लालित्यम्
ललित लेखन -गद्य .
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कहानी-कुञ्ज
भानमती का कुनबा.
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शुक्रवार, 25 मई 2012
कृष्ण-सखी - 41 & 42.
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41 किसी भाँति स्थिर नहीं हो पा रही पांचाली . पिछली घटनाओं ने झकझोर कर रख दिया है . सहज तो वे पाँचो भी नहीं - जैसे भीतर ही भीतर जैसे क...
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बुधवार, 16 मई 2012
कृष्ण-सखी - 39 & 40 .
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39 * उस दिन जो सुन पाया बार-बार क्यों उद्विग्न करता है! अंतर से कोई बोल उठता है -अब पांचाली के कहने पर चेते हो ,सत्यवती ने भी कुछ कह...
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गुरुवार, 3 मई 2012
कृष्ण-सखी - 37 & 38.
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37 गहराती निशा का नीरव अंधकार समूचे कुरु-क्षेत्र पर छाया है .हवायें गुमसुम .बीच-बीच में उठती शिवाओं और श्वानों की ध्वनियाँ उस घोर गहनता ...
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मंगलवार, 24 अप्रैल 2012
कृष्ण-सखी - 35.& 36.
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35 * सुभद्रा का पुत्र ,कृष्ण का भागिनेय - अभिमन्यु ! रह-रह कर पार्थ का हृदय तड़प उठता है, उन सात महारथियों ने कैसे घेर कर मारा होगा अ...
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शनिवार, 14 अप्रैल 2012
कृष्ण-सखी - 33 & 34 .
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33 * साक्षात् काल- रूप धरे हैं भीष्म ! तुले हुये ,जैसे ललकार रहे हों पार्थ को .कब तक संयत रहोगे ? आज मुझसे निपटना ही पड़ेगा .पांचाल और ...
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सोमवार, 9 अप्रैल 2012
सावधान ,वे सड़कों पर घूम रहे हैं
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* फ़िल्में और उनके गीत ,हमारे शयन-कक्षों और ड्राइँग रूम्स का हिस्सा बन चुके हैं .मुंबइया हिन्दी हमारी भाषा में छौंक लगाने लगी है (बिंदा...
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बुधवार, 4 अप्रैल 2012
कृष्ण-सखी .31 & 32 .
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31. व्यग्रता से पांचाली के पीछे बारादरी में निकल आये थे पितामह. जनार्दन को देख विस्मयाभिभूत से कुछ पल खड़े रह गये . आगे के घटन...
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