लालित्यम्
ललित लेखन -गद्य .
(यहां ले जाएं ...)
कहानी-कुञ्ज
भानमती का कुनबा.
▼
रविवार, 11 जुलाई 2021
राग-विराग -15..
›
राग-विराग 15. "भौजी, भौजी हो . . . कहाँ गईं? . . देखो तो तुम्हारे लिये क्या आया है?" साड़ी के पल्ले से भीगे हाथ पोंछती रत्नावली आत...
10 टिप्पणियां:
गुरुवार, 24 जून 2021
राग-विराग -14.
›
* गोस्वामी तुलसीदास कोरे धूनी रमाने वाले संत नहीं थे, जिसे केवल अपनी मुक्ति की चिंता सताती. वे ऐसे संत थे जिसका हृदय लोक-जीवन में संत्रास द...
5 टिप्पणियां:
शनिवार, 12 जून 2021
राग-विराग - 13.
›
* जब भी नन्ददास का इधर चक्कर लगता है, भौजी के हाल-चाल लेना नहीं भूलते. जानते हैं दद्दू के समाचार पाने को वे भी व्याकुल होंगी. देवर होने का...
6 टिप्पणियां:
रविवार, 23 मई 2021
राग-विराग -12.
›
जीवन की लंबी यात्रा कर वे रामबोला से तुलसी(दास) और तुलसी से गोस्वामी तुलसीदास तक की दूरी तय कर चुके थे .अनेक ग्रंथों का प्रणयन कर लोक में प...
13 टिप्पणियां:
शुक्रवार, 7 मई 2021
राग-विराग - 11.
›
राग-विराग - 11. अनेकों अवान्तर कथाओं द्वारा रोचकता बढ़ाने के साथ नई-नई जानकारियां देते हुए तुलसीदास का कथा-क्रम चलने लगा था. बीच-बीच में ग...
7 टिप्पणियां:
बुधवार, 28 अप्रैल 2021
राग-विराग - 10.
›
* उस दिन हड़बड़ा कर तुलसीदास बड़े भिनसारे ही काशी से निकल पड़े थे. अंतर्मन से पुकार उठ रही थी - 'हे राम , अपनी शरण में...
6 टिप्पणियां:
मंगलवार, 6 अप्रैल 2021
राग-विराग - 9.
›
* वापसी में रत्ना बहुत चुप-चुप थी . नन्ददास बत करने का प्रयत्न करते, तो हाँ,हूँ में उत्तर दे देती. वे उसकी मनस्थिति समझ रहे थे.. कुछ देर चु...
15 टिप्पणियां:
‹
›
मुख्यपृष्ठ
वेब वर्शन देखें