लालित्यम्
ललित लेखन -गद्य .
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कहानी-कुञ्ज
भानमती का कुनबा.
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गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013
आत्म-हंता.
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* अंतरिक्ष की असीम परिधि में एक अति लघु धूमिल छाया डोल रही है . पारदर्शी-सा धुआँ, कोई रंग न रूप गड्डमगड्ड भटकता हुआ. हाँ,बीच-बीच में मन...
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शनिवार, 16 फ़रवरी 2013
भानमती की बात - राष्ट्रीय गाली .
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* 'इत्ते दिन कहाँ रहीं भानमती? हमें लगा तुमने यह देश छोड़ दिया.' 'देश कहाँ छोड़ा ,हम तो देस गये रहे .' 'ओह, अपने गा...
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सोमवार, 11 फ़रवरी 2013
तृप्ति!
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* बड़ी देर में लौट कर आई थी. पूछा,' खाना खा लिया?' 'अभी नहीं.' 'क्यों? इतनी देर से बैठे हो ,रामरती से कहते परस दे...
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शनिवार, 26 जनवरी 2013
इतना तो विहित है -
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* अब के लोगों के गले से ज़रा कम ही उतरेगी .बात तब की है जब हमारे देश में स्त्रियाँ पति का नाम नहीं लेती थीं, मेरी तो ऐसी आदत पड़ी है कि...
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गुरुवार, 24 जनवरी 2013
हिमगिरि के ननिहाल में (उत्तरार्ध).
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* लीजिये,आ गया ब्रह्मअरण्य क्षेत्र ! पाँच नदियों का संगम -कृष्णा ,कोयना ,वेण्णा ,सावित्री और गायत्री. कृष्णा नदी का क्षेत्र बहुत विस्त...
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बुधवार, 9 जनवरी 2013
रट के आई हैं ?
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मौसम बदल रहा था ।ऐसे दिनों में प्रायः ही ज़ुकाम की शिकायत हो जाती है । जब क्लास में खड़े होकर बोलना पड़ता है तो गले में एकदम सुरसुरी और...
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शनिवार, 5 जनवरी 2013
हिमगिरि के ननिहाल में -
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* देश के दक्षिणी भागों की यात्रा का स्वभाव और प्रभाव ही कुछ और है .उत्तर के गंगा-यमुनी समतलों को पीछे छोड़ती विंध्य और सतपुड़ा से आगे ...
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