लालित्यम्
ललित लेखन -गद्य .
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कहानी-कुञ्ज
भानमती का कुनबा.
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गुरुवार, 31 मार्च 2011
भानमती की बात - आग और फूस.
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* बड़ों की कही हुई बातें कभी-कभी सोचती ही रह जाती हूँ .कुछ सार तो था ही ,अब कोई चाहे जितना दकियानूसी कह ले .व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाय ...
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शनिवार, 26 मार्च 2011
कृष्ण-सखी - 7. & 8..
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7, ओह, उस दिन की बात - बाहर से दुर्वासा की पुकार आई थी , युधिष्ठिर बाहर आए ,शीष नवाया ,अभ्यर्थना की . 'आज्ञा दीजिये ऋषिवर ,' ...
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सोमवार, 21 मार्च 2011
बड़ा मज़ा आया !
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* दो छोट-छोटे मोज़े ,ऊपर से रोल किए हुए जैसे उतारे वैसे ही उछाल दिए .एक इधर ,एक उधर . सिमटे पड़े हैं दोनों - एड़ी और पंजे दोनों के काफ़ी श...
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मंगलवार, 15 मार्च 2011
एक थी तरु - 8 . & 9.
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8 . शन्नो उस दिन बहुत रोई थी .आँखें सूज गईं थीं .माता-पिता दोनों बहुत क्रोध में थे .बार-बार शन्नो पर चिल्लाते रहे . " तारा वहाँ क्य...
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बुधवार, 9 मार्च 2011
एक नदी बहती है - आकाश में.
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एक नदी बहती है - आकाश में. * चारों ओर कुहासा छाया है - सफ़ेद धुँधलका .दुपहरी हो गई पर सूरज का बिंब धुंध के आवरण में ढका झिलमिला कर रह ग...
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गुरुवार, 3 मार्च 2011
कृष्ण-सखी - 5 &.6 .
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5. 'कृष्णे ,तुम्हारा कोई मनोभाव मेरा अजाना नहीं है , ये रीति नीति सब अलग रह जाती हैं .तुम्हारी अनुरक्ति और विरक्ति के अंकन मुझसे छि...
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रविवार, 27 फ़रवरी 2011
भानमती की बात - 2 (अरे,अरे,अरे !)
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* छूट माँगने में कोई शर्म नहीं हमारे यहाँ किसी को ! सिर पर चढ़ के माँगते हैं ,जैसे दूसरे इनका उधार खाए बैठे हैं. छूट लेने की तो जैसे हम...
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