लालित्यम्
ललित लेखन -गद्य .
(यहां ले जाएं ...)
कहानी-कुञ्ज
भानमती का कुनबा.
▼
मंगलवार, 25 नवंबर 2014
कथांश - 26 .
›
* वसु माँ के पास रुक गई थी. तनय का कहना था ,भइया अधिक छुट्टियाँ नहीं ले सकते .तुम्हीं रुक जाओ .माँ कुछ ठीक हो जायँ तो मैं ले जाऊँगा .मैंन...
9 टिप्पणियां:
मंगलवार, 18 नवंबर 2014
हे कृष्ण , यहाँ मत आना तुम !
›
* ओ कृष्ण ,तुम मत आना ! यहाँ मत आना तुम !! गला फाड़-फाड़ कर टेर रहे हैं जो पाखंडी ,अपन- स्वार्थी ,उनके शब्दों पर मत जाना. ये लोग अप...
13 टिप्पणियां:
गुरुवार, 6 नवंबर 2014
कथांश - 25.
›
* सुबह आँगन से आवाज़ दे कर मुझे चाय का कप पकड़ा दिया था सुमति ने . कोई विशेष बात-चीत नहीं हुई . दोपहर में मुझे थाली परोस कर दे गई . एक ...
7 टिप्पणियां:
शनिवार, 1 नवंबर 2014
कथांश - 24.
›
* रमन बाबू के 'माया-भवन' (माया उनकी पत्नी का नाम) में रौनक हो गई थी .विनय तो वहीं अपने स्नातकोत्तर कालेज में खुश थे अब पारमिता ...
9 टिप्पणियां:
शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014
कथांश - 23 .
›
* वसु की बिदा के बाद पापा ने मुझसे कहा था ,'मैं जा रहा हूँ ,अपनी माँ को भेजने की तैयारी कर रखना.' उनकी बात सुन कर चौंक गया ,मै...
11 टिप्पणियां:
सोमवार, 13 अक्टूबर 2014
कथांश - 22.
›
* वसु के विवाह की तारीख तय होने पर माँ ने कहा था 'मुन्ना, मेरा एक कहा मानेगा ? मेरी प्रश्नवाचक दृष्टि के उत्तर में बोलीं 'शादी में...
14 टिप्पणियां:
बुधवार, 8 अक्टूबर 2014
भूख का तमाशा.
›
* पीछे वाले क्रीक के दोनों ओर बाजरे जैसी कलगी वाली लंबी-लंबी घासें उग आई हैं.फिर ऊँचे पेड़ों की पाँत, साइकिल और पैदल वालों की लेन के ...
11 टिप्पणियां:
‹
›
मुख्यपृष्ठ
वेब वर्शन देखें