लालित्यम्
ललित लेखन -गद्य .
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कहानी-कुञ्ज
भानमती का कुनबा.
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मंगलवार, 11 सितंबर 2018
सावधान, वे सड़कों पर घूम रहे हैं.
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* बोलते-बोलते हमारी बोली कितनी बदल जाती है कभी सोचा है? नये-नये शब्दो की भर्ती कहाँ से हो गई,पुराने कब,कहाँ बिसर गये पता ही नहीं चलता. फ़िल...
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गुरुवार, 12 जुलाई 2018
निमंत्रण
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* भ्रमण के लिये बाहर न जा पाऊँ तो साँझ घिरे ,अपने ही बैकयार्ड में टहलना अच्छा लगता है . ड्राइव वे तक, मज़े से सवा-सौ कदम ...
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शुक्रवार, 18 मई 2018
हरफ़नमौला -
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* अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं- आपकी तारीफ़ ? भला कोई अपने मुँह से अपनी तारीफ़ करता है? अब क्या-क्या कहूँ अपने बारे में, मुझे तो शर...
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रविवार, 13 मई 2018
गुड़ - शक्कर
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कहाँ शक्कर और कहाँ गुड़ ! एक रिफ़ाइंड, सुन्दर, खिलखिलाकर बिखर-बिखर जाती, नवयौवना , देखने में ही संभ्रान्त, सजीली शक्कर और कहाँ गाँठ-गठीला...
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शनिवार, 5 मई 2018
व्यक्ति की स्वाधीनता -
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* कुछ दिन पहले 104 साल के बॉटनी और इकोलॉजी के प्रख्यात वैज्ञानिक डेविड गुडऑल ने ऑस्ट्रेलिया में अपने घर से विदा ली और अपनी ज़िंदगी ...
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शनिवार, 17 मार्च 2018
मैं अश्वत्थामा बोल रहा हूँ --
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मैं, अश्वत्थामा बोल रहा हूँ - शप्त मानवता के विषम व्रण माथे पर लिये मैं,अश्वत्थामा ,युगान्तरों से भटक रहा हूँ .चिर-संगिनी है वह अहर्न...
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सोमवार, 25 दिसंबर 2017
सप्ता धाये का फल पावै --
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* हिन्दी भाषा में परम्परा से चले आते कुछ ऐसे शब्द हैं जिनका ,समय के प्रवाह और परिस्थितियों के फेर में , अपने पूर्व अर्थ से बहुत अपकर्ष ...
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