बुधवार, 20 मार्च 2013

एक थी गौरैया .


*
 एक छोटी-सी गौरैया थी.उसे एक द्यूल मिला - (पता है द्यूल क्या होता है? चने की दाल का एक दाना.)
वह बड़ी खुश हुई .और उसे खाने के लिये चक्की के खूँटे पर जा कर बैठ गई .खूँटा फटा हुआ था .उसकी चोंच से द्यूल एकदम गिरा और खूँटे की दरार में जाकर फँस गया.
चिड़िया खूँटे से कहने लगी ,'मेरा द्यूल दे दो .'
खूँटा बोला 'अरे वाह, मैं क्यों दूँ ,तुम मुझ पर चढ़ कर बैठीं .तुमने गिराया .मैं काहे को दूँ ?'
चिड़िया बढ़ई के पास गई ,'बढ़ई, बढ़ई खूँटा चीर. खूँटा द्यूला दे नाहीं, मैं चब्बऊँ क्या?(चिड़िया हैं न ,ऐसे ही बोलती है ,चबाऊँ को चब्बऊं कहती है )
बढ़ई हँसने लगा ,'अरे जा ,जरा से द्यूल के पीछे मैं खूँटा चीरूँ .भाग जा यहाँ से .'
उसे बुरा लगा वह राजा के पास गई,'राजा,राजा ,बढ़ई दंड,बढ़ई खूँटा फाड़े नाहीं, खूँटा द्यूला दे नाहीं ,मैं चब्बऊँ क्या?'
राजा ने कहा ,' राज के इतने काम करने हैं और मैं बेकार में बढ़ई को दंड देने लगूँ ,
यहाँ शोर मत मचाओ ,कहीं और जाओ .'
परेशान हो कर चिड़िया रानी के पास गई ,'रानी,रानी, राजा रूठ .राज बढ़ैया डाढ़ै नाहीं  ,बढ़ई खूँटा फाड़े नाहीं,' खूँटा द्यूला दे नाहीं मैं चब्बऊँ क्या?'
'वाह री चिड़िया ,मैं क्यों  राजा से रूठूँ ,मुझे कोई और काम नहीं क्या ? '
क्या करे, बेचारी छोटी- सी गौरैया!
तब उसे चूहे की याद आई .उसके पास जाकर बोली ,'चूहे,चूहे ,रानी के कपड़े काट .रानी राजा रूठे नाहीं राज बढ़ैया डाढ़ै नाहीं  ,बढ़ई खूँटा फाड़े नाहीं,' खूँटा द्यूला दे नाहीं, मैं चब्बऊँ क्या?'
चूहे को बड़ा मज़ा आया बोला,' जरा सी गौरैया ,नन्हा सा द्यूल .बेकार सबसे कहती फिर रही है .कुछ और ढूँढ कर खा ले .'
परेशान हो गई , सोचने लगी क्या करूँ अब ?
एक हाथी उसे अपनी पीठ पर बैठने देता था .चलो उसी के पास चलें उसने सोचा .
गई . हाथी ने पूछा क्यों रोनी शकल बनाए है तू ?'
उसने वही बात बता दी, 'हाथी,हाथी ,चूहे को दबा ,चूहा कपड़े काटे नाहीं, रानी राजा रूठे नाहीं, राज बढ़ैया डाढ़ै नाहीं ,बढ़ई खूँटा फाड़े नाहीं,' खूँटा द्यूला दे नाहीं मैं चब्बऊँ क्या?'
'अरे, इतना हबड़ा मैं,बेकार में चूहे को दबा दूँ . जरा सी बात के लिये  परेशान कर दिया . किसी और से कह जा के .'
इतने में उसे तेज़ी से जाती हुई चींटी दिखी. बस, उड़ कर पहुँच गई उसके पास .
'ओ चींटी ,मेरा एक काम कर दे.' 
चींटी रुकी,' क्या?'
' ज़रा देर को हाथी की सूँड़ में घुस जा .'
'क्यों ?हाथी ने क्या बिगाड़ है तेरा?'
' वह मेरा काम नहीं कर रहा है. हाथी चूहा दाबै नाहीं ,चूहा कपड़े काटे नाहीं, रानी राजा रूठे नाहीं, राज बढ़ैया डाढ़ै नाहीं ,बढ़ई खूँटा फाड़े नाहीं, खूँटा द्यूला दे नाहीं मैं चब्बऊँ क्या?'
'नहीं ,सूँड़ के अंदर बिलकुल अच्छा नहीं लगता.गीला-गीला है वहाँ ,हवा भी नही आती.'
बड़ा गुस्सा आ रहा थी चिड़िया को, भूखी तो थी ही, 'अच्छा ,मत घुस. अभी तुझे ही खा जाती हूँ .'
वह चोंच खोल के बढ़ी.
चींटी डर गई .भाग के कहाँ जाती .चिल्ला पड़ी ,'नहीं, मुझे मत खाओ , अभी जा रही हूँ .हाथी की सूँड़ में घुसती हूँ .'
गईं दोनो हाथी के पास .
दोनों को साथ देख हाथी घबराया .उसे पता था एक बार एक हाथी की सूँड़ में चींटी घुस गई थी .उसके रेंगने से वह इतना दुखी हुआ कि सूँड़ पटक-पटक कर बेहोश हो गया था.
वह तैयार हो गया ,'अरे चींटी बहिना , मैं तो गौरैया से हँसी कर रहा था .चलो अभी चलता हूँ .कहाँ है चूहा?'
चूहे ने हाथी पर बैठी गौरैया को आते देखा. बुरी तरह डर गया 'अरे हाथी दादा, तुम आराम करो ,मैं जा रहा हूँ रानी के कपड़े काटने .'
रानी ने चूहे के साथ उसे को आते देखा .समझ गई बोली ,'नहीं चूहे मुन्ना ,इतने मँहगे कपड़े काटना मत! मैं अभी राजा से रूठती हूँ .'
इतनी देर में राजा खाना खाने अंदर आया था ,उसने देखा रानी रूठने की तैयारी कर रही है .
चिड़िया खिड़की पर बैठी थी .उसे याद आ गया .झट से रानी से बोला ,'तुम कितनी अच्छी हो ,तुम्हारी बात ज़रूर सुनूँगा .कहाँ है बढ़ई? बेचारी छोटी-सी गौरैया का काम नहीं कर रहा है ,अभी दंड देता हूँ .'
 वह दौड़ कर पहुँची बढ़ई को बुलाने .
'चलो राजा ने बुलाया है .'
'क्यों?'
 'चलो तो ,अभी पता लग जाएगा !.'
वह खूब खुश थी .बढ़ई समझ गया.
जाकर राजा से बोला ,' राजा जी, मैंने तो इस छुटकन्नी से हँसी में कहा था.ये ग़लत समझ गई .चलो गौरैया रानी ,अभी खूँटा चीर देता हूँ.
उसने उठाई कुल्हाड़ी और चल दिया गौरैया के साथ. पहुँचे खूँटे के पास . 
बुरी तरह घबरा गया खूँटा .एक दम द्यूल निकाल के सामने रख दिया .
'मैं क्या करूँगा द्यूल का मैं तो कुछ खाता नहीं .ले जा ,चिड़िया बच्ची .' 'बढ़ई बाबा,आप भी आराम कीजिये .'
गौरैया ने अपना द्यूल चोंच में रखा और फुर्र से उड़ गई. 
*(बचपन की याद)

19 टिप्‍पणियां:

  1. हम्म ..मतलब सीधी उंगली से घी नहीं निकलता तो .....

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  2. बहुत मजेदार कथा। शक्तिशाली बने बिना कोई पूछता नहीं है।

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  3. बहुत बढ़िया प्रस्तुति-
    आभार आदरेया -

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  4. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  5. कहानी पढ़कर मजा आ गया..आभार!

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  6. बहुत ही सुन्दर बल कथा,इसे बचपन में गीत के रूप में गाया करते थे.
    "स्वस्थ जीवन पर-त्वचा की देखभाल"

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  7. आदरणीया, आपकी लेखनी में जो जादू है वह अब कम ही देखने को मिलता है। आपको श्रद्धा से मेरा नमन! इसे स्वीकार करें। आपके आशीर्वाद का इच्छुक हूं। आशा है आप वंचित नहीं करेंगी।
    http://voice-brijesh.blogspot.com

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  8. दो तीन बाते कहूंगा इस सम्बन्ध में ; एक तो कहानी बहुत सुन्दर और प्रेरक है और आपने सुनाई उसी दादी माँ और नानी माँ वाले अंदाज में है :) दूसरी बात यह कि जैसा कि शिखा जी ने कहा सीधी उँगली से ..... तीसरी बात यह है कि आज हमारे देश को इस कहानी से सबक लेने की बहुत आवश्यकता है, ख़ास कर हमारे प्रधान मंत्री जी को की इंसान ठान ले तो कुछ भी असंभव नहीं है चाहे वो कोलीशन गवर्नमेंट ही क्यूं न हो :)

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  9. आपकी रचना निर्झर टाइम्स पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें http://nirjhar-times.blogspot.com और अपने सुझाव दें।

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  10. बहुत सुंदर कथा वाह वाह हमारे प्रशासन पर भी बिलकुल फिट बैठती है कमजोर की कोई नही सुनता घी सीधी उँगली से नही निकलता जुगत लगानी पड़ती है|इस सुंदर कथा और होली की बधाई आपको

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  11. रोचक .... पर यह कहानी तो चूहे से होती हुई बिल्ली , कुत्ते डंडे , आग , पानी , हाथी और चींटी तक जाती है ....बचपन में सुनी कहानी याद करा दी ।

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    1. ये तो कहानी है ,पूँछवाली पंक्तियाँ पकड़ कर चाहे जितना लंबिया दें -क्या फ़र्क पड़ता है!

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  12. बहुत सुंदर बाल कथा..;आनंद आ गया

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  13. मन में थान लो तो सब कुछ लिया जा सकता है ...
    सही सीख देती है आपकी कहानी ... रोचक अंदाज़ से कही है कहानी आपनी ...

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  14. गिरिजेश भाई का धन्यवाद, इधर का रास्ता दिखाने के लिये:)

    ये कहानी पहले सुनी नहीं थी, आनंद आ गया।

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