लालित्यम्
ललित लेखन -गद्य .
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कहानी-कुञ्ज
भानमती का कुनबा.
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बुधवार, 11 दिसंबर 2019
जब अक्ल घास चरने निकल जाय...
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* रात के दस बजकर अट्ठावन मिनट हो चुके हैं ,मुझे उत्सुकता है यह जानने की, कि इस घड़ी में अंकों का रूप एकदम से कैसे बदल जाता है . हुआ यह क...
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बुधवार, 13 नवंबर 2019
मैं, अश्वत्थामा बोल रहा हूँ - 3.
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* द्वापर युग बीत गया. मानव के मान-मूल्यों के क्षरण की गाथा रच, मानव चरित्र का वह अद्भुत आख्यान,अपने अध्याय पूरे कर, छोड़ गया अंतर्चेतना के...
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बुधवार, 30 अक्टूबर 2019
अपनी अपनी पैकिंग -
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* बड़ा लोभी है मन ,कहीं सुन्दरता देखी नहीं कि अपने भीतर संजो लेने को उतावला हो उठता है. और तो और प्लास्टिक के सजीले पारदर्शी लिफ़ाफ़े जिस...
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रविवार, 20 अक्टूबर 2019
अक्ल की बाढ़
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* यह अक्ल नाम की बला जो इन्सान के साथ जुड़ी है बड़ी फ़ालतू चीज़ है. बाबा आदम के उन जन्नतवाले दिनों में इसका नामोनिशान नहीं था. मुसम्मात ह...
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मंगलवार, 27 अगस्त 2019
आस्थावान या आस्थाहीन?
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* मुझे याद है उन दिनों, की जब मोहल्ले के मंदिरों में सुबह-शाम झाँझ-मझीरे बजाकर आरती होती थी ,आस-पास के बच्चे बड़े चाव से इकट्ठे हो कर मँझ...
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शुक्रवार, 18 जनवरी 2019
मैं अश्वत्थामा बोल रहा हूँ (2) -
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* वही पुरातन परिवेश लपेटे ,लोगों से अपनी पहचान छिपाता इस गतिशील संसार में एकाकी भटक रहा हूँ .चिरजीवी हूँ न मैं ,हाँ मैंअश्वत...
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रविवार, 23 दिसंबर 2018
एक और काल --
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* 'पापा, खाना खाने आइये.' बच्चे ने आवाज़ लगाई . 'नहाय रहे हैंगे' उत्तर देता वयोवृद्ध नारी स्वर . मैं वहीं खड़ी थी ,सुन...
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