लालित्यम्
ललित लेखन -गद्य .
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कहानी-कुञ्ज
भानमती का कुनबा.
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मंगलवार, 26 सितंबर 2017
श्री सलिल वर्मा द्वारा कृष्ण-सखी - एक प्रतिक्रिया ,पर मैं जो कहना चाहती हूँ -
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श्री सलिल वर्मा द्वारा कृष्ण-सखी - एक प्रतिक्रिया ,पर मैं जो कहना चाहती हूँ - कृष्ण -सखी का यह मूल्यांकन ऐसा लगा जैसे पूरी तरह रचना के ग...
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मंगलवार, 15 अगस्त 2017
जहँ-जँह चरण पड़ें ....
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* इंसानी कारस्तानियों से तो अब सारी दुनिया पनाह माँगने लगी है .एक छोटा सा उदाहरण अभी हाल ही में सामने आया ह...
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शनिवार, 29 जुलाई 2017
हम भी हैं पाप के भागी -
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* रात्रि आधी से अधिक बीत चुकी थी ,हमलोगों को लौटने में बहुत देर हो गई थी ,उस कालोनी में अँधेरा पड़ा था.कारण बताया गया कि रात्रि-चर और वन्य...
7 टिप्पणियां:
बुधवार, 19 जुलाई 2017
आगे-आगे देखिये होता है क्या ...
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* जन्म से लेकर मृत्यु तक हम वस्त्रों में ही लिपटे रहते हैं. वस्त्र-विन्यास का यह तीसरा युग है . पहला युग - प्राकृतिक उपादानों से निर्मित ...
6 टिप्पणियां:
शुक्रवार, 7 जुलाई 2017
आवहि बहुरि वसन्त ॠतु -
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* बड़ी तेज़ गति से चलते चले जाना - वांछित तोष तो मिलता नहीं ,ऊपर से मनः ऊर्जा का क्षय ! तब लगता है क्यों न अपनी मौज में रमते हुये पग...
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रविवार, 18 जून 2017
मैं कौआ नहीं बनना चाहती
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* बाहर लान में खुलनेवाली हमारी खिड़की के शेड तले एक भूरी चिड़िया ने घोंसला बनाया है.अब तो अंडों में से बच्चे निकल आये हैं .चिड़िया दूर तक ...
10 टिप्पणियां:
शुक्रवार, 5 मई 2017
ज्ञान की आँधी -
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* बाह्य संसार से जब कोई परेशान हो जाता है, उबरने का कोई रास्ता नहीं दिखाई देता तो उस झींकन के साथ उसके अंतःचक्षु खुलने लगते हैं.नई-नई ...
2 टिप्पणियां:
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