना ,पश्चिम की ओर दिशाशूल है ,और रेशम और चन्दन के तो बिल्कुल अनुकूल नहीं .
वैश्य हमने तो पैसा फँसा दिया .आप ही कोई उपाय निकालिये .
ब्राह्मण -[कुछ देर आँखें बन्द कर विचार करता है ]..एक उपाय है -चार तोला सोना पीले वस्त्र में लपेट कर किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान दै देना ,एक कुक्कुट की बलि और पाँच पंडितों को भोजन करा के दक्षिणा भी.
वैश्य - [ मुँह बनाता है] पंडित जी, इतना तो हमारे बस का नहीं है और जीव-हत्या भी हम नहीं करना चाहते .हम वैश्य हैं पशु पालते हैं उनकी हत्या नहीं .
ब्राह्मण -इन्द्रसेन ,समृद्धि चाहते हो तो पशु-बलि करनी होगी .
[ ब्राह्मण के पुत्र का प्रवेश ]पुत्र -बप्पा ,धूलिया चमार आज जोत पर काम करने नाहीं गया और सोमती कहती है उसका छोरा बीमार है सो काम पे देर ,से आयेगी .
ब्राह्मण - इन शूद्रों के दिमाग बहुत बढ़े जाय रहे हैं . [पुत्र से ]उससे कह दो लड़का जिये चाहे मरै, हमारा काम जरूर होबै का  चाही ..[पुत्र जाता है ]अब का बतावैं ,इन्द्रसेन जी ,कल हमारी पंडितानी नहाकर मंदिर जा रही था वो बुद्धन चाण्डाल अइस निकला कि ओहि की छाया पंडितानी पर पडी ,बिचारी को फिर से नहाय का  पड़ा .
वैश्य -ये चमार-चाण्डाल बस्ती से बाहर ही रहा करें तभै ठीक है.और चाण्डलन को तो घंटा बजा कर चलना चाहिये कि लोग सावधान रहें, किसी पर परछावाँ न पड़ जाय .
ब्राह्मण -अब तो ऐसी व्यवस्था करै का चही कि  वेद-मंत्र इनके कानन में पड़ जाय तो पिघला सीसा भरवाय दो .इनका काम सेवा करै का  है और कौनो बात से इन्हें का मतलब !
[पुत्र फिर आता है ]
पुत्र - बप्पा, ऊ धूलिया बहुत-चबर-चबर करै लाग , कहत है मजूरी कम दोगे तो काम नाहीं करेंगे ,नाहीं होय बौद्ध हो जायेंगे .
ब्राह्मण - सब नास्तिक हुये जा रहे हैं सुसरे !हाँ ,इन्द्रसेन जी आपने क्या सोचा ?
वैश्य -हत्या हम नहीं करेंगे पंडित, हमने सोच लिया है .
ब्राह्मण -अधरम की बात करते हो .पवित्र बलि को हत्या करते हो .फिर तुम्हारा अनिष्ट- शमन कैसे होगा ?
वैश्य -अरे पंडित ,अनिष्ट दूर करने के लिये जितना तुमने बताया उसके बाद हमारे पास बचेगा ही क्या ?हम तो पहले ही कंगाल हो जायेंगे .
ब्राह्मण -ब्राह्मण को देने में जान निकलती है .अरे जो ब्रह्मण के पास गया समझो चौगुना हो गया .
वैश्य -हमारे बस का नहीं .
ब्राह्मण - उसी महावीर और गौतम की सीखों ने लोगन का दिमाग खराब कर दिया .देश रसातल को जा रहा है . ऐसे दुष्ट चच्चच्...
वैश्य -[उत्तेजित होकर ]दुष्ट मत कहो पंडित !वे त्यागी हैं ,अपने लिये नहीं माँगते .तुम लोगन की तरह अपने सुख-भोग के लिये धरम का नाम ले ले कर लोगन से वसूली नहीं करते .किसी को दुःख नहीं पहुँचाना चाहते .
ब्राह्मण -अच्छा !इसी पर तुल गये हो तो यही सही .ब्राह्मण के शाप से नष्ट हो जाओगे ,सौ-सौ जनम रौरव नरक में पड़ो रहोगे . 
वैश्य -[उठ कर खडा हो जाता है ]दे दो शाप पंडित ,हम इस धर्म को ही छोड़ देंगे जो न लोक में चैन लेने  न परलोक में ..हम जैन धर्म की दीक्षा ले लेंगे ,तुम सम्हाले बैठे रहो अपना धर्म ![वेग से उठता है चला जाता है ]
[ब्राह्मणी का प्रवेश ]
स्त्री - अरे इन्द्रसेन चला गवा ?कुछु दान-दक्षिणा दै गवा कि नाहीं ?
ब्राह्मण -अब ऊ न आई  .सब नास्तिक होते जाय रहे हैं .ये सिरमुंडे जैन मुनि ,इनका तो   देखे मन घिनात है .अहिंसा-अहिंसा चिल्लावत हैं ,वर्णाश्रम धर्म की जड़ खोदे जाय रहे हैं .
स्त्री - दान-दक्षिणा तो वैश्यन से ही मिलत रही  , क्षत्रिय लोग का  देंगे !
ब्राह्मण -जाने दो हमारा का बिगाड़ लेंगे .हम सर्वश्रेष्ठ हैं ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं .हमका केऊ की चिन्ता नहीं .
(दृष्य समाप्त)
नटी - कितना आडंबर !अपने सुख के लिए कितना पाखंड रचते रहे. दूसरों का जीना मुश्किल कर दिया .
सूत्र. -अपना कर्तव्य भूल गए .ज्ञान का अर्जन और वितरण कर समाज का कल्याण करना तो  दूर ,बस मतलब साधने में लगे रहे .
इसी की तो प्रतिक्रिया हुई थी जैन और बौद्ध संप्रदायों का उदय ,ऐसे ही विषम कालों में जन-मन  को आश्वस्ति देने के लिए ,सदाचार की ओर ले जाने के लिए प्रबुद्ध और जाग्रत चेतनाएं धरती पर आती हैं .
(दृष्य समाप्त )
 लोक. -  मानव  की उन्मुक्त चेतना नहीं  बँधी रह पाती ,
    राह दिखाने , दीप लिए कोई विभूति आ जाती
सत्य,अहिंसा ,ब्रह्मचर्य,अस्तेय तथा अपरिग्रह,
शान्ति और सद्भाव लिए आये थे महापुरुष द्वय
सहज ज्ञानमय सात्विक मत के नये सँदेशे आए !

नटी -तो यह पृष्ठभूमि रही थी ,इन नये मतों के मूल में .
लोक. -
मिली प्रेरणा  यह कि  ,कर्ममय हो  नैतिक अनुशासन ,
मानव मात्र कर सके जिसमें स्वयं आत्म-परिशोधन !
आत्म-सुखों से विरत ,राग से मुक्त, धम्म अपना ले
मानव-जीवन नैतिकता की नई उँचाई पा ले
वैशाली के वर्धमान ,सिद्धार्थ शाक्यकुल दीपक ,
राजपुत्र होकर भी दोनों सुख-वैभव तज आए !
जग के शाप-ताप हरने भीषण व्रत साधा वन में ,
पूर्णज्ञान  औ'शुद्ध-बुद्ध हो प्रकटे जग आँगन में !
 [मंच पर महावीर ]
  तीर्थंकर जिन की सात्विकता पर चल जैन कहाये
(कुछ देर अंधकार लोकमन  की आवाज गूँजती रहती है )
- धारा बहती जाये !
दुनिया के दुख दर्द ,कि जिस का जीवन छू न सके थे ,
राग-रंग ,वैभव -विलास  ,सारे  सुख- भोग भरे थे !
जन-जन के दुख से विह्वल हो उसने करुणा बाँटी ,
दूर चीन जापान तलक उसके संदेश गये थे .
 जन-जन को प्रबोध देते वे स्वयं बुद्ध कहलाए !
नटी - आज भी सुदूर देशों तक बौद्ध-धर्म के सजीव चिह्न विद्यमान हैं.
लोक.-इतिहास साक्षी है ,कैसी-कैसी घटनाएँ अनायास घट जाती हैं .
दृष्य -
दृष्य -पृष्ठभूमि में सैनिक- पड़ाव,दो प्रहरी हाथों में दंड लिये 'जागते रहो ' चिल्लाते मंच के आर-पार चल रहे हैं .एक ओर से सम्राट् अशोक का ,शीष झुकाए धीरे- धीरे ,गहन सोच में भराप्रवेश  करता है , शून्य में ताकता खड़ा हो जाता है .
अशोक -(स्वगत कथन)आधी रात बीत चुकी !नींद जैसे आँखों से उड़ गई है .कलिंग का युद्ध समाप्त हो गया .मैं जीत गया ..पर मन में निरंतर एक युद्ध चल रहा है .दिन में देखे गये वे दृष्य  भूल नहीं पाता हूँ .विजय के उन्माद में रथ पर चढ़ कर नगर घूमने निकला था .पर कहाँ थे मेरी जय-जयकार बोलनेवाले ?कलिंग उजड़ा पड़ा था पुरुष-शून्य !कहीं कोई स्वागत नहीं .मेरे अपने सैनिक जय बोल-बोल कर थक चुके थे .विलाप और क्रंदन के स्वर वातावरण में मनहूसियत भर रहे थे .रोते कलपते भूखे बच्चे ,मुझे देखते ही भयभीत हो जाते .पीठ पीछे एक दूसरे को बताते कि यही है ...क्या बताते होंगे वे कि यही है जिसने अपनी लिप्सा में हमारे जीवन उजाड़ डाले !..और वह युवती विधवा  ...पछाड़ खाती मेरे रथ के सामने आ पड़ी .पागल सी चीख रही थी ..'ले अशोक मेरा भी खून पी ले !तुझे मेरा सुहाग एक दिन भी सहन न हुआ ! मेरी भी हत्या कर दे .संतुष्ट हो ले तू !'..खुले बाल ,लाल-लाल आँखें,तन-बदन का होश नहीं !सैनिक पकड़ -पकड़ कर हटाते और वह बार-बार सामने आ गिरती थी चिल्लाती थी ' ले मुझे भी मार डाल ,नहीं तो जिन्दगी भर तुझे शाप दूँगी !'
' ...मैंने यह क्या कर डाला !महापंडित ने कहा था युद्ध क्षत्रिय का धर्म है.छत्र धारण करने वाले को राज्य-विस्तार करना चाहिये ...पर यह भयानक नर-मेध ?...मैं आगे कुछ सोच नहीं पाता ![सिर पकड़ कर बैठ जाता है ,एक बौद्ध-भिक्षु निकल कर आता है,अशोक को देख कर उसकी ओर बढ़ता है ]
भिक्षु - तुम कौन हो ?रात्रि के इस प्रहर में अकेले यहाँ क्या कर रहे हो ?
अशोक -मैं एक मनुष्य ,अशान्त, उद्विग्न मन लिये भटक रहा हूँ .समझ नहीं पा रहा हूँ कि अपने प्रमाद के वशीभूत हो जो जघन्य आचरण कर डाला है उसका निराकरण कैसे  होगा !.. और आप कौन ?इस समय यहाँ ..?
भिक्षु -मैं उपगुप्त हूँ -बौद्ध भिक्षु !युद्ध में जो घायल हो गये हैं उनकी परिचर्या  हेतु निकलता हूँ !अनाथ हो गये भूख से बिलबिलाते बच्चों को भोजन चाहिये ,घायलों को सुश्रुषा चाहिये ,दुखिनी स्त्रियों को धीरज चाहिये !जितना मुझसे हो सकेगा करूँगा ....पर तुम यहाँ क्या कर रहे हो ?
अशोक -[अपने में खोया सा ] आपके मुख पर कैसी देवोपम शान्ति है .रात-रात भर श्रम करके भी आप  म्लान  नहीं हैं !सब कुछ त्याग कर भी आप परम तुष्ट हैं . सांसारिक प्राणियों की निरंतर सेवा करके भी आप क्लान्त नहीं हैं .और मैं क्रूर ,नराधम ..मुझे कहीं शान्ति नहीं मिलेगी ,कभी नहीं ,कभी नहीं !
भिक्षु - शान्त हो ,शान्ति रखो .इतने हताश और उद्विग्न क्यों हो तुम ?
अशोक -क्या बताऊँ,कैसे कहूँ ?..मैं ही हूँ इस भयानक नर-मेध का सूत्रधार !...हाँ, मैं ही हूँ पापी ,अधम अशोक !
भिक्षु -विजयी सम्राट्!आप और इस तरह
अशोक - नहीं ,मत कहो सम्राट्,मत कहो विजयी ! कहो हत्यारा अशोक ,हारा हुआ अशोक !पश्चाताप की अग्नि में दग्ध, भटकता  अशोक !...ओह, मैं क्या करूँ !
भिक्षु - शान्त होइये महाराज!सच्चे मन से जो अपनी भूल पर पश्चाताप करता है ,उसे अवश्य क्षमा मिलती है .यह संसार दुखों का आगार है .जितने लोगों को शान्ति और सन्तोष पहुँचा सको ,पहुँचाओ.अहिंसा,त्याग और प्राणिमात्र के लिये करुणा .संसार में इससे बढ़ कर कुछ नहीं .
भन्ते -मुझे अपनी शरण में लीजिये !मैं प्रण करता हूँ कि इसी क्षण से मैं हिंसा से विरत रहूँगा और अपनी सामर्थ्य भर जन की सुख-शान्ति का विधान करूँगा .मुझे स्वीकार कीजिये ,अपने चरणों में स्थान दीजिये .
[अशोक घुटने टेकता है,उपगुप्त सिर पर वरद- हस्त फैलाता है.पृष्ठभूमि से स्वर 'बुद्धं सरणं गच्छामि ,धम्मं सरणं गच्छामि ,संघं सरणं गच्छामि !]
*
(क्रमशः)

5 टिप्‍पणियां:

  1. स्वार्थ सिध्ह करने वालों की न पहले कमी थी न आज है .....बस
    उनके रूप बदल गए हैं.....

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  2. सुन्दर सार्थक संदेशपरक प्रस्तुति स्वार्थ तत्व पर कटाक्ष करती हुई

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  3. जब जब धर्म की हानि होती है परमात्मा किसी न किसी रूप में धरती पर आते हैं..सागर-संगम के इस सुंदर बोध परक अंक के लिए बधाई

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  4. लोक भाषा का लालित्य भी देखते ही बनता है सुन्दर सागर संगम।

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  5. बेहद सांगीतिक रचना रूपक परिधान पहने हुए।

    नेह के रथ से मिले
    संकेत अमलतास के
    लौट आए टहनियों के
    लालनीले
    पंख वाले दिन

    शुक्रिया आपकी ंरचना का लोक भाषा को आप पोषित करती रहें।

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