मंगलवार, 20 सितंबर 2011

एक थी तरु - 34. & 35.


34.
कभा-कभी जब कुछ करने को नहीं होता मन जाने किन पुरानी गलियों में भटक जाता है .एक से एक बेमेल स्मृतियाँ ,कोई तुक नहीं जिनकी आज के जीवन से ,अनायास जाग उठती हैं .
एक हरषू था .आज सड़क पर  जाते एक लड़के को  देख कर लगा वही जा रहा है .नहीं वह कहाँ .दस साल पहले की बात है अब कहाँ वह नितांत अनुभवहीन ,दुनिया भर की उत्सुकता आँखों में समेटे  लजाता-सा युवक .
समय के साथ अधेड़ तो हो  गया होगा ही और परिस्थितियाँ ऐसी कि और दस साल बड़ा लगता हो तो ताज्जुब नहीं .,
वही हरषू जिसने अपनी चाची से कहा था ,'चाची ,ये तरु बी.ए. का फ़ारम भऱ रही है ...ये पढ़ेगी  इम्तहान में बैठेगी ..'
उसकी आँखों में ईर्ष्या की कौंध देखी थी तरु ने  .
वह लड़का था . उसे लगता होगा ज़रूरत उसे अधिक है पढ़ने की ,बढ़ने की आगे का रास्ता बनाने की और तरु तो लड़की है शादी हो जायेगी क्या करेगी डिग्री का ?
.पर उसे कोई सुविधा नहीं मिली आगे पढ़ना एक सपना बन कर रह गया .चाचा इतना खर्चा क्यों करेंगे उस पर .दसवीं पास कर रह जायेगा .
हाँ ,मैं लड़की हूँ .
- पर मैं ..मैं..नहीं पढ़ती तो ?
कैसा होता जीवन .बिलकुल परवश.कुछ नहीं कर पाती ..कहीं ब्याह दी जाती -घुट जाती बिलकुल .कुंठित ,वर्जित ,विवश ,
जैसे अम्माँ !कितनी बेबस थीं वे !बेबस कोई  होता नहीं बना दिया जाता है -शुरू से ,कि  स्वतंत्र व्यक्तित्व विकस ही न पाये ,जैसा चलाया जाय बस उतना ही.सारी ऊर्जा घुट-घुट कर नकारात्मक हो जाय चाहे .हताशा का ओर-छोर नहीं ,उबरने का कहीं  रास्ता नहीं .
दोष उन स्त्रियों का नहीं जिनकी क्षमताओं को नकार दिया सबने ,अपने ही खाँचों  में फ़िट करने के लिये  .बस गृहस्थी की गाड़ी घसीटते उसी लीक पर चलना है तुम्हें .ऊपर से अपेक्षा कि सहज-समान्य बनी रहो. जिनके लिये सारे रास्ते बंद हो .,कैसा लगता होगा उन्हें ? .अम्माँ  की तरह !
अम्माँ की यादें ऐसी मनस्थिति के साथ लगी चली आती हैं.
उनकी की मृत्यु से कुछ सप्ताह पहले तरु भाई के घर गई थी .उसे लग रहा था भाभी पर बहुत बोझ पड़ गया है ,कुछ सहायता पहुँचा सके और अम्माँ के साथ कुछ दिन बिता ले .
उस दिन कामवाली नहीं आई थी .झाडू-पोंछा ,चौका-बर्तन सब पड़ा हुआ था .रीना वैसे ही व्यस्त है ,चलो मैं ही करवा दूँ - सोचा तरु ने और लग गई .
चौके में झाडू लगाते समय पटे के नीचे ढँका कुकर का पुराना एल्यूमीनियम का डिब्बा झाडू के धक्के से बाहर खिसक आया .
'अरे, ये कल सुबहवाले कढ़ी-चावल यहाँ किसने मिला कर रखे हैं ?कुत्ते  को डालने के लिये दिये रखे होंगे' ,तरु ने सोच लिया .उसने डब्बा वहीं खिसका दिया .
 बाद में जब  नहाकर निकली तो  देखा अम्माँ घिसटती हुई चौके में पहुँच गई हैं और और पटे के नीचे  से वे बासे कढ़ी-चावल निकाल कर वहीं जमीन पर बैठ कर खाने लगी हैं.
 'अरे अम्माँ ,ये क्या खा रही हो ?'
 'अमाया ऐ---बअ जाआ ऐ ,वो अहीं अक ऐती हैं ---.'
 अम्माँ अब रुक-रुक कर ऐसे ही बोल पाती हैं .सुबह से उनने कुछ खाया नहीं था .
 पूछने पर रीना ने कहा था ये कुछ समझती नहीं ,इन्हें कैसे खिलाना- रखना है मुझे पता है .नहीं तो पेट भराब हो जाये तो कौन समेटता फिरेगा !
 स्तब्ध तरु देख रही है ,जिसे देख कर ही खाने की इच्छा खत्म हो जाये ,कितनी भूख के बाद वह गले से उतरता होगा !
कितना तरसी होंगी ये ,कैसे गु़ज़रे होंगे इनके दिन .कितनी शौकीन थीं स्वादिष्ट चीजें बनाने की - खाने और खिलाने की!
 शाम को तरु ने अपनी लाई मिठाई में से दो पीस फ्रिज में से निकाले और लाकर अम्माँ को पकड़ा दिये .
रीनी ने खाते देख लिया ,बोली ,'दीदी, हमारा इतना बस नहीं कि इतना सब इन्हें खिलायें .बेकार आदतें बिगा़ड रही हो .'
 क्या कमी है इस घर में ?क्या नहीं बनता यहाँ ?पर हाँ ,घर तुम्हारा है मैं कौन होती हूँ किसी से कुछ कहने- करनेवाली !
 यहाँ तो शुरू से ही यह चल रहा है .कभी कोई बात होने पर रीना फट् से कहती है ,'इनने हमें क्या दिया ?'
ठीक है ,इस दुनिया में अपनापन ,लिहाज ,संबंध सब खोखले शब्द हैं।पहले इस हाथ से ले ले तब उसी हिसाब से उस हाथ से दे .
यहाँ किसी से कुछ कहना बेकार है ,तरु जानती है नहीं तो बहुत कुछ सुनने को मिल जायेगा .शादी के पहले इन के पति ने जो कमाई की थी उसे किस-किस पर कितना खर्च किया, इन्हें तो इसका भी हिसाब रखना है और जितना हो सके उसे बराबर कर लेना है .
उस दिन सबके साथ खाने बैठ कर  तरु उन कौरों को कड़वे घूँटों की तरह हलक से उतारती रही।

  फिर उनकी मृत्यु की सूचना आई थी .
चलो, अच्छा हुआ मुक्ति पा गईं वे .यहीं के यहीं प्रायश्चित हो गया .
ओ माँ ,चलते समय कोई भी बोझ तुम्हारी छाती पर नहीं रहा होगा ! सब धुल-पुँछ गया .कोई पछतावा लेकर नहीं गई होगी तुम !
विश्राम करना ,निश्चिन्त होकर माँ ,और निर्मल स्वच्छ मन लेकर फिर आना तुम !
जाने कितनी विवशताओँ से कुण्ठित अपनी जो ममता अपनी संतान को नहीं दे पाईं, फिर आकर स्नेह से सींच देना ।औरों का मैं नहीं जानती लेकिन मेरा तृषित मन तुम्हारी प्रतीक्षा करेगा .तुम्हारे अन्तर्मन में भी कुछ खटक रह गई होगी- अपने बच्चों पर अपना ममत्व लुटाये बिना तुम भी कहाँ चैन पाओगी !
हमने जाने में - अनजाने ,गुस्से में या  रिक्त मन  में घुमड़ती असंतोष की अभिव्यक्ति के कारण ,जो अनुचित किया हो उसे भी क्षमा कर देना माँ ,,सोच लेना कि इतनी बुद्धि हममें विकसित नहीं हो पाई थी !
मन ही मन कहती है तरल - इस नाम और रूप की मूल निर्मिति तुम्हारी है .जीवन के प्रति जो दृष्टि विकसी है इसके मूल में भी कहीं तुम हो ! आज मैं जो हूँ तुम्हारी देन है .तुमसे भिन्न कर इसे देखना संभव नहीं .

 और मन की उद्विग्नता जब असहनीय हो उठती है तब अपने भीतर किसी को पुकारती है तरु ,कहती है -ओ मेरे अंतर्यामी ,जीवन का जो ज़हर मेरे हिस्से में आया है उसे पचाने की सामर्थ्य देना !तुमने जो दिया, मुझे स्वीकार , पर उसे अंत तक निभा सकूँ ऐसी  क्षमता भी तुम्हीं  प्रदान करते रहना !
*
विपिन की खोज-ख़बर लेती रहती है तरल .

उसके माता- पिता रिटायर हो गये, अपने गाँव में रहने चले गये हैं वे लोग.
इलाज  चल रहा है  . बिलकुल नॉर्मल नहीं हो पाया अभी तक .दाहिने हाथ की  सूजन बड़ी मुश्किल से कम हुई है ,अब भी किसी  मौसम में दर्द होने लगता है .सूजन भी बढ़ जाती है और  उठा नहीं पाता हाथ.कभी-कभी एकदम उत्तेजित हो जाता है . यहाँ के  वातावरण से दूर रहना ही उसके हित में है .
नहीं ,तरु नहीं जा सकती उसे देखने .
नहीं तो फिर वही सब घिर आयेगा उस पर ,उत्तेजना नुक्सानदेह हो जायेगी .कहीं फिर दिमाग़ पर वही सब चढ़ गया या अवसाद में लौट गया तो !
 नहीं   .चिट्ठी-पत्री करने की भी ज़रूरत नहीं ,असित का कहना है जिस स्थिति से निकालना है उससे बच कर रहना ही ठीक होगा .लिखने- पढ़ने से तो वही सब फिर उभर आयेगा .दिमाग़ पर और ज़ोर पड़ेगा .नहीं ,उसे वहीं रहने दो ,यहाँ क्या बचा है उसके लिये !इसी में उसका भला है .
 हाँ ,इसी में उसका भला है !
34.
दिन बड़े खाली-खाली से हो गये हैं  -बड़े उचाट से !
लगता है करने को कुछ नहीं ,एक बँधा हुआ  ढर्रा चलता जा रहा है .समय बीतता चला जा रहा  है.  .
चंचल एम.ए. में आ गई है.असित ने बड़े-बड़े मंसूबे पाल रखे हैं - मेरी बेटी ये बनेगी ,वो बनेगी .
तरु को हँसी आती है .पहले यह भी तो देख लो बेटी का झुकाव किस ओर है .
असित का कहना है अभी शादी की क्या जल्दी है ,उसे कुछ बन लेने दो
.तरु कुछ और सोच रही है .लड़की अपना केरियर बनाना चाहे तो इन्तज़ार किया जाय नहीं तो सही उम्र पर विवाह ठीक.जीवन के उल्लास और उमंगें उम्र के बढ़ने साथ ,  कभी-कभी दूध में उफान की तरह बैठने लगती हैं .सही उम्र से उसका मतलब है बीस से तेईस तक-लडकियों के मामले में .लव मैरिज पर उसका विश्वास नहीं.खास कर नई उम्र की लडकियाँ .जो दुनियादारी के अनुभव से बिल्कुल कोरी हों,इस मामले मे भावुकता  या कोरे आदर्शवाद से भर निर्णय ले लेती हैं फिर उम्र भर पछताती हैं .
 "आज की दुनिया बड़ी खराब है ." वह असित से कहती है ,"फिर हमारे सामने ही ,चंचल भी सेटल हो जाय तो निश्चिन्ती हो ."
 अन्दर वाले कमरे में चंचल  पढ रही है,बाहरवाले में असित और तरु हैं.उनकी बातों के कुछ अंश उसके कान तक आ जाते हैं .
असित ने आवाज देकर इनलैंड लाने को कहा .
'अच्छा तो कहीं चिट्ठी लिखी जा रही है '! कौतूहल से ,कुछ देर वहीं खडी रही .फिर लौट गई .

 चंचल की कुछ साथिनें ब्याह गईं ,कुछ  विभिन्न प्रतियोगिताओं की तैयारी, और कुछ निरुद्देश्य पढ़ रही हैं.
विवाह की बात उसके मन मे पुलक भर देती है .घर में अब यह चर्चा  होने लगी है .
 कान लगा कर बाहर की बातें सुनने की कोशिश करती है .एकाध शब्द के अलावा कोई कुछ बोल ही नहीं रहा .
वैसे तो पापा बार-बार मम्मी से  पूछते हैं 'क्या लिखें ?'और मम्मी बताती हैं. दोनों सलाह -मशविरा करते हैं  .आज इतने चुप कैसे हैं ?
उसे ताज्जुब हो रहा है .....हो सकता है मन्नो मौसी को लिख रहे हों. उनकी तबीयत खराब थी ,आपरेशन होना है .वे चाहती है हिन्दुस्तान से कोई कुछ महीनों के लिये उनके पास चला जाय .हाँ, मम्मी जा सकती हैं .पर वहाँ का इन्लैंड थोड़े ही लिखा जायेगा .
 उँह ,उसने सोचा अभी लिख कर रख देंगे तब देख लूँगी .चिट्ठी के मामले में पापा बडे आलसी हैं,एक तो उनकी चिट्ठी एक बार में पूरी होती नहीं और फिर दो-तीन दिन से पहले डाक में नहीं जाती .
 फिर भी उसका मन नहीं माना ,तो किताब उठाने बहाने फिर वहाँ जा घुसी .रैक पर किताबें खड़बड़ करती रही -शायद कुछ शब्दों को पकड़ कर मतलब समझ में आ जाय .
 कोई कुछ नहीं बोल रहा .किताबें उठाने में भला कतनी देर लगाई जा सकती है !फिर अन्दर आ गई पर उसके कान उधर ही लगे हैं .
 असित की आवाज  ,"देखो ठीक है ."
 "हाँ और क्या ?" कुछ देर में मम्मी की आवाज .
 अजीब बात है .घूमकर आये दोनों जने और चिट्ठी लिखने बैठ गये .ऐसी क्या जरूरी थी .वैसे तो मम्मी दस बार रटती हैं तब दो-चार दिन टाल-मटोल कर लिखते हैं
.---ऊँह होगा ,मुझे क्या ?
 पर किसी तरह चैन नहीं पड़ रहा , अन्दर सुगबुगाहट हो रही है  - लिखा किसे है ?क्या लिखा है ?कुछ मुझसे संबंधित है ?--कहाँ के लिये हो सकती है ?वह लाख सिर मारती है ,कुछ समझ नहीं आता .न बेकार कमरे में जाना ठीक लग रहा है ,न कुछ पूछना -चंचल परेशान है .
 एक बार सोचा पापा को आवाज़ देकर कहे बंबई चिट्ठी लिख रहे हों तो मैं भी लिखूँगी जीजा जी को .मन्नो मौसी की बेटी आज कल वहीं है न .पर कहने की हिम्मत नहीं पडी .डर लगा मम्मी टोक देंगी ,"पढ़ रही हो या इधर  ध्यान लगाये हो /"
 चंचल फिर पानी पीने निकली .असित अब चिट्ठी मोड़ रहे हैं .
 "पता तो लिखो तरु ने कहा ."
 हाँ ,वहीं  जा रही है -चंचल समझ गई .
 फिर तरु की आवाज आई ,"पीछे अपना पता भी पूरा लिख दो ."
 "रहने दो ,वे गेस करें ."
 अब रहा नहीं गया चंचल से. बाहरवाले कमरे में फिर आ गई ,"पापा ,कहाँ चिट्ठी लिखी ?"
बढ़ कर चिट्ठी उठा ली उसने  ,"अच्छा ,जीजा जी को लिखी है !लाइये हम अपना नाम लिख दें पीछे ."
 "नहीं,नहीं ,तुम अलग लिखना ." असित ने फौरन टोका .उन्होंने पीछे अपना पता भी लिख दिया ..
 तरु अखबार की गड्डी लिये ,किसी खास तारीख का ढूँढ रही है .असित बाथरूम चले गये .चंचल ने धीरे से चिट्ठी उठा ली और दूसरे कमरे में घुस गई .
 चलो... मोड़ी है अभी ,चिपकाई नहीं है !
क्या करे ?कमरा बन्द कर ले ?पर इस समय कमरा बन्द करने की क्या तुक ?मम्मी समझ गईं तो ! रक्खी रहने दो यहीं ,रात में अभी काफ़ी देर जग कर पढ़ाई करनी है,मौका लग ही जायेगा .
  'अरे, जब लिख ही ली है तो डाल क्यों नहीं आते. सुबह निकल जायेगी  ? " तरु की आवाज आई.
 असित चिट्ठी ढूँढ रहे हैं
 "अभी तो यहीं रखी थी ,कहाँ गई ?"
 तरु झुक कर पीछे दीवाल की तरफ़ झाँकती है ,मेज पर रखी किताबें ,पत्रिकायें पलटती है ..
 "तरु ,तुमने उठाई ?"
 "नहीं ,मैंने नहीं उठाई .तुम पता लिख रहे थे तभी से मै तो अखबारों में वह तुलसी के उपयोग वाला लेख खोज रही हूँ .पता नहीं किस दिनके पेपर में था .पिछले हफ्ते आया था शायद .."
 इधर -उधर ढूँढ- खखोर मच रही है. फिर असित ने आवाज लगाई ,"चंचल ,तुमने चिट्ठी उठाई ?"
 चंचल धक् से रह गई .-अब क्या करे ?
 वह फौरन चली आई .
 "नहीं ,हमने नहीं उठाई ."
 "तुम मालिनी की चिट्ठी के धोखे में तो नहीं ले गईं ?"
 मालिनी उसकी फ्रेंड का नाम है .
 "मालिनी की तो ये पड़ी है ."तरु ने एक इन्लैंड उठाकर आगे रख दिया .
 "हमने उठाई ही नहीं,हम क्या करते उस का ?"
 "फिर गई कहाँ ?"
 फिर सब ढूँढा गया.अखबार हटा कर दीवान पर पड़ी चादर फटकारी गई .
 "यहाँ से कहां जायेगी ?तुम्हीं कहीं रख कर भूल गये हो."

 "मैं तो सिर्फ़ बाथरूम गया था.वहाँ क्यों ले जाता?"
 'मैंने तो छुई भी नहीं.'-तरल का तर्क.
 मेज़ की बिताबें फिर  उल्टी-पल्टी गईं,अखबार झाड़-झाड़ कर देखे गये.फिर तरु उठ कर अन्दर के कमरे  में गई.
वहाँ अल्मारी मे रखी मिल गई चिट्ठी.
 "क्यों,चंचल,तुमने ले जा कर रखी?"
 हड़बड़ा गई वह ,"हमने नहीं रखी ,मम्मी,"

 "तो और किसने रक्खी? मैं तो यहाँ से उठ कर कहीं गई नहीं.पापा बाथरूम गये थे , बस ."
 "हमें नहीं पता ."
 चंचल को देख कर असित मुस्करा रहे हैं.
 'तुम्हीं ने रखी होगी चिट्ठी के तो पाँव लग नहीं गये कि उठ कर चली जाती ."
 खिसियाहट के मारे वह रुआँसी हो आई ,"हमने नहीं रखी .हम क्यों रखते ?"
 "तुम यहाँ से कुछ सामान ले गईं थीं ?"
 "हाँ ,सामान तो ठिकाने से रख दिया था ."
 "अच्छा " तरु ने कहा ,उसकी हँसी स्पष्ट नहीं है ,."और सब सामान पड़ा रह गया ,ये मालिनी की चिट्ठी , ग्रीटिंग कार्ड ,गिलास ,चम्मच ,हेल्मेट , रूमाल और तुम सिर्फ़ चिट्ठी ठिकाने से रख आईं ?"
 "वाह क्या बात है !"
 असित हो-हो करके हँस पडे .
 "बेकार में ही --"खिसियाई चंचल कमरे से बाहर निकल गई
**
35.
 गीता में जिसे ' जल मे कमल पत्र - वत् ' कहा गया है ,वह स्थिति क्या ऐसी ही होती होगी जैसी आज मेरे मन की हो गई है !
तरु सोचती है,जिसे सुख कहते हैं वह सब कुछ है मेरे पास ,पर मन उसमें डूबता नहीं .कुछ पाकर  खुशी से नाच नहीं अठता .सबसे अलग-थलग रह जाता है . क्या यही कहलाती है निर्लिप्त मनस्थिति ?
अरे नहीं , कैसे हो सकती है मेरी वह स्थिति ?वह तो वैराग्य से उत्पन्न ,निस्पृहता से पुष्ट परम शान्तिमय स्थिति है ,जहाँ सांसारिकता की ओर प्रवृत्ति ही नहीं होती .और मेरा घोर सांसारिक, माया -मोह से आच्छन्न मन ! जिससे मेरा कोई मतलब नहीं ,उससे भी कहीं न कहीं से जुड़ जाती हूँ !
 लेकिन फिर भी ,हमेशा नहीं ,पर कभी-कभी लगता है ये सारे सुख,ये सारे दुख निरर्थक हैं .इनकी भोक्ता होकर भी मैं इनसे अलग रह जाती हूँ ,असंपृक्त!.
वहाँ जहाँ मैं हूँ सिर्फ़ ,और कुछ नहीं  .सबसे अलग, निर्लिप्त .सुख- नहीं ,दुख नहीं ,राग नहीं ,द्वेष नहीं ,अपना नहीं, पराया नहीं .कैसी विलक्षण है वह अनुभूति जिसे व्यक्त नहीं कर पाती .वहाँ ये चीज़ें बहुत छोटी ,बहुत सतही रह जाती हैं.कैसी है वह अनुभूति जहाँ मै भोक्ता होकर भी साक्षी रह जाती हूँ .निन्दा-स्तुति ,उचित-अनुचित,पाप-पुण्य की सीमायें कहीं पीछे रह जाती हैं और मैं सबसे तटस्थ !
वह क्या है जो मुझे सबसे दूर कर देता है ?कोई प्रश्न जहाँ नहीं ,ऐसी स्थिति में मन कभी-कभी कैसे पहुँच जाता है !बस यही बोध शेष रहता है कि जो करना है वह करना है,उससे कहीं निस्तार नहीं .
- मन की जड़ता है क्या, या रिक्तता का बोध?
 पर अकेली कहाँ हूँ मैं ?हर जगह सब से जुड़ी. हुई .हर्ष -शोक ,हानि-लाभ सभी कुछ तो औरों से जुड़ा  है .फिर मेरा अपना है क्या ?

 गीली घास पर नंगे पाँव कब से चले जा  रही है .
.
विपिन के जाने के बाद तरु की अन्यमनस्कता और बढ़ गई है .
 उम्र का कितना रास्ता पार कर आई केशों मे झलकती सफ़ेदी और आँखों से बारीक चीजों का न दिखाई देना. चश्मा जरूरी होता जा रहा है .
 पर क्या उम्र को सिर्फ वर्षों से ही मापा जा सकता है अनुभवों से नहीं ?
 अपने विगत पर विचार करती है तो लगता है यह जीवन निष्फलताओं का दस्तावेज़ है .जो करना चाहा कभी न हो सका .संभव है इसीलिये इतनी रिक्तता भर गई है .
 वह मन ही मन कहती है ,'मैं तुम्हारी आभारी हूँ असित ,कि तुमने मुझे प्यार किया ,मेरा साथ दिया ,कितनी बार ,'कैसे तर हैं  तुम्हारे बाल,जिस करवट लेटती हो उधर के !कितना पसीना ..इतनी गर्मी तो नहीं है,'  कहते हुये,नीम अँधेरे में अपने से सटा कर 'तुमने मेरे आँसुओँ का गीलापन पोंछा है.

पर मैं तुम्हारे साथ अभिन्न कहाँ हो सकी . मुझे क्षमा करना .मैं निरुपाय हूँ .मैंने जो किया उसका परिणाम मुझे ही भोगना है .उसके बिना मेरा निस्तार नहीं .वहाँ मैं बिल्कुल अकेली हूँ .तुम भी मेरे साथ नहीं  .मैं विवश हूँ इन विषमताओँ को झेलने के लिये .जिस अन्याय में मेरा साझा है उसका दण्ड मुझे ही भोगना है -अकेले ,तुमसे अलग . अपने ही ताप से दग्ध  .मेरी समझ में नहीं आता ,मुझसे जो हुआ ,उसका निराकरण किस प्रकार करूँ !
 मैं क्या थी ,क्या हूँ,और क्या हो जाऊँगी .मुझे खुद पता नहीं .जीवन की कटुताओँ का तीखापन जिसमें समा गया है,वह तरु . .,कितने-कितने अभिशाप जिसके पल्ले में बँधे हैं वह तरु ,सब कुछ पाकर भी जो  मन से वंचित रह गई है .निरर्थक  जीवन जीनेवाली तरु !

कभी-कभी कितनी ऊब लगती है.इच्छा होती है चली जाय कहीं जहाँ यहाँ का कोई न हो .न विपिन न असित, न नाते-रिश्ते ,और कोई स्मृति नहीं .कोरा हो जाय मन बिलकुल - कुछ दिनों को ही सही!
..कहीं अजाने देश की धरती पर ,अनजाने लोगों के बीच जहाँ न कोई अपना हो ,न पराया .एक नई यात्रा की शुरुआत करने .
पर वहाँ भी आज तक के जीवन को नकारा जा सकेगा क्या ?आज तक के संबंधों की अब तक की स्थितियों की जो परिणतियाँ , और  परिष्कृतियाँ  मेरे निजत्व में समाहित हो गई है ,उनसे छुटकारा हो सकेगा क्या ?

 तरु को लगता है वह बहुत थक गई है, अब रुक कर आराम करना चाहती है .
 कैसी विडंबना है ,वह जो जानती है उसे सिर्फ वही जानती है ,दूसरा कोई नहीं ,जान सकता भी नहीं .
        और लोग भी कैसी-कैसी धारणायें बना लेते  हैं .पर किसी का क्या दोष !    जल की सतह पर जो होता है वही तो दिखाई देता है सबको . डूबनेवाला ही जानता है अस्लियत तो.

.
 असित के दोस्त उससे कहते हैं ,"यार ,तुम लकी हो ."
घर -बाहर हर जगह निभाव कर लेती है ,तमाम बातों में दखल दे लेती है .उनकी समस्याओं को सुन कर सहानुभूति-सुझाव भी .लोगों को लगता है बौद्धिकता में उनसे  पीछे नहीं है .सिर्फ़ घर की औरत न होकर उसके सिवा भी बहुत कुछ है.

उनकी पत्नियां समझती हैं कि उसने जीवन मे बहुत सफलतायें पाईँ हैं.सफलता के भी सबके अपने-अपने माप-दण्ड.कोई किसी को नहीं समझ सकता.हँसी आती है कभी-कभी. .
"देखो ,तरु दीदी कैसे करती हैं." "तरु भाभी आप ग्रेट हैं ." " भई , हम आपकी तरह नहीं कर पाते "  ईर्ष्या की पात्र तरु !
 वह सुनती है और चुप रहती है .मन ही मन कहती है 'मेरी तरह कोई न हो इस दुनिया में .इतना अशान्त और उद्विग्न मन लेकर किसी को न जीना  पड़े !'
 इस प्रशंसा की ,असित जैसा पति और भरे-पुरे घर की स्वामिनी होने की सार्थकता उसके लिये क्या है ?और जिसे लोग उसकी कुशलता और सफलता रहते है ,उसे कहाँ तक लादे रहे - जब मन कहीं टिकता नहीं ,कुछ स्वीकारता नहीं,निर्लिप्त भटकता है ?
अब सहन शक्ति जवाब देने लगी है ,वह इस ज़िद्दी मन से भी छुटकारा पाना चाहती है,जो स्थितियों से पटरी बैठा लेना नहीं जानता ,जो किसी प्रकार चैन लेने नहीं देता .इस दारुण मन्थन से,चेतनायें श्रमित और,लड़ने की सामर्थ्य क्षीण हो चली है .मन ही मन कहती है ,'असित ,तुमसे जुड कर मैंने इस ज़िन्दगी को जिया कहाँ, बेगार सी टाली है .
यह उद्विग्नता और अशान्ति जब असह्य हो उठती है,तनी हुई शिरायें जब चटक कर टूट जाना चाहती हैं,तब उसके भीतर कोई जागता है ..उसे साधनेवाला ,चरम निराशा से उबारनेवाला .उन विषम क्षणों में संतप्त मन को चेताता है ,पूछता है ,'बस ,इतने में घबरा गईं?इसी बल-बूते पर संसार की अथाह वेदना को मापने का दम भरा था ?"
'नहीं मुझे कोई शिकायत नहीं  ,' वह अपने आप से कहती है , 'दुख तो मैने स्वयं माँगे थे ,और जैसा मेरा स्वभाव है शान्ति मुझे मिलेगी नहीं ,'

और मन की विश्रान्ति कुछ शान्त होने  होने लगती है .

तरु जब चलती है तो एक खूब चमकीला तारा उसके साथ-साथ चलता है .उसकी दृष्टि आकाश की ओर उठी .आज वह सितारा कहाँ चला गया ?वह सारे आकाश में खोजती है .घने पेडों की आड मे कभी-कभी वह छिप जाता है ,परउसकी झिलमिलाहट हिलते पत्तों की सँध से झलक ही जाती है .आज कोहरा है ,या इतनी देर हो गई है कि वह सितारा डूब गया है .
*


(क्रमशः)


5 टिप्‍पणियां:

  1. इस गद्य का प्रवाह आकर्षित करता है।

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  2. कितना सरस है अंश ३४! सच कहूँ, ऐसा कौतुहल सदैव मुझे भी रहा है। पापा के आगे-पीछे बहुत चक्कर काटे हैं, देखने के लिए कि लिखा क्या गया है।
    अंश ३५ में तरल की उद्विग्नता होने के बाद भी, असित का होना आश्वस्त करता है। सुखद है इस यात्रा का सहयात्री बन देखना।

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  3. मन बार बार चाहता है अभी भी कि... काश चंचल तरु और असित की संतान न होकर विपिन और लवलीन की बेटी होती..और उसे तरल अपना लेती।
    ख़ैर, मुझे दूसरा भाग बहुत सुखदायी लगा। इससे अधिक न कह पाऊँगी कुछ।हर बार पढ़ने पर मन भीग भीग जाता है ..शब्द गीले हो ही जाते हैं।

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