मंगलवार, 28 सितंबर 2010

विलक्षण अनुभव

आनेवाली घटनाओं का आभास कई बार मुझे हुआ है ।

मेरे सबसे बड़े भाई ज्ञानेन्द्र सक्सेना घर -परिवार को त्याग कर वाजपेयी जी के साथ संघ के सक्रिय कार्यकर्ता रहे थे ।लखनऊ से निकलनेवाले पाञ्चजन्य नामक पत्र का संपादन उन्होने कई वर्षों तक किया था (पाञ्चजन्य के इतिहास में उनका नाम अंकित है)।संघ के कार्यों के प्रति निष्ठावान रह कर उन्होंने विवाह से इन्कार कर दिया था और घर से उन्होंने कोई मतलब नहीं रखा ।बाद की स्थितियों मे संघ से उनका मोह भंग हो गया और वे विक्रम वि.वि. उज्जैन में अंग्रेजी के प्रवक्ता नियुक्त हो गये थे।हम लोगों के बहुत कहने पर वे विवाह के लिये तैयार हुये और 1959 में उनका विवाह हुआ पर दो महीनों के अंदर ही (भाभी जी की दूसरी बिदा भी नहीं हुई थी) स्टोव दुर्घटना में उनका स्वर्गवास हो गया।

मेरा विवाह हो चुका था और हम मुज़फ़्फ़रनगर में थे।जब उनके ववाह में गई थी उन्हें निमंत्रित कर आई थी कि मेरे घर ज़रूर आइयेगा। एक रात मुझे स्वप्न आया कि दादा आये हैं ,उनके माथे पर सुइयाँ चुभी हैं ,रक्त बह रहा है ।मुझे बड़ा दुख लगा ,उज्जैन से इतनी दूर मेरे भई इतने कष्ट में आये । रास्ते में कितने लोगों ने देखा होगा किसी से यह नहीं हुआ कि सुइयाँ निकाल कर दवा लगा दे ।इतने में नींद खुल गई और फिर मैं सो नहीं पाई ।दोपहर बाद ख़बर आ गई कि ज्ञान दादा नहीं रहे ।

पहले मेरे साथ अक्सर यह होता था कि स्वप्न में मै अक्सर ही किसी कक्षा में न जाने कौन सी भाषा में धारा प्रवाह बोलते -बोलते अचानक जाग जाती ,जागते जागते भी कुछ शब्द मुँह से निकलते रहते थोड़ी देर वह भाषा ध्यान में रहती थी फिर सब भूल जाती थीकई बार मेरे पति पूछते हैं तुम किस भाषा में इतने लंबे-लंबे वाक्य बोल रहीं थीं । मुझे ऐसा भी लगता है कि बहुत सी बातें मैंने जानी हैं मेरा मस्तिष्क समझता है पर क्या हैं वह अस्पष्ट रह जाता है.

विचित्र देवालयों में घूमती हूँ । एक बार सागर के किनारे बहुत रमणीय परिवेश में लक्ष्मीजी सक्षात् मेरे सामने खड़ी थीं ,मैं उन्हें देख कर सोच रही थी ये सागर-कन्या हैं इसलिये इनके तन की कान्ति श्यामल है ।उन्होंने मुझसे कहा ,'बोल ,क्या माँगती है ?' मैं विचार करने लगी धन ,पद ,यश सब समाप्त हो जानेवाली चीज़े हैं माँग कर क्या करूँगी मुँह से निकला,'जन्म-जन्मान्तर तक मेरी आत्मा का कल्याण कीजिये ।'

वे मुस्कराईं और बोलीं ,'अच्छा पुत्री, तो अब मैं चलती हूँ ।

'और ओझल हो गईं।

,मुझे याद है बचपन के वे स्वप्न ,जब श्री कृष्ण अपना पीतांबर फैला कर उड़ते- उड़ते गिरती हुई मुझे सम्हाल लेते हैं।और चतुर्भुजा देवी मेरे साथ खेलने आई हैं ,मैंने उनसे पूछा ये चार हाथ कैसे हैं ,वे मुस्कराईं और ऐसे ही है कह कर टाल गईं । लेकिन यह सब किसी को बताने की बातें नहीं हैं।कई बार बहुत सुन्दर स्वप्न आते हैं ,जैसे मैं ब्रह्मपुत्र के तट पर खड़ी हूँ और बंगाल की खाड़ी तक का सुरम्य दृष्य,ग्राम ,नगर ,वन ,पर्वत ,नदियों से युक्त प्रकृति का रमणीय मुक्त विस्तार मेरे सामने फैला है । बहुत आनन्द पूर्ण मनस्थिति में मैं उन्मुक्त विचरण कर रही हूँ ।

एक अनुभव तो बहुत विलक्षण है।मेरी बहुत घनिष्ठ सखी थी विशाखा ,उम्र में मुझसे कुछ साल बड़ी ।हम दोनो ने निश्चय किया था कि इस संसार से जो पहले बिदा ले वह दूसरी से संपर्क कर ले ।दुर्भाग्यवश विशाखा का देहावसान पहले हो गया ।मेरे पास सूचना आई तो मैंने मन ही मन कहा,अरे विशाखा, हम दोनो के बीच जो निश्चय हुआ था तुम मिलने की बात भूल कैसे गईं ?और रात को वह आई । स्वप्न में नहीं सच में वह मेरे समाप आई और बैठ गई ।हमलोग काफ़ी देर बातें करते रहे ।फिर मैंने कहा -विशाखा तुम तो चली गईं ,मेरे लिये कितना और समय शेष है।उसने बताया।और कुछ देर बाद वह चली गई ।फिर वह कभी मुझे नहीं दिखी।

कंप्यूटर पर ओ.ओ.बी.ई.खूब विस्तार से पढ़े।मन में बार बार प्रश्न उठने लगे पता नहीं मेरा अगला जन्म कैसा होगा ।एक रात मैंने अपने अगले जीवन की झलक पा ली।उस समय मेरी मनस्थिति जैसी गहन शान्ति और आनन्द से विभोर थी वैसा अनुभव अब तक कभी नहीं हुआ था।बहुत दिनों तक वह आनन्द मन में उदित होता रहा ।अब भी उसका कभी-कभी आभास हो जाता है।

1996 में मेरा एक्सीडेन्ट हुआ था।मेरी कुहनी की हड्डी तीन जगह से टूट गई थीऔर तीन महीने मेरा हाथ ऊपर की ओर कर के वहीं सधा रहे इसलिये डोरी बाँध कर ऊपर तान दिया गया था !हाथ को उसी स्थित में रखते हुये सारे कार्य संपन्न करना असुविधापूर्ण तो रहा पर हाथ को ऊपर ताने हुये सोना मेरे लिये वैसा कष्टकर नहीं रहा ।अक्र्सर ही जब मै सो जाती थी तो मुझे लगता था मेरा हाथ अत्यंत सुविधापूर्ण स्थिति में मेरे ऊपर रखा हुआ है कभी आदतन मेरा दूसरा हाथ उस हाथ को छूने की आवश्यकता अनुभव कर उस ओर पहुँचता था बस तब ही पता लगता अरे वह तो ऊपर बँधा हुआ है!

एकाध बार भयानक दुर्घटना से भी बची हूँ ,ऐसा लगा जैसे किसी ने सम्भाल कर एक तरफ़ कर दिया है !मुझे लगता है जैसे कोई मेरे साथ है जो विषम क्षणों में मुझे साधता है,सहारा देता है ।मुझे विश्वास है जब तक मेरा मन स्वच्छ रहेगा वह मेरे साथ रहेगा !
*

4 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन में हर कोई कई बार ऐसे रहस्यमयी स्थितियों से दो चार होता है मगर इसका जवाब कहीं से नहीं मिलता कि यह कैसे हुआ ...विज्ञान तो यह सुनने को ही तैयार नहीं ! हार्दिक शुभकामनायें !

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  2. Sateesh ji se ekdum sehmat...:)
    magar mujhe poora vishvaas hai...aapke likhe shabdon par..kyunki ye harf maine anubhav kiye hain......apne swapn sach hote bhi dekhe hain....aur shivalayon nadiyon mein bhinn bhinn devtaaon ke aage naman karti rahi hoon

    ..ishwar sada aapke sath rahein isi tarah..:)


    aur
    ...Vishakha ji aapki saheli hain..muaff kijiyega..''vishakha'' kahani mein maine unhe naam se sambodhit kar diya....sanshay ki sthiti to thi...ki waaqayi aapki mitr hain ya bas ek paatr.......:(:( galti ho gayi...sanshay ki sthiti mein to aur bhi naam nahin lena chahiye tha..''ji'' laga dena chahiye tha...:(

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  3. विशाखा को नाम से संबोधित किया तो क्या ,एक पात्र के रूप में ही तो! उचित है और स्वाभाविक भी.

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  4. nahin nahin..dar'asal....jo baat hai wo मैं व्यक्त नहीं कर पाउंगी यहाँ.....वो मेरी भूल हो गयी थी...बस ..उसे सुधारना ज़रूरी था !
    और आपसे आयु..ज्ञान...सबमें बहुत छोटी हूँ.....आप ''जी'' न लगाया करें कृपया......:(

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