लालित्यम्
ललित लेखन -गद्य .
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कहानी-कुञ्ज
भानमती का कुनबा.
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रविवार, 18 जून 2017
मैं कौआ नहीं बनना चाहती
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* बाहर लान में खुलनेवाली हमारी खिड़की के शेड तले एक भूरी चिड़िया ने घोंसला बनाया है.अब तो अंडों में से बच्चे निकल आये हैं .चिड़िया दूर तक ...
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शुक्रवार, 5 मई 2017
ज्ञान की आँधी -
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* बाह्य संसार से जब कोई परेशान हो जाता है, उबरने का कोई रास्ता नहीं दिखाई देता तो उस झींकन के साथ उसके अंतःचक्षु खुलने लगते हैं.नई-नई ...
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सोमवार, 20 मार्च 2017
एक बार फिर ...
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* हे अपार करुणामय अमिताभ बुद्ध ,क्षमा करना -मैं एक मंद-मति नारी हूँ, जो नर के समान सहज मानव के रूप में तुम्हें भी स्वीकार्य नहीं थ...
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रविवार, 29 जनवरी 2017
लिये लुकाठी हाथ !
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* बहुत समय बाद कबीर भारत आये तो देश में अंगरेजी की शान देख कर चकित हो गये . गुण-गान सुनते रहे .... कैसा साहित्य -कैसी अधिकारमयी, ...
11 टिप्पणियां:
गुरुवार, 12 जनवरी 2017
मन की लगाम -
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* शाम को जब भ्रमण पर निकलती हूँ तो बहुत लोगआते-जाते मिल जाते हैं. अधिकतर फ़ोन कान से सटाये बोलते-सुनते चलते जाते हैं ,अपने आप में मग्न ....
5 टिप्पणियां:
शनिवार, 12 नवंबर 2016
पर मैं और क्या करती ..!
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* यहाँ अमेरिका में लोग जिस तरह अंग्रेज़ी बोलते हैं,कभी-कभी सिर के ऊपर से निकल जाती है. रोज़ शाम को टहलने निकलती हूँ.अड़ोस-पड़ोस में क...
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शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016
और मैं चुप !
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* 'नानी ,काँ पे हो...?' 'कौन है ?'अनायास मेरे मुँह से निकला, महरी बोली,'आपकी नतनी ,और कौन ?' वैसे मैं जानती ह...
17 टिप्पणियां:
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